इंदिरी बचाओ - सेव योर पेनिस ::Part 1
आज़ाद भारत के गुमनाम किस्से शृंखला की पांचवी कड़ी में पेश है आपातकाल के दौरान नसबंदी काण्ड। हालांकि ये किस्सा गुमनाम नहीं है , लेकिन इस काण्ड की डिटेल बहुत गजब की है और पब्लिक डोमेन में इतनी आसानी से नहीं मिलती।
एक सस्ता चुटकुला कुछ इस प्रकार है - नसबंदी वाले एक गांव में पहुंचे जहां वो पिछले साल ही नसबंदी कर चुके थे । गांव वालों ने उन्हें दौड़ा लिया , कहा - कनेक्शन तो पहले ही काट दिया , अब क्या नल उखाड़ने आये हो ? चुटकुला भद्दा जरूर है , लेकिन यही सच्चाई थी आपातकाल के समय लगे नसबंदी प्रोग्राम की। थोड़ा और पीछे यदि इतिहास में जाओ , तो नाज़ी पार्टी के सत्ता में आने के बाद हिटलर ने चार लाख लोगों की नसबंदी करवाई थी जो अनुवांशिक रूप से कमजोर थे। हिटलर का कहना था - ऐसे लोगों की आने वाली नस्ल को आने का कोई हक़ नहीं क्यूंकि वो एक मजबूत जर्मन रेस बनाना चाहता था। संजय गाँधी ने आपातकाल के दौरान लगभग साठ लाख लोगों की नसबंदी करवाई थी -सीधा साधा सूत्र - वो हिटलर से पंद्रह गुना बड़ा तानाशाह था।
भारत की जनसख्यां साल दर साल बढ़ती आयी है , आज़ादी के बाद से। इस में कोई संशय नहीं है। आज़ादी के समय भारत की आबादी लगभग बत्तीस करोड़ थी और भारत की पहली हेल्थ मंत्री थी राजकुमारी अमृत कौर जी। उन्होंने एक अमेरिकन डॉक्टर अब्राहम स्टोन की ईजाद - rhythm मेथड को भारत में सौ महिलाओ में एक एक्सपेरिमेंट के रूप में लागू किया - इसमें एक रंग बिरंगा नेकलेस इन महिलाओं को दिया गया और कहा - हरे बीड का मतलब सुरक्षित और लाल बीड का मतलब खतरा - इस प्रकार इन्हें गर्भाधान से बचने के लिए ट्रेनिंग दी गयी। इन्हें केवल बीड को देखना था और बड़े सीधे रूल फॉलो करने थे। लेकिन कुछ समय बाद पाया गया इन महिलाओ ने वो नेकलेस बच्चो को दे दिए खेलने के लिए क्यूंकि वो गहने नहीं थे। इन सौ में से पचास महिलाये कुछ महीनो में ही गर्भवती पायी गयी। ये आज़ाद भारत का पहला कदम था आबादी कण्ट्रोल करने का। इस बाद अगले तीस सालो में कोई तरक्की नहीं हुई इस दिशा में। IMF , वर्ल्ड बैंक , दुसरे पश्चिमी देशो ने जब जब भारत को कोई मदद थी - आर्थिक , अनाज आदि की तो हर बार इंटरनेशनल लेवल से पापुलेशन कण्ट्रोल का प्रेशर आया । हर पांच वर्षीय योजना में इसके लिए प्रावधान और पैसा था - लेकिन वो छु मंतर हो जाता था। तो जब आपातकाल लगा तो इंदिरा गाँधी पर इसका प्रेशर तो था ही , ऊपर से बर्थ कण्ट्रोल का भी अलग प्रेशर था । स्टेज सज चूका था संजय गाँधी की एक और सनक का । मारुती का काम तो टॉय टॉय फिस्स था ही , तो खाली दिमाग शैतान का घर । संजय ने नसबंदी करवाने की ठानी - वो भी बगैर हेल्थ मिनिस्ट्री के पूछे बिना ।
संजय को ना तो कार बनानी आती थी - तो कार बनाने की कोशिश की , नसबंदी कैसे लागू करे - वो भी नहीं ज्ञात था ; लेकिन वो भी किया। और ऐसा किया कि उसके बाद किसी सरकार में हिम्मत नहीं रही बर्थ कण्ट्रोल प्रोग्राम को सख्ती से लागू करे। फल स्वरुप आज हम एक सौ बत्तीस करोड़ हो चुके है और आगे बढ़ेंगे। अब बाकी बर्थ कण्ट्रोल के तरीके उस समय बड़े अलग थे - संयुक्त परिवार में रहना , ग्रामीण परिवेश में ये सब बातें सत्तर के दशक में बहुत अलग थी। तो केवल एक ही इलाज था - नसबंदी। ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी। हालांकि इंदिरा के सब सलाहकारों का मानना था ये बहुत बुरा कदम है क्यूंकि आबादी से ही कृषि वृद्धि होगी आदि आदि। नसबंदी की जगह आर्थिक विस्तार करना चाहिए - लेकिन संजय के दिमाग में सनक घर चुकी थी। संजय ने इस काम का बीड़ा उठाया और एक प्रोग्राम बनाया - लोकल नसबंदी : तीन मिनट का ऑपरेशन , लोकल anesthesia के द्वारा , बिना एक खून की बूँद के। अब जनता में नसबंदी को लेकर कुछ भ्रांतिया फैली थी जैसे - नसबंदी के बाद आदमी इच्छुक नहीं रहता , मर्दानगी समाप्त हो जाती है आदि आदि। यहाँ तक महिलाये भी यही सोचती थी। एक ऐसे देश में , जहां पुरुष होना एक बहुत बड़ा एडवांटेज हो , वहां ऐसी बातें मायने रखती है । लोग कहते - नसबंदी के बाद आदमी लकड़ी बन जाएगा , हर वक़्त थका थका रहेगा , औरतें उस से चौका-बासन करवाएंगी आदि। संजय के पास इन सब बातो से निबटने का समय ना था। हेल्थ मिनिस्ट्री के अनुसार ये काम दो साल के दौरान धीरे धीरे करना चाहिए लेकिन इन सब को दरकिनार कर संजय ने मोर्चा खोल दिया।
कहानी है थोड़ी लम्बी और थोड़ी दिलचस्प। तो ये हुआ पहला पार्ट । जारी रहेगी । क्रमश:
अंत में :
अगली किश्तों में पढ़िए : नसबंदी के तीन दलाल - इंदिरा ,संजय और बंसीलाल ;
संजय की मम्मी बड़ी निकम्मी ;
ज़मीन गयी चकबंदी में , मकान गया हदबंदी में , दरवज्जे पर खड़ी औरत चिल्लाये - मेरा मरद गया नसबंदी में !
इंदिरी बचाओ - सेव योर पेनिस ::Part 2
नोट - इस से पहले का पार्ट १ मेरी वाल पर पोस्टेड है -यदि वो नहीं पढ़ा है तो पहले वो पढ़ लें।
गतांक से आगे :
संजय ने नसबंदी का प्रोग्राम सबसे पहले दिल्ली में लांच किया था - उस के बाद उन राज्यों में जहां कांग्रेस की सरकार थी। इस कार्यक्रम को लागू करवाने के लिए चार लोगो की टीम गठित की गयी -गवर्नर किशन चंद , नविन चावला , विद्याबेन शाह और रुखसाना सुल्ताना। सुल्ताना खुशवंत सिंह के भतीजे को तलाक दे चुकी थी - फिल्म लाइन से जुडी बेगम पारा की भतीजी थी। इत्र में नहायी , आँखों पर हमेशा धूप चश्मा चढ़ाये ३१ साला सुल्ताना संजय गाँधी की सबसे बड़ी फैन थी और वो किसी को भाव ना देती। सुल्ताना का काम एक बुटीक चलाना था और यही उसकी क्वालिफिकेशन थी। अमृता सिंह की माँ , सैफ की सास और सारा अली खान की नानी। बड़े बड़े नेता सुल्ताना के समक्ष मेमने नज़र आते थे। अब एक नज़र संजय गाँधी पर - सितम्बर 1976 , जब ये नसबंदी कार्यक्रम लांच हुआ था - उस समय संजय की आयु तीस थी - ना वो सांसद थे , ना किसी सरकारी नौकरी पर और ना कोई व्यापार - लेकिन ओहदा सबसे बड़ा। इतना बड़ा कि इंदिरा ने नसबंदी का काम संजय के हवाले कर दिया और किसी ने चू तक ना की।
सबसे पहले शुरुआत हुई दिल्ली की जामा मस्जिद के रिहाशी इलाको से , जहां विद्याबेन और सुल्ताना ने काम शुरू किया - कैंप लगाए - दोनों मरदाना और जनाना नसबंदी के। शुरू में किसी ने ध्यान ना दिया । सुल्ताना इत्र छिड़कती वहां की गलियों में घूमती और खवातीनो से दरख़्वास्त्र करती। पहले दिन १९ लोग , दुसरे दिन जीरो , तीसरे दिन तीन लोग कैंप में आये। संजय ने पैसा और वालंटियर बढ़ाये , खुद कैंप में बैठे तब भी २४ से ज्यादा लोग ना आये। अब तक प्रोग्राम स्वचछा से चल रहा था - कोई जोर जबरजस्ती नहीं थी। इनाम बढ़ाया गया -७५ रुपैये , एक टिन घी का और दो दिन की काम से छुट्टी। अब संजय ने dig पुलिस को बुलाया और लोगो को आने के किये कहा । ऊपर से सरकार ने भी १६ अप्रैल को आबादी दिवस घोषित कर दिया - सब कोंग्रेसी नेता इसी सुर में बयान देने लगे थे। अब इन सब के चलते रोज तीन सौ से ऊपर लोग कैंप में आने लगे थे। कुछ जगह ट्रांजिस्टर भी बाँट रहे थे ताकि ज्यादा लोग आये। अब ये प्रोग्राम up , mp , राजश्थान , बिहार , हरयाणा , ओरिसा , पंजाब , हिमाचल राज्यों में भी शुरू किया गया । दिल्ली का ट्रैक रिकॉर्ड ४१ प्रतिशत था और बाकी राज्य १६ प्रतिशत टारगेट पर चल रहे थे । संजय गाँधी खुद डेली सुबह रिपोर्ट लेते थे - टारगेट कितना मीट हुआ है । दिल्ली में उस एक साल में उतनी नसबंदी हो गयी जो पिछले दस साल में नहीं हुई थी। लेकिन अभी सैलाब आना बाकी था।
जब सब मुख्य मंत्री अपनी अपनी रिपोर्ट देते तो उन सबको आपस में तुलना करवा कर जलील किया जाता। इस तरह से हरियाणा - जहां बंसीलाल थे ने दमदार गति पकड़ी। राजस्थान भी पीछे ना था। अखबारों में साफ़ इंस्ट्रक्शन थे - कोई बुरी खबर ना छापी जाए। बल्कि बढ़िया खबर प्रिंट होती - कैसे अपनी ख़ुशी से लोग नसबंदी करवा रहे है - ऑस्ट्रेलियाई डॉक्टर की थीसिस छपती कि नसबंदी के बाद इच्छा और बढ़ जाती है आदि आदि। २ मौलवी के साथ भी संजय की फोटो छापी गयी जिन्होंने नसबंदी करवाई थी , ईसाई आर्चबिशप की भी अपील जारी हुई। अक्टूबर का महीना गजब का निकला - चाईबासा बिहार में एक डॉक्टर ने रिकॉर्ड ९२ नसबंदी करि एक दिन में ; गुजरात में दस हज़ार ऑपरेशन हुए पूरे महीने में ; भालकी कर्नाटक में बारह घंटे में दो हज़ार ऑपरेशन। आगरा में दो हज़ार भिखारियों को पकड़ा गया और १८०० को तुरंत ऑपरेट कर दिया गया एक दिन में ही। सुल्ताना ने दिल्ली में अलग ही कहर ढा रखा था - छह कैंप वो चला रही थी - सबसे ज्यादा कुख्यात था दोजना हाउस कैंप - जिसे कबाड़ी बाजार वाले स्पॉन्सर कर रहे थे। दोजोना हाउस कैंप रोज सुबह दस बजे खुलता , चाय पिलाई जाती , दोपहर खाना मिलता , पूरे दिन गाने बजते - आओ नसबंदी करवाए। इनाम में ट्रांजिस्टर , डालडा और घडिया बांटी जाती। इस कैंप में छह बिस्तर थे और डॉक्टर के टीम के हेड थे - डॉक्टर निरोध बनेर्जी। जी हां नाम सही पढ़ा आपने - निरोध ! इस दोजोना हाउस में ही सबसे ज्यादा बर्बरता हुई थी और इस कैंप को सँभालने के लिए राजस्थान के पेशेवर अपराधियों को जिम्मेदारी दी गयी थी।
अप्रैल 1976 में गवर्नर ने एक नोटिस जारी किया -सब सरकारी दफ्तर , स्कूल, कॉलेज , बैंक , पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर सब जगह - जिसके दो से ज्यादा बच्चे है , नसबंदी जरुरी है नहीं तो तरक्की नहीं होगी , पूरा वेतन नहीं मिलेगा , कोई लोन नहीं , कोई सुविधा नहीं , कोई छुट्टी नहीं , कोई एडवांस नहीं। लोगो से बाकायदा एफिडेविट लिए जाने लगे - नसबंदी सर्टिफिकेट के साथ। इसी के साथ नकली सर्टिफिकेट गैंग ने अपना काम शुरू किया - ये लोग पहले नकली डिग्री बनाते थे लेकिन अब पैसा नसबंदी के सर्टिफिकेट में ज्यादा था। सबसे ज्यादा शोषण इस में स्कूल टीचर के साथ हुआ क्यूंकि इन्हे ना केवल खुद की नसबंदी करवानी थी बल्कि पांच लोगो की भी करवानी थी। अब ये लोग अपनी नौकरी बचाने के लिए अपनी पगार का कुछ हिस्सा इन "बकरो " को देने के किये विवश थे। माहौल इस कदर बढ़ा कि ड्राइवर, स्कूटर ,रिक्साव , हथियार , सेल्स टैक्स आदि के लाइसेंस के लिए भी नसबंदी का सर्टिफिकेट जरुरी था। सरकारी अस्पताल में भी मरीज को तब एडमिट करते अगर उसके पास नसबंदी का सर्टिफिकेट होता। कई किस्से हुए - जहां मरीज को एडमिट करने से पहले नसबंदी का ऑपरेशन किया और इसी दौरान वो ख़त्म हो गए । तरुण क्या , बूढ़े क्या सबकी नसबंदी धड़ाधड़ हो रही थी। भूदान मूवमेंट के श्री विनोबा भावे ने आपातकाल को अनुशाशन पर्व बताया और भूमिहीनों को जो पट्टे दिए जाते , उसमे भी नसबंदी का सर्टिफिकेट जरुरी था ।
सबसे ज्यादा शामत आयी सरकारी अफसर और कर्मचारी जो पचास के आयु वर्ग में थे - इस आयु में पहले नसबंदी करवाओ तब जाकर जीवन के सब काम आगे बढ़ते। ये लोग यदि अपने बच्चो की शादी के लिए एडवांस , लोन आदि मांगते तो पहले नसबंदी करवाते थे । कई ऐसे भी केस निकले जहां आदमियों की नसबंदी हुई - लेकिन फिर भी बच्चे हो गए। जब पत्नियों पर शक किया गया तो मामला खुला कि कई सारे नसबंदी इतनी हड़बड़ी में हुए थे कि वो सफल नहीं थी। गांव में खौफ इतना ज्यादा था कि मर्द दिन में घर में छिपे रहते और रात को खेतो में भाग जाय करते थे। अमेठी का मैन बाजार गौरीगंज का , पूरा सुनसान रहता था - ये गाँधी परिवार के गढ़ की कहानी थी । उत्तवर , मुजफरनजर और कुछ और जगह ऐसे काण्ड हुए कि पूरा देश हिल गया था।
जारी है नसबंदी की कहानी। क्रमश :
अंत में : इस गाथा को पूरा करने के लिए एक पोस्ट और लगेगी। अंतिम किश्त में पढ़िए -कुछ जगह क्या बर्बरता हुई , और कैसे संजय गाँधी की नसबंदी का प्लान बना था तुर्कमान गेट पर -जनता पार्टी की सरकार में ।
2020 में जब कमलनाथ की MP सरकार थी - तब एक डिपार्टमेंट में सरकारी नोटिस जारी हुआ था - जो लोग स्टर्लीज़ है , केवल उन्हें तरक्की मिलेगी। हो हल्ला जब हुआ तब कमलनाथ ने वो आदेश वापस लें लिया था और आईएएस अफसर पर सब इलज़ाम डाल दिया था। ये आपातकाल की पुनर्वृति थी। खबर पूर्ण रूप से याद नहीं - लेकिन ऐसा कुछ हुआ था दो साल पहले !
इंदिरी बचाओ - सेव योर पेनिस ::Part 3
उत्तावर दिल्ली से अस्सी किलोमीटर दूर एक मेवाती मुस्लिम्स का एक गांव है। १९७६ में एक रात तीन बजे अचानक पूरे गांव को घोड़े पर सवार पुलिस ने घेर लिया और अन्नोउंस हुआ - १५ साल से बड़े मर्द बस स्टैंड मैन रोड पर जमा हो। चार सौ के ऊपर लोग जब वहां इक्कठे हुए - पुलिस ने पूरे गांव की तलाशी , लूटमार और आगजनी करी। एक दिन में पूरे गांव के सब आदमियों का ऑपरेशन कर दिया गया। इसी तरह मुज़्ज़फरनगर में दंगा शुरू हो गया जब पुलिस और प्रशासन ने जबरजस्ती करनी शुरू की। लोकल कांग्रेस नेताओ ने जब हाई कमांड को फ़ोन किया तो उन्हें डांट डपट कर चुप करा दिया गया । यहाँ का डीएम सीधा संजय के कण्ट्रोल में था और लोकल नेताओ आदि का उस पर कोई प्रभाव ना था। डेली का छह हज़ार का टारगेट लिए इस डीएम ने किसी को ना बक्शा - रिक्शा वाले से लेकर रोड पर रेहड़ी लगाने वालो तक को ऑपरेट करवा दिया। ये सीधे लोगो के वाहन उठवा लेता था - लौटने के एवज में नसबंदी करवा कर छोड़ता। ७५ साल के बूढ़े से लेकर १५ साल के लड़को तक को नहीं छोड़ा । जब लोगो ने मिल कर डीएम आवास पर धावा बोला तो जबाब में पुलिस ने आंसू गैस , गोली और लाठीचार्ज किया - कई लोग मरे और जख्मी हुए । ७५ पुलिस वाले तक जख्मी बताये गए। विपक्ष ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से जाँच की मांग रखी लेकिन ये दंगे सुल्तान पुर से मेरठ से गोरखपुर तक फ़ैल चुके थे। mp up बिहार , बंगाल सब जगह से दंगे की खबर आ रही थी - लोग या तो दंगो में मर रहे थे या नसबंदी के दौरान लापरवाही से।
हरयाणा में सबसे ज्यादा लोगो को झेलना पड़ा क्यूंकि चौधरी बंसीलाल ने बहुत सख्ती से प्रोग्राम लागू करवाया था - हरयाणा टॉप पर था आंकड़ों में। ताज्जुब की बात थी जम्मू कश्मीर के शेख अब्दुल्लाह इस रेस में बहुत बहुत पीछे थे - ना के बराबर आंकड़े और शेख को डांटने वाला भी कोई ना था। सुल्ताना का दोजना हाउस में सबसे ज्यादा लोग ऑपरेशन की लापरवाही से मरे - कोई पांच सौ मौत बताता कोई हज़ार , जितने मुँह उतनी बाते । लेकिन सुल्ताना पर कोई ऊँगली तक नहीं उठा पाया । विपक्ष संसद से लापता था क्यूंकि आपातकाल में लोग धड़ाधड़ गिरफ्तार हो रहे थे तो आम जनता की कहने वाला भी कोई ना था। इस टाइम इंदिरा ने एक नया एलान किया -हर राज्य अपने हिसाब से नसबंदी लागू करवाए - तो सब ये राज्य के cm ड्राफ्ट पेश करने में लग गए और सबसे पहले महाराष्ट्र ने कानून बनाया नसबंदी के लिए। cm थे sb चवण । कानून था - ५५ तक के आदमी और ४५ तक की औरत को कानूनन नसबंदी करवानी पड़ेगी तीसरे बालक के होने के छह महीने के अंदर । एक बार फिर पढ़िए ये कानून और सोचिये। नहीं किया तो दो साल की क़ैद !! इस से पहले ये राष्ट्रपति से पारित होता , आपातकाल समाप्त हो गया और नया चुनाव अन्नोउंस हो गया ।
किस्से और दर्दनाक कहानिया और भी बहुत है लेकिन पोस्ट को अब समापन के ओर ले जाना जरुरी है । ये प्रोग्राम 270 दिन तक चला था और सब नियम कानून ताक पर रख दिए गए थे। जनता पार्टी की सरकार में अनेको जाँच कमिटी बनी इसके लिए लेकिन कुछ नहीं हुआ।
चुनाव प्रचार के दौरान जब बंसीलाल जी हरियाणा में घुमते तो युवक अपनी धोती खोल कर खड़े हो जाते थे। कई लोगो ने घर के बहार नोटिस चिपका दिया - वही वोट मांगने आये जिसके पास नसबंदी का सर्टिफिकेट हो। ये नल और कनेक्शन वाला चुटकुला भी इसी चुनाव में से निकला था और वो सब नारे भी। एक सवाल उठता है - नसबंदी से हिन्दू और मुस्लिम पर क्या असर पड़ा ? सीधा कोई उत्तर नहीं है - लेकिन जो लोग सरकारी नौकरी वाले थे - वो ज़्यदातर बहुसंख्यक थे और उन्होंने शराफत से नसबंदी करवाई - वही से डेमोग्राफिक्स बदलने शुरू हुए थे। अल्पसंख्यक ने इतनी आसानी से हार नहीं मानी थी इस प्रोग्राम में।
अंत में - जब इंदिरा चुनाव हार गयी तो उन्हें भनक पड़ी कि कई सत्ताधारी लोग संजय की नसबंदी करवाने पर तुले है तुर्कमान गेट पर। तो वो सीधे jp नारायण के पास पहुंची गुहार लगाने और jp ने सब लोगो को शांत किया। ये बात अलग है - कि महज ढाई साल बाद जनता ने इंदिरा और संजय को बम्पर जीत के साथ फिर सत्ता दे दी थी। इस बार संजय के पास सांसद की कुर्सी भी थी - लेकिन आयु नहीं बची थी। यदि आयु होती - तो आज भारत की क्या तस्वीर होती ?
ये पूरा प्रकरण लगभग आठ किताबो के पढ़ने के बाद संक्षेप में लिखा है - गुहा जैसे लेखकों ने इस काण्ड को चार लाइन में समेट दिया जैसे कुछ हुआ ही नहीं था। कुछ जगह थोड़ा विवरण मौजूद है लेकिन एक जगह सब डिटेल फिर भी नहीं मिलती।
इंदिरी का मतलब समझे जनाब?
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