नोट- इस कहानी के सब पात्र काल्पनिक है- किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है।
मनेका का विवाह छुटकु उस्ताद से हो तो गया था किंतु मनेका अठारह वर्ष की कमसिन कन्या थी। प्रियदर्शिनी को छुटकु उस्ताद को काफ़ी मनाना पड़ा कि भइये , लड़की को अठारह की तो होन दे पहले। ख़ैर - विवाह हुआ पारसी रीति रिवाजो से - वो एक अलग गाथा है। ये वाली गाथा तो मनेका के सुसराल से धकियाने जाने की है।
आपातकाल में छुटकु उस्ताद और नयी नवेली मल्लिका ऐ हिंदुस्तान सत्ता का सबसे तगड़ा नशा किए घूम रहे थे। मनेका तो खुले आम सास प्रियदर्शिनी को कहती- कब हमाये आदमी को वज़ीरऐआला बनाओगी डोकरी। प्रियदर्शिनी खिसिया खिसिया रह जाती। छुटकु लड़के की मुहब्बत ने लौहस्त्री के हाथ जकड़ रखे थे। प्रियदर्शिनी को मनेका से ख़तरा ना था- असल ख़तरा तो उसकी अम्मा अम्तृश्वर और बहन अंबिका से था। मैंतारी अम्तृश्वर तो अपने भाई से प्रॉपर्टी के केस में जीत कर आई थी और बहन अव्वल दर्ज की धायं धायं क़िस्म की कर्कश स्त्री थी। दोनों मनेका के दम पर फूल रही थी। फ़ौजी पिता इस काल में अलग ही चरस बोए पड़े थे- अमेरिकी कंपनी के कमीशन एजेंट बने चाँदी काट रहे थे।एक लड़की को प्रभावशाली परिवार में टिका कर बाक़ी सब का ऐश करने का ये फार्मूला आजकल भारत में बड़ा प्रचलन में है जी।
ख़ैर- विवाह के छः साल बाद अकस्मात् क़िस्मत ने पलटा खाया और हवाई दुर्घटना में छुटकु उस्ताद ख़ुदा को प्यारे हुए। प्रियदर्शिनी की हालत बुरी हो गई- कोई राजनीतिक पारिवारिक सहारा अब शेष ना था। बड्ढे लड़के को पायलट की नौकरी और विदेशी छोकरी से फ़ुरसत ही ना थी। मनेका हालाँकि दुखी थी- नन्हा सा बालक था किंतु कमउम्र और राजनैतिक आकांक्षाओं ने ग़म भुलाने में मदद की। मनेका को आशा थी छुटकु उस्ताद का पदभार उसे मिल जाएगा। सास की सचिव बनने के लिए भी वो तैयार थी। लेकिन एक समस्या उसके सामने विकराल मुँह फाड़े खड़ी थी। वो अभी पच्चीस की ना हुई थी- इसके चलते छुटकु उस्ताद की सीट अमेठी से वो चुनाव ना लड़ सकती थी। इंतज़ार करने के अलावा मनेका के पास कोई और चारा ना था। सास से दो दो हाथ करने का समय अभी ना आया था।
इस दौरान उसने सूर्या पत्रिका पर पूरा ध्यान दिया। पत्रिका की कमान और मालिकाना हक़ अपनी मम्मी को दे चुकी थी- संपादक रंगीले सदाबहार बुढ़ऊ थे ही। बुढ़ऊ ने नमक का हक़ अदा किया और सूर्या पत्रिका में तड़कता भड़कता लेख लिखा - छुटकु उस्ताद का राजनीतिक वारिस कौन। लेख में अंत में मनेका को शेर पर विराजमान दुर्गे से तुलना कर उसे उचित वारिस घोषित कर दिया गया। प्रियदर्शिनी के कान खड़े हुए- यूँ कि शेर वाली दुर्गे तो हम है, हमारा ख़िताब छिनेंने वाली ये कल की छोकरी मुझसे मुक़ाबला करेगी। सास को पटखनी देना इतना आसान ना था।
देश के प्रथम परिवार के हितैषी और रिश्तेदार कौल साब ने बड़े लड़के बड्ढे उस्ताद को समझाया- अभी भी टैम है। छोकरी और नौकरी का मोह छोड़ो और अमेठी के सिंहासन पर भाई छुटकु उस्ताद का राजनीतिक कार्यभार सम्भालो। ना तो मनेका पच्चीस की होने पर वो सिंहासन तुमसे छीन लेगी। बड्डे उस्ताद जल्दी समझ गये और अमेठी के उपचुनाव में जीत भी गये। जेठ की जीत मनेका को फूटी आँख ना सुहायी। सरेआम बयान कुछ यूँ दिया- जेठ जी को राजनीति कहाँ करनी आती है। उनकी बीवी फ़िरंगी- अब तक नागरिकता ना ली। जेठ जी घनघोर आलसी- दस बजे से पहले ना उठते है। बताओ घर की कलह खुले आम चल रही थी। सास ने मनेका को समझाया, हल्का धमकाया किंतु अब वो समझाने वाली ना थी। अब तो खुले आम दो दो हाथ करने का उसका मूड बन चुका था।
सूर्या पत्रिका में आरएसएस के बढ़ते प्रभाव को देख प्रियदर्शिनी ने मनेका और अपनी समधन को समझाया- पत्रिका ख़रीदने का ऑफर दिया। किंतु वे दोनों ना मानी। उल्टा सास पर दबाव बनानी लगी- रंगीले बुढ़ऊ संपादक को एक गर्मागर्म इंटरव्यू दे दें। सास प्रियदर्शिनी ने साफ़ इंकार कर दिया। इसी दौरान उत्तर प्रदेश विधान सभा में इस पार्टी के अनेक लोगो ने विद्रोह का बिगुल बजा दिया। इन बग़ावत वालों का नेतृत्व कर रहे थे डम्पी भाईजान। भाईजान का छुटकु उस्ताद से स्कूल टैम से दाँत काटी रोटी का रिश्ता नाता था। भाईजान ने भाभी जान को सभा को संबोधित करने न्योता भेजा। किंतु सास ने लगाम कस दी- ना जाने दिया। आख़िर इस पार्टी में केवल वफ़ादार लोगों की वैल्यू थी- बग़ावत करने वालों को वो सबक़ सिखाना जानती थी।
इसी दौरान इंग्लैंड में शहज़ादा चार्ल्स और शहज़ादी डायना का निकाह मुक़र्रर पाया गया। सास प्रियदर्शिनी ने अपने नये युवराज बड्ढे उस्ताद और विदेशी बहू को उत्ते दावत खाने भेजा और मनेका को केन्या भेज दिया ताकि वो तीनों बालकों को चिड़ियाघर दिखा लाये। मनेका को लगा शाही विवाह में तो मुझे जाना चाहिए था किंतु भेजा गया हाथी जिराफ़ दिखाने। पानी सर से गुजर चुका था। भारत आने पर सास, जेठ जेठानी की ग़ैर मौजूदगी में वो सीधे लखनऊ पहुँची और भाईजान के साथ सभा में जमकर विषवमन किया। इस टैम सास को वो कम आंक रही थी।
देश लौटने पर प्रियदर्शिनी को उनके सचिव धवन जी और योग गुरु ने मनेका द्वारा किया कांड वीडियो टेप पर दिखाया। सास ने मनेका को कमरे में पैग़ाम और ख़ाना भिजवाया- कहा अब से तुम्हारा शेष परिवार के संग भोजन करना बंद। ऐंठेली मनेका ने अब सुपरहिट मुक़ाबला करने की ठान ही ली थी। थोड़ी देर में नौकर उसे बुलाने आया- देश की प्रधान मंत्री तुम्हें अब देखना चाहेंगी। मनेका सास के कमरे में पहुची जहां योगाचार्य और धवन जी के साथ वो नंगे पैर चहलक़दमी कर रही थी।
देखते ही सासु ने दहाड़ कर कहा- अभी इसी वक़्त इस घर से निकल जाओ। मनेका ने साफ़ इनकार कर दिया- कहा मेरे शौहर का घर है। प्रतिउत्तर में - ये देश की प्रधान मंत्री का घर है- अभी के अभी यहाँ से अपनी माँ के घर चली जा। लगे हाथो सासु ने उसकी माँ को भी दो चार फ़ारसी शब्द सुना दिये। कोई भी स्त्री कुछ भी सहन कर लेगी किंतु अपने माँ पिता का अपमान नहीं सहन करेगी। मनेका ने तुरंत अपने कमरे में जाकर अपनी कर्कश बहन अंबिका आनंद को टेलीफ़ून कर बुला भेजा। बहन को कोई काम धंधा तो था नहीं तुरंत आ पहुँची और सास से झगड़ा आदि करना शुरू कर दिया। इसी दौरान विदेशी बहू ने बड्ढे उस्ताद और उनके भाई अरुण को भी दफ़्तर से बुला लिया। गृह क्लेश की महफ़िल पूर्ण रूप से जम चुकी थी।
बड्ढे उस्ताद ने जब मनेका और उसकी बहन को माँ से बदतमीज़ी करते देखा तो उन्होंने आवास के सिक्योरिटी हेड को कहा- इन दोनों को धक्के मार घर से निकाल दो। हेड भी डेढ़ श्याना निकला- बोला- लिखित में दो आदेश। अरुण ने तुरंत रोका और समझाया - ये मत करना ना तो लंबे जाओगे। शुक्र है उस ज़माने में ४९८ वाला क़ानून ना था ना तो और क्या क्या होता। ख़ैर सास प्रियदर्शिनी ने अपना रौद्र रूप दिखाया कहा- तुरंत इसी वक़्त कपड़े आदि लेके निकल जाओ बाक़ी सामान बाद में भिजवा देंगे। दो साल के पोते को उन्होंने अपने कमरे में सुलवा दिया।
धायं धायं बहन ने तुरंत फ़ून कर अपनी अम्मा और रंगीले बुढ़ऊ को बुला भेजा। बुढ़ऊ तुरंत सब विदेशी पत्रकार आदि की टीम टाम लिए प्रधान मंत्री आवास पर आ धमके। कैमरा की फ़्लैशलाइट चमकनी शुरू। प्रियदर्शिनी को हल्का हल्का बुख़ार भी था- अपने नवजात पोते की कस्टडी लेने की चिंता थी। इसी दौरान मनेका और उसकी बहना ने अपने कुत्ते सचिव जी पर छोड़ दिये। चूँकि सचिव जी दबाव बना रहे थे तो उन्हें कुत्ते से कटवा दिया। कुकुर प्रेम उसी ज़माने से चला आ रिया है जी।
अपने सूटकेस आदि पैक करके अपने बच्चे को लेने जब मनेका आयी तो सासु ने बच्चा देने से साफ़ इंकार कर दिया। रात गहरा रही थी- किंतु तुरंत वकीलों की टीम आवास पर आ पहुँची। वकील आदि बोले- बच्चे को दे दो नहीं तो पुलिस केस में लंबा जाओगी। मन मार कर बालक को देना पड़ा। जब सूटकेस आदि टेम्पो में भरे जाने लगे तो सचिव जी को फिर कीड़ा काटा- सब माल असबाब की जाँच करने की माँग रखी। बहू मनेका ने सास से एक बड़ा अच्छा सबक़ सीखा था।सबक़ था- अपनी व्यथा पब्लिक में खुल कर दिखाओ। सब मीडिया के सामने उसने सब सूटकेस आदि खोल कर रख दिये। पूरी दुनिया ने ये तमाशा देखा। बाक़ायदा फ़ोटू आदि लिए गये। प्रियदर्शिनी ने ये देख अपना माथा पीट लिया। ऐन मौक़े पर बहू बाज़ी मार गई। सब सहूनिभूति बटोर के ले गई।
अगले दिन अखबारो में खबर और फ़ोटू छपी किस प्रकार छोटी बहू को घर से निकाला गया। इस सब ट्विस्ट और टेल में विदेशी बहू की भूमिका पर अलग से सीरीज लिखनी पड़ेगी।
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