गुरुवार, 27 अप्रैल 2023

अमृतसर_आ_गया

 भीष्म साहनी ने एक कहानी लिखी है #अमृतसर_आ_गया

इस कहानी में इसका वर्णन है की जब मुसलमान अकेला होता है तब वो कितना शांतिप्रिय और सेकुलर होने का बहाना करता है ..लेकिन जैसे ही वो अपने स्वधर्मी मुसलमानों के साथ होता है तब वो कितना खतरनाक, खूंखार और इस्लामवादी हो जाता है....
क्या भारत क्या पाकिस्तान इनके लिए सिर्फ और सिर्फ इनकी कौम ही सबसे बड़ी है।
शाहनवाज भुट्टो फज्र की नमाज़ पढ़ रहे थे,तभी खबर आई- मुबारक हो बेटा हुआ है,मियां भुट्टो ने कमरे में पहुंचकर बच्चे को हौले से उठाया उसकी कान में नमाज पढ़ी.फिर नाम रखा- #जुल्फिकार. मुसलमानों के चौथे खलीफा हजरत अली की तलवार जुल्फिकार के नाम पर। जो आगे पाकिस्तान का PM बना...
पाक के ताकतवर नेताओं में एक #प्रधाममंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की वो आखिरी रात बहुत ही दर्दनाक थी ====
जब भुट्टो को फांसी दी गई, तब ब्रिगेडियर राहत लतीफ़ रावलपिंडी जेल के इंचार्ज थे, जब गार्ड ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को फांसी देने ले जाने आए, तो वह नशे की दवा की वजह से गहरी नींद में थे।
जब गार्ड आए तो वह गहरी नींद में थे. उन्होंने उनको उठने और फांसी के लिए चलने को कहा लेकिन वो उठ नहीं पाए. फिर उन्हें स्ट्रेचर पर रखा गया. जो गार्ड उन्हें लेने गए थे, उनमें जेल सुपरिटेंडेंट भी थे। उन्होंने उनसे कहा कि इस वक़्त आपको ख़ुद से उठ जाना चाहिए।
उनको जब फांसी दी गई तो उससे एक दिन पहले उन्हें खुद भी नहीं पता था कि उनकी फांसी की सजा होगी यह सब काम पाकिस्तानी जनरल द्वारा जल्दबाजी में हुए थे




फांसी से कुछ देर पहले जब सुरक्षाकर्मियों ने भुट्टो के हाथ पीछे कर बांधने की कोशिश की तो उन्होंने उसका विरोध किया। आखिरकार उनके हाथों में जबरदस्ती रस्सी बांधी गई। उसके बाद उन्हें एक स्ट्रेचर पर लिटा कर कुछ दूर ले जाया गया।
भुट्टो को फांसी पर लटकाने के लिए #जल्लाद पहले से ही तैयार था। जैसे ही घड़ी में देर रात 2 बजकर 4 मिनट हुए, जल्लाद ने भुट्टो के कान में कुछ फुसफसाया और लिवर दबा दिया। भुट्टो आधे घंटे तक फांसी के फंदे पर लटके रहे। इसके बाद एक डॉक्टर ने भुट्टो की जांच की और उन्हें मृत घोषित कर दिया।
इसके बाद खुफिया एजेंसी ने एक फोटोग्रफर को भुट्टो की तस्वीर लेने भेजा उसे ब्रीफ दिया गया था कि वो भुट्टो के #लिंग की तस्वीर खींचकर लाए. वे लोग देखना चाहते थे कि भुट्टो का खतना हुआ भी है या नहीं।
फोटो देखने के बाद इस बात की पुष्टि हुई कि एक सच्चे मुसलमान की तरह भुट्टो का भी खतना हुआ था।
फिर मिलिट्री ट्रक में आधी रात को ही एयरपोर्ट से शव को उनके पुश्तैनी गांव में दफनाया गया।
आमतौर पर होने वाली फांसी के तीन घंटे पहले ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को फांसी दी गई।

बाबा राघवदास -पूर्वांचल का गाँधी


भारत के पहले सन्यासी विधायक,जिन्हे #पूर्वांचल_का_गाँधी कहा जाता है
1896 महाराष्ट्र में जन्मे राघवेन्द्र एक सिद्ध गुरु की खोज में १७ वर्ष की अवस्था में अपने प्रान्त को अलविदा कर दिए और प्रयाग, काशी आदि तीर्थों में विचरण करते हुए up के गाजीपुर पहुंचे जहाँ उनकी भेंट मौनीबाबा नामक एक संत से हुई। मौनीबाबा ने राघवेन्द को हिन्दी सिखाई,

गाजीपुर में कुछ समय बिताने के बाद राघवदास देवरिया के बरहज पहुंचे और वहां संत योगीराज अनन्त महाप्रभु के शिष्य बन गए.
1921 में स्वतंत्र भारत का सपना साकार करने के लिए स्वतंत्रता संग्राम में कूद गए तथा साथ ही साथ जनसेवा भी करते रहे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस कर्मयोगी को कई बार जेल भी गए, 1931 में गाँधीजी के नमक सत्याग्रह को सफल बनाने के लिए राघवबाबा ने क्षेत्र में कई स्थानों पर जनसभाएँ की।


जिन्होंने अपने जीवन को एक सन्यासी की भांति जिया किन्तु जनहित में सबसे आगे बढ़ कर कार्य किया।
उन दिनों क्रांतिकारियों के शवों को जेलअधिकारियों द्वारा अनादरपूर्वक नष्ट कर दिया जाता था। परिवारजन को छोड़ कर अन्य लोग क्रांतिकारियों के शवों को अंतिमसंस्कार के लिए लेने से डरते थे कि कहीं अंग्रेज सरकार के कोप का भाजन न बनना पड़े। किन्तु 18 दिसम्बर 1927 को गोरखपुर में प्रसिद्ध क्रांतिकारी रामप्रसाद ‘बिस्मिल को फांसी दिए जाने के बाद उनके शव का दाहसंस्कार बाबा राघवदास ने लोगो के सहयोग से किया था।
असहयोग आंदोलन के समय #देवरिया में कई सभाओं की अध्यक्षता की। वे इतने अच्छे वक्ता थे कि उनका भाषण सुनने के लिए हजारों स्त्री-पुरुषों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। संयुक्त प्रांत के गुप्तचर विभाग के अभिलेख में बाबा राघवदास को एक खतरनाक वक्ता बताया गया था।अपने जेल जीवन के दौरान ही बाबा राघवदास गोरखपुर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुन लिए गए थे।


बाबा देवरियाई जनता के कितने प्रिय थे, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि की १९४८ में जब कांग्रेस से सोशलिस्ट पार्टी के अलग हो गई और विधायक आचार्य नरेंद्र देव के इस्तीफे के बाद कांग्रेस ने बाबा राघव दस को अपना प्रत्याशी बनाया तो उन्होंने आचार्य नरेंद्र देव को लगभग 1200 वोटों से हराया भी।

बाबा ने अपना सारा जीवन जनता की सेवा में समर्पित कर दिया,१५ जनवरी १९५८ को माँ भारती का यह सपूत, जनता का सच्चा सेवक अपनों से विदा लेकर ब्रह्म में विलीन हो गया।

उनकी स्मृति में पूर्वी उप में अनेक शिक्षा संस्थाओं का नाम उनके नाम पर रखा गया है,
बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर
बाबा राघवदास इण्टर कॉलेज, देवरिया
बाबा राघवदास स्नात्कोत्तर महाविद्यालय, बरहज
जब सरकार ने कोल्हू पर टैक्स लगाया तो इन्होने बिधानसभा से इस्तीफा दे दिया , और अंत में सरकार को अपना बिल वापस लेना पड़ा, बाबा राघव दास जी का मानना था की कोल्हू समाज का गरीब चलाता है। आज के नेताओं को बाबा राघव दास जी से प्रेरणा लेने की जरुरत है

#मरीचझापी आजाद भारत का सबसे भीषण नरसंहार.......

 #मरीचझापी आजाद भारत का सबसे भीषण नरसंहार.......

मरीचझापी कांड और कुछ नहीं बल्कि लेफ्ट राजनीतिक की गलतियों का एक नमूना है. 26 जनवरी, 1979 को अवैध तरीके से रह रहे लोगों को हटाने के लिए नरसंहार किया गया.
देखने में सबकुछ लगभग जालियांवाला बाग की तरह ही था. सामने 40,000 के आसपास निहत्थे, मजबूर बच्चे, औरत और मर्द थे और दूसरी तरफ सैकड़ों की संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बल के हथियारबंद जवान. सबसे बड़ा फर्क ये था कि जालियांवाला बाग में पुलिस ब्रिटिश सरकार की थी और यहां पुलिस पश्चिम बंगाल सरकार की थी.
यह सब उस जगह हुआ जहां गंगा की दो धाराएं हुगली और पद्मा समुद्र में मिलती हैं. यह नरसंहार मरीचझापी द्वीप पर हुआ. 26 जनवरी, 1979 को पश्चिम बंगाल की लेफ्ट फ्रंट सरकार ने तय किया कि मरीचझापी द्वीप चूंकि टाइगर रिजर्व का हिस्सा है और यहां किसी को बसने की इजाजत नहीं दी जा सकती, इसलिए वहां अवैध तरीके से रह रहे लोगों को हटाया जाएगा. इस आदेश को अमल में लाने के लिए आर्थिक नाकेबंदी, कर दी गई. 17 मई, 1979 को राज्य के सूचना मंत्री ने पत्रकारों को बताया कि मरीचझापी को खाली करा लिया गया है.
मरीचझापी में उस दौरान क्या क्या हुआ
मरीचझापी की घटना बमुश्किल 40 साल पुरानी है. लेकिन इसका बहुत कम ही ब्यौरा मिलता है. पत्रकार दिप हलदार ने मरीचझापी कांड के अलग अलग किरदारों, जिंदा बचे लोगों, उनके पनेताओं, उस समय रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार, अफसर आदि से बात करके बिखरे किस्से को समेटने की कोशिश अपनी किताब ब्लड आइलैंड में की है, जो छपने के लिए तैयार है. उन्होंने इस घटना का किस्सा अपने पिता दिलीप हालदार से सुना था. दिलीप हालदार ने सिर्फ मरीचझापी पर तो नहीं, लेकिन पूरी रिफ्यूजी समस्या पर एक किताब बंगाल विभाजन के बाद लिखी है. इसके अलावा प्रसिद्ध लेखक अमिताव घोष की किताब द हंग्री टाइड्स की पृष्ठभूमि भी मरीचझापी के ये घटना ही है. इसके अलावा उस समय के अखबारों, खासकर आनंद बाजार पत्रिका और स्टेट्समैन में मरीचझापी की रिपोर्ट छपी हैं.
वो कौन लोग थे, जिन्होंने मरीचझापी को अपना घर बना लिया था?
ये कहानी भारत के विभाजन से शुरू होती है. भारत की विभाजन पूरब और पश्चिम दो तरफ हुआ था. पश्चिम में पंजाब का विभाजन त्रासद तो था, लेकिन वो हिस्सा जल्द ही स्थिर हो गया. लेकिन पूरब में बंगाल का विभाजन एक निरंतर त्रासदी लेकर आया.
बंगाल का विभाजन ब्रिटिश सरकार की उस योजना के तहत हुआ जिसमें बंगाल के हिंदू और मुस्लिम बहुल इलाके के प्रतिनिधियों को विभाजन के पक्ष या विपक्ष में वोट डालने के लिए कहा गया. अगर इनमें से किसी भी हिस्से के प्रतिनिधियों का ज्यादा वोट विभाजन के पक्ष में होता, तो विभाजन का फैसला होना था. मुस्लिम बहुल इलाके के प्रतिनिधियों ने एकीकृत बंगाल के लिए वोट डाला जबकि हिंदू बहुल इलाके के प्रतिनिधियों- कांग्रेस, हिंदू महासभा, कम्युनिस्ट- ने विभाजन के पक्ष में वोट डाला. बंगाल एकीकृत रहता तो मुस्लिम बहुल होता.
इस वोटिंग के बाद आखिरकार बंगाल का बंटना तय हो गया. लेकिन बीच में एक चीज फंस गई. बंगाल की शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के प्रतिनिधियों ने विभाजन के खिलाफ, एकीकृत बंगाल के लिए वोट डाला. पूर्वी बंगाल में दलित और मुसलमान दोनों ज्यादातर छोटे किसान और खेत मजदूर थे और मिल कर रहे रहे थे, तो दलितों ने विभाजन के बाद भी पूर्वी बंगाल में रहना तय किया. उनके नेता जोगेंद्रनाथ मंडल आजाद पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री बने.
बंगाल के दलितों ने उस समय सांप्रदायिक नहीं होने का फैसला किया था, जिसकी उन्हें बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी
विभाजन को लेकर पूर्वी बंगाल के दलितों का आकलन पूरी तरह गलत साबित हुआ. नए राष्ट्र पाकिस्तान में उन पर अकथनीय अत्याचार होने लगे और इसके साथ ही शुरू हुआ वहां से भारत की ओर पलायन. लेकिन भारत अब इन अवांछित लोगों को स्वीकार करने को तैयार नहीं था. आखिर ये वो लोग थे जिन्होंने विभाजन के समय पाकिस्तान में रहने का विकल्प चुना था. पलायन का सिलसिला तब और तेज हो गया जब शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश का मुक्ति संग्राम छिड़ गया. इस दौरान एक करोड़ से ज्यादा हिंदू दलित भारत आ गए. भारत ने उन्हें नागरिकता नहीं दी और उन्हें ट्रांजिट कैंपों में रखा गया. इस कल्पना के साथ कि कभी उन्हें बांग्लादेश वापस भेज दिया जाएगा.
ये भारत की आजादी की अवांछित संतानें है.
लेकिन जो लोग भारत आ गए उन्हें बंगाल की खाड़ी में फेंका तो नहीं जा सकता था. उन्हें भारत के उन इलाकों में भेज दिया गया, जहां लोग आम तौर पर रहना नहीं चाहते. मसलन अंडमान द्वीप समूह, छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य जंगल, उत्तर प्रदेश के मलेरिया प्रभावित तराई क्षेत्र आदि. कालांतर में इनके वोटर कार्ड बन गए. कई ने आधार कार्ड भी बनवा लिए लेकिन उनकी नागरिकता का मामला संशय में रहा. उन्हें अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र भी नहीं मिला. सबसे ज्यादा बंगाली हिंदू रेफ्यूजी अंडमान में हैं और वहां अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र जारी ही नहीं होता.
दंडकारण्य से मरीचझापी: वादों के टूटने की त्रासदी
1977 में पश्चिम बंगाल में लेफ्ट फ्रंट की सरकार बनी. उससे पहले लेफ्ट फ्रंट के नेताओं ने आश्वासन दिया था कि दंडकारण्य के शरणार्थियों को पश्चिम बंगाल में बसाया जाएगा. लेफ्ट फ्रंट के नेता राम चटर्जी इस बीच दंडकारण्य आए और शरणार्थियों को सपने दिखाए कि बंगाल उनका इंतजार कर रहा है.
वाममोर्च की सरकार बनने के बाद दंडकारण्य से शरणार्थी बड़ी संख्या में पश्चिम बंगाल आने लगे. चूंकि सरकार उन्हें बसा नहीं रही थी, इसलिए उन लोगों ने सुंदरबन के एक सुनसान द्वीप मरीचझापी में अपना ठिकाना बनाया. उस दलदली जमीन को खेती लायक बनाया और मछली पालन का काम शुरू किया. वहां उन्होंने स्कूल खोले और एक क्लिनिक भी खोल लिया
लेकिन वाम मोर्चा सरकार के इरादे नेक नहीं थे. सरकार में भद्रलोक बंगालियों का वर्चस्व था और वे भूल नहीं पाए थे कि इन दलितों ने बंगाल के विभाजन का विरोध किया था. सरकार ने उन्हें हटाने और मरीचझापी खाली कराने का आदेश दे दिया.
मरीचझापी आजाद भारत का सबसे भीषण नरसंहार
इसके बाद तो मानों सरकार मशीनरी भेड़ियों की तरह मरीचझापी पर टूट पड़ी. लगभग 100 पुलिस बोट और बीएसएफ के दो स्टीमर ने 26 जनवरी, 1979 को मरीचझापी द्वीप की घेराबंदी कर दी. लोगों को वहां से आना और जाना रोक दिया. वहां न भोजन पहुंच सकता था और न दवा. मरीचझापी में पीने के पानी के एकमात्र स्रोत में जहर मिला दिया गया. मरीचझापी के चारों तरफ समुद्री पानी था, लेकिन पीने के लिए एक बूंद पानी नहीं था. प्रत्यक्षदर्शियों का अनुमान है कि आर्थिक घेराबंदी के दौरान 1000 से ज्यादा लोग मारे गए. आखिरकार लोगों को मरचीझापी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. जिंदा बचे लोगों को उठाकर वापस दंडकारण्य पहुंचा दिया गया. कहा जाता है कि इस दौरान लोगों की लाशों को समुद्र में फेंक दिया गया. सुंदरबन के बाघों ने उन्हें खाया और वे आदमखोर बन गए.
दवाई, खाद्यान्न समेत तमाम वस्तुओं की सप्लाई रोक दी गई। पीने के पानी के एकमात्र स्रोत में जहर मिला दिया गया। पाँच दिन बाद 31 जनवरी 1979 को हुई पुलिस की अंधाधुंध गोलीबारी में शरणार्थियों को निर्दयता से मार डाला गया। प्रत्यक्षदर्शियों का अनुमान है कि इस दौरान 1000 से अधिक लोग मारे गए। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, हाई कोर्ट के आदेश पर 15 दिन बाद रसद आपूर्ति की इजाजत लेकर एक टीम यहाँ पहुंची थी। इसमें जाने-माने कवि ज्योतिर्मय दत्त भी शामिल थे। दत्त के मुताबिक, उन्होंने भूख से मरे 17 व्यक्तियों के शव देखे।
मरीचझापी बंगाल की राजनीति में कभी मुद्दा नहीं रहा. दलितों के साथ व्यवहार को लेकर कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट में कोई मतभेद नहीं था. मीडिया और अकादमिक क्षेत्र में चूंकि भद्रलोक बंगालियों का वर्चस्व है, इसलिए वहां भी इसकी खास चर्चा नहीं हुई. तृणमूल सरकार भी इस मामले में अलग साबित नहीं हुई. पश्चिम बंगाल में दलित आंदोलन कमर 1947 में ही टूट चुकी थी. वहां अब तक कोई मजबूत दलित आंदोलन नहीं खड़ा हो पाया है. जबकि उनकी आबादी लगभग एक चौथाई है.
दरअसल इतने साल भी बंगाली हिंदू शरणार्थियों की नागरिकता का विवाद हल नहीं हुआ है. भारतीय उपमहाद्वीप का ये एकमात्र समुदाय है, जो कहीं का नागरिक नहीं है. हालांकि ऐसे नागरिकता विहीन लोग और भी हैं. लेकिन उनकी संख्या कम है. देश में सरकारें आती जाती रहीं, लेकिन ये मामला कभी हल नहीं किया गया.
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अयोध्या की कहानी जिसे पढ़कर आप की भुजाएं फड़क उठेगी और आंखों से अंगार बरसने लगेगा

 

जब बाबर दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुआ उस समय जन्म भूमि सिद्ध महात्मा #श्यामनन्द जी महाराज के अधिकार क्षेत्र में थी। महात्मा श्यामनन्द की ख्याति सुन कर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा आशिकान अयोध्या आया,महात्मा जी के शिष्य बनकर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा ने योग और सिद्धियाँ प्राप्त कर ली और उनका नाम भी महात्मा श्यामनन्द के ख्यातिप्राप्त शिष्यों में लिया जाने लगा। ये सुनकर जलालशाह नाम का एक फकीर भी महात्मा श्यामनन्द के पास आया और उनका शिष्य बनकर सिद्धियाँ प्राप्त करने लगा। जलालशाह एक कट्टर मुसलमान था, और उसको एक ही सनक थी, हर जगह इस्लाम का आधिपत्य साबित करना। अत: जलालशाह ने अपने काफिर गुरू की पीठ में छुरा घोंप कर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा के साथ मिलकर ये विचार किया की यदि इस मदिर को तोड़ कर मस्जिद बनवा दी जाये तो इस्लाम का परचम हिन्दुस्थान में स्थायी हो जायेगा। धीरे धीरे जलालशाह और ख्वाजा कजल अब्बास मूसा इस साजिश को अंजाम देने की तैयारियों में जुट गए।
सर्वप्रथम जलालशाह और ख्वाजा बाबर के विश्वासपात्र बने और दोनों ने अयोध्या को खुर्द मक्का बनाने के लिए जन्मभूमि के आसपास की जमीनों में बलपूर्वक मृत मुसलमानों को दफन करना शुरू किया और मीरबाँकी खां के माध्यम से बाबर को उकसाकर मंदिर के विध्वंस का कार्यक्रम बनाया। बाबा श्यामनन्द जी अपने मुस्लिम शिष्यों की करतूत देख के बहुत दुखी हुए और अपने निर्णय पर उन्हें बहुत पछतावा हुआ। दुखी मन से बाबा श्यामनन्द जी ने रामलला की मूर्तियाँ सरयू में प्रवाहित की और खुद हिमालय की और तपस्या करने चले गए। मंदिर के पुजारियों ने मंदिर के अन्य सामान आदि हटा लिए और वे स्वयं मंदिर के द्वार पर रामलला की रक्षा के लिए खड़े हो गए। जलालशाह की आज्ञा के अनुसार उन चारो पुजारियों के सर काट लिए गए।
जिस समय मंदिर को गिराकर मस्जिद बनाने की घोषणा हुई उस समय भीटी के राजा महताब सिंह बद्री नारायण की यात्रा करने के लिए निकले थे, अयोध्या पहुचने पर रास्ते में उन्हें ये खबर मिली तो उन्होंने अपनी यात्रा स्थगित कर दी और अपनी छोटी सेना में रामभक्तों को शामिल कर 1 लाख चौहत्तर हजार लोगो के साथ बाबर की सेना के 4 लाख 50 हजार सैनिकों से लोहा लेने निकल पड़े। रामभक्तों ने सौगंध ले रक्खी थी रक्त की आखिरी बूंद तक लड़ेंगे जब तक प्राण है तब तक मंदिर नहीं गिरने देंगे। रामभक्त वीरता के साथ लड़े 70 दिनों तक घोर संग्राम होता रहा और अंत में राजा महताब सिंह समेत सभी 1 लाख 74 हजार रामभक्त मारे गए। श्रीराम जन्म भूमि रामभक्तों के रक्त से लाल हो गयी। इस भीषण कत्ले आम के बाद मीरबांकी ने तोप लगा के मंदिर गिरवा दिया । मंदिर के मसाले से ही मस्जिद का निर्माण हुआ पानी की जगह मरे हुए हिन्दुओं का रक्त इस्तेमाल किया गया नीव में लखौरी इंटों के साथ ।
इतिहासकार #कनिंघम अपने लखनऊ गजेटियर के 66वें अंक के पृष्ठ 3 पर लिखता है की एक लाख चौहतर हजार हिंदुओं की लाशें गिर जाने के पश्चात मीरबाँकी अपने अभियान मे सफल हुआ और उसके बाद जन्मभूमि के चारो और तोप लगवाकर मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया।
इसी प्रकार हैमिल्टन नाम का एक अंग्रेज बाराबंकी गजेटियर में लिखता है की " जलालशाह ने हिन्दुओं के खून का गारा बना के लखौरी ईटों की नीव मस्जिद बनवाने के लिए दी गयी थी।
उस समय अयोध्या से ६ मील की दूरी पर सनेथू नाम का एक गाँव के पंडित #देवीदीन_पाण्डेय ने वहां के आस पास के गांवों सराय सिसिंडा राजेपुर आदि के सूर्यवंशीय क्षत्रियों को एकत्रित किया। देवीदीन पाण्डेय ने सूर्य वंशीय क्षत्रियों से कहा भाइयों आप लोग मुझे अपना राजपुरोहित मानते हैं आपके पूर्वज श्री राम थे और हमारे पूर्वज महर्षि भरद्वाज जी। आज मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जन्मभूमि को मुसलमान आक्रान्ता कब्रों से पाट रहे हैं और खोद रहे हैं इस परिस्थिति में हमारा मूकदर्शक बन कर जीवित रहने की बजाय जन्म भूमि की रक्षार्थ युद्ध करते करते वीरगति पाना ज्यादा उत्तम होगा। देवीदीन पाण्डेय की आज्ञा से दो दिन के भीतर 90 हजार क्षत्रिय इकठ्ठा हो गए दूर दूर के गांवों से लोग समूहों में इकठ्ठा हो कर देवीदीन पाण्डेय के नेतृत्व में जन्मभूमि पर जबरदस्त धावा बोल दिया । शाही सेना से लगातार 5 दिनों तक युद्ध हुआ । छठे दिन मीरबाँकी का सामना देवीदीन पाण्डेय से हुआ उसी समय धोखे से उसके अंगरक्षक ने एक लखौरी ईंट से पाण्डेय जी की खोपड़ी पर वार कर दिया। देवीदीन पाण्डेय का सर बुरी तरह फट गया मगर उस वीर ने अपने पगड़ी से खोपड़ी से बाँधा और तलवार से उस कायर अंगरक्षक का सर काट दिया। इसी बीच मीरबाँकी ने छिपकर गोली चलायी जो पहले ही से घायल देवीदीन पाण्डेय जी को लगी और वो जन्म भूमि की रक्षा में वीर गति को प्राप्त हुए। जन्मभूमि फिर से 90 हजार हिन्दुओं के रक्त से लाल हो गयी। देवीदीन पाण्डेय के वंशज #सनेथू ग्राम के ईश्वरी पांडे का #पुरवा नामक जगह पर अब भी मौजूद हैं।
पाण्डेय जी की मृत्यु के 15 दिन बाद #हंसवर के महाराज #रणविजय_सिंह ने सिर्फ 25 हजार सैनिकों के साथ मीरबाँकी की विशाल और शस्त्रों से सुसज्जित सेना से रामलला को मुक्त कराने के लिए आक्रमण किया । 10 दिन तक युद्ध चला और महाराज जन्मभूमि के रक्षार्थ वीरगति को प्राप्त हो गए।महाराज के वीरगति प्राप्त करने के बाद महारानी जयराज ने उनके कार्य को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया और तीन हजार नारियों की सेना लेकर उन्होंने जन्मभूमि पर हमला बोल दिया और हुमायूं के समय तक उन्होंने छापामार युद्ध जारी रखा। रानी के गुरु स्वामी #महेश्वरानंद जी ने रामभक्तों को इकठ्ठा करके सेना का प्रबंध करके जयराज कुमारी की सहायता की। साथ ही स्वामी महेश्वरानंद जी ने #सन्यासियों की सेना बनायीं इसमें उन्होंने 24 हजार सन्यासियों को इकठ्ठा किया और रानी जयराज कुमारी के साथ, हुमायूँ के समय में कुल 10 हमले जन्मभूमि के उद्धार के लिए किये। 10वें हमले में शाही सेना को काफी नुकसान हुआ और जन्मभूमि पर रानी जयराज कुमारी का अधिकार हो गया। लेकिन लगभग एक महीने बाद हुमायूँ ने पूरी ताकत से शाही सेना फिर भेजी, इस युद्ध में स्वामी महेश्वरानंद और रानी कुमारी जयराज कुमारी लड़ते हुए अपनी बची हुई सेना के साथ मारे गए और जन्मभूमि पर पुनः मुगलों का अधिकार हो गया। श्रीराम जन्मभूमि एक बार फिर कुल 24 हजार सन्यासियों और 3 हजार वीर नारियों के रक्त से लाल हो गयी।
रानी जयराज कुमारी और स्वामी महेश्वरानंद जी के बाद यद्ध का नेतृत्व स्वामी #बलरामचारी जी ने अपने हाथ में ले लिया। उन्होंने गांव गांव में घूम कर रामभक्त हिन्दू युवकों और सन्यासियों की एक मजबूत सेना तैयार करने का प्रयास किया और जन्मभूमि के उद्धारार्थ 20 बार आक्रमण किये। इन 20 हमलों में कम से कम 15 बार स्वामी बलरामचारी ने जन्मभूमि पर अपना अधिकार कर लिया मगर ये अधिकार अल्प समय के लिए रहता था थोड़े दिन बाद बड़ी शाही फ़ौज आती थी और जन्मभूमि पुनः मुगलों के अधीन हो जाती थी। जन्मभूमि में लाखों हिन्दू बलिदान होते रहे। उस समय का मुग़ल शासक अकबर था। शाही सेना हर दिन के इन युद्धों से कमजोर हो रही थी। अतः अकबर ने #बीरबल और #टोडरमल के कहने पर खस की टाट से उस चबूतरे पर 3 फीट का एक छोटा सा मंदिर बनवा दिया। इस प्रकार बार-बार के आक्रमणों और हिन्दू जनमानस के रोष एवं हिन्दुस्थान पर मुगलों की ढीली होती पकड़ से बचने का एक राजनैतिक प्रयास की अकबर की इस कूट नीति से कुछ दिनों के लिए जन्मभूमि में रक्त नहीं बहा। लगातार युद्ध करते रहने के कारण स्वामी बलरामचारी का स्वास्थ्य गिरता चला गया था और प्रयाग कुम्भ के अवसर पर त्रिवेणी तट पर स्वामी बलरामचारी की मृत्यु हो गयी।
यही क्रम शाहजहाँ के समय भी चलता रहा। फिर #औरंगजेब के हाथ सत्ता आई वो कट्टर मुसलमान था और उसने समस्त भारत से काफिरों के सम्पूर्ण सफाये का संकल्प लिया था। उसने लगभग 10 बार अयोध्या मे मंदिरों को तोड़ने का अभियान चलकर यहाँ के सभी प्रमुख मंदिरों की मूर्तियों को तोड डाला। औरंगजेब के समय में समर्थ गुरु #श्रीरामदास जी महाराज जी के शिष्य श्री वैष्णवदास जी ने जन्मभूमि के उद्धारार्थ 30 बार आक्रमण किये। इन आक्रमणों मे अयोध्या के आस पास के गांवों के सूर्यवंशीय क्षत्रियों ने पूर्ण सहयोग दिया जिनमे सराय के ठाकुर सरदार गजराज सिंह और राजेपुर के कुँवर गोपाल सिंह तथा सिसिण्डा के ठाकुर जगदंबा सिंह प्रमुख थे। ये सारे वीर ये जानते हुए भी की उनकी सेना और हथियार बादशाही सेना के सामने कुछ भी नहीं है अपने जीवन के आखिरी समय तक शाही सेना से लोहा लेते रहे। लम्बे समय तक चले इन युद्धों में रामलला को मुक्त कराने के लिए हजारों हिन्दू वीरों ने अपना बलिदान दिया और अयोध्या की धरती पर उनका रक्त बहता रहा। ठाकुर गजराज सिंह और उनके साथी क्षत्रियों के वंशज आज भी सराय मे मौजूद हैं। आज भी फैजाबाद जिले के आस पास के #सूर्यवंशीय_क्षत्रिय सिर पर पगड़ी नहीं बांधते, जूता नहीं पहनते, छता नहीं लगाते, उन्होने अपने पूर्वजों के सामने ये प्रतिज्ञा ली थी की जब तक श्री राम जन्मभूमि का उद्धार नहीं कर लेंगे तब तक जूता नहीं पहनेंगे, छाता नहीं लगाएंगे, पगड़ी नहीं पहनेंगे।
#चिमटाधारी साधु_सेना
1640 ईस्वी में औरंगजेब ने मन्दिर को ध्वस्त करने के लिए जबांज खाँ के नेतृत्व में एक जबरजस्त सेना भेज दी थी, बाबा वैष्णव दास के साथ साधुओं की एक सेना थी जो हर विद्या मे निपुण थी इसे चिमटाधारी साधुओं की सेना भी कहते थे । जब जन्मभूमि पर जबांज खाँ ने आक्रमण किया तो हिंदुओं के साथ चिमटाधारी साधुओं की सेना की सेना मिल गयी और उर्वशी कुंड नामक जगह पर जाबाज़ खाँ की सेना से सात दिनों तक भीषण युद्ध किया । चिमटाधारी साधुओं के चिमटे के मार से मुगलों की सेना भाग खड़ी हुई। इस प्रकार चबूतरे पर स्थित मंदिर की रक्षा हो गयी । जाबाज़ खाँ की पराजित सेना को देखकर औरंगजेब बहुत क्रोधित हुआ और उसने जाबाज़ खाँ को हटाकर एक अन्य सिपहसालार सैय्यद हसन अली को 50 हजार सैनिकों की सेना और तोपखाने के साथ अयोध्या की ओर भेजा और साथ मे ये आदेश दिया की अबकी बार जन्मभूमि को बर्बाद करके वापस आना है, यह समय सन् 1680 का था । बाबा वैष्णव दास ने सिक्खों के गुरु गुरुगोविंद सिंह से युद्ध मे सहयोग के लिए पत्र के माध्यम संदेश भेजा । पत्र पाकर #गुरु_गुरुगोविंद सिंह सेना समेत तत्काल अयोध्या आ गए और ब्रहमकुंड पर अपना डेरा डाला । ब्रहमकुंड वही जगह जहां आज कल गुरुगोविंद सिंह की स्मृति मे सिक्खों का गुरुद्वारा बना हुआ है। बाबा वैष्णव दास एवं सिक्खों के गुरुगोविंद सिंह रामलला की रक्षा हेतु एकसाथ रणभूमि में कूद पड़े। इन वीरों कें सुनियोजित हमलों से मुगलो की सेना के पाँव उखड़ गये सैय्यद हसन अली भी युद्ध मे मारा गया। औरंगजेब हिंदुओं की इस प्रतिक्रिया से स्तब्ध रह गया था और इस युद्ध के बाद 4 साल तक उसने अयोध्या पर हमला करने की हिम्मत नहीं की।
औरंगजेब ने सन् 1664 मे एक बार फिर श्री राम जन्मभूमि पर आक्रमण किया । इस भीषण हमले में शाही फौज ने लगभग 10 हजार से ज्यादा हिंदुओं की हत्या कर दी नागरिकों तक को नहीं छोड़ा। जन्मभूमि हिन्दुओं के रक्त से लाल हो गयी। जन्मभूमि के अंदर नवकोण के एक कंदर्प कूप नाम का कुआं था, सभी मारे गए हिंदुओं की लाशें मुगलों ने उसमे फेककर चारों ओर चहारदीवारी उठा कर उसे घेर दिया। आज भी #कंदर्पकूप गज शहीदा के नाम से प्रसिद्ध है, और जन्मभूमि के पूर्वी द्वार पर स्थित है। शाही सेना ने जन्मभूमि का चबूतरा खोद डाला बहुत दिनो तक वहचबूतरा गड्ढे के रूप मे वहाँ स्थित था । औरंगजेब के क्रूर अत्याचारो की मारी हिन्दू जनता अब उस गड्ढे पर ही श्री रामनवमी के दिन भक्तिभाव से अक्षत,पुष्प और जल चढाती रहती थी. नबाब सहादत अली के समय 1763 ईस्वी में जन्मभूमि के रक्षार्थ अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह और पिपरपुर के राजकुमार सिंह के नेतृत्व मे बाबरी ढांचे पर पुनः पाँच आक्रमण किये गये जिसमें हर बार हिन्दुओं की लाशें अयोध्या में गिरती रहीं।
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लखनऊ गजेटियर मे कर्नल हंट लिखता है की “लगातार हिंदुओं के हमले से ऊबकर नबाब ने हिंदुओं और मुसलमानो को एक साथ नमाज पढ़ने और भजन करने की इजाजत दे दी पर सच्चा मुसलमान होने के नाते उसने काफिरों को जमीन नहीं सौंपी। “लखनऊ गजेटियर पृष्ठ 62 नासिरुद्दीन हैदर के समय मे मकरही के राजा के नेतृत्व में जन्मभूमि को पुनः अपने रूप मे लाने के लिए हिंदुओं के तीन आक्रमण हुये जिसमें बड़ी संख्या में हिन्दू मारे गये। परन्तु तीसरे आक्रमण में डटकर नबाबी सेना का सामना हुआ 8वें दिन हिंदुओं की शक्ति क्षीण होने लगी, जन्मभूमि के मैदान मे हिन्दुओं और मुसलमानो की लाशों का ढेर लग गया । इस संग्राम मे भीती, हंसवर, मकरही, खजुरहट, दीयरा अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह आदि सम्मलित थे। हारती हुई हिन्दू सेना के साथ वीर चिमटाधारी साधुओं की सेना आ मिली और इस युद्ध मे शाही सेना के चिथड़े उड गये और उसे रौंदते हुए हिंदुओं ने जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया। मगर हर बार की तरह कुछ दिनो के बाद विशाल शाही सेना ने पुनः जन्मभूमि पर अधिकार कर लिया और हजारों हिन्दुओं को मार डाला गया। जन्मभूमि में हिन्दुओं का रक्त प्रवाहित होने लगा। नावाब वाजिदअली शाह के समय मे पुनः हिंदुओं ने जन्मभूमि के उद्धारार्थ आक्रमण किया । फैजाबाद गजेटियर में कनिंघम ने लिखा "इस संग्राम मे बहुत ही भयंकर खूनखराबा हुआ । दो दिन और रात होने वाले इस भयंकर युद्ध में सैकड़ों हिन्दुओं के मारे जाने के बावजूद हिन्दुओं नें राम जन्म भूमि पर कब्जा कर लिया। क्रुद्ध हिंदुओं की भीड़ ने कब्रें तोड़ फोड़ कर बर्बाद कर डाली मस्जिदों को मिसमार करने लगे और पूरी ताकत से मुसलमानों को मार-मार कर अयोध्या से खदेड़ना शुरू किया। मगर हिन्दू भीड़ ने मुसलमान स्त्रियों और बच्चों को कोई हानि नहीं पहुचाई। अयोध्या मे प्रलय मचा हुआ था ।

इतिहासकार कनिंघम लिखता है की ये अयोध्या का सबसे बड़ा हिन्दू मुस्लिम बलवा था। हिंदुओं ने अपना सपना पूरा किया और औरंगजेब द्वारा विध्वंस किए गए चबूतरे को फिर वापस बनाया। चबूतरे पर तीन फीट ऊँची खस की टाट से एक छोटा सा मंदिर बनवा लिया । जिसमे पुनः रामलला की स्थापना की गयी। कुछ जेहादी मुल्लाओं को ये बात स्वीकार नहीं हुई और कालांतर में जन्मभूमि फिर हिन्दुओं के हाथों से निकल गयी। सन 1857 की क्रांति मे बहादुर शाह जफर के समय में बाबा रामचरण दास ने एक मौलवी आमिर अली के साथ जन्म भूमि के उद्धार का प्रयास किया पर 18 मार्च सन 1858 को कुबेर टीला स्थित एक इमली के पेड़ मे दोनों को एक साथ अंग्रेज़ो ने फांसी पर लटका दिया । जब अंग्रेज़ो ने ये देखा कि ये पेड़ भी देशभक्तों एवं राम भक्तों के लिए एक स्मारक के रूप मे विकसित हो रहा है तब उन्होने इस पेड़ को कटवा कर इस आखिरी निशानी को भी मिटा दिया। बाकी मुलायम के कारनामे तो आपको पता ही होंगे
दुख तो इस बात है हमारे इतिहास जो स्कूलों में पढ़ाया जाता है उसमे बाबर, अकबर को बहुत अच्छा बताया जाता है जबकि इनके कारण कितना कत्लेआम हुआ जो उन्होंने अधर्म किया उसका कहीं जिक्र नहीं।


युगोस्लाविया - सोवियत संघ

  यदि आप कभी bosnia-herzegovina जाएंगे तब एक जगह आपको 9300 मुसलमानों की सामूहिक कब्र दिखेगी जहां उन सभी के नाम लिखे हैं दरअसल यह मुस्लिम कही...