मंगलवार, 30 मई 2023

#विश्व युद्ध

 कहते हैं प्यार और जंग में सब जायज़ है ,युद्ध क्षेत्र की ऐसी ही कुछ घटनाये जहा भ्रम पैदा किया गया और और पासा ही पलट गया

द्वितीय विश्व युद्ध के समय लगभग सभी दलों ने जमकर धोखाधड़ी, भ्रम और चालाकी का सहारा लिया था. #जापानी सेना ने खेतों में, मैदानों में बांस के बने नकली बमवर्षक विमान के मॉडल खड़े किये, उन्हें असली घास फूस आदि से थोड़ा ढंक दिया. इससे अमेरिकी सेना को लगता कि ये जापान का कोई ख़ुफ़िया सैन्य अड्डा है और वो बम बरसा के खुश हो जाते. एक जगह तो जापानियों से खाली एयर फील्ड की जमीन पर अमेरिकी B-29 विमान का बड़ा सा चित्र पेंट कर दिया, जिसके इंजन में आग लगी हो. अन्य अमेरिकी बमवर्षकों को लगता उनके किसी विमान के साथ कोई दुर्घटना हुई है, वो छानबीन के लिए नीची उड़ान भरते और जापानी टैंक और तोपों का शिकार बन जाते.

अमेरिका भी भला कैसे पीछे रहता. अमेरिकी सेना के 23rd Headquarters Special Troops को यह जिम्मेदारी मिली कि ऐसा #छलावरण पैदा किया जाये कि जर्मन सेना को लगे, अमेरिका के सहायक अन्य देशों की सेनायें समय से पहले ही भारी गोला बारूद और साजोसामान के साथ पहुँच चुकी हैं. 23rd Troops ने हवा से फूलने वाले रबर के हवाईजहाज, टैंक, युद्ध के ट्रक के मॉडल से, #Fake रेडियो ट्रांसमिशन और दूर दूर तक लगे स्पीकर्स पर तोपों के गडगडाहट, सैनिकों के शोर की रिकॉर्डिंग बजाकर #Ghost_Army का भ्रम पैदा किया.


#भारतीय_आर्मी की सूझबूझ
भारतीय सेना ने भी समय-२ पर चालाकी और होशियारी से काम लिया. सन 1971 की लड़ाई में कराची पर बमवर्षा करते हुए भारतीय नेवी मिसाइल बोट्स आपस में रशियन भाषा में संवाद कर रहे थे, जिससे #पाकिस्तानी सेना चक्कर में पड़ गयी. उन्हें लगता यह सिग्नल सुदूर अरब सागर में रूसी नेवी का अमेरिकी सेना के खिलाफ रणनीति की बातें, प्लान आदि हैं. इसके अलावा इंडियन आर्मी ने जगह जगह पर दक्षिण भारतीय रेडियो ट्रांसमिशन स्टाफ की पोस्टिंग की. इन साउथ इंडियन भाषाओँ में बातचीत के सिग्नल पाकिस्तानी सेना के पल्ले ही नहीं पड़ते थे।

#ब्रिटिश_आर्मी की Starfish Sites –
2nd World War के दौरान British Army ने जर्मन लड़ाकू विमानों से अपने शहरों को बचाने के लिए भ्रम विद्या का सहारा लिया. ब्रिटिश आर्मी के इस प्रोजेक्ट का नाम था Starfish. इस प्रोजेक्ट के तहत South City Film Studios में नकली शहर, हवाई जहाज, टैंक आदि के कार्डबोर्ड, कैनवास, लकड़ी आदि सामग्री से बने मॉडल तैयार किये जाने लगे. इस नकली मॉडल का प्रयोग असली स्थान से दूर किसी वीराने, खेत में नकली शहर और सैनिक हवाई अड्डे का भ्रम पैदा करने के लिए किया जाता था. लोगों को एक टीम तैयार की गयी जोकि युद्ध समय की दौरान इन मॉडल में आग लगा दिया करते, जिससे जर्मन बॉम्बर विमानों को लगे कि वहाँ पर पहले से ही युद्ध चल रहा है. कई जगह नकली ट्रेन के मॉडल खड़े कर उनमे बिजली के बल्ब जला दिए जाते.



किसी तालाब के ऊपर लाइट लैंप लगा कर उससे #परावर्तित रौशनी से नदी का भ्रम पैदा किया जाता. ब्रिटिश आर्मी का अनुमान है, इस प्रयोग से हजारों-लाखों निवासियों और आर्मी की जान बचाई गयी.
भारत के इतिहास में भी कई बार ऐसी घटनाओं का जिक्र है. #शिवाजी ने शाइस्ताखान के खिलाफ युद्ध में रात के समय बैलों और साड़ों की सींगो में मशालें बांधकर छोड़ दिया था, जिससे भारी सेना का भ्रम पैदा किया. बीजापुर और क़ुतुब शाही की लड़ाई में मराठे छोटे छोटे ग्रुप में पहाड़ों में अलग अलग तरफ से आक्रमण करते थे, जिससे बड़ी सेना का आभास हो.
मेवाड़ के शासक अपने घोड़ों पर छोटे हाथियों की सी सूंड और छद्मावरण पहना दिया करते थे, जिससे युद्ध में विरोधी सेना के घोड़े उन्हें छोटे हाथी समझ कर डरकर बिदक जाया करते थे. #महाराणा प्रताप ने इस युद्धनीति का प्रयोग प्रसिद्ध हल्दीघाटी के युद्ध में भी किया था।



रविवार, 28 मई 2023

रानी कर्णावती - पवार वंश

इतिहास में #कर्णावती नाम की दो रानियों का उल्लेख मिलता है,एक चित्तौड के शासक राणासंग्राम सिंह की पत्नी थी
दूसरी देवभूमि की महारानी गढवाल की शासिका थीं जिनका उल्लेख नाक काटने वाली रानी के नाम से मिलता है~~~~~
शाहजहां के कार्यकाल पर #बादशाहनामा लिखने वाले अब्दुल हमीद लाहौरी और इटली के लेखक निकोलाओ मानुची जो 17 सदी में भारत आये और औरंगजेब के मुगल दरबार में काम किया थे, दोनों ने ही इस रानी का जिक्र अपनी किताब 'स्टोरिया डो मोगोर में किया है की कैसे मुगल सैनिकों की नाट काटी थी !

रानी कर्णावती पवार वंश के राजा #महिपतशाह की पत्नी थी,जिनके शासन में रिखोला लोदी और माधोसिंह जैसे सेनापति हुए थे जिन्होंने तिब्बत के आक्रांताओं को छठी का दूध याद दिलाया था! माधोसिंह के बारे में गढ़वाल में काफी किस्से प्रचलित हैं ! पहाड़ का सीना चीरकर अपने गांव मलेथा में पानी लाने की कहानी भला किस गढ़वाली को पता नहीं होगी। कहा जाता था कि माधोसिंह अपने बारे में कहा करते थे == एक सिंह वन ​का सिंह, एक सींग गाय का। तीसरा सिंह माधोसिंह, चौथा सिंह काहे का
रिखोला लोदी और माधोसिंह जैसे सेनापतियों की मौत के बाद महिपतशाह भी जल्द स्वर्ग सिधार गये ! तत्पश्चात रानी कर्णावती ने सत्ता संभाली,उनके पुत्र पृथ्वीपतिशाह केवल 7 साल के थे, अतः रानी कर्णावती ने एक संरक्षिका शासिका के रूप में शासन किया !

वे अपनी विलक्षण बुध्दि एवं गौरवमय व्यक्तित्व के लिए प्रसिध्द हुईं,और बडे धैर्य और साहस के साथ उन्होंने पृथ्वीपति शाह के संरक्षक के रूप में राज्यभार संभाला ! रानी कर्णावती ने राजकाज संभालने के बाद अपनी देखरेख में शीघ्र ही शासन व्यवस्था को सुद्यढ किया! #गढवाल के प्राचीन ग्रंथों और गीतों में रानी कर्णावती की प्रशस्ति में उनके द्वारा निर्मित बावलियों. तालाबों , कुओं आदि का वर्णन आता है।
एक बार समर्थ गुरु स्वामी #रामदास और सिख गुरु #हरगोविन्द जी 1634 में श्रीनगर गढवाल पधारे और रानी कर्णावती को उनसे भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समर्थ गुरु रामदास ने रानी कर्णावती से पूछा कि क्या पतित पावनी गंगा की सप्त धाराओं से सिंचित भूखंड में यह शक्ति है कि वैदिक धर्म एवं राष्ट्र की मार्यादा की रक्षा के लिये मुगल शक्ति से लोहा ले सके। इस पर रानी कर्णावती ने विनम्र निवेदन किया पूज्य गुरुदेव , इस पुनीत कर्तव्य के लिये हम गढवाली सदैव कमर कसे हुए उपस्थित हैं।



इससे पहले जब महिपतशाह गढ़वाल के राजा थे तब 14 फरवरी 1628 को शाहजहां का #राज्याभिषेक हुआ था ! जब वह गद्दी पर बैठे तो देश के तमाम राजा आगरा पहुंचे थे ! महिपतशाह आगरा नहीं गये ! इसके दो कारण थे,पहला यह कि पहाड़ से आगरा तक जाना तब आसान नहीं था और दूसरा उन्हें मुगल शासन की अधीनता स्वीकार नहीं थी ! कहा जाता है कि शाहजहां इससे चिढ़ गया था !

इसके अलावा किसी ने मुगल शासकों को बताया कि गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर में सोने की खदानें हैं ! महीपति शाह के शासनकाल में मुगल सेना गढवाल विजय के बारे में सोचती भी नहीं थी, लेकिन जब रानी कर्णावती ने गढवाल का शासन संभाला तब मुगल शासकों ने सोचा कि उनसे शासन छीनना सरल होगा !

शाहजहां को समर्थ गुरु रामदास और गुरु हरगोविन्द सिंह के श्रीनगर पहुंचने और रानी कर्णावती से सलाह मशविरा करने की खबर लग गयी थी ! नजाबत खां नाम के एक मुगल सरदार को गढवाल पर हमले की जिम्मेदारी सौंपी गयी और वह 1635 में एक विशाल सेना लेकर आक्रमण के लिये आया जिसमे पैदल व घुडसवार सैनिक भी थे !

विषम परिस्थितियों में रानी कर्णावती ने सीधा मुकाबला करने के बजाय कूटनीति से काम लिया और मुगलो को अपनी सीमा में घुसने दिया लेकिन जब वे वर्तमान समय के #लक्ष्मणझूला से आगे बढ़े तो उनके आगे और पीछे जाने के रास्ते रोक दिये गये। गंगा के किनारे और पहाड़ी रास्तों से अनभिज्ञ मुगल सैनिकों के पास खाने की सामग्री समाप्त होने लगी ! उनके लिये रसद भेजने के सभी रास्ते भी बंद थे !

मुगल सेना कमजोर पड़ने लगी और ऐसे में सेनापति ने गढ़वाल के राजा के पास संधि का संदेश भेजा लेकिन उसे ठुकरा दिया गया ! मुगल सेना की स्थिति बदतर हो गयी थी ! रानी चाहती तो उसके सभी सैनिकों का खत्म कर देती लेकिन उन्होंने मुगलों को सजा देने का नायाब तरीका निकाला !

रानी ने संदेश भिजवाया कि वह सैनिकों को जीवनदान दे सकती है लेकिन इसके लिये उन्हें अपनी नाक कटवानी होगी! मुगल सैनिकों के हथियार छीन लिए गये और आखिर में उन सभी की एक एक करके #नाक काट दी गयी ! कहा जाता है कि जिन सैनिकों की नाक का​टी गयी उनमें सेनापति नजाबत खान भी शामिल था ! वह ​इससे काफी शर्मसार था और उसने मैदानों की तरफ लौटते समय अपनी जान दे दी।
इस तरह मोहन चट्टी में मुगल सेना को नेस्तनाबूद कर देने के बाद रानी कर्णावती ने जल्द ही पूरी दून घाटी को भी पुन: गढवाल राज्य के अधिकार क्षेत्र में ले लिया ! गढवाल की उस नककटवा रानी ने गढवाल राज्य की विजय पताका फिर शान के साथ फहरा दी और समर्थ गुरु रामदास को जो वचन दिया था, उसे पूरा करके दिखा दिया ! रानी कर्णावती के राज्य की संरक्षिका के रूप में 1640 तक शासनारूढ रहने के प्रमाण मिलते है

शाहजहां इस हार से काफी शर्मसार हुआ था,बाद में उसने अरीज खान को गढ़वाल पर हमले के लिये भेजा था लेकिन वह भी दून घाटी से आगे नहीं बढ़ पाया था, बाद में शाहजहां के बेटे औरंगजेब ने भी गढ़वाल पर हमले की नाकाम कोशिश की थी !

बुधवार, 24 मई 2023

राजा राममोहन राय आधुनिक भारत के जनक VS इसाई धर्मप्रचारक

 आइये आज आपको इतिहास की एक और साजिश से रूबरू करवाते हैं

आज तक हम और हमारे बच्चो ने यही पढ़ा है की राजा #राममोहन_राय आधुनिक भारत के जनक थे~~~राममोहनराय कोई राजा नहीं था,वो अदालत का मुंशी और #इसाईधर्मप्रचारक था
कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने किस बेशर्मी से हमारे गौरवशाली इतिहास को विकृत और नष्ट किया है ये बात अब किसी से छुपी नहीं है। ताजा उदाहरण राम जन्म भूमि में मिले सबूत हैं, कि किस तरह इरफान हबीब से लेकर रोमिला थापर जैसे तथाकथित इतिहासकार देश के सामने झूठा इतिहास थोपते रहे।

ऐसे ही इतिहासकारों ने अंग्रेजों के गुलाम रहे तथाकथित राजा राममोहन राय को भी देश का ऐसा महान #समाज_सुधारक बना दिया है जो न तो ढंग से पढ़ा लिखा था न राजा था। ब्राह्मण घर में पैदा हुआ राम मोहन राय कैसे राजा बना और इसाई धर्म ग्रहण करने के बाद अंग्रेजों ने उसे समाज सुधारक बना दिया।
राममोहन राय के बारे में जानने के पहले भारत की गुरुकल व्यवस्था के बारे में जान लीजिए, इसी गुरुकुल व्वस्था को खत्म करने के लिए तथाकथित राजा राम मोहन राय ने अंग्रजों के साथ मिलकर इसाई शिक्षा व्यवस्था देश पर थोपी थी। एक अंग्रेज था जिसका नाम था जी.डब्लू. लिटनर, उसने भारत की शिक्षा व्यवस्था पर सबसे बड़ा सर्वेक्षण किया और अपनी रिपोर्ट में कहा था कि १८२३ में भारत मे एक भी ऐसा गांव नहीं था जहा गुरुकुल न हो, किसी किसी गांव मे तो एक से ज्यादा गुरुकुल थे |

जब कुछ अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारी के रूप में भारत आए और यहां के समाज में कुछ प्रतिष्ठा पाने का प्रयास करने लगे तो उन्होंने पाया कि इस समाज में शिक्षा का बहुत महत्व है। इसलिए उन्होंने कोलकाता और काशी मे विद्यालय स्थापित किए ।

1780 ईस्वी मे कोलकाता मे एक मदरसा बनाया ताकि उस इलाके के नवाब प्रसन्न हों और 1791 ईस्वी मे काशी मे संस्कृत विद्यालय बनाया ताकि काशी सहित आसपास के हिंदू राजा प्रसन्न हों।
#इंग्लैंड मे यह वह दौर था जब वहाँ भारत की लूट से धन पहुँचना शुरू हुआ ,भारत के सुंदर मुलायम सूती और रेशमी वस्त्र इंग्लैंड और यूरोप के रईस लोगों के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं थे।

इस 1793 में इंग्लैंड से पादरी विलियम कैरी भारत आया। इसने इंग्लैंड में रहकर एक पुस्तक लिखी थी- “हिंदुओं तथा अन्य विधर्मियों को ईसाई कैसे बनाया जाए।” उसने बंगाल में कोलकाता के आस पास आकर लोगों को ईसाई बनाने का अभियान छेड़ दिया। कोलकोता में कुछ समय बाद ही उसकी भेंट #ब्याज का धंधा करने वाले राममोहन राय से हुई जो थोड़ी अरबी फारसी पढ़ा था। वह कंपनी के लोगों को ब्याज पर रकम उधार देता था और अपना गुजारा ब्याज की रकम से चलाता था । इस तरह वह #कंपनी के लोगों से काफी घुल मिल गया था।

राम मोहन राय का जन्म 14-08-1774 को हुगली जिले,बंगाल में अमीर ब्राह्मण परिवार में हुआ था।पिता रूढ़िवादी व्यक्ति थे,और धार्मिक परंपराओँ का सख्ती से पालन करते थे।
14 साल की उम्र में राम मोहन ने एक भिक्षु बनने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन मां ने विरोध किया तो उन्होंने ये विचार त्याग दिया।
हालाँकि उनके पिता रमाकांत बहुत रूढ़िवादी थे, लेकिन चाहते थे कि उनका बेटा उच्च शिक्षा हासिल करे। उन्होंने गाँव के स्कूल से बंगाली और संस्कृत की शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद, राम मोहन को एक मदरसे में फारसी और अरबी का अध्ययन करने के लिए पटना भेजा गया। उस समय फारसी और अरबी पढ़ना जरुरी समझा जाता था क्योंकि यह मुगलों के शासन के दौर में इस भाषा का का ज्ञान होना जरुरी था।
राम मोहन राय ने कुरान और अन्य इस्लामिक शास्त्रों का अध्ययन किया। पटना में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, वह संस्कृत सीखने के लिए बनारस (काशी) गए।राम मोहन ने नौ साल की उम्र में बाल विवाह हुआ, लेकिन उनकी पहली पत्नी की शादी के तुरंत बाद मृत्यु हो गई। दूसरी शादी से उनके दो बेटे थे। 1826 में अपनी दूसरी पत्नी की मृत्यु के बाद, उन्होंने तीसरी बार शादी की और उनकी तीसरी पत्नी ने उन्हें छोड़ दिया।

1805 में उसे ईस्ट इंडिया कंपनी में उसे जॉन डिगबॉय नामक अधिकारी के सहायक के रूप में नौकरी मिल गई। यहाँ काम करते हुए उसने अंग्रेजों को खुश करने के लिए बाईबिल पढ़ना शुरु कर दी।
1815 में रॉय ने एकेश्वरवादी हिंदू धर्म के अपने सिद्धांतों को प्रचारित करने के लिए अल्पकालिक आत्मीय सभा (फ्रेंडली सोसाइटी) की स्थापना की। इसके साथ ही राम मोहन राय का झुकाव ईसाई धर्म में हुआ और उसने ओल्ड (हिब्रू बाइबिल) और न्यू टेस्टामेंट को पढ़ने के लिए हिब्रू और ग्रीक भाषा सीखी। 1820 राम मोहन राय ने प्रीस ऑफ जीसस, गाइड टू पीस एंड हैप्पीनेस शीर्षक पुस्तकों में ईसा मसीह की नैतिक शिक्षाओं को प्रकाशित किया ताकि हिंदू लोग अपने धार्मिक ग्रंथों को छोड़ ईशु की मान्यताओं पर भरोसा करने लगे।
राम मोहन राय अपने समाचार पत्रों, ग्रंथों और पुस्तकों में पारंपरिक हिंदू धर्म की मूर्तिपूजा और अंधविश्वास बताते हुए उनकी आलोचना करते रहे, आज कल के जय भीम और वामपंथिये की तरह।

1822 में रॉय ने अपने हिंदू एकेश्वरवादी सिद्धांतों को सिखाने के लिए एंग्लो-हिंदू स्कूल और चार साल बाद वेदांत कॉलेज की स्थापना की। जब 1823 में बंगाल सरकार ने एक और पारंपरिक संस्कृत महाविद्यालय प्रस्तावित किया, तो रॉय ने कहा कि संस्कृत पढ़ने से नई पीढ़ी को कोई ज्ञान नहीं मिलेगा। इसके लिए राय ने अंग्रेजी शिक्षा की वकालात की।
अगस्त 1828 में रॉय ने ब्राह्म समाज (सोसाइटी ऑफ ब्रह्मा) गठन किया जिसे हिंदू सुधारवादी संप्रदाय नाम देकर इसके माध्यम से इसाई धारणाओं का प्रचार किया गया।

पादरी कैरी ने राममोहन राय के साथ मिलकर जालसाजी भरा ग्रंथ लिखा #महानिर्वाण तंत्र और यह बताया कि “महानिर्वाण तंत्र” भारतीय दर्शन का बहुत बड़ा ग्रंथ है जो कि ईसाइयत के सिद्धांतों को ही संस्कृत में प्रस्तुत करता है और परमेश्वर के विषय में ईसाइयों की जो मान्यता है, ठीक वही मान्यता महानिर्वाण तंत्र मे भी ईश्वर की है।

अंग्रेजों की गुलामी करते हुए मुलाजिम रहते हुए राममोहन राय ने एक अभियान छेड़ दिया कि बंगाल में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई हो । इसके साथ ही उसने यह अभियान भी चलाया कि अंग्रेज लोग बंगाल में ज्यादा से ज्यादा संख्या में आकर बसें । उसके लिए भारतीयों के समक्ष यह तर्क रखा कि देखो, यह लोग हमारा धन इंग्लैंड ले जाते हैं अगर यही रहेंगे तो हमारा धन यहीं रहेगा और वे यहीं पर व्यापार करेंगे ।

राममोहन की मदद से कंपनी ने एक एंग्लो संस्कृत स्कूल कोलकाता मे खोला, बाद मे उसे ही वेदान्त महाविद्यालय का नाम दिया जबकि वहाँ #ईसाई सिद्धान्त ही वेदान्त कहकर पढ़ाये जाते थे ।

राममोहन राय फारसी के जानकार होने के कारण और पादरी विलियम कैरी के माध्यम से अकबर शाह द्वितीय (22 अप्रैल 1760 – 28 सितंबर 1837) नामक जो मुगल खानदान का वंशज दिल्ली में बचा था, उसके संपर्क में आया। अकबर शाह द्वितीय अपनी पेंशन बढ़ाने की अर्जी इंग्लैंड की महारानी को भेजना चाहता था।

राम मोहन राय ने अपने आपको अंग्रेजों का करीबी बताकर अकबर शाह द्वितीय को समझाया कि इंग्लैंड में आप मुझे एक #राजा की उपाधि देकर भेजें ताकि लोग वहाँ मेरी इज्जत करें और आपका काम भी आसान हो जाए। राजा ने राम मोहन राय को मुगल सम्राट द्वारा राजा की #उपाधि देकर 19 नवंबर, 1830 को मुगल साम्राज्य का दूत बनाकर ब्रिटेन भेजा।

1833 में ब्रिस्टल, इंग्लैंड में रहने के दौरान मेनिन्जाइटिस से उनकी मृत्यु हो गई। उसे इसाई पद्धति से दफनाया गया । कुछ समय बाद, जिस ईसाई कब्रिस्तान में उसे दफनाया गया था, वहाँ के लोगों ने उसकी कब्र का वहाँ होने का विरोध का और उसकी मौत के 9 साल बाद उसे उस कब्र से निकाल कर ब्रिस्टल मे एक दूसरे कब्रिस्तान की कब्र में फिर से 7 फुट गहरे गड्ढे में दफनाया गया।

उस कब्रिस्तान के पादरी लोग प्रतिवर्ष 27 सितंबर को राम मोहन राय की स्मृति में प्रार्थना करने उस कब्र पर इकट्ठा होते हैं और नेहरू जी की प्रेरणा से तथा कांग्रेस शासन की योजना से भारतीय राजदूत वहां कब्रिस्तान में पहुंचकर” मृतक राम मोहन राय को ईसाई गॉड सद्गति दें, इस प्रार्थना की सभा में शामिल होते रहे।
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युगोस्लाविया - सोवियत संघ

  यदि आप कभी bosnia-herzegovina जाएंगे तब एक जगह आपको 9300 मुसलमानों की सामूहिक कब्र दिखेगी जहां उन सभी के नाम लिखे हैं दरअसल यह मुस्लिम कही...