रविवार, 21 मई 2017

आंध्रप्रदेश और तेलंगाना

नेहरु और माउंटबेटन हैदराबाद राज्य [आज का पूरा आंध्रप्रदेश और तेलंगाना ] को आजाद देश बनाने के पक्ष में थे .......

अगर सरदार पटेल और कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी [के एम मुंशी ] नही होते तो आज आंध्रप्रदेश और तेलंगाना अलग देश होते ...
जिस समय ब्रिटिश भारत छोड़ रहे थे, उस समय यहाँ के 562 रजवाड़ों में से सिर्फ़ तीन को छोड़कर सभी ने भारत में विलय का फ़ैसला किया. ये तीन रजवाड़े थे कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद.
अंग्रेज़ों के दिनों में भी हैदराबाद [आज का आंध्रप्रदेश और तेलंगाना ] की अपनी सेना, रेल सेवा और डाक तार विभाग हुआ करता था. उस समय आबादी और कुल राष्ट्रीय उत्पाद की दृष्टि से हैदराबाद भारत का सबसे बड़ा राजघराना था. उसका क्षेत्रफल 82698 वर्ग मील था जो
कि इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक था.
हैदराबाद की आबादी का अस्सी फ़ीसदी हिंदू लोग थे जबकि अल्पसंख्यक होते हुए भी मुसलमान प्रशासन और सेना में महत्वपूर्ण पदों पर बने हुए थे.
उस पर तुर्रा ये भी था कि कट्टरपंथी क़ासिम राज़वी के नेतृत्व मे रज़ाकार हैदराबाद की आज़ादी के समर्थन में जन सभाएं कर रहे थे और उस इलाक़े से गुज़रने वाली ट्रेनों को रोक कर न सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिम यात्रियों पर हमले कर रहे थे बल्कि हैदराबाद से सटे हुए भारतीय इलाक़ों में रहने वाले हिन्दुओ का कत्लेआम कर रहे थे.
आजाद भारत का सबसे पहला आतंकी सन्गठन इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन था और आजाद भारत का पहला आतंकी कासिम रिजवी था .. हैदराबाद के निजाम ने कासिम रिजवी को हिन्दुओ का कत्लेआम करने का जिम्मा सौपा था .. कासिम रिजवी के समर्थकों को रजाकार कहा जाता था .. इस संगठन के पास बहुत हथियार थे और निजाम का समर्थन था ..इसलिए हैदराबाद स्टेट में हिन्दुओ का कत्लेआम होने लगा ..
नेहरु और माउन्टबेटन हैदराबाद को भारत में शामिल करने के पक्ष में नही थे .. लेकिन सरदार पटेल किसी भी कीमत पर हैदराबाद स्टेट को भारत गणराज्य में मिलाने के पक्ष में थे ...
सरदार पटेल ने के एम मुंशी को हैदराबाद में एजेंट-जनरल बनाकर भेजा .. मुंशी जी बिना वेतन इस पद पर जाने को राजी हुए .. और हैदराबाद की पल पल की खबर प्रधानमंत्री नेहरु को न देकर गृहमंत्री सरदार पटेल को दे रहे थे ...
निजाम ने जिन्ना को संदेश भेजकर ये जानने की कोशिश की थी कि क्या वह भारत के ख़िलाफ़ लड़ाई में हैदराबाद का समर्थन करेंगे? हैदराबाद का प्रधानमंत्री मीर लायक अली लगातार पाकितानी प्रधानमंत्री के सम्पर्क में था .. उसी समय गुप्त खबर आई की पाकिस्तान ने पुर्तगाली सरकार के साथ समझौता किया .. जिसके अनुसार उस समय पुर्तगाली सरकार के अधीन गोवा में हैदराबाद स्टेट के लिए नौसेना बेस बनेगा ..बदले में गोवा पर भारत के हमले की स्थिति में करांची से पाकिस्तान गोवा की मदद करेगा ...
निज़ाम के सेनाध्यक्ष मेजर जनरल एल एदरूस ने अपनी किताब 'हैदराबाद ऑफ़ द सेवेन लोव्स' में लिखा है कि निज़ाम ने उन्हें ख़ुद हथियार ख़रीदने यूरोप भेजा था. लेकिन वह अपने मिशन में सफल नहीं हो पाए थे क्योंकि हैदराबाद को एक आज़ाद देश के रूप में मान्यता नहीं मिली थी.
मज़े की बात ये थी कि एक दिन अचानक वह लंदन में डॉर्सटर होटल की लॉबी में माउंटबेटन से टकरा गए. माउंटबेटन ने जब उनसे पूछा कि वह वहाँ क्या कर रहे हैं तो उन्होंने झेंपते हुए जवाब दिया था कि वह वहाँ अपनी आंखों का इलाज कराने आए हैं.
माउंटबेटन ने मुस्कराते हुए उन्हें आँख मारी. लेकिन इस बीच लंदन में निज़ाम के एजेंट जनरल मीर नवाज़ जंग ने एक ऑस्ट्रेलियाई हथियार विक्रेता सिडनी कॉटन को हैदराबाद को हथियारों की सप्लाई करने के लिए राज़ी कर लिया.
भारत को जब ये पता चला कि सिडनी कॉटन के जहाज़ निज़ाम के लिए हथियार ला रहे हैं तो उसने इन उड़ानों पर प्रतिबंध लगा दिया.
सरदार पटेल के कड़े रुख से परेशान जब निज़ाम को लगा कि भारत हैदराबाद के विलय के लिए दृढ़संकल्प है तो उन्होंने ये पेशकश भी की कि हैदराबाद को एक स्वायत्त राज्य रखते हुए विदेशी मामलों, रक्षा और संचार की ज़िम्मेदारी भारत को सौंप दी जाए... लेकिन वो रज़ाकारों के प्रमुख क़ासिम राज़वी को इसके लिए राज़ी नहीं करवा सके.
रज़ाकारों की गतिविधियों ने पूरे भारत का जनमत उनके ख़िलाफ़ कर दिया. 22 मई को जब इत्तेहाद-ऊल-मुसलमीन के आतंकी यानी रजाकरो ने ट्रेन में सफ़र कर रहे हिंदुओं पर गंगापुर स्टेशन पर हमला बोला और तीस हिन्दुओ की हत्या की तो पूरे भारत में भारत सरकार की आलोचना होने लगी कि वो उनके प्रति नर्म रुख़ अपना रही है.
भारतीय सेना के पूर्व उपसेनाध्यक्ष लेफ़्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा अपनी आत्मकथा स्ट्रेट फ्रॉम द हार्ट में लिखते हैं, "मैं जनरल करियप्पा के साथ कश्मीर में था कि उन्हें संदेश मिला कि सरदार पटेल उनसे तुरंत मिलना चाहते हैं. दिल्ली पहुंचने पर हम पालम हवाई अड्डे से सीधे पटेल के घर गए. मैं बरामदे में रहा जबकि करियप्पा उनसे मिलने अंदर गए और पाँच मिनट में बाहर आ गए. बाद में उन्होंने मुझे बताया कि सरदार ने उनसे सीधा सवाल पूछा जिसका उन्होंने एक शब्द में जवाब दिया."
सरदार ने उनसे पूछा कि अगर हैदराबाद के मसले पर पाकिस्तान की तरफ़ से कोई सैनिक प्रतिक्रिया आती है तो क्या वह बिना किसी अतिरिक्त मदद के उन हालात से निपट पाएंगे?
करियप्पा ने इसका एक शब्द का जवाब दिया 'हाँ' और इसके बाद बैठक ख़त्म हो गई.
इसके बाद सरदार पटेल ने हैदराबाद के ख़िलाफ़ सैनिक कार्रवाई को अंतिम रूप दिया. भारत के तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल रॉबर्ट बूचर इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ थे. उनका कहना था कि पाकिस्तान की सेना इसके जवाब में अहमदाबाद या बंबई पर बम गिरा सकती है.
दो बार हैदराबाद में घुसने की तारीख़ तय की गई लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते इसे रद्द करना पड़ा. निज़ाम ने गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी से व्यक्तिगत अनुरोध किया कि वे ऐसा न करें.
राजा जी और नेहरू की बैठक हुई और दोनों ने कार्रवाई रोकने का फ़ैसला किया. निज़ाम के पत्र का जवाब देने के लिए रक्षा सचिव एचएम पटेल और वीपी मेनन की बैठक बुलाई गई.
उस समय हैदराबाद स्टेट में चार संस्थाए सक्रिय थी
१- इत्तेहाद-ऊल- मुसलमीन जो पूरी तरह से भारत सरकार के खिलाफ थी और हैदराबाद स्टेट को अलग देश बनाने के पक्ष में थी ...
२- कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया --ये भी रजाकरो यानि इत्तेहाद के साथ थी और हैदराबाद को अलग देश बनाने के पक्ष में थी .
३- हैदराबाद राज्य कांग्रेस -- ये हैदराबाद को भारत में मिलाने के पक्ष में थी
4- आर्य समाज और आरएसएस -- ये दोनों पूरी तरह से हिन्दुओ के साथ थे और इत्तेहाद रजाकरो के कहर से हिन्दुओ को बचाने ले लगे थे और ये भी हैदराबाद को भारत में मिलाने के पक्ष में थे ..
फिर जब खबर मिली की हैदराबाद का प्रधानमंत्री मीर लायक अली पाकिस्तान भाग गया और वहाँ से सैनिक मदद लेने का जुगाड़ कर रहा है तो सरदार पटेल में भारतीय सेना को हैदराबाद पर हमला करने का आदेश दिया
नेहरू और राजा जी चिंतित थे कि इससे पाकिस्तान जवाबी कार्रवाई करने के लिए प्रेरित हो सकता है लेकिन चौबीस घंटे तक पाकिस्तान की तरफ़ से कुछ नहीं हुआ तो उनकी चिंता मुस्कान में बदल गई.
हाँ, जैसे ही भारतीय सेना हैदराबाद में घुसी, पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ाँ ने अपनी डिफ़ेंस काउंसिल की बैठक बुलाई और उनसे पूछा कि क्या हैदराबाद में पाकिस्तान कोई ऐक्शन ले सकता है?
बैठक में मौजूद ग्रुप कैप्टेन एलवर्दी (जो बाद में एयर चीफ़ मार्शल और ब्रिटेन के पहले चीफ़ ऑफ डिफ़ेंस स्टाफ़ बने) ने कहा ‘नहीं.’
लियाक़त ने ज़ोर दे कर पूछा ‘क्या हम दिल्ली पर बम नहीं गिरा सकते हैं?’
एलवर्दी का जवाब था कि हाँ ये संभव तो है लेकिन पाकिस्तान के पास कुल चार बमवर्षक हैं जिनमें से सिर्फ़ दो काम कर रहे हैं.' इनमें से एक शायद दिल्ली तक पहुँच कर बम गिरा भी दे लेकिन इनमें से कोई वापस नहीं आ पाएगा.'
भारतीय सेना की इस कार्रवाई को ऑपरेशन पोलो का नाम दिया गया क्योंकि उस समय हैदराबाद में विश्व में सबसे ज़्यादा 17 पोलो के मैदान थे.
पांच दिनों तक चली इस कार्रवाई में 1373 रज़ाकार मारे गए. हैदराबाद स्टेट के 807 जवान भी रहे. मारे ..भारतीय सेना ने अपने 66 जवान खोए जबकि 97 जवान घायल हुए.
रजाकरो का नेता कासिम अली पाकिस्तान भाग गया ...
और इस तरह से हैदराबाद [आज का आंध्रप्रदेश और तेलंगाना ] भारत के हिस्से बने
फोटो में सरदार पटेल में सामने समर्पण करते हुए हैदराबाद स्टेट के निजाम

सनातन धर्म और बौद्ध धर्म


                                                 सनातन धर्म और बौद्ध धर्म 
                                                                                                            

 (1) प्रश्न :-
 "समुद्रगुप्त एवं सभी गुप्त वंशी शासकों ने वैष्णव धर्म का एवं क्षत्रिय धर्म का ही पालन किया था। मौर्य वंशियों ने ही जैन एवं बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया। कृपया बताएं"
उत्तर : -
"मौर्यवंश के सभी शासक हिन्दू थे, अशोक भी| अंग्रेजों और बौद्धों की झूठी बातों पर ध्यान देने के बदले अशोक के शिलालेख पढ़ लें, रोमिला थापर की पुस्तक में मिल जायेंगे | पेशावर का एक ग्रीक राजा मिनांदर बाद में बौद्ध बना, वरना भारत का कोई भी राजा कभी भी बौद्ध नहीं बना | किन्तु बौद्ध भिक्षुओं का भी सम्मान होता था, यही तो हिन्दुओं का स्वभाव रहा है | मिनांदर के बारे में भी बौद्ध स्रोत कहते हैं कि वह बौद्ध बन गया था , किन्तु दो इंडो-ग्रीक राजाओं (मीनराज तथा स्फुटिध्वज) ने ज्योतिष के ग्रन्थ संस्कृत में लिखे जिसका दर्शन 100% सनातनी है | अतः तथाकथित बौद्ध स्रोतों पर मुझे विश्वास नहीं है |
                                                                    (2) प्रश्न :--
"अब हम यही सुनते आये थे कि अशोक ने बौद्ध धर्म को अपना कर क्षत्रिय धर्म को नष्ट कर दिया अहिंसा का अत्यधिक प्रचार प्रसार करके ..... पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य वंश को समाप्त किया था वह बौद्ध धर्म को रोकने हेतु था या राजनीतिक कारणों से।
उत्तर :--
"इसका कोई प्रमाण नहीं है कि अशोक ने बौद्ध धर्म को अपनाया | सनातन धर्म से घृणा करने वाले अंग्रेजों ने जानबूझकर हिन्दू समाज को बाँटने के लिए कई हथकण्डे खोजे, जिनमे एक हथकंडा यह भी था कि बौद्धमत को बढ़ावा दिया जाय और हिन्दुओं से लड़ाया जाय | मैं पुनः कहता हूँ कि अशोक के शिलालेख पढ़ लें, "बौद्ध" शब्द ही नहीं मिलेगा, सर्वत्र "ब्राह्मणों और श्रमणों" के लिए विशेष सम्मान और छूटों का उल्लेख है | "श्रमण" का अर्थ जानबूझकर अंग्रेजों ने "बौद्ध" लगाया , जबकि ब्राह्मण का शास्त्रीय अर्थ होता है "ब्रह्म-प्राप्त ज्ञानी व्यक्ति" और श्रमण का अर्थ है श्रम अर्थात तपस्या में रत व्यक्ति जो तत्कालीन 65 सम्प्रदायों में से किसी भी सम्प्रदाय का हो सकता था | उन 65 में से एक सम्प्रदाय बौद्धों का भी था | बौद्धमत एक पृथक religion था ही नहीं | बौद्धों के मूल ग्रन्थ हैं त्रिपिटक, उनमें भी अशोक के शिलालेखों जैसी ही भाषा है : सच्चे ब्राह्मणों की सर्वत्र प्रशंसा गौतम बुद्ध ने भी धम्मपिटक में की और लोभी ब्राह्मणों की निन्दा की, किन्तु ऐसा तो वेदव्यास जी ने भी किया | गीता में श्रीकृष्ण भी कहते हैं कि अत्यधिक तप द्वारा शरीर को नष्ट करना पाप है, किन्तु प्राणायाम, व्रत आदि तप की बड़ाई भी की | यही तो गौतम बुद्ध का भी मध्यम मार्ग है | फिर गौतम बुद्ध ने ऐसी कौन सी नयी बात कही कि उनके मत को सनातन धर्म से पृथक religion माना जाय ? गौतम बुद्ध ने कब कहा कि वे कोई नया धर्म या religion आरम्भ कर रहे हैं ? प्राचीन ऋषियों की भांति बुद्ध और तीर्थंकरों ने केवल "धर्म" का प्रचार किया, वैदिक धर्म या बौद्ध धर्म या जैन धर्म का नहीं | आधुनिक काल में भी बहुत से विद्वानों ने इस तथ्य को पकड़ा है और संसार के सम्प्रदायों को दो किस्मों में बाँटा है : धार्मिक और अधार्मिक , हिन्दू(सनातन)-बौद्ध-जैन मतों को धार्मिक-सम्प्रदाय माना गया और यहूदी-ईसाई-इस्लाम आदि को अधार्मिक क्योंकि उन सम्प्रदायों में धर्म के मूल लक्षणों का कोई महत्त्व ही नहीं है (धर्म के मूल लक्षण हैं :-- धैर्य, क्षमा-दम-अस्तेय-शौच-इन्द्रियनिग्रह-धी-विद्या-सत्य-अक्रोध) |

मेगास्थानीस का इन्डिका इन्टरनेट पर मुफ्त में मिल जाएगा | कलिंग के तीन भाग थे जिनमे हिमालय की तराई से दक्षिण तक के सारे गणतन्त्र थे | "क" का अर्थ यास्क ने बताया 33 व्यंजनों द्वारा प्रदर्शित 33 कोटि (किस्म) के देवताओं में प्रथम देवता परब्रह्म, जो कभी प्रकट नहीं होते किन्तु उनके तीन चिह्न (लिंग) प्रकट होते हैं : ब्रह्मा-विष्णु-महेश | यह है त्रि-कलिंग जिसका विस्तार से वर्णन मेगास्थानीस ने किया | चाणक्य ने भारतीय गणराज्यों का महासंघ बनाया और मगध के अत्याचारी एवं देशद्रोही राजा को हटाकर मगध को भी उस संघ में ले आये, जिसे अंग्रेजों ने झूठ-मूठ मौर्य साम्राज्य कहा | चन्द्रगुप्त मौर्य साम्राज्यवादी नहीं थे | 
उन्होंने जीवन में तीन ही युद्ध लड़े --

(1) सिकन्दर से युद्ध जिसका उल्लेख प्राचीन भारतीय साहित्य में है किन्तु अंग्रेजों ने साफ़ अनदेखा कर दिया, क्योंकि सिकन्दर भारत में अनेकों गणराज्यों और राजाओं से युद्ध में हारकर भागा था और सिन्धुतट पर लगे घाव के कारण ही बेबीलोन पँहुचने से पहले ही रास्ते में मारा गया यह बात यूरोपियन "विद्वानों" को रास नहीं आयी जो आज भी सिकन्दर को झूठ-मूठ विश्व-विजेता कहते हैं |
(2) नन्द से युद्ध जिसमें बहुत से राजाओं और गणराज्यों ने साथ दिया, और
(3)आक्रमणकारी सेल्यूकस से युद्ध, जिस कारण मगध साम्राज्य ईरान की सीमा तक फैल गया |

चन्द्रगुप्त मौर्य या उसके पुत्र ने कभी अन्य कोई युद्ध लड़ा ही नहीं | फिर दक्षिण भारत पर मौर्यों का कब्जा कैसे और कब हो गया, जैसा कि इतिहास का कबाड़ा करने वाले कबाड़ी इतिहासकार पढ़ाते हैं ? समाधान है मेगास्थानीस का इन्डिका : जिस कलिंग महासंघ ने चन्द्रगुप्त को गद्दी पर बिठाया, उसके विरुद्ध चन्द्रगुप्त क्यों लड़ता ? और वह महासंघ भी चन्द्रगुप्त को बाहरी व्यक्ति क्यों समझता ?
किन्तु जिस अशोक ने भाइयों को भी जिन्दा नहीं छोड़ा, वह एकछत्र अधिनायकवादी साम्राज्य की लिप्सा में अन्धा होकर कलिंग संघ को क्यों छोड़ता ? मगध राज्य ईरान की सीमा तक फैल गया था, उसके समक्ष कलिंग टिक न सका | पहले सैनिकों को मारा | फिर सारे युवक लड़ने आये, मारे गए | फिर गुरुकुलों के गुरु और शिष्य आये, मारे गए -- अनगिनत ब्रह्महत्याएं हुई | फिर नारियाँ आयीं, कलिंगसेना के नतृत्व में (गणराज्यों के अध्यक्ष भी राजा कहलाते थे ; कलिंगसेना वैसी ही राजकुमारी थी जैसे कि सिद्धार्थ शाक्य गणराज्य के राजकुमार थे, उन्हें कोई गद्दी उत्तराधिकार में मिलने नहीं जा रही थी) | पहले तो अशोक ने ना-नुकुर किया, उसके बाद जो किया वह महिषासुर के सिवा पूरे विश्व इतिहास में किसी और ने नहीं किया, किसी राक्षस ने भी नहीं | अंग्रेजों को केवल "अशोक" ही प्राचीन भारत में "महान" दिखा, क्योंकि सनातनी साहित्य में अशोक को महत्त्व नहीं दिया गया , अशोक कुख्यात हो चुका था | उसने बौद्धों को अपने पक्ष में करने की चाल चली - कलिंग युद्ध के दो साल बाद उसका हृदय "पिघला" ! किन्तु मौर्यों का वंश जनता की दृष्टि में राज करने का नैतिक अधिकार खो चुका था | यही कारण है कि पूरी सेना के समक्ष सेनापति पुष्यमित्र ने मौर्य सम्राट का वध किया तो एक भी सैनिक या नागरिक ने सम्राट की ओर से विरोध नहीं किया , किसी बौद्ध ने भी मुँह नहीं खोला, क्योंकि भारतीयों (हिन्दुओं-बौद्धों-जैनों) के हृदय से धर्म का लोप नहीं हुआ था | महाभारत में व्यास जी ने बारम्बार कहा कि जो धर्म की रक्षा करते हैं धर्म भी उन्हीं की रक्षा करता है | मौर्यों का धर्म चुक गया था |
सन्देह हो तो केवल तीन चीजों का अध्ययन कर लें :-- धम्मपिटक, मेगास्थानीस का इन्डिका, अशोक के शिलालेख, और सम्भव हो तो विशाखदत्त का संस्कृत नाटक "मुद्राराक्षस" भी पढ़ लें जिसका हिंदी अनुवाद 91 वर्ष पहले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने किया था | कैसे चन्द्रगुप्त मौर्य नेअकेले सिकन्दर की लाखों की सेना में घुसकर उसे नीचा दिखाया था यह आपको सेक्युलर इतिहासकार नहीं बताएँगे, वे तो चन्द्रगुप्त मौर्य को भी हिन्दू नहीं बल्कि जैन बतायेंगे, जबकि उस काल में सनातनियों और जैनों में परस्पर पृथक religion वाली कोई भावना भी नहीं थी, और चाणक्य के आज्ञाकारी शिष्य ने कभी जैन मत अपनाया इसका प्रमाण भी नहीं है | चन्द्रगुप्त मौर्य ने वर्णाश्रम धर्म के प्राचीन नियम का पालन करते हुए संन्यास लिया तो उसे म्लेच्छों ने जैन घोषित कर दिया ! ***
कोई व्यक्ति बौद्ध बन जाए किन्तु भिक्षु न बनकर सिंहासन से चिपका रहे, या कोई व्यक्ति जैन बन जाय किन्तु दिगम्बर या श्वेताम्बर साधु न बनकर दूकानदारी चलाता रहे या राजा बना रहे -- प्राचीन भारत में यह अकल्पनीय था , यह भी अकल्पनीय था कि कोई ब्राह्मण खेती करे या दूकान खोल ले | प्राचीन भारत में कोई राजा बौद्ध या जैन हो ही नहीं सकता था | ऐसी असम्भव कल्पनाएँ दासता के युग की खोजें हैं | किन्तु ब्राह्मण को यह छूट थी कि आपातकाल में वह अन्य वर्णों के कार्य करे | अतः पुष्यमित्र सुंग ने यवन खतरे से देश को बचाने के लिए गद्दी सम्भाली और दीर्घकाल के बाद भारत में अश्वमेध यज्ञ हुआ तो कोई अनुचित कार्य नहीं हुआ क्योंकि मौर्य राजा नालायक था, यही कारण है कि किसी ने विरोध भी नहीं किया | उनके पुत्र अग्निमित्र को कालिदास ने एक नाटक का मुख्य पात्र भी बनाया | ***

सेक्युलर इतिहासकार "सबूत" यह देते हैं कि श्रवण-बेलगोल में 600 ईस्वी का अभिलेख मिला जिसमे भद्रबाहु और "चन्द्रगुप्त-मुनि" का वर्णन है | बाद के भी कुछ अभिलेखों में ऐसा उल्लेख है | किन्तु यही मुनि मौर्य-सम्राट चन्द्रगुप्त थे ऐसा स्पष्ट उल्लेख 1432 ईस्वी के अभिलेख से पहले कहीं नहीं मिलता | 1432 ईस्वी के जैन अभिलेख को उससे 1729 पहले की घटना का प्रमाण किस आधार पर माना जाय? समकालीन अभिलेख को प्रमाण माना जाता है | आज से एक हज़ार वर्ष पहले वहाँ जैन मठ की स्थापना हुई, बाद में बाहुबली की विशाल मूर्ति स्थापित हुई, और पाँच सौ वर्ष बाद चन्द्रगुप्त मौर्य के जैन मुनि होने का अभिलेख बनाया गया | आज कांची के शंकराचार्य कहते हैं कि आदि-शंकर ने ही ईसापूर्व 500 में कांची मठ की स्थापना की थी | तब तो आदि-शंकर और गौतम बुद्ध समकालीन हो गए न ! मठ वाले तो ऐसी खुराफात करते ही रहते हैं |

असली बिंदु पर आइये -- चन्द्रगुप्त मौर्य जबतक सम्राट थे तबतक "मुनि" नहीं थे, और उस युग में जैन बनने का अर्थ ही था मुनि बनना, आजकल की तरह नहीं कि जैन भी हैं और दूकान भी खोले हुए हैं | मेरी बात बुरी लगे तो मैं क्या करूँ, कई बार सत्य अप्रिय हो सकता है किन्तु सत्य कभी भी अपकार नहीं करता | ये सेक्युलर इतिहासकार भी कहते हैं कि चन्द्रगुप्त स्वेच्छा से गद्दी त्यागते समय "सम्भवतः" जैन बन गया | यदि यह सत्य है तो भी जबतक वह राजा था तबतक सनातनी था न !

युगोस्लाविया - सोवियत संघ

  यदि आप कभी bosnia-herzegovina जाएंगे तब एक जगह आपको 9300 मुसलमानों की सामूहिक कब्र दिखेगी जहां उन सभी के नाम लिखे हैं दरअसल यह मुस्लिम कही...