बुधवार, 9 अगस्त 2017

मिज़ोरम में क्रांति और फिर शांति

पूर्वोत्तर भारत में क्रांति और फिर शांति के महत्व को समझना हो तो एक बार ‘मिजोरम’ की यात्रा करनी चाहिए यात्रा न कर सकें तो मिजोरम के इतिहास को पढना चाहिए ...आजादी के बाद मिजोरम में हुए आंदोलन देश के अन्य राज्यों में हुए आंदोलनों से सर्वथा भिन्न रहे ...

मिज़ोरम कोई नहीं जाता। क्योंकि यह पूर्वोत्तर के पार की धरती है, पूर्वोत्तर के उस तरफ की धरती है। जिस तरह लद्दाख है हिमालय पार की धरती। जिसमें हिमालय चढने और उसे पार करने का हौंसला होता है, वही लद्दाख जा पाता है। ठीक इसी तरह जिसमें पूर्वोत्तर जाने और उसे भी पार करने का हौंसला होता है, वही मिज़ोरम जा पाता है। पूर्वोत्तर बडी बदनाम जगह है। वहां उग्रवादी रहते हैं जो कश्मीर के आतंकवादियों से भी ज्यादा खूंखार होते हैं। कश्मीर के आतंकवादी तो केवल सुरक्षाबलों को ही मारते हैं, पूर्वोत्तर के आतंकवादी सुरक्षाबलों को नहीं मारते बल्कि हिन्दीभाषियों को मारते हैं। कोकराझार बडी भयंकर जगह है। पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार है कोकराझार। कोकराझार से गुजरे बिना सिक्किम तो जाया जा सकता है लेकिन बाकी के सात राज्यों में नहीं जाया जा सकता।


भारत का सबसे साक्षर राज्य केरल (93.91%) है तो दूसरे स्थान पर मिज़ोरम (91.60%) है। यही नहीं देश के सबसे साक्षर दो जिले सेरछिप (98.76%) और आइजॉल (98.50%) हैं। ये दोनों मिज़ोरम में हैं।


मिज़ोरम के इतिहास का जिक्र किये बिना यह वृत्तान्त अधूरा है। यहां का असली इतिहास आजादी के बाद शुरू होता है। इसे आसाम राज्य में एक जिले का दर्जा दिया गया था। यहां की भाषा-संस्कृति आसाम से अलग होने के कारण शीघ्र ही इसे पक्षपात का सामना करना पडा। आसाम सरकार ने पूर्णतया मिज़ोरम की अनदेखी की। राजकीय भाषा असमिया कर देने और एक अकाल के बाद यहां स्थिति और बिगडी। ऐसे में इसे एक अलग राज्य बनाने की मांग जोर पकडने लगी। इसी दौरान एक विद्रोही संगठन मिजो नेशनल फ्रंट भी बन गया।

मिज़ो नेशनल फ्रंट का लक्ष्य अलग राज्य का नहीं था बल्कि भारत से स्वतन्त्र होकर अलग देश बनाने का था। इसके लिये इस फ्रंट ने अपनी एक सेना भी बनाई- मिज़ो नेशनल आर्मी। 1960 के दशक में फ्रंट के नेताओं ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) का भी दौरा करना शुरू किया। वहां से पाकिस्तान ने उन्हें हरसम्भव सहायता दी, धन और हथियारों की सहायता व इन्हें चलाने का प्रशिक्षण भी।
इसी दौरान भारत-चीन युद्ध और भारत-पाकिस्तान युद्ध हुए। भारत का सारा ध्यान अपनी पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर लग गया। विद्रोही फ्रंट ने इस परिस्थिति का भरपूर लाभ उठाया। इसकी अपनी प्रशिक्षित सेना हथियारों से लैस थी ही, साथ ही अच्छा संख्याबल भी था। विद्रोह को सुनियोजित तरीके से अन्जाम दिया गया। गुप्तरूप से इस ऑपरेशन का नाम रखा गया- ऑपरेशन जेरिचो। इसका अन्तिम लक्ष्य 1 मार्च 1966 को पूर्ण क्रान्ति करके मिज़ोरम को स्वतन्त्र राष्ट घोषित करने का था। इसमें कोई शक नहीं था कि तात्कालित तौर पर पाकिस्तान इस नये देश का समर्थन करता।

विद्रोही 28 फरवरी की रात को आइजॉल में घुस गये। इन्होंने शहर की टेलीफोन लाइनें काट दीं ताकि प्रशासन बाहर से सहायता न मांग सके। इन्होंने रात में ही शहर के सभी प्रमुख स्थानों और कार्यालयों पर कब्जा कर लिया। शहर की पूर्ण घेराबन्दी कर दी ताकि कोई बाहर न जा सके। कानून व्यवस्था स्थानीय पुलिस और आसाम राइफल्स के हाथों से निकल चुकी थी। हालात इतने बदतर हो चुके थे कि आइजॉल के डिप्टी कमिश्नर को आसाम राइफल्स के यहां शरण लेनी पडी। बाहर से सहायता का एकमात्र साधन सिल्चर सडक ही थी जिसे विद्रोहियों ने बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया था।

1 मार्च 1966 को मिज़ो नेशनल फ्रंट के नेता लालदेंगा ने भारत से आजादी की घोषणा कर दी और अधिक से अधिक संख्या में मिज़ो लोगों को अपने समर्थन में करने लगे। इसके बाद शहर में बुरी तरह हिंसा भडक उठी। गैर-मिज़ो लोगों को जमकर मारा गया, उनकी दुकानें लूटी गईं और घरों में आग लगा दी गई।
मिज़ोरम के दूसरे भागों में भी ऐसा ही हुआ। आइजॉल से 200 किलोमीटर दूर चम्फाई में तो उन्होंने आसानी से आसाम राइफल्स की पोस्ट पर कब्जा कर लिया। आसाम की सीमा पर स्थित वैरेंगते पर भी कब्जा कर लिया और सरकारी कर्मचारियों को जिले से भागना पडा। लुंगलेई में भी ऐसा ही हुआ। कोलासिब में करीब 250 लोगों को बन्धक बना लिया गया जिनमें गैर-मिज़ो नागरिक, सरकारी कर्मचारी आदि थे।
3 मार्च को भारत की आंख खुली। मामले की गम्भीरता को देखते हुए आसाम राइफल्स की और ज्यादा बटालियनें हेलीकॉप्टर से आइजॉल भेजी गईं व शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। हेलीकॉप्टर से जवानों को भेजना भी आसान नहीं था क्योंकि विद्रोहियों के पास अच्छे हथियार थे जो हवा में घातक मार कर सकते थे। इसकी जिम्मेदारी भारतीय वायुसेना को दी गई। पहली कोशिशों में विद्रोहियों ने वायुसेना को भी क्षति पहुंचाई। इसके बाद वो घटना हुई जिसे भारत तो क्या कोई भी देश नहीं करना चाहेगा। अपने ही देश में अपने ही नागरिकों पर हवाई हमला। वायुसेना ने जमकर हवाई हमले किये। बाद में मिज़ोरम के मुख्यमन्त्री ज़ोरमथंगा ने इन हमलों को ‘निर्दयी बमबारी’ कहा था। तात्कालिक रूप से ऐसा करना आवश्यक था।

उधर थलसेना ने भी मोर्चा संभाला। 6 मार्च को सेना आइजॉल पहुंची, इसके बाद चम्फाई और लुंगलेई। मार्च के अन्त तक सेना ने पूरे मिज़ोरम का कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया। एक समय मिज़ोरम में सभी आसाम राइफल्स की चौकियों पर विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया था सिवाय आइजॉल के। लेकिन वायुसेना ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया। रही सही कसर थलसेना ने पूरी कर दी।

इसके बाद विद्रोहियों को भागना पडा और वे गांवों में सामान्य लोगों के बीच घुलमिल गये और अपनी गतिविधियां जारी रखीं। यह भी एक चुनौतीयुक्त परिस्थिति थी क्योंकि इसमें आमलोगों को दोतरफा मार पडती है- एक तो विद्रोहियों से और दूसरी सेना से। तब जनवरी 1967 में भारत सरकार ने यहां ग्रुपिंग पॉलिसी लागू की जिसमें सभी को अपने अपने गांव छोडकर सेना के नियन्त्रण वाले इलाकों में बसना था। ये निवास स्थान मुख्यतः सडकों के पास थे। ऐसा करने के बाद सेना को विद्रोहियों को ढूंढने व उनकी चालें नाकाम करने में आसानी रही, हालांकि बडी संख्या में आमलोगों को मानसिक समस्या का सामना करना पडा। अपना घर व जमीन छोडकर अनजान स्थान पर बसना किसे अच्छा लगता है?

इसके बाद हालात और सुधरे। अगस्त 1968 में विद्रोहियों को माफी दे दी गई जिसके फलस्वरूप बडी संख्या में विद्रोहियों ने समर्पण किया व मुख्यधारा में शामिल हुए। फिर 21 जनवरी 1972 को मिज़ोरम को केन्द्र शासित प्रदेश बना दिया गया। मिज़ो नेशनल फ्रंट की विद्रोही गतिविधियां 1976 में समाप्त हुईं जब उसने भारत सरकार के साथ ‘सन्धि’ की। इसकी शर्तों के अनुसार भारत सरकार मिज़ोरम को अलग राज्य बनाने व आइजॉल को उसकी राजधानी बनाने पर सहमत हुई तो फ्रंट अपनी विद्रोही व हिंसक गतिविधियां छोडने पर। आखिरकार मिज़ोरम 20 फरवरी 1987 को भारत का राज्य बना।
तो जी, ऐसी भीषण कहानी थी मिज़ोरम की। अब मिज़ोरम भारत के सबसे शान्त राज्यों में से एक है। इसके पडोसी राज्य अवश्य उत्पाती हैं।

मिजोरम की एक खासियत इसकी साक्षरता है .... भारत के प्रमुख साक्षर राज्यों में शीर्ष पर स्थित मिजोरम में मिजो भाषा बोली जाती है लेकिन चूंकि मिजो भाषा की कोई अपनी लिपि नहीं है इसलिए यह रोमन में लिखी जाती है .... बावजूद इसके मिजोरम साक्षरता के मायने में एक मिसाल है ... और क्रांति के बाद शांति के मामले में भी।

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