बुधवार, 9 अगस्त 2017

वो जुर्म जिसके चलते एक हाथी को फांसी दे दी गई

                       वो जुर्म जिसके चलते एक हाथी को फांसी दे दी गई

कोई फिल्म शुरू होती है तो कभी कभी एक डिस्क्लेमर आता है. कि इस फिल्म में किसी जानवर को नुकसान नहीं पहुंचाया गया है. अगर सच में नुकसान पहुंचा दिया तो पेटा वाले धर लेते हैं. नहीं तो मेनका गांधी भरता बना देती हैं. होना भी यही चाहिए. जानवरों पर अत्याचार करना इंसान का काम नहीं है. लेकिन एक बार सारी लिमिट क्रॉस हो गई थी. एक मादा हाथी को उसी सर्कस के लोगों ने फांसी पर लटका दिया था जिसका वो पेट भरती थी. वो भी खुलेआम, ढाई हजार लोगों की भीड़ के सामने.

मामला तकरीबन सौ साल पुराना है यानी 1916 की बात है. टेनेसी, अमेरिका में चार्ली स्पार्क नाम का आदमी एक बहुत बड़ा सर्कस चलाता था. सर्कस का नाम था स्पार्क्स वर्ल्ड फेमस शोज़. उसमें बिग मैरी नाम की एक मादा हाथी थी. आगे इसको हथिनी लिखा जाएगा काहे कि मादा लिखने और पढ़ने में भारी लगता है. तो मैरी बड़ी टैलेंटेड थी. वो अपनी सूंड से सींग बजाती थी और 25 तरह का म्यूजिक निकालती थी.


तो ये सर्कस अपना शो जमाने के लिए इरविन शहर से 40 किलोमीटर दूर किंगस्पोर्ट नाम की जगह पर लगा था. 11 सितंबर की बात है. वॉल्टर एल्ड्रिज नाम के एक नए आदमी ने सर्कस जॉइन किया. इसका काम मैरी को ट्रेनिंग देना था, लेकिन उसको पहले से कोई एक्सपीरिएंस नहीं था. उसके बाल लाल भूरे टाइप के थे इसी वजह से उसे रेड कहा जाता था. 38 साल के इस आदमी के पास घर बार नहीं था इसीलिए नौकरी मिल गई थी.

अपनी जॉइनिंग के अगले दिन मैरी को उसने संभाल लिया. उसके हाथ में एक भाला पकड़ा दिया गया. समझा दिया गया कि मैरी के कान पर धीरे से इसे मारना है. अगर वो कंट्रोल में न आ रही हो. सर्कस के प्रचार के लिए टाउन में परेड करनी थी. जिसके लिए रेड मैरी को लेकर निकला. रास्ते में एक जगह मैरी को तरबूज का टुकड़ा दिखा. वो खाने के लिए रुक गई. एल्ड्रिज उसके ऊपर सवार था और उसको बड़ी जल्दी थी. वो बार बार भाला चुभाने लगा.

मैरी उसकी बार बार की हरकत से परेशान हो गई. उसने सूंड घुमाई और एल्ड्रिज को उठा के पटका जमीन पर. उसके सिर पर लात रखके कुचल दिया. खोपड़ी फट गई, एल्ड्रिज मर गया. जिन लोगों ने ये देखा उनके होश फाख्ता हो गए. सब गिरते पड़ते वहां से भागे. फिर ये बात मार्केट में फैल गई कि जब तक मैरी रहेगी, इस सर्कस का कोई शो देखने नहीं जाएगा. लोगों की मांग थी कि मैरी को मार डाला जाए.

चार्ली बिजनेसमैन था. उसको लगा कि एक हाथी की वजह से सर्कस बंद करना ठीक नहीं है. उसने मैरी को मारने का फैसला लिया. लेकिन उसे तमाशा दिखाने का एक्सपीरिएंस था. मैरी की मौत को भी तमाशा बनाने का मन बना लिया. तय हुआ कि मैरी को फांसी दी जाएगी. सोचो एक हाथी के लिए फांसी की सजा, कितना वाहियात आइडिया था. लेकिन इंसान पर शैतान सवार होता है तो ऐसे ही जुगाड़ दिमाग में आते हैं.


मैरी को ट्रेन में लादकर एरविन ले जाया गया. वहां एक क्रेन मंगाई गई, सौ टन भारी. जो वहां रेलवे के डिब्बे या बाकी सामान उठाने का काम करती थी. एरविन में उस टाइम नया नया रेलवे का काम चल रहा था. मैरी को रेल से बांध दिया गया. उसकी गर्दन में मोटी जंजीर लपेटी गई. फिर क्रेन ने उसे उठाया. मैरी इतनी जोर से चिंघाड़ी लोगों की हालत पतली हो गई. दर्द से छटपटाती मैरी सिर्फ पांच फिट ऊपर पहुंची थी कि चेन टूट गई. वो नीचे गिरी और उसके कूल्हे की हड्डियां टूट गईं. दोबारा और मोटी चेन मंगवाई गई. फिर से उसकी गर्दन में बांधी गई. फिर क्रेन से उठाया गया और आधे घंटे तक लटका के रखा गया. तब जाकर सबको यकीन हुआ कि ये मर चुकी है.

वो दिन है और आज का दिन है. एरविन शहर मैरी की फांसी के लिए याद किया जाता है. तब से जानवरों के खिलाफ क्रूरता पर कितने कानून बन चुके हैं. सजा कितनों को मिली है इसका पता नहीं. लेकिन इंसान सनकी है. तभी तो कभी मजे के लिए कुत्ते को जलाने की, कभी दांत के लिए हाथी को मारने की, कभी सींग के लिए हिरन को मारने की खबरें आती रहती हैं.

गजवा-ए-हिन्द

                                  जानिए गजवा-ए-हिन्द क्या है।

पहले तो यह जाने की गजवा-ए-हिन्द का मतलब क्या है, काफिरों को जीतने के लिए किये जाने वाले युद्ध को “गजवा” कहते हैं और जो इस युद्ध में विजयी रहता है उसे “गाजी” कहते हैं, जिस भी आक्रान्ता और अक्रमंनकारी के नाम के सामने गाजी लगा हो या जिसे गाजी की उपाधि दी गयी हो निश्चय हो वह हिन्दुओ का व्यापक नर संहार करके इस्लाम के फैलाव में लगा था। हम हिन्दुओ की सबसे बड़ी कमजोरी है की हम धर्म के बारे में बहुत कम जानते हैं और और अपने को सेकुलर कहते है और सेकुलर का मतलब भी नहीं जानते। एक मुस्लिम अपने को कभी भी सेकुलर नहीं कहता है, चाहे वह नेता हो या आम नागरिक , हां, वह हिन्दू भीड़ में सेकुलर बनने का महत्व का भाषण जरुर देता है।

गजवा-ए-हिन्द का मतलब है की भारत में सभी गैर मुस्लिमो पर इस्लामिक शरिया कानून लागु करना जिसके लिए या तो इनको मारकर ख़तम कर दो या इनको इस्लाम स्वीकार कराओ या उन्हें तब तक जिन्दा रखो जब तक अपनी कमाई का एक हिस्सा “जजिया कर” के रूप में इस्लामिक सरकार को देते रहे जैसा मुग़ल करते रहे। भारत में यह एक बार हो चूका है, हलांकि यह तुकडे तुकडे में हुआ।
गजवा-ए-हिन्द के ७ मुख्य प्रक्रिया स्तर होते हैं



१- अल-तकिय्या :
यह वह अवस्था है जब मुस्लिम कमजोर या कम संख्या में होता है, इस स्थिति में काफिरों (गैर-मुस्लिमों)से झूठ बोलना और उन्हें धोखा देना जायज माना जाता है. यह अवस्था अपने को अंदरूनी तौर से मजबूत रखना और काफिरों से अपनी अंदरूनी जानकारियों से दूर रखना. नेहरुद्दीन जवाहिरी और मैमूना बेगम, राजीव का असली धर्म आज भी किसी को नहीं पता है.
२-काफिरों के मन में भय भरना :
इस काम के लिए काफिरों पर धोखे से हमला करना और उनकी हत्या करना, झुण्ड बनाकर किसी एक जगह पर काफिरों (गैर मुस्लिमों) पर हमले करना, जो पिछले ३-४ साल से भारत में जारी है. ट्रकों और गाड़ियों में भरकर किसी एक जगह पर हिन्दुओं को हड़काना सेकुलर सरकारों में कब से चल रहा है. इस काम के लिए गैर मुस्लिम अगुआ और आक्रामक नेताओं को मौत के घात उतरना, एक-एक करके उनको घात लगाकर खतम कर देना जिसे लोग भयभीत रहा करें और सार्वजनिक रूप से जबान न खोलें.

3 हथियारों का जखीरा इकठ्ठा करना :
यह काम बहुत ही निर्णायक होता है और इसमें धर्म युद्ध जैसे कोई नियम नहीं होते. काफ़िर को जितनी पीड़ा दायक मृत्यु दी जाये (दूसरे काफ़िर को दिखाकर) वह सबसे ज्यादा प्रभावी होता है. हथियार इकठ्ठा करने का काम जो “अदनान खगोशी और उसके बाद बहुत से मुस्लिम तस्कर” पिछले ४० साल से कर रहे हैं. सबसे ज्यादा हथियार सोवियत संघ से मुस्लिम देशों के टूटने के बाद भारत में लाये गए, अनुमान के अनुसार पूर्व सोवियत देशों से १ करोड़ AK-47 गायब हुयीं मगर आज तक उनका कोई पता नहीं है! ये हथियार मुख्यतः भारत-अफगानिस्तान-पाकिस्तान गए.
4 समय समय पर काफिरों की ताकत का अंदाज़ा करना :
इसके लिए दंगो का सहारा लेकर अपने आक्रमणों का काफिरों की तरफ से प्रतिरोध आंकना जो बहुत दिनों से चल रहा है और इसका ताजा उदाहरण जम्मू के किश्तवाड़ में देखने को मिला. छोटी-छोटी बातों पर बड़ा झगड़ा करके काफिरों की एक जुटता का और उनकी ताकत का पता लगाना.

5 ठिकाने या शिविर बनाना :
इस काम के लिए धर्म का सहारा और दूसरे धर्म पर इस्लाम को सच्चा धर्म बताकर लोगों को आस्थावान बनाकर किया जाता है जिससे लोग मुस्लिमों पर विश्वास करें और उन पर शक न करें. इस इलाके से गैर मुस्लिमों को दूर रखा जाता है जिससे उन्हें गतिविधियों की जानकारी मिल ही न सके और वे गाफिल रहें. इसके लिए बस्तियों और मस्जिदों को इस्तेमाल किया जाता है जहा पर लोगों को इकठ्ठा करना और हथियार रखना और भीड़ को भड़काकर काफिरों का उस इलाक़े में सफाया कर देना. इस्लामिक गतिविधि वाले शिविरों के इलाके से किसी न किसी बहाने सभी काफिरों को भगाना जरुरी होता है जिससे कि कहीं संवेदनशील सूचनाएँ काफिरों को लीक न हो जाएँ क्योंकि इस्लाम की असली ताकत “अल-तकिय्या” ही है.

6 सरकारी सुरक्षा तंत्र को कमजोर करना :
इस काम में तो खुद सरकारें तक शामिल हैं, हर शुक्रवार को नमाज़ के बाद पुलिस की पिटाई उनके मनोबल को तोड़कर पूरे तंत्र को कमजोर करने का हिस्सा है जो जोर-शोर से चल रहा है. असल में सेकुलर सरकारें खुद इस काम को पता नहीं किस वजह से समर्थन दे रही हैं. जिस फौजी के पास १२०० गज कारगर रेंज की असाल्ट रायफल है, वह इन जेहादियों पर गुलेल चला रहा है. इशरत जहाँ और सोहराबुद्दीन केस इसी का भाग है जो इस्लामिक शक्तियों के इशारे पर हो रहे हैं. सेना की संख्या कम रखना, उनके पास साधनों का अभाव, उनके ऊपर क़ानूनी शिकंजा, नौकरी को मजबूरी बनाना, यह इसी का हिस्सा है कि व्यापक दंगे की स्थिति में जिसमें मशीन गन और ग्रेनेड प्रयोग किये जाएँ, सेना का काम सिर्फ कर्फ्यू लगाने तक ही सीमित रहे.

7 व्यापक दंगे :
यह गजवा-ए-हिन्द का अंतिम पड़ाव है जिसमें बहुत कम समय में ज्यादा से ज्यादा काफ़िर या गैर मुस्लिम मर्दों को मौत के घाट उतारना और उनके प्रतिरोध को कम कर देना. गजवा-ए-हिन्द के लिए पाकिस्तान का भारत पर आक्रमण सबसे उपयुक्त समय होगा जो कि पाकिस्तानी वेबसाइटों पर बार-बार देखने को मिलता है. इस काम के लिए जेहादी लड़कों के मरने पर युवा जेहादियों को ७२ सुन्दर जवान हुर्रें मिलने की बात की जाती है और जीत गए तो जवान काफ़िर महिलाओं के साथ सहवास करने के अनंत मौके भी प्रस्तावित किये जाए हैं. यही अंतहीन सिलसिला पिछले १४०० सालों से चल रहा है. पहले भारत में सनातनी जड़ें गहरी थीं जिससे बार-बार सनातनी-हिदूत्व पनप सका लेकिन आज के दिन झूठे इतिहास और गलत पढ़ाई तथा चर्चों और अरबों द्वारा नियंत्रित टीवी / मिडिया ने हिंदुत्व का बेड़ा गर्क कर रखा है उस पर यह हिन्दू विरोधी सरकारें हर वह काम कर रही है जो हिंदुत्व को ख़त्म करने के लिए जरुरी है.

गजवा-ए-हिन्द की यह प्रक्रिया कश्मीर में आज़माई जा चुकी है जो १००% सफल रही है, जम्मू पश्चिम बंगाल केरल आदि में इसका ट्रायल चल रहा है. बीच में ईसाइयत के खेल ने इसे कमजोर ज़रूर किया था लेकिन अब दोबारा इसने गति पकड़ ली है. भले ही इसमें सबसे बड़ा रोड़ा जानकारी बाँटने के रूप में फेसबुक व्हाट्सएप्प सोसल मीडिया आ चुका है 
लेकिन फिर भी तस्करी के हथियार तो आ ही चुके हैं।

मिज़ोरम में क्रांति और फिर शांति

पूर्वोत्तर भारत में क्रांति और फिर शांति के महत्व को समझना हो तो एक बार ‘मिजोरम’ की यात्रा करनी चाहिए यात्रा न कर सकें तो मिजोरम के इतिहास को पढना चाहिए ...आजादी के बाद मिजोरम में हुए आंदोलन देश के अन्य राज्यों में हुए आंदोलनों से सर्वथा भिन्न रहे ...

मिज़ोरम कोई नहीं जाता। क्योंकि यह पूर्वोत्तर के पार की धरती है, पूर्वोत्तर के उस तरफ की धरती है। जिस तरह लद्दाख है हिमालय पार की धरती। जिसमें हिमालय चढने और उसे पार करने का हौंसला होता है, वही लद्दाख जा पाता है। ठीक इसी तरह जिसमें पूर्वोत्तर जाने और उसे भी पार करने का हौंसला होता है, वही मिज़ोरम जा पाता है। पूर्वोत्तर बडी बदनाम जगह है। वहां उग्रवादी रहते हैं जो कश्मीर के आतंकवादियों से भी ज्यादा खूंखार होते हैं। कश्मीर के आतंकवादी तो केवल सुरक्षाबलों को ही मारते हैं, पूर्वोत्तर के आतंकवादी सुरक्षाबलों को नहीं मारते बल्कि हिन्दीभाषियों को मारते हैं। कोकराझार बडी भयंकर जगह है। पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार है कोकराझार। कोकराझार से गुजरे बिना सिक्किम तो जाया जा सकता है लेकिन बाकी के सात राज्यों में नहीं जाया जा सकता।


भारत का सबसे साक्षर राज्य केरल (93.91%) है तो दूसरे स्थान पर मिज़ोरम (91.60%) है। यही नहीं देश के सबसे साक्षर दो जिले सेरछिप (98.76%) और आइजॉल (98.50%) हैं। ये दोनों मिज़ोरम में हैं।


मिज़ोरम के इतिहास का जिक्र किये बिना यह वृत्तान्त अधूरा है। यहां का असली इतिहास आजादी के बाद शुरू होता है। इसे आसाम राज्य में एक जिले का दर्जा दिया गया था। यहां की भाषा-संस्कृति आसाम से अलग होने के कारण शीघ्र ही इसे पक्षपात का सामना करना पडा। आसाम सरकार ने पूर्णतया मिज़ोरम की अनदेखी की। राजकीय भाषा असमिया कर देने और एक अकाल के बाद यहां स्थिति और बिगडी। ऐसे में इसे एक अलग राज्य बनाने की मांग जोर पकडने लगी। इसी दौरान एक विद्रोही संगठन मिजो नेशनल फ्रंट भी बन गया।

मिज़ो नेशनल फ्रंट का लक्ष्य अलग राज्य का नहीं था बल्कि भारत से स्वतन्त्र होकर अलग देश बनाने का था। इसके लिये इस फ्रंट ने अपनी एक सेना भी बनाई- मिज़ो नेशनल आर्मी। 1960 के दशक में फ्रंट के नेताओं ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) का भी दौरा करना शुरू किया। वहां से पाकिस्तान ने उन्हें हरसम्भव सहायता दी, धन और हथियारों की सहायता व इन्हें चलाने का प्रशिक्षण भी।
इसी दौरान भारत-चीन युद्ध और भारत-पाकिस्तान युद्ध हुए। भारत का सारा ध्यान अपनी पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर लग गया। विद्रोही फ्रंट ने इस परिस्थिति का भरपूर लाभ उठाया। इसकी अपनी प्रशिक्षित सेना हथियारों से लैस थी ही, साथ ही अच्छा संख्याबल भी था। विद्रोह को सुनियोजित तरीके से अन्जाम दिया गया। गुप्तरूप से इस ऑपरेशन का नाम रखा गया- ऑपरेशन जेरिचो। इसका अन्तिम लक्ष्य 1 मार्च 1966 को पूर्ण क्रान्ति करके मिज़ोरम को स्वतन्त्र राष्ट घोषित करने का था। इसमें कोई शक नहीं था कि तात्कालित तौर पर पाकिस्तान इस नये देश का समर्थन करता।

विद्रोही 28 फरवरी की रात को आइजॉल में घुस गये। इन्होंने शहर की टेलीफोन लाइनें काट दीं ताकि प्रशासन बाहर से सहायता न मांग सके। इन्होंने रात में ही शहर के सभी प्रमुख स्थानों और कार्यालयों पर कब्जा कर लिया। शहर की पूर्ण घेराबन्दी कर दी ताकि कोई बाहर न जा सके। कानून व्यवस्था स्थानीय पुलिस और आसाम राइफल्स के हाथों से निकल चुकी थी। हालात इतने बदतर हो चुके थे कि आइजॉल के डिप्टी कमिश्नर को आसाम राइफल्स के यहां शरण लेनी पडी। बाहर से सहायता का एकमात्र साधन सिल्चर सडक ही थी जिसे विद्रोहियों ने बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया था।

1 मार्च 1966 को मिज़ो नेशनल फ्रंट के नेता लालदेंगा ने भारत से आजादी की घोषणा कर दी और अधिक से अधिक संख्या में मिज़ो लोगों को अपने समर्थन में करने लगे। इसके बाद शहर में बुरी तरह हिंसा भडक उठी। गैर-मिज़ो लोगों को जमकर मारा गया, उनकी दुकानें लूटी गईं और घरों में आग लगा दी गई।
मिज़ोरम के दूसरे भागों में भी ऐसा ही हुआ। आइजॉल से 200 किलोमीटर दूर चम्फाई में तो उन्होंने आसानी से आसाम राइफल्स की पोस्ट पर कब्जा कर लिया। आसाम की सीमा पर स्थित वैरेंगते पर भी कब्जा कर लिया और सरकारी कर्मचारियों को जिले से भागना पडा। लुंगलेई में भी ऐसा ही हुआ। कोलासिब में करीब 250 लोगों को बन्धक बना लिया गया जिनमें गैर-मिज़ो नागरिक, सरकारी कर्मचारी आदि थे।
3 मार्च को भारत की आंख खुली। मामले की गम्भीरता को देखते हुए आसाम राइफल्स की और ज्यादा बटालियनें हेलीकॉप्टर से आइजॉल भेजी गईं व शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। हेलीकॉप्टर से जवानों को भेजना भी आसान नहीं था क्योंकि विद्रोहियों के पास अच्छे हथियार थे जो हवा में घातक मार कर सकते थे। इसकी जिम्मेदारी भारतीय वायुसेना को दी गई। पहली कोशिशों में विद्रोहियों ने वायुसेना को भी क्षति पहुंचाई। इसके बाद वो घटना हुई जिसे भारत तो क्या कोई भी देश नहीं करना चाहेगा। अपने ही देश में अपने ही नागरिकों पर हवाई हमला। वायुसेना ने जमकर हवाई हमले किये। बाद में मिज़ोरम के मुख्यमन्त्री ज़ोरमथंगा ने इन हमलों को ‘निर्दयी बमबारी’ कहा था। तात्कालिक रूप से ऐसा करना आवश्यक था।

उधर थलसेना ने भी मोर्चा संभाला। 6 मार्च को सेना आइजॉल पहुंची, इसके बाद चम्फाई और लुंगलेई। मार्च के अन्त तक सेना ने पूरे मिज़ोरम का कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया। एक समय मिज़ोरम में सभी आसाम राइफल्स की चौकियों पर विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया था सिवाय आइजॉल के। लेकिन वायुसेना ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया। रही सही कसर थलसेना ने पूरी कर दी।

इसके बाद विद्रोहियों को भागना पडा और वे गांवों में सामान्य लोगों के बीच घुलमिल गये और अपनी गतिविधियां जारी रखीं। यह भी एक चुनौतीयुक्त परिस्थिति थी क्योंकि इसमें आमलोगों को दोतरफा मार पडती है- एक तो विद्रोहियों से और दूसरी सेना से। तब जनवरी 1967 में भारत सरकार ने यहां ग्रुपिंग पॉलिसी लागू की जिसमें सभी को अपने अपने गांव छोडकर सेना के नियन्त्रण वाले इलाकों में बसना था। ये निवास स्थान मुख्यतः सडकों के पास थे। ऐसा करने के बाद सेना को विद्रोहियों को ढूंढने व उनकी चालें नाकाम करने में आसानी रही, हालांकि बडी संख्या में आमलोगों को मानसिक समस्या का सामना करना पडा। अपना घर व जमीन छोडकर अनजान स्थान पर बसना किसे अच्छा लगता है?

इसके बाद हालात और सुधरे। अगस्त 1968 में विद्रोहियों को माफी दे दी गई जिसके फलस्वरूप बडी संख्या में विद्रोहियों ने समर्पण किया व मुख्यधारा में शामिल हुए। फिर 21 जनवरी 1972 को मिज़ोरम को केन्द्र शासित प्रदेश बना दिया गया। मिज़ो नेशनल फ्रंट की विद्रोही गतिविधियां 1976 में समाप्त हुईं जब उसने भारत सरकार के साथ ‘सन्धि’ की। इसकी शर्तों के अनुसार भारत सरकार मिज़ोरम को अलग राज्य बनाने व आइजॉल को उसकी राजधानी बनाने पर सहमत हुई तो फ्रंट अपनी विद्रोही व हिंसक गतिविधियां छोडने पर। आखिरकार मिज़ोरम 20 फरवरी 1987 को भारत का राज्य बना।
तो जी, ऐसी भीषण कहानी थी मिज़ोरम की। अब मिज़ोरम भारत के सबसे शान्त राज्यों में से एक है। इसके पडोसी राज्य अवश्य उत्पाती हैं।

मिजोरम की एक खासियत इसकी साक्षरता है .... भारत के प्रमुख साक्षर राज्यों में शीर्ष पर स्थित मिजोरम में मिजो भाषा बोली जाती है लेकिन चूंकि मिजो भाषा की कोई अपनी लिपि नहीं है इसलिए यह रोमन में लिखी जाती है .... बावजूद इसके मिजोरम साक्षरता के मायने में एक मिसाल है ... और क्रांति के बाद शांति के मामले में भी।

युगोस्लाविया - सोवियत संघ

  यदि आप कभी bosnia-herzegovina जाएंगे तब एक जगह आपको 9300 मुसलमानों की सामूहिक कब्र दिखेगी जहां उन सभी के नाम लिखे हैं दरअसल यह मुस्लिम कही...