कहते हैं प्यार और जंग में सब जायज़ है ,युद्ध क्षेत्र की ऐसी ही कुछ घटनाये जहा भ्रम पैदा किया गया और और पासा ही पलट गया
द्वितीय विश्व युद्ध के समय लगभग सभी दलों ने जमकर धोखाधड़ी, भ्रम और चालाकी का सहारा लिया था. #जापानी सेना ने खेतों में, मैदानों में बांस के बने नकली बमवर्षक विमान के मॉडल खड़े किये, उन्हें असली घास फूस आदि से थोड़ा ढंक दिया. इससे अमेरिकी सेना को लगता कि ये जापान का कोई ख़ुफ़िया सैन्य अड्डा है और वो बम बरसा के खुश हो जाते. एक जगह तो जापानियों से खाली एयर फील्ड की जमीन पर अमेरिकी B-29 विमान का बड़ा सा चित्र पेंट कर दिया, जिसके इंजन में आग लगी हो. अन्य अमेरिकी बमवर्षकों को लगता उनके किसी विमान के साथ कोई दुर्घटना हुई है, वो छानबीन के लिए नीची उड़ान भरते और जापानी टैंक और तोपों का शिकार बन जाते.
अमेरिका भी भला कैसे पीछे रहता. अमेरिकी सेना के 23rd Headquarters Special Troops को यह जिम्मेदारी मिली कि ऐसा #छलावरण पैदा किया जाये कि जर्मन सेना को लगे, अमेरिका के सहायक अन्य देशों की सेनायें समय से पहले ही भारी गोला बारूद और साजोसामान के साथ पहुँच चुकी हैं. 23rd Troops ने हवा से फूलने वाले रबर के हवाईजहाज, टैंक, युद्ध के ट्रक के मॉडल से, #Fake रेडियो ट्रांसमिशन और दूर दूर तक लगे स्पीकर्स पर तोपों के गडगडाहट, सैनिकों के शोर की रिकॉर्डिंग बजाकर #Ghost_Army का भ्रम पैदा किया.
#भारतीय_आर्मी की सूझबूझ
भारतीय सेना ने भी समय-२ पर चालाकी और होशियारी से काम लिया. सन 1971 की लड़ाई में कराची पर बमवर्षा करते हुए भारतीय नेवी मिसाइल बोट्स आपस में रशियन भाषा में संवाद कर रहे थे, जिससे #पाकिस्तानी सेना चक्कर में पड़ गयी. उन्हें लगता यह सिग्नल सुदूर अरब सागर में रूसी नेवी का अमेरिकी सेना के खिलाफ रणनीति की बातें, प्लान आदि हैं. इसके अलावा इंडियन आर्मी ने जगह जगह पर दक्षिण भारतीय रेडियो ट्रांसमिशन स्टाफ की पोस्टिंग की. इन साउथ इंडियन भाषाओँ में बातचीत के सिग्नल पाकिस्तानी सेना के पल्ले ही नहीं पड़ते थे।
#ब्रिटिश_आर्मी की Starfish Sites –
2nd World War के दौरान British Army ने जर्मन लड़ाकू विमानों से अपने शहरों को बचाने के लिए भ्रम विद्या का सहारा लिया. ब्रिटिश आर्मी के इस प्रोजेक्ट का नाम था Starfish. इस प्रोजेक्ट के तहत South City Film Studios में नकली शहर, हवाई जहाज, टैंक आदि के कार्डबोर्ड, कैनवास, लकड़ी आदि सामग्री से बने मॉडल तैयार किये जाने लगे. इस नकली मॉडल का प्रयोग असली स्थान से दूर किसी वीराने, खेत में नकली शहर और सैनिक हवाई अड्डे का भ्रम पैदा करने के लिए किया जाता था. लोगों को एक टीम तैयार की गयी जोकि युद्ध समय की दौरान इन मॉडल में आग लगा दिया करते, जिससे जर्मन बॉम्बर विमानों को लगे कि वहाँ पर पहले से ही युद्ध चल रहा है. कई जगह नकली ट्रेन के मॉडल खड़े कर उनमे बिजली के बल्ब जला दिए जाते.
किसी तालाब के ऊपर लाइट लैंप लगा कर उससे #परावर्तित रौशनी से नदी का भ्रम पैदा किया जाता. ब्रिटिश आर्मी का अनुमान है, इस प्रयोग से हजारों-लाखों निवासियों और आर्मी की जान बचाई गयी.
भारत के इतिहास में भी कई बार ऐसी घटनाओं का जिक्र है. #शिवाजी ने शाइस्ताखान के खिलाफ युद्ध में रात के समय बैलों और साड़ों की सींगो में मशालें बांधकर छोड़ दिया था, जिससे भारी सेना का भ्रम पैदा किया. बीजापुर और क़ुतुब शाही की लड़ाई में मराठे छोटे छोटे ग्रुप में पहाड़ों में अलग अलग तरफ से आक्रमण करते थे, जिससे बड़ी सेना का आभास हो.
मेवाड़ के शासक अपने घोड़ों पर छोटे हाथियों की सी सूंड और छद्मावरण पहना दिया करते थे, जिससे युद्ध में विरोधी सेना के घोड़े उन्हें छोटे हाथी समझ कर डरकर बिदक जाया करते थे. #महाराणा प्रताप ने इस युद्धनीति का प्रयोग प्रसिद्ध हल्दीघाटी के युद्ध में भी किया था।
