शनिवार, 21 मई 2016

"Save Cow" कहने वाले कट्टरपन्थी कैसे हो गये.....?

शोभा डे नाम की एक प्रख्यात लेखिका 
की टिप्पणी -
"मांस तो मांस ही होता है,
चाहे गाय का हो, 
या बकरे का, 
या किसी अन्य जानवर का......।
फिर,
हिन्दू लोग जानवरों के प्रति अलग-अलग व्यवहार कर के 
क्यों ढोंग करते है कि बकरा काटो, 
पर, गाय मत काटो ।
ये उनकी मूर्खता है कि नहीं......?"
.
जवाब -1.
बिल्कुल ठीक कहा शोभा जी आप ने ।
मर्द तो मर्द ही होता है, 
चाहे वो भाई हो, 
या 
पति, 
या 
बाप, 
या 
बेटा । 
फिर, तीनो के साथ आप अलग-अलग व्यवहार क्यों करती हैं ?
क्या सन्तान पैदा करने, 
या यौन-सुख पाने के लिए पति जरुरी है ? 
भाई, बेटा, या बाप के साथ भी वही व्यवहार किया जा सकता है,
जो आप अपने पति के साथ करती हैं ।
ये आप की मूर्खता और आप का ढोंग है कि नहीं.....?
जवाब-2.
घर में आप अपने बच्चों और अपने पति को खाने-नाश्ते में दूध तो देती ही होंगी, या चाय-कॉफी तो बनाती ही होंगी...!
जाहिर है, वो दूध गाय, या भैंस का ही होगा ।
तो, क्या आप कुतिया का भी दूध उनको पिला सकती हैं, या कुतिया के दूध की भी चाय-कॉफी बना सकती हैं..?
तो, दूध तो दूध, चाहे वो किसी का भी हो....!!
ये आप की मूर्खता और आप का ढोंग है कि नहीं......?
.
प्रश्न मांस का नहीं, आस्था और भावना का है ।
जिस तरह, भाई, पति, बेटा, बेटी, बहन, माँ, आदि रिश्तों के पुरुषों-महिलाओं से हमारे सम्बन्ध मात्र एक पुरुष, या मात्र एक स्त्री होने के आधार पर न चल कर भावना और आस्था के आधार पर संचालित होते हैं, 
उसी प्रकार गाय, बकरे, या अन्य पशु भी हमारी भावना के आधार पर व्यवहृत होते हैं ।
जवाब - 3.
एक अंग्रेज ने स्वामी विवेकानन्द से पूछा - सब से अच्छा दूध किस जानवर का होता है ?
स्वामी विवेकानंद - भैँस का ।
अंग्रेज - परन्तु आप भारतीय तो गाय को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं न.....?
स्वामी विवेकानन्द कहा - 
आप ने "दूध" के बारे मे पुछा है जनाब, "अमृत" के बारे में नहीं,
और दूसरी बात, 
आप ने जानवर के बारे मेँ पूछा था ।
गाय तो हमारी माता है,
कोई जानवर नहीं ।
इसी विषय में एक सवाल :-
"Save tiger" 
कहने वाले समाज सेवी होते हैं 
और 
"Save Dogs" 
कहने वाले पशु प्रेमी होते हैं ।
तब,
"Save Cow" कहने वाले कट्टरपन्थी कैसे हो गये.....?
इसका जवाब, अगर किसी के पास हो, तो बताने की ज़रूर कृपा करे ।

बुधवार, 18 मई 2016

भारतीय संविधान

भारतीय संविधान को उधार का थैला भी कहा जाता है। भारतीय संविधान का भूल पाठ अंग्रेजी में ही है। अब हमारी राष्ट्रीय भाषा हिन्दी में हमारा संविधान बनाने के लिए समय आ गया है । उधार का भारतीय संविधान को तेयार करने मेँ 2 वर्ष, 11 महीने, 18 दिन का समय लगा ।

ारतीय संविधान के विदेशी स्रोत

संयुक्त राज्य अमेरिका से मौलिक अधिकार, राज्य की कार्यपालिका के प्रमुख तथा सशस्त्र सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर के रुप मेँ होने का प्रावधान, नयायिक पुनरावलोकन, संविधान की सर्वोच्चता, नयायपालिका की स्वतंत्रता, निर्वाचित राष्ट्रपति एवं उस पर महाभियोग, उपराष्ट्रपति, उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के नयायाधीशों को हटाने की विधि एवं वित्तीय आपात।

ब्रिटेन से संसदात्मक शासन-प्रणाली, एकल नागरिकता एवं विधि निर्माण प्रक्रिया, मंत्रियोँ के उत्तरदायित्व वाली संसदीय प्रणाली।

आयरलैंड से नीति निदेशक सिद्धांत, राष्ट्रपति के निर्वाचक-मंडल की व्यवस्था, राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा मेँ साहित्य, कला, विज्ञान तथा समाज सेवा इत्यादि के क्षेत्र मेँ ख्याति प्राप्त व्यक्तियों का मनोनयन, आपातकालीन उपबंध।

आस्ट्रेलिया से प्रस्तावना की भाषा, समवर्ती सूची का प्रावधान, केंद्र और राज्य के बीच संबंध तथा शक्तियों का विभाजन, संसदीय विशेषाधिकार।

जर्मनी से आपातकाल के प्रवर्तन के दौरान राष्ट्रपति को मौलिक अधिकार संबंधी शक्तियां।

कनाडा से संघात्मक विशेषताएं, अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास।

दक्षिण अफ्रीका से संविधान संशोधन की प्रक्रिया का प्रावधान।

रुस से मौलिक कर्तव्योँ का प्रावधान।

जापान से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया।

स्विट्ज़रलैंड से संविधान की सभी सामाजिक नीतियों के संदर्भ मेँ निदेशक तत्वों का उपबंध।

फ़्रांस से गणतांत्रिक व्यवस्था, अध्यादेश, नियम, विनियम, आदेश, संविधान विशेषज्ञ के विचार, न्यायिक निर्णय, संविधियां। इटली से मूल कर्तव्योँ की भाषाएं भावना।

भारतीय संविधान के स्रोत मेँ हम भारत के लोग तथा भारत शासन अधिनियम 1935 है। 395 अनुच्छेदों मेँ से लगभग 250 अनुछेद इसी से लिए गए हैं या उनमेँ थोडा परिवर्तन किया गया है।

आइवर जेनिंग्स ने भारतीय संविधान को उधार का थैला एवं वकीलों का स्वर्ग कहा है।

यही कारण है कि अनेक बार भारतीय संविधान की 'उधार ली गई वस्तुओं का संकलन मात्र' कहा जाता है।

रविवार, 15 मई 2016

ईरान का नाम पहले पर्शिया था .. वहाँ इस्लाम का कोई वजूद तक नही था .. सिर्फ पारसी लोग रहते थे ... उनके खूब बड़े बड़े अग्नि देवता के मन्दिर थे ..बाद में पर्शिया पर मुसलमानों ने हमला किया और खूब कत्लेआम मचाया .. जो जिन्दा बचे वो तलवार के डर से इस्लाम कुबूल कर लिए और जिन्हें धर्म प्यारा था वो शहीद हो गये ...
एक छोटी सी नाव में आठ पुरुष और कुछ महिलाये, और कुछ बच्चे अपनी पवित्र आग को लेकर समुद्र के रास्ते से भाग निकले .. उन्हें पता ही नही था की वो किधर जा रहे है .. कई दिनों तक समुन्द्र में चलने के बाद उन्हें जमीन नजर आया .. वो जगह था गुजरात के वलसाड जिले का संजान बंदरगाह ... वो लोग वही उतर गये ..
चूँकि वो लोग थके थे इसलिए स्थानीय लोगो ने उन्हें खाना आदि दिया .. फिर जब कुछ दिन रहने के बाद भी ये लोग कही जा नही रहे थे वो वहाँ के राजा ने सोचा की इन्हें मै कैसे बताऊ की मेरे राज्य में आपके लिए जगह नही है .. तो उसने एक दूध से भरा हुआ गिलास उनके पास भेजा ... पारसियों का सरदार बहुत होशियार था .. उसने उस गिलास में एक चम्मच चीनी डालकर वापस भेज दिया ...
यानी राजा कहना चाहता था की मेरे राज्य में जगह नही है .. तो पारसियों ने कहा की जैसे दूध में चीनी घुलमिल जाती है और एक बूंद दूध बाहर नही गिरता वैसे ही हम पारसी आप हिन्दुओ के साथ घुल मिलकर रहेंगे ..
राजा को ये जबाब बेहद पसंद आया और उसने उदवाडा में उन्हें रहने के लिए जगह दे दिया .. बाद में पारसी लोग नवसारी और मुंबई, अहमदाबाद में भी बसे

शुक्रवार, 13 मई 2016


मीना बाजार का कामी कीड़ा अकबर 'महान' [वेब दुनिया से साभार ]



भारत के ज्ञात इतिहास में कामुक वृत्ति के दो चरित्र मिलते हैं। एक मांडव का गयासुद्दीन और दूसरा अकबर। इनमें भी अकबर ने गयासुद्दीन को बहुत पीछे छोड़ दिया। गयासुद्दीन कामुक था किंतु अपनी काम-पिपासा के लिए वह अपने मालवा राज्य की हिन्दू प्रजा को ही सताता था। जहां कहीं किसी हिन्दू के घर में सुंदर स्त्री की खबर मिली नहीं कि उसके घुड़सवार लड़की को लेने उस हिन्दू के द्वार पर जा धमकते थे। एक बार मांडव के दुर्ग में पहुंचने के बाद लड़की की मुक्ति असंभव थी। हालांकि गयासुद्दीन ने मुस्लिम महिलाओं और लड़कियों को बख्श दिया।

लेकिन, अकबर ने तो मानवता की सारी मर्यादाएं तोड़ दी थीं। क्या शत्रु, क्या मित्र, क्या हिन्दू, क्या मुसलमान, क्या प्रजा, क्या दरबारी, किसी की सुंदर बहन-बेटी इस 'कामी कीड़े' की वासना से नहीं बच पाई थी।

सारा देश गुलाम हो चुका था। विजित राज्यों से सुंदर महिलाएं लूट लाने का सिलसिला बंद हो गया था। पूरा भारत अकबर की प्रजा बन चुकी थी। मुस्लिम प्रजा के साथ-साथ हिन्दुओं ने भी परदा प्रथा को अपना लिया था। इस कारण बुरके और घूंघट में छिपी सुंदर स्त्रियों को ढूंढ निकालना आसान नहीं था। दरबारियों के जनानखाने सुंदर हिन्दू, मुसलमान महिलाओं से भरे पड़े थे। दरबारियों की कन्याएं भी जवान हो रही थीं, किंतु परदे की ओट में थीं। धूर्त अकबर ने अपने दरबारियों और प्रजा की सुंदर महिलाओं को खोजने का एक आसान उपाय निकाला। उसने राजधानी में मीना बाजार लगाने की परंपरा डाली।

अकबर का मीना बाजार : आगरे के किले के सामने मैदान में मीना बाजार लगना प्रारंभ हुआ। शुक्रवार को पुरुष वर्ग तो पांच बार की नमाज में व्यस्त रहता था। इस दिन किले में और किले के आसपास पुरुषों का प्रवेश वर्जित था। सारे मैदान में महिलाएं दुकान सजाकर बैठती थीं और महिलाएं ही ग्राहक बनकर आ सकती थीं।

अकबर का आदेश था कि प्रत्येक दरबारी अपनी महिलाओं को दुकान लगाने के लिए भेजे। नगर के प्रत्येक दुकानदार को भी हुक्म था कि उनके परिवार की महिलाएं उनकी वस्तुओं की दुकान लगाएं। इस आदेश में चूक क्षम्य नहीं थीं। किसी सेठ और दरबारी की मीना बाजार में दुकान का न लगाना अकबर का कोपभाजन बनना था।

धीरे-धीरे मीना बाजार जमने लगा। निर्भय बेपरदा महिलाएं खरीद-फरोख्त को घूमने लगीं। अकबर की कूटनियां और स्वयं अकबर स्त्री वेश में मीना बाजार में घूमने लगे। प्रति सप्ताह किसी सेठ या दरबारी की सुंदर महिला पर गाज गिरती। वह अकबर की नजरों में चढ़ जाती अकबर की कूटनियां किसी भी प्रकार उसे किले में पहुंचा देतीं।

कुछ तो लोकलाज का भय, कुछ पति के प्राणों का मोह, लुटी-पिटी महिलाओं का मुंह बंद कर देता। साथ ही अन्य महिलाओं द्वारा यदि पुरुषों तक बात पहुंचती भी तो मौत के डर से मन-मसोसकर रह जाते। अस्मतें लुटती रही और मीना बाजार चलता रहा।

कभी-कभी कोई अत्यंत सुंदर स्त्री अकबर को भा जाती और वह उसके घर वालों के संदेश भिजवा देता कि डोला हरम में भिजवा दें। यदि स्त्री विवाहित हुई तो उसके पति को तलाक के लिए बाध्य करता। इस प्रकार कई दरबारियों की कन्याएं और विवाहिताएं आगरे के किले में लाई गईं।

अकबर का आक्रमण : इस समय अकबर की उम्र 22 वर्ष थी। नित नई स्त्रियों का भोग निरंतर उसकी वासना को बढ़ा रहा था। उच्च वंश के शाह अबुल माली और मिर्जा शर्फुद्दीन हुसैन जैसे लोगों की महिलाएं भी अकबर की वासना की शिकार बनी थीं। इन्हीं दिनों एक शेख की पत्नी अकबर की निगाह में चढ़ गई। अकबर ने शेख पर दबाव डाला कि अपनी पत्नी को तलाक दे दे ताकि मैं उसे अपने हरम में डाल सकूं। न तो शेख अपनी पत्नी को छोड़ना चाहता था, न उसकी पत्नी ही इस पशु के पास जाना चाहती थी।

आगरा के और भी 10-12 परिवारों की महिलाओं को अकबर अपने हरम में डालना चाहता था। आखिर आगरा के चुनिंदा मुसलमान दर‍बारियों की एक गुप्त बैठक हुई जिसमें अकबर की हत्या की योजना बनाई गई। शर्फुद्दीन का एक हिन्दू गुलाम था फुलाद, बाड़मेर का रहने वाला, ऊंचा-पूरा, कद्दावर जवान आबूमाली के मित्र शर्फुद्दीन ने उसे अपनी गुलामी से मुक्त किया और बदले में अकबर को मार डालने का वचन लिया।

सदा अंगरक्षकों से घिरे रहने वाले अकबर को तलवार या भाले से मारना संभव नहीं था। बंदूकें उस समय बारूद की एक नाल या दो नाल की हुआ करती थीं, जिनसे एक या दो बार ही फायर किया जा सकता था। तब निर्णय हुआ कि तीर से अकबर को मारा जाए। तीर भी अधिक दूरी से मारना था, इस कारण मजबूत कमान की जरूरत पड़ी ताकि तीर शरीर के भीतर तक पैठ सकें। फुलाद ने तीरंदाजी के अभ्यास में कई धनुष तोड़ डाले, फिर एक लोहे का बना कन्धहारी धनुष उसे दिया गया, लोहे के धनुष से अभ्यास के बाद घातक दल अवसर की ताक में रहने लगा।

आगरा में तो काम बना नहीं। पता लगा जनवरी 1564 में अकबर शेख निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर जियारत के लिए जाना चाहता है। घातक दल के लोग जनवरी के प्रथम सप्ताह में दिल्ली पहुंच गए और उपयुक्त स्थान की तलाश कर घात लगाकर बैठ गए। औलिया की दरगाह के मार्ग में माहम अनगा द्वारा निर्मित एक दुमंजिला मदरसा भी था। इसी मदरसे की छत पर फुलाद तीरों का तरकश लेकर जा बैठा। माहम अनगा के पु‍त्र आदम खां को किले की दीवार से गिराकर अकबर ने मरवाया था और पुत्र के गम में कुछ दिन बाद अनगा भी मर गई थी। अनगा का परिवार भी अकबर के खून का प्यासा था और हत्या-योजना में शामिल था।

11 जनवरी 1564 को अकबर ने औलिया की दरगाह पर जा दर्शन किए। अकबर दरगाह से लौट रहा था। उसके अंगरक्षक बिखरे हुए थे। कुछ तो साथ थे कुछ आगे बढ़ गए थे और कुछ दरगाह में प्रार्थना के लिए रुके थे। अकबर जैसे ही मदरसे के नीचे आया, एक सनसनाता तीर आकर उसका कंधा बिंध गया। अकबर जोर से चीख पड़ा। अंगरक्षकों ने उसे अपनी ढालों की ओट में ले लिया और तीर की दिशा में निगाहें दौड़ाईं। देखा तो मदरसे की छत से ए‍क विशालकाल व्यक्ति तीर बरसा रहा है। सन्नाते तीर अंगरक्षकों की ढालों से टकरा रहे थे। लोग मदरसे की ओर तलवारें सूंत दौड़ पड़े। फुलाद के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए।

अंगरक्षक घुड़सवारों ने अकबर की सवारी के मार्ग में आने वाले सभी बाजार बंद करवा दिए। प्रत्येक घर के खिड़की-दरवाजे बंद करवा दिए गए। घरों की छतों पर मुगल निशानेबाज बैठा दिए गए। इस प्रकार पूर्ण सुरक्षा के साथ अकबर दिल्ली के महल में लाया गया। तीर काफी भीतर तक धंस गया था और लगातार खून बह रहा था। कुशल जर्राहों (सर्जन) ने कंधे से तीर निकला। दस दिन तक हकीमों से इलाज करवा अकबर पालकी में बैठ आगरा लौटा। गहरे घाव के कारण वह घोड़े की सवारी के अयोग्य था और हाथी की सवारी में निशानेबाजों का खतरा था। (स्मिथ पृष्ठ 61)

मौत के भय ने अकबर को झकझोर दिया था। उसने बलात लोगों की पत्नियां छीनना तो बंद कर दिया, लेकिन मीना बाजार चलता रहा और महिलाओं की आबरू लुटती रही। फर्क इतना था कि औरतें हमेशा के लिए हरम में रोकी नहीं जाती थीं। एकआध दिन या कुछ घंटों के बाद छोड़ दी जाती थी |

किरण देवी की कटार : मीना बाजार के प्रवेश द्वार पर दुकान लगाने वाली महिलाओं के नाम वंश दर्ज होते थे। इसी प्रकार बाजार में खरीद के लिए प्रवेश करने वाली महिलाओं के नाम-परिवार दर्ज होते थे। इसी प्रकार बाजार में खरीद के लिए प्रवेश करने वाली महिलाओं के नाम-परिवार लिखे जाते थे।

अकबर ने देखा कि बीकानेर के राव कल्याणमल की बूढ़ी पत्नी नाममात्र के लिए दुकान लगाकर बैठती है, किंतु परिवार की सुंदर जवान औरतें आज तक मीना बाजार में नहीं आईं। वैसे राव कल्याणमल ने प्राणों के भय से अपनी कन्या अकबर को ब्याह दी थी किंतु नित नई स्त्रियों को भोगने की लालसा से अकबर ने राव कल्याणमल को संदेश भेजा कि आपके परिवार की महिलाएं एक बार भी मीना बाजार में खरीदी के लिए नहीं आई हैं, यह ठीक नहीं है।

लाचार हो राव कल्याणमल ने अपनी पत्नी से परामर्श किया व शुक्रवार को अपने बड़े बेटे रायसिंह की पत्नी को ‍दासियों के साथ मीना बाजार में भेजा। अनिष्ट की आशंका से बड़ी कंवरानी कांप उठी। रोती-सिसकती जिठानी की कातर आंखें आशा की अंतिम किरण की ओर उठीं, वह थी देवरानी किरण कुंवर। रणबांकुरे, सिसौदिया शक्तिसिंह की बेटी। हिन्दू सूर्य नर-नाहर महाराणा प्रताप की भतीजी। हिन्दू गौरव पृथ्वीसिंह राठौर की पत्नी।

कंवरानी सा.! आज कौन बचाएगा मुझे? लगता है आज जीवन का अंतिम दिन आ गया है। रायसिंह की पत्नी ने किरण कुंवर से कहा।

'ठहरो भाभी सा. अभी आती हूं।' कहकर किरण कुंवर महल में गई और तीखी कटारी जूड़े में खोंसती बाहर आ गई। 'आप अकेली नहीं मरेंगी भाभी सा.! यह सिसौदियों की बेटी भी आपका साथ देगी।'

मीना बाजार के प्रवेश द्वार पर जैसे ही दोनों राठौर वधुओं ने बीकानेर राजपरिवार का नाम लिखाया, द्वार पर खड़ी कूटनियों ने अकबर को सूचना भिजवा दी। पृथ्वीसिंह की पत्नी किरण कुंवर का नाम सुनते ही अकबर खुशी से उछल पड़ा। जिस सिसौदिया घराने का डोला आज तक दिल्ली-आगरा के किसी बादशाह के हरम में नहीं आया, वही सिसौदिया की बेटी मीना बाजार में आ चुकी है।

अकबर ने दूर से देखा और किरण कुंवर के रूप को मुग्ध हो देखता ही रह गया। अब किरण कुंवर को मीना बाजार की किसी बंद छोलदारी (तंबू) से किले में लाने की जुगत भिड़ाई गई। एक मुगल दासी ने जुहार अर्ज की और कहा कि बीकानेर वाली बेगम साहिबा, जो इनकी ननद हैं, अपनी भाभियों को याद कर रही हैं।

दोनों देवरानी-जिठानी एक-दूसरे की ओर प्रश्नभरी दृष्टि से देखने लगीं। तब किरण कुंवर ने कहा- 'भाभी सा.! आप यहीं रुके, मैं अकेली जाती हूं। मेरी ओर से निश्चिंत रहें। मैं जौहर और शस्त्र से खेलने वाले परिवार की बेटी हूं। यह तुर्क मेरे जीवित शरीर को नहीं पा सकेगा' , कहकर किरण कुंवर किले के द्वार की ओर चल दी।

किले के द्वार पर तातार औरतें पहरा दे रही थीं। आज कोई पुरुष सैनिक किले में नहीं था। शाही खानदान के पुरुष भी या तो आमोद-प्रमोद के लिए बाहर चले जाते थे या किले के भीतरी कक्षों में रहते थे। किले के द्वार से आगे बढ़ किरण सुनसान मार्ग पर पहुंची। आगे-आगे चलती मुगल दासी व किरण कक्ष में गई ही थी कि पास के द्वार से निकल अकबर ने मार्ग रोक लिया। मुगल दासी शीघ्रता से भाग गई। अकबर शराब पिये था। किरण कुंवर के सामने तीन मार्ग थे। सम्मानपूर्ण मृत्यु या प्रतिरोधरहित रहकर अपनी इज्जत लुटवा लेना या जूड़े में खुंसी कटार लेकर अकबर को समाप्त कर देना।

क्षणमात्र में किरण ने निर्णय ले लिया और भूखी शेरनी की तरह अकबर पर टूट पड़ी। अकबर के लिए यह अप्रत्याशित था। वह कुछ सोच सके, इसके पूर्व ही वीरांगना किरण ने उसे भूमि पर दे पटका और छाती पर जा बैठी और लगी अकबर के मुंह पर घूंसों का प्रहार करने। अकबर का नशा काफूर हो गया। घूंसों की बौछार थमते ही अकबर ने देखा क्रोध से फुंफकारती किरण कुंवर ने जूड़े में खुंसी कटार निकाली, एक हाथ से अकबर के बाल पकड़े और कटार वाला हाथ ऊपर उठाया। साक्षात मौत अकबर के सामने नाचने लगी। हजारों महिलाओं की सतीत्व को लूटने वाला नरपिशाच कांग्रेसियों द्वारा कहने जाने वाला तथाकथित महावीर महान अकबर दोनों हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा।

'ओ देवी! मुझे माफ करो, मेरी जान बख्श दो, मैं तुम्हारी गाय हूं। मुझसे भारी गलती हो गई, अब कभी ऐसे पाप कर्म नहीं करूंगा।'

किरण का हाथ रुक गया। वह विचार करने लगी। अकबर तो मर जाएगा, किंतु प्रतिशोध की ज्वाला में जेल में बंद मेरे पति मारे जाएंगे। मुगल तख्त खाली नहीं रहेगा, शहजादा सलीम बादशाह बन जाएगा। बदले की आग में मुसलमान सैनिक आगरे के हजारों हिन्दुओं को तबाह कर देंगे। हजारों हिन्दू महिलाओं का अपहरण होगा। मैं अकेली तख्त तो नहीं पलट सकती, हां परिस्थिति में सुधार कर सकूंगी। उसने अकबर के गले पर कटार रख दी और कहा मैं तुझे माफ कर सकती हूं।

एक शर्त पर कि कुरान की कसम खा कि आज के बाद मीना बाजार नहीं लगेगा। अब किसी भी अबला की इज्जत पर आंच नहीं आएगी। अकबर ने कुरान की कसम खाकर सब स्वीकार‍ किया। किरण कुंवर किले से बाहर निकल आईं और उस दिन के बाद आगरा में फिर मीना बाजार नहीं लगा। (टाड राजस्थान)

हरम की बेगमों का वितरण : अपनी अनियंत्रित काम-वासनाओं के स्वभाव के कारण अकबर के प्राण दो बार संकट में पड़ चुके थे। धूर्त अकबर समझ गया कि दो बार तो जैसे-तैसे बच गया। यदि जान बचानी है तो आगे से यह सब बंद करना होगा। अत: मीना बाजार बंद होने के साथ-साथ अकबर के स्त्री-संग्रह की वृत्ति पर भी रोक लग गई। लेकिन अकबर के हरम में असंतोष के ज्वालामुखी आग उगलने को तैयार थे।

वे महिलाएं जिनके पिता-पति और भाइयों की हत्या कर अकबर उन्हें उठा लाया था, उनसे अकबर के प्राण संकट में पड़ सकते थे। हरम में आते-जाते, विलास कक्ष में रात बिताते, हरम की महिलाओं को अपनी सेवा के लिए बलात बाध्य करते अकबर को उनके तेवर देखने को मिलते रहते थे। अकबर ने तुरंत निर्णय लिया और एक दिन दरबार में अपने मुस्लिम सामंतों, दरबारियों और नवरत्नों को एकत्र कर हरम की पांच हजार औरतें उनमें वितरित कर दीं।

मोंसरात (गोवा का पादरी) कहता है कि अकबर ने मात्र एक पत्नी रखी थी, लेकिन यह सत्य नहीं है। मानसिंह की बुआ के साथ अकबर के हरम में अपने गुरु बैरम खां की पत्नी खानेजमां और उसके भाई बहादुर खां की पत्नी और आदम खां की पत्नी की उसके हरम में मौजूद थीं। बदायूंनी के अनुसार उसने हरम की 5,000 औरतों में से सिर्फ 16 औरतें चुनकर रख लीं, बाकी अपने दरबारियों में बांट दीं।

'आईने अकबरी' के अनुसार अकबर कहता है कि यदि मुझमें पहले बुद्धि होती, तो मैं अपने राज्य की किसी स्त्री को जबरन हरम में नहीं डालता। (स्मिथ पृष्ठ 270)

यह कैसा महान? : परिजनों की हत्या कर असहाय अबलाओं को बलात हरम में डालने वाला क्या महान हो सकता है? उनके परिवारों से छीनकर एकत्र की गईं महिलाओं को निर्जीव वस्तु या पशुओं की तरह दरबारियों में वितरित कर देने वाला क्या महान हो सकता है? इज्जत के साथ अपनी गृहस्थी में सुख-शांति से रह रहीं 5000 महिलाओं को इस वासना के कीड़े ने वेश्या बना डाला। फिर भी कहा जाता है अकबर महान।

गुरुवार, 5 मई 2016

इतिहास की चोपड़ी में,

इतिहास की चोपड़ी में
आज से लगभग ५०० साल पहले, वास्को डी गामा आया था हिंदुस्तान. इतिहास की चोपड़ी में, इतिहास की किताब में हमसब ने पढ़ा होगा कि सन. १४९८ में मई की २० तारीख को वास्को डी गामा हिंदुस्तान आया था. इतिहास की चोपड़ी में हमको ये बताया गया कि वास्को डी गामा ने हिंदुस्तान की खोज की, पर ऐसा लगता है कि जैसे वास्को डी गामा ने जब हिंदुस्तान की खोज की, तो शायद उसके पहले हिंदुस्तान था ही नहीं.
वास्को डी गामा यहाँ आया था भारतवर्ष को लुटने के लिए, एक बात और जो इतिहास में, बहुत गलत बताई जाती है कि वास्को डी गामा एक बहूत बहादुर नाविक था, बहादुर सेनापति था, बहादुर सैनिक था, और हिंदुस्तान की खोज के अभियान पर निकला था, ऐसा कुछ नहीं था, सच्चाई ये है………………………………………
कि पुर्तगाल का वो उस ज़माने का डॉन था, माफ़िया था. जैसे आज के ज़माने में हिंदुस्तान में बहूत सारे माफ़िया किंग रहे है, उनका नाम लेने की जरुरत नहीं है,ऐसे ही बहूत सारे डॉन और माफ़िया किंग १५ वी सताब्दी में होते थे यूरोप में. और १५ वी. सताब्दी का जो यूरोप था, वहां दो देश बहूत ताकतवर थें उस ज़माने में, एक था स्पेन और दूसरा था पुर्तगाल. तो वास्को डी गामा जो था वो पुर्तगाल का माफ़िया किंग था. १४९० के आस पास से वास्को डी गामा पुर्तगाल में चोरी का काम, लुटेरे का काम, डकैती डालने का काम ये सब किया करता था. और अगर सच्चा इतिहास उसका आप खोजिए तो एक चोर और लुटेरे को हमारे इतिहास में गलत तरीके से हीरो बना कर पेश किया गया. और ऐसा जो डॉन और माफ़िया था उस ज़माने का पुर्तगाल का ऐसा ही एक दुसरा लुटेरा और डॉन था, माफ़िया था उसका नाम था कोलंबस, वो स्पेन का था. तो हुआ क्या था, कोलंबस गया था अमेरिका को लुटने के लिए और वास्को डी गामा आया था भारतवर्ष को लुटने के लिए. लेकिन इन दोनों के दिमाग में ऐसी बात आई कहाँ से, कोलंबस के दिमाग में ये किसने डाला की चलो अमेरिका को लुटा जाए, और वास्को डी गामा के दिमाग में किसने डाला कि चलो भारतवर्ष को लुटा जाए. तो इन दोनों को ये कहने वाले लोग कौन थे?
हुआ ये था कि १४ वी. और १५ वी. सताब्दी के बीच का जो समय था, यूरोप में दो ही देश थें जो ताकतवर माने जाते थे,एक देश था स्पेन, दूसरा था पुर्तगाल, तो इन दोनों देशो के बीच में अक्सर लड़ाई झगडे होते थे, लड़ाई झगड़े किस बात के होते थे कि स्पेन के जो लुटेरे थे, वो कुछ जहांजो को लुटते थें तो उसकी संपत्ति उनके पास आती थी, ऐसे ही पुर्तगाल के कुछ लुटेरे हुआ करते थे वो जहांज को लुटते थें तो उनके पास संपत्ति आती थी, तो संपत्ति का झगड़ा होता था कि कौन-कौन संपत्ति ज्यादा रखेगा. स्पेन के पास ज्यादा संपत्ति जाएगी या पुर्तगाल के पास ज्यादा संपत्ति जाएगी. तो उस संपत्ति का बटवारा करने के लिए कई बार जो झगड़े होते थे वो वहां की धर्मसत्ता के पास ले जाए जाते थे. और उस ज़माने की वहां की जो धर्मसत्ता थी, वो क्रिस्चियनिटी की सत्ता थी, और क्रिस्चियनिटी की सत्ता में १४९२ के आसपास पोप होता था जो सिक्स्थ कहलाता था, छठवा पोप. तो एक बार ऐसे ही झगड़ा हुआ, पुर्तगाल और स्पेन की सत्ताओ के बीच में, और झगड़ा किस बात को ले कर था? झगड़ा इस बात को ले कर था कि लूट का माल जो मिले वो किसके हिस्से में ज्यादा जाए. तो उस ज़माने के पोप ने एक अध्यादेश जारी किया. सन १४९२ में, और वो नोटिफिकेशन क्या था? वो नोटिफिकेशन ये था कि १४९२ के बाद, सारी दुनिया की संपत्ति को उन्होंने दो हिस्सों में बाँटा, और दो हिस्सों में ऐसा बाँटा कि दुनिया का एक हिस्सा पूर्वी हिस्सा, और दुनिया का दूसरा हिस्सा पश्चिमी हिस्सा. तो पूर्वी हिस्से की संपत्ति को लुटने का काम पुर्तगाल करेगा और पश्चिमी हिस्से की संपत्ति को लुटने का काम स्पेन करेगा. ये आदेश १४९२ में पोप ने जारी किया. ये आदेश जारी करते समय, जो मूल सवाल है वो ये है कि क्या किसी पोप को ये अधिकार है कि वो दुनिया को दो हिस्सों में बांटे, और उन दोनों हिस्सों को लुटने के लिए दो अलग अलग देशो की नियुक्ति कर दे? स्पैन को कहा की दुनिया के पश्चिमी हिस्से को तुम लूटो, पुर्तगाल को कहा की दुनिया के पूर्वी हिस्से को तुम लूटो और १४९२ में जारी किया हुआ वो आदेश और बुल आज भी एग्जिस्ट करता है.
ये क्रिस्चियनिटी की धर्मसत्ता कितनी खतरनाक हो सकती है उसका एक अंदाजा इस बात से लगता है कि उन्होंने मान लिया कि सारी दुनिया तो हमारी है और इस दुनिया को दो हिस्सों में बांट दो पुर्तगाली पूर्वी हिस्से को लूटेंगे, स्पेनीश लोग पश्चिमी हिस्से को लूटेंगे. पुर्तगालियो को चूँकि दुनिया के पूर्वी हिस्से को लुटने का आदेश मिला पोप की तरफ से तो उसी लुट को करने के लिए वास्को डी गामा हमारे देश आया था. क्योकि भारतवर्ष दुनिया के पूर्वी हिस्से में पड़ता है. और उसी लुट के सिलसिले को बरकरार रखने के लिए कोलंबस अमरीका गया. इतिहास बताता है कि १४९२ में कोलंबस अमरीका पहुंचा, और १४९८ में वास्को डी गामा हिंदुस्तान पहुंचा, भारतवर्ष पहुंचा. कोलंबस जब अमरीका पहुंचा तो उसने अमरीका में, जो मूल प्रजाति थी रेड इंडियन्स जिनको माया सभ्यता के लोग कहते थे, उन माया सभ्यता के लोगों से मार कर पिट कर सोना चांदी छिनने का काम शुरु किया. इतिहास में ये बराबर गलत जानकारी हमको दी गई कि कोलंबस कोई महान व्यक्ति था, महान व्यक्ति नहीं था, नराधम था. और वो किस दर्जे का नराधम था, सोना चांदी लुटने के लिए अगर किसी की हत्या करनी पड़े तो कोलंबस उसमे पीछे नहीं रहता था, उस आदमी ने १४ – १५ वर्षो तक बराबर अमरीका के रेड इन्डियन लोगों को लुटा, और उस लुट से भर – भर कर जहांज जब स्पेन गए तो स्पेन के लोगों को लगा कि अमेरिका में तो बहुत सम्पत्ति है, तो स्पेन की फ़ौज और स्पेन की आर्मी फिर अमरीका पहुंची. और स्पेन की फ़ौज और स्पेन की आर्मी ने अमरीका में पहुँच कर १० करोड़ रेड इंडियन्स को मौत के घाट उतार दिया. १० करोड़. और ये दस करोड़ रेड इंडियन्स मूल रूप से अमरीका के बाशिंदे थे. ये जो अमरीका का चेहरा आज आपको दिखाई देता है, ये अमरीका १० करोड़ रेड इन्डियन की लाश पर खड़ा हुआ एक देश है. कितने हैवानियत वाले लोग होंगे, कितने नराधम किस्म के लोग होंगे, जो सबसे पहले गए अमरीका को बसाने के लिए,उसका एक अंदाजा आपको लग सकता है, आज स्थिति क्या है कि जो अमरीका की मूल प्रजा है, जिनको रेड इंडियन कहते है, उनकी संख्या मात्र ६५००० रह गई है.
१० करोड़ लोगों को मौत के घाट उतारने वाले लोग आज हमको सिखाते है कि हिंदुस्तान में ह्यूमन राईट की स्थिति बहुत ख़राब है. जिनका इतिहास ही ह्यूमन राईट के वोइलेसन पे टिका हुआ है, जिनकी पूरी की पूरी सभ्यता १० करोड़ लोगों की लाश पर टिकी हुई है, जिनकी पूरी की पूरी तरक्की और विकास १० करोड़ रेड इंडियनों लोगों के खून से लिखा गया है, ऐसे अमरीका के लोग आज हमको कहते है कि हिंदुस्तान में साहब, ह्यूमन राईट की बड़ी ख़राब स्थिति है, कश्मीर में,पंजाब में, वगेरह वगेरह. और जो काम मारने का, पीटने का, लोगों की हत्याए कर के सोना लुटने का, चांदी लुटने का काम कोलंबस और स्पेन के लोगों ने अमरीका में किया, ठीक वही काम वास्को डी गामा ने १४९८ में हिंदुस्तान में किया. ये वास्को डी गामा जब कालीकट में आया, २० मई, १४९८ को, तो कालीकट का राजा था उस समय झामोरिन, तो झामोरिन के राज्य में जब ये पहुंचा वास्को डी गामा, तो उसने कहा कि मै तो आपका मेहमान हु, और हिंदुस्तान के बारे में उसको कहीं से पता चल गया था कि इस देश में अतिथि देवो भव की परंपरा. तो झामोरिन ने बेचारे ने, ये अथिति है ऐसा मान कर उसका स्वागत किया, वास्को डी गामा ने कहा कि मुझे आपके राज्य में रहने के लिए कुछ जगह चाहिए,आप मुझे रहने की इजाजत दे दो, परमीशन दे दो. झामोरिन बिचारा सीधा सदा आदमी था, उसने कालीकट में वास्को डी गामा को रहने की इजाजत दे दी. जिस वास्को डी गामा को झामोरिन के राजा ने अथिति बनाया, उसका आथित्य ग्रहण किया, उसके यहाँ रहना शुरु किया, उसी झामोरिन की वास्को डी गामा ने हत्या कराइ. और हत्या करा के खुद वास्को डी गामा कालीकट का मालिक बना. और कालीकट का मालिक बनने के बाद उसने क्या किया कि समुद्र के किनारे है कालीकट केरल में, वहां से जो जहांज आते जाते थे, जिसमे हिन्दुस्तानी व्यापारी अपना माल भर-भर के साउथ ईस्ट एशिया और अरब के देशो में व्यापार के लिए भेजते थे, उन जहांजो पर टैक्स वसूलने का काम वास्को डी गामा करता था. और अगर कोई जहांज वास्को डी गामा को टैक्स ना दे, तो उस जहांज को समुद्र में डुबोने का काम वास्को डी गामा करता था.
पोर्तुगीज सरकार के जो डॉक्यूमेंट है वो बताते है कि वास्को डी गामा पहली बार जब हिंदुस्तान से गया, लुट कर सम्पत्ति को ले कर के गया, तो ७ जहांज भर के सोने की अशर्फिया, उसके बाद दुबारा फिर आया वास्को डी गामा. वास्को डी गामा हिंदुस्तान में ३ बार आया लगातार लुटने के बाद, चौथी बार भी आता लेकिन मर गया. दूसरी बार आया तो हिंदुस्तान से लुट कर जो ले गया वो करीब ११ से १२ जहांज भर के सोने की अशर्फिया थी. और तीसरी बार आया और हिंदुस्तान से जो लुट कर ले गया वो २१ से २२ जहांज भर के सोने की अशर्फिया थी.इतना सोना चांदी लुट कर जब वास्को डी गामा यहाँ से ले गया तो पुर्तगाल के लोगों को पता चला कि हिंदुस्तान में तो बहुत सम्पत्ति है. और भारतवर्ष की सम्पत्ति के बारे में उन्होंने पुर्तगालियो ने पहले भी कहीं पढ़ा था, उनको कहीं से ये टेक्स्ट मिल गया था कि भारत एक ऐसा देश है, जहाँ पर महमूद गजनवी नाम का एक व्यक्ति आया, १७ साल बराबर आता रहा, लुटता रहा इस देश को, एक ही मंदिर को, सोमनाथ का मंदिर जो वेरावल में है. उस सोमनाथ के मंदिर को महमूद गजनवी नाम का एक व्यक्ति, एक वर्ष आया अरबों खरबों की सम्पत्ति ले कर चला गया, दुसरे साल आया, फिर अरबों खरबों की सम्पत्ति ले गया. तीसरे साल आया, फिर लुट कर ले गया. और १७ साल वो बराबर आता रहा, और लुट कर ले जाता रहा. तो वो टेक्स्ट भी उनको मिल गए थे कि एक एक मंदिर में इतनी सम्पत्ति, इतनी पूंजी है,इतना पैसा है भारत में, तो चलो इस देश को लुटा जाए, और उस ज़माने में एक जानकारी और दे दू, ये जो यूरोप वाले अमरीका वाले जितना अपने आप को विकसित कहे, सच्चाई ये है कि १४ वी. और १५ वी. शताब्दी में दुनिया में सबसे ज्यादा गरीबी यूरोप के देशो में थी. खाने पीने को भी कुछ होता नहीं था. प्रकृति ने उनको हमारी तरह कुछ भी नहीं दिया, न उनके पास नेचुरल रिसोर्सेस है, जितने हमारे पास है. न मौसम बहूत अच्छा है, न खेती बहुत अच्छी होती थी और उद्योगों का तो प्रश्न ही नहीं उठता. १३ फी. और १४ वी. शताब्दी में तो यूरोप में कोई उद्योग नहीं होता था. तो उनलोगों का मूलतः जीविका का जो साधन था जो वो लुटेरे बन के काम से जीविका चलाते थे. चोरी करते थे, डकैती करते थे, लुट डालते थे,ये मूल काम वाले यूरोप के लोग थे, तो उनको पता लगा कि हिंदुस्तान और भारतवर्ष में इतनी सम्पत्ति है तो उस देश को लुटा जाए, और वास्को डी गामा ने आ कर हिंदुस्तान में लुट का एक नया इतिहास शुरु किया. उससे पहले भी लुट चली हमारी, महमूद गजनवी जैसे लोग हमको लुटते रहे.
लेकिन वास्को डी गामा ने आकर लुट को जिस तरह से केन्द्रित किया और ओर्गनाइजड किया वो समझने की जरूरत है. उसके पीछे पीछे क्या हुआ,पुर्तगाली लोग आए, उन्होंने ७० – ८० वर्षो तक इस देश को खूब जम कर लुटा. पुर्तगाली चले गए इस देश को लुटने के बाद, फिर उसके पीछे फ़्रांसिसी आए,उन्होंने इस देश को खूब जमकर लुटा ७० – ८० वर्ष उन्होंने भी पुरे किए. उसके बाद डच आ गये हालैंड वाले, उन्होंने इस देश को लुटा. उसके बाद फिर अंग्रेज आ गए हिंदुस्तान में लुटने के लिए ही नहीं बल्कि इस देश पर राज्य भी करने के लिए. पुर्तगाली आए लुटने के लिए, फ़्रांसिसी आए लुटने के लिए,डच आए लुटने के लिए, और फिर पीछे से अंग्रेज चले आए लुटने के लिए, अंग्रेजो ने लुट का तरीका बदल दिया.

वेटिकन द्वारा रेपिस्ट पादरी की भारत में नियुक्ति



पिछले कुछ वर्षों में चर्च के पादरियों द्वारा बाल यौन शोषण की घटनाएँ पश्चिम में अत्यधिक मात्रा में बढ़ गई हैं. समूचा वेटिकन प्रशासन एवं स्वयं पोप पादरियों की इस “मानसिक समस्या” से बहुत त्रस्त हैं. पोप फ्रांसिस और इससे पहले वाले पोप ने भी मीडिया के सामने खुद स्वीकार किया है कि पादरियों में बाल यौन शोषण की “बीमारी” एक महामारी बन चुकी है. पश्चिमी देशों में मुक्त यौन व्यवहार एवं खुले समाज के कारण इस प्रकार की घटनाएँ जल्द ही सामने भी आ जाती हैं, इसीलिए सन 2001 से 2014 के बीच वेटिकन ने अपने पादरियों के गुनाह छिपाने के लिए न्यायालय से बाहर “सहमति से समझौते” के तहत लाखों डॉलर मुआवजे के रूप में बाँटे हैं.
दूसरी तरफ भारत एक सांस्कृतिक समाज है, जहाँ यौन स्वच्छंदता कतई आम बात नहीं है. यहाँ पर लड़कियाँ अक्सर पीछे रहती हैं, और जब मामला यौन शोषण अथवा बलात्कार का हो, तो उस लड़की पर समाज और परिवार का इतना जबरदस्त दबाव होता है कि वह खुलकर अपने अत्याचारी के खिलाफ सामने आ ही नहीं पाती. एक सर्वे के अनुसार बलात्कार एवं यौन शोषण के 92% मामले वहीं दबा दिए जाते हैं, जबकि बचे हुए 8% में भी सजा होने का प्रतिशत बहुत कम है, क्योंकि जागरूकता की कमी है. भारत के ऐसे माहौल में वेटिकन के उच्चाधिकारी एक बलात्कारी पादरी को भारत में नियुक्त कर रहे हैं.
जी हाँ, चौंकिए नहीं... रेव्हरेंड जोसफ जेयापौल नामक पादरी की नियुक्ति जल्द ही भारत के किसी चर्च में की जाने वाली है. रेवरेंड जेयापौल 2011 तक अमेरिका के मिनेसोटा प्रांत में डायोसीज ऑफ क्रुक्सटन में पादरी था, जहाँ इसने मीगन पीटरसन नाम की चौदह वर्षीय लड़की के साथ लगातार एक वर्ष तक बलात्कार और यौन शोषण किया. कोर्ट में खुद पीटरसन के लिखित बयान के अनुसार, “मैं फादर जेयापौल से सबसे पहली बार 2004 में मिली, जब उनका ट्रांसफर कनाडा की सीमा पर स्थित मिनेसोटा प्रांत के एक गाँव ग्रीनबुश में ब्लेस्ड सेक्रामेन्टो चर्च में हुआ. मैं बचपन से ही बहुत ही धार्मिक लड़की थी, और रोज़ाना चर्च जाती थी. मेरा सपना था कि मैं नन बनूँ. पहली ही भेंट में फादर जेयापौल ने मुझे धार्मिक किताबें देने के बहाने अपने निजी कमरे में बुलाया. मैं छोटी थी, इसलिए उसकी नीयत नहीं भाँप सकी. लेकिन उसने मुझे बहला-फुसलाकर मुझे “पापी” होने का अहसास दिलाया और पापों से मुक्त करने के बदले उसने लगातार एक वर्ष तक उस चर्च में यौन शोषण किया. मुझे जान से मारने और पीटने की धमकी देकर उसने मुझे बहुत डरा दिया था, इसलिए मैं किसी के सामने मुँह खोलने से घबराती थी. लेकिन जब यह सिलसिला लगातार चलता रहा और मैं थोड़ी बड़ी हुई, तब मुझमे हिम्मत जागी और मैंने अपने परिवार वालों को इसके बारे में बताया”.
जब पीटरसन के परिवार वालों ने वेटिकन में शिकायत की तो पहले अधिकारियों द्वारा लीपापोती की कोशिशें की गईं, लेकिन जब परिवार ने सीधे पोप फ्रांसिस से संपर्क किया तब जाकर काफी टालमटोल के बाद 2010 में रेवरेंड जोसफ जेयापौल को चर्च से निलंबित (सिर्फ निलंबित) किया गया. पीटरसन के परिजनों ने वेटिकन पर मुकदमा दायर कर दिया और 2011 में पादरी की सजा कम करने के समझौते के तहत कोर्ट के बाहर आपसी सहमति से सात लाख पचास हजार डॉलर का मुआवज़ा वसूल किया. सजा सुनते ही यह पादरी भारत भाग निकला, लेकिन 2012 में इंटरपोल ने इसे पकड़कर पुनः अमेरिकी पुलिस के हवाले कर दिया. दो वर्ष की जेल काटने के बाद रेवरेंड जोसफ रिहा हो गया और वेटिकन ने इसे पुनः चर्च की सेवाओं में शामिल कर लिया.
ताज़ा खबर यह है कि फरवरी 2016 में जब इस बहादुर लड़की पीटरसन को यह पता चला कि फादर जोसफ जेयापौल को एक नए असाइनमेंट के तहत विशेष नियुक्ति देकर भारत के किसी चर्च में भेजा जा रहा है, तब इसे और इसके परिवार को तगड़ा झटका लगा. पीटरसन कहती हैं, कि “यह बेहद अपमानजनक निर्णय है, वेटिकन कैसे एक बलात्कारी को पुनः किसी चर्च में नियुक्त कर सकता है?भारत जाकर यह आदमी पता नहीं कितनी लड़कियों का जीवन खराब करेगा, जहाँ वे इसके खिलाफ खुलकर सामने भी नहीं आ सकेंगी” अब इसने पुनः वेटिकन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. फिलहाल पादरी जेयापौल 61 वर्ष का है, और पीटरसन द्वारा इस मामले में पुनः आवाज़ उठाने के कारण भारत भेजने का फैसला कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया है, लेकिन यह स्थिति कब तक रहेगी कहा नहीं जा सकता. हो सकता है निकट भविष्य में दिल्ली अथवा तमिलनाडु के किसी चर्च में रेवरेंड जोसफ जेयापौल को बिशप नियुक्त कर दिया जाए...
बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत के “प्रगतिशील”(??) महिला संगठन वेटिकन के इस निर्णय के खिलाफ अपना मुँह खोलेंगे?? भारत के वामपंथी और सेकुलर बुद्धिजीवी, जेल काट चुके इस बाल यौन अपराधी को भारत में पादरी बनाने का विरोध करेंगे?? या फिर इनकी सारी बौद्धिक तोपें सिर्फ हिन्दू संतों के विरोध हेतु आरक्षित हैं??

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युगोस्लाविया - सोवियत संघ

  यदि आप कभी bosnia-herzegovina जाएंगे तब एक जगह आपको 9300 मुसलमानों की सामूहिक कब्र दिखेगी जहां उन सभी के नाम लिखे हैं दरअसल यह मुस्लिम कही...