रविवार, 23 दिसंबर 2018

शांतिप्रिय मज़हब

१-जबसे #शांतिप्रिय_मज़हब बना है तभी से “शिया और सुन्नी” मुस्लिम एक दूसरे की जान के दुश्मन हैं, यह लोग आपस में लड़ते-मरते रहते हैं।
२. #अहमदिया, सलफमानी, शेख, क़ाज़ी, मुहम्मदिया, पठान आदि मुस्लिमों की जातियां हैं और हंसी की बात यह एक ही अल्लाह को मानने वाले, एक ही मस्जिद में नमाज़ नहीं पढते। सभी जातियों के लिए अलग अलग मस्जिदें होती हैं।
३. सउदी अरब, अरब अमीरात, ओमान, कतर आदि अन्य अरब राष्ट्रों के मुस्लिम पाकिस्तान, भारत और बंगलादेशी मुस्लिमों को #फर्जी मुसलमान मानते हें और इनसे छुआछूत मानते हैं। सउदी अरब में ऑफिसों मे भारत और पाक के मुसलमानों के लिए अलग पानी रखा जाता है।
४. #शेख अपने आपको सबसे उपर मानते हैं और वे किसी अन्य जाति में निकाह नहीं करते।
५. #इंडोनेशिया में १०० वर्षों पूर्व अनेकों बौद्ध और हिंदू परिवर्तित होकर मुस्लिम बने थे, इसी कारण से सभी इस्लामिक राष्ट्र, इंडोनेशिया से घृणा की भावना रखते हैं।
६. #क़ाज़ी मुस्लिम भारतीय मुस्लिमों'' को मुस्लिम ही नहीं मानते क्यूंकि उन का मानना है कि यह सब भी हिंदूधर्म से परिवर्तित हैं।
७. #अफ्रीका_महाद्वीप के सभी इस्लामिक राष्ट्र जैसे मोरोक्को, मिस्र, अल्जीरिया, निजेर, लीबिया आदि राष्ट्रों के मुस्लिमों को तुर्की के मुस्लिम सबसे निम्न मानते हैं। 
८. #सोमालिया जैसे गरीब इस्लामिक राष्ट्रों में अपने बुजुर्गों को '#जीवित समुद्र में बहाने की प्रथा चल रही है।
९. #भारत के ही #बोहरा मुस्लिम किसी भी मस्जिद में नहीं जाते, वो मात्र मज़ारों पर जाते हैं। उनका विश्वास #सूफियों पर है... अल्लाह पे नहीं।
१०. मुसलमान दो मुख्य सामाजिक विभाग मानते हैं...............



१. #अशरफ अथवा शरु और २. अज़लफ। अशरफ से तात्पर्य है 'कुलीन' और शेष अन्य मुसलमान जिनमें व्यावसायिक वर्ग और निचली जातियों के मुसलमान शामिल हैं, उन्हें अज़लफ अर्थात् नीच अथवा निकृष्ट व्यक्ति माना जाता है। उन्हें #कमीना अथवा इतर कमीन या रासिल, जो रिजाल का भ्रष्ट रूप है, 'बेकार' कहा जाता है। कुछ स्थानों पर एक तीसरा वर्ग 'अरज़ल' भी है, जिसमें आने वाले व्यक्ति सबसे नीच समझे जाते हैं। उनके साथ कोई भी अन्य मुसलमान मिलेगा- जुलेगा नहीं और न उन्हें मस्जिद और सार्वजनिक कब्रिस्तानों में प्रवेश करने दिया जाता है। १. 'अशरफ' अथवा उच्च वर्ग के मुसलमान (प) सैयद, (पप) शेख, (पपप) पठान, (पअ) मुगल, (अ) मलिक और (अप) मिर्ज़ा।
२. #अज़लफ' अथवा निम्न वर्ग के मुसलमान... (A) खेती करने वाले शेख और अन्य वे लोग जोमूलतः हिन्दू थे, किन्तु किसी बुद्धिजीवी वर्ग से सम्बन्धित नहीं हैं और जिन्हें अशरफ समुदाय, अर्थात् पिराली और ठकराई आदि में प्रवेश नहीं मिला है।(B) दर्जी, जुलाहा, फकीर और रंगरेज।
(C) बाढ़ी, भटियारा, चिक, चूड़ीहार, दाई,धावा, धुनिया, गड्डी, कलाल, कसाई, कुला, कुंजरा,लहेरी, माहीफरोश, मल्लाह, नालिया, निकारी। (D) अब्दाल, बाको, बेडिया, भाट, चंबा, डफाली, धोबी, हज्जाम, मुचो, नगारची, नट, पनवाड़िया, मदारिया, तुन्तिया। ३. 'अरजल' अथवा निकृष्ट वर्ग भानार, हलालखोदर,हिजड़ा , कसंबी, लालबेगी, मोगता, मेहतर।
अल्लाह एक, कुरान एक, एक हीनबी और महान एकता... बतलाते हैं स्वंय में ? जबकि, मुसलमानों के बीच, शिया और सुन्नी सभी मुस्लिम देशों में एक दूसरे को मार रहे हैं और अधिकांश मुस्लिम देशों में इन दो संप्रदायों के बीच हमेशा धार्मिक दंगा होता रहता है। इतना ही नहीं, शिया को सुन्नी मस्जिद में जाना मना है। इन दोनों को अहमदिया मस्जिद में नहीं जाना है और ये तीनों सूफी मस्जिद में कभी नहीं जाएँगे। फिर इन चारों का मुजाहिद्दीन मस्जिद में प्रवेश वर्जित है। किसी बोहरा मस्जिद मे कोई दूसरा मुस्लिम नहीं जा सकता।कोई बोहरा का किसी दूसरे के मस्जिद मे जाना वर्जित है।

NDA (National Defence Academy) लचित_बोरफुकन है

 #NDA (National Defence Academy) में जो बेस्ट कैडेट होता है, उसको एक गोल्ड मैडल दिया जाता हैं | लेकिन क्या आपको यह ज्ञात हैं कि उस मैडल का नाम #लचित_बोरफुकन है ?
कौन हैं ये "लचित बोरफुकन" ? पोस्ट को पूरा पढ़ने पर आपकों भी ज्ञात हो जाएगा कि क्यों वामपंथी और मुगल परस्त इतिहासकारों ने इस नाम को हम तक पहुचने नहीं दिया |
क्या आपने कभी सोचा है कि पूरे उत्तर भारत पर अत्याचार करने वाले मुस्लिम शासक और मुग़ल कभी बंगाल के आगे पूर्वोत्तर भारत पर कब्ज़ा क्यों नहीं कर सके ?
कारण था वो हिन्दू योद्धा जिसे वामपंथी और मुग़ल परस्त इतिहासकारों ने इतिहास के पन्नो से गायब कर दिया - असम के परमवीर योद्धा "लचित बोरफूकन।" अहोम राज्य (आज का आसाम या असम) के राजा थे चक्रध्वज सिंघा और दिल्ली में मुग़ल शासक था औरंगज़ेब। औरंगज़ेब का पूरे भारत पे राज करने का सपना अधूरा ही था बिना पूर्वी भारत पर कब्ज़ा जमाये।


इसी महत्वकांक्षा के चलते औरंगज़ेब ने अहोम राज से लड़ने के लिए एक विशाल सेना भेजी। इस सेना का नेतृत्व कर रहा था राजपूत राजा राजाराम सिंह। राजाराम सिंह औरंगज़ेब के साम्राज्य को विस्तार देने के लिए अपने साथ 4000 महाकौशल लड़ाके, 30000 पैदल सेना, 21 राजपूत सेनापतियों का दल, 18000 घुड़सवार सैनिक, 2000 धनुषधारी सैनिक और 40 पानी के जहाजों की विशाल सेना लेकर चल पड़ा अहोम (आसाम) पर आक्रमण करने।
अहोम राज के सेनापति का नाम था "लचित बोरफूकन।" कुछ समय पहले ही लचित बोरफूकन ने गौहाटी को दिल्ली के मुग़ल शासन से आज़ाद करा लिया था।


इससे बौखलाया औरंगज़ेब जल्द से जल्द पूरे पूर्वी भारत पर कब्ज़ा कर लेना चाहता था।
राजाराम सिंह ने जब गौहाटी पर आक्रमण किया तो विशाल मुग़ल सेना का सामना किया अहोम के वीर सेनापति "लचित बोरफूकन" ने। मुग़ल सेना का ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे रास्ता रोक दिया गया। इस लड़ाई में अहोम राज्य के 10000 सैनिक मारे गए और "लचित बोरफूकन" बुरी तरह जख्मी होने के कारण बीमार पड़ गये। अहोम सेना का बुरी तरह नुकसान हुआ। राजाराम सिंह ने अहोम के राजा को आत्मसमर्पण ने लिए कहा। जिसको राजा चक्रध्वज ने "आखरी जीवित अहोमी भी मुग़ल सेना से लडेगा" कहकर प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।


लचित बोरफुकन जैसे जांबाज सेनापति के घायल और बीमार होने से अहोम सेना मायूस हो गयी थी। अगले दिन ही लचित बोरफुकन ने राजा को कहा कि जब मेरा देश, मेरा राज्य आक्रांताओं द्वारा कब्ज़ा किये जाने के खतरे से जूझ रहा है, जब हमारी संस्कृति, मान और सम्मान खतरे में हैं तो मैं बीमार होकर भी आराम कैसे कर सकता हूँ ? मैं युद्ध भूमि से बीमार और लाचार होकर घर कैसे जा सकता हूँ ? हे राजा युद्ध की आज्ञा दें....
इसके बाद ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे सरायघाट पर वो ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया, जिसमे "लचित बोरफुकन" ने सीमित संसाधनों के होते हुए भी मुग़ल सेना को रौंद डाला। अनेकों मुग़ल कमांडर मारे गए और मुग़ल सेना भाग खड़ी हुई। जिसका पीछा करके "लचित बोफुकन" की सेना ने मुग़ल सेना को अहोम राज के सीमाओं से काफी दूर खदेड़ दिया।
इस युद्ध के बाद कभी मुग़ल सेना की पूर्वोत्तर पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं हुई। ये क्षेत्र कभी गुलाम नहीं बना।
ब्रम्हपुत्र नदी के किनारे सरायघाट पर मिली उस ऐतिहासिक विजय के करीब एक साल बाद ( उस युद्ध में अत्यधिक घायल होने और लगातार अस्वस्थ रहने के कारण ) माँ भारती का यह अदभुद लाड़ला सदैव के लिए माँ भारती के आँचल में सो गया.

राजेश्वर विधूड़ी.....राजेश पायलट


1980 की एक दोपहर #PMO के अपने कैबिन में जब PM #इंदिरा_गांधी बैठी जरूरी फाइलों को टंटोल रही थी तभी उनके फोन की घण्टी बजती है ट्रिन ट्रिन..फोन इंदिरा जी के निजी सहायक का था मैडम वायुसेना के #कैप्टेन राजेश्वर विधूड़ी सहारनपुर आपसे मिलना चाहते हैं. इंदिरा जी फाइलों को खंगालते हुए गंभीरता से कहती है ह्म्म्म भेज दीजिये उनको अंदर कैबिन में 
कैप्टेन #राजेश्वर_विधूड़ी कैबिन में पहुंचकर इंदिरा जी को कुछ डाक्यूमेंट्स देते हुए कहते हैं मैडम ये लीजिये मेरा बॉयोडाटा में अगला #लोकसभा का चुनाव कांग्रेस के टिकिट पे बागपत सीट से लड़ना चाहता हूं ....
कुछ देर इधर उधर की बातचीत के बाद इंदिरा जी ने कैप्टेन विधूड़ी से कहा-देखिए कैप्टेन बागपत सीट जातीय समीकरणों के हिसाब से बड़ी जटिल है मैं समझती हूं वायुसेना में ही आपका भविष्य उज्ज्वल है आप अभी देश की सेवा कीजिये मेरी शुभकामनाएं आपके साथ है ....
कैप्टेन विधूड़ी-खतरों से तो मुझे उस वक़्त भी डर नहीं लगा था मैडम जब मैंने 71 की जंग में पाक पे अपने जेट से भीष्ण बमबारी की थी फिलहाल मैंने #VRS ले लिया है ....
इतना कहकर कैप्टेन विधूड़ी इंदिरा जी के कैबिन से निकल गए
कुछ माह बाद कैप्टेन विधूड़ी जी पे दिल्ली से एक कॉल आता है हैल्लो कैप्टेन मैं संजय .... संजय गांधी .... आपको भरतपुर (राजस्थान) की लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकिट पे चुनाव लड़ना है ....
दरअसल जातीय समीकरणों के हिसाब से गुर्ज्जर बाहुल्य भरतपुर सीट कैप्टेन विधूड़ी के लिए परफेक्ट थी ....
कैप्टेन विधूड़ी जब नामांकन के लिए भरतपुर पहुंचते है तो वहां की जनता और कांग्रेस कार्यकर्ता उनको पहचानने से इंकार कर देते हैं और बोलते हैं हमें तो कहा गया कोई पायलट आ रहा है वो लड़ेगा यहां से चुनाव ....
खबर संजय गांधी तक दिल्ली पहुंचती है और वो फिर कैप्टेन विधूड़ी को कॉल करते हैं हैल्लो कैप्टेन आप अपना नाम चेंज करो यार पहले ....
अगले दिन कैप्टेन विधूड़ी पहले कचहरी (तहसील) जा एक हलफनामा दायर कर के अपना नाम बदलते हैं .... इसी वजह से उनका चुनावी नामांकन भी एक दिन की देरी से होता है
कल के कैप्टन राजेश्वर विधूड़ी आज के #राजेश_पायलट बन चुके थे ...

रविवार, 30 सितंबर 2018

#बख्तियारपुर #बख्तियार_खिलजी #आसामी राय

                                    #बख्तियारपुर #बख्तियार_खिलजी #आसामी राय

यह शैतान गुलामो के बाजार में कई बार बिका था कई बार इसको नोकरी ने निकाला गया फिर मुहम्मद गोरी के पास गया उसने इस अंतरास्ट्रीय डाकू सरदार की हर प्रकार से खिदमत की उसके घरेलु कामो में भी हाथ बंटाता  था , उसकी कामाग्नि को शांत करने के लिए औरतों की दलाली की।फिर लुटेरों की सेना के साथ इसने कई जगह हमले किए।
उत्तरप्रदेश एवम बिहार के सारनाथ , कुशीनगर नालंदा आदि प्राचीन हिन्दू बौद्ध मंदिरों/विश्वविद्यालय तोड़ने का श्रेय इसे ही जाता  है या साफ़ कहें इस्लाम को जाता है उसने पाषाण भवनों की नींव तक खोद डाली।इसके बाद खिलजी कुत्तुबदीन ऐबक के पास आया , वहां उसे बहुत मान सम्मान मिला..
सनातन रक्त में त्वरित प्रतिक्रिया के तत्वों का आभाव शायद हमेशा ही रहेगा।  प्रतिक्रियात्मक प्रत्युत्तर के लिए बाट जोहना हमारी आदतों में शुमार है जिस बख्तियार खिलज़ी (नालंदा विश्वविद्यालय का विध्वंसक आतताई मलेक्ष ) का नाम बिहार राज्य वाले ढो रहे हैं उसको असम के तात्कालिक शूरवीर आसामी राय से सीखनी चाहिए की कैसे बदला लिया जाता है। बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को ध्वस्त करने के बाद, बिहार समेत आधे भारत को लूटने, खसोटने के बाद वह बंगाल, आसाम की ओर बढ़ा।यहाँ सबसे पहले उसने उस समय की #बंगाल की राजधानी नदिया में प्रवेश किया वहां पहुंचकर उसने किसी से किसी तरह की छेड़खानी नहीं की और दुर्ग महल तक जा पहुंचा वह बिना किसी दिखावे के आगे बढ़ता रहा ताकि कोई समझ ना पाए की वो कौन है लोगो ने सोचा वह कोई व्यापारी है , और बेचने के लिए घोड़े लाया है इसी तरह वह राय  लखमिनिया के घर तक पहुँच गया तब उसने तलवार खिंच उनपर आक्रमण कर दिया , उस समय सभी लोग भोजन पर बैठे हुए थे , खाद सामग्री से परिपूर्ण सोने के बर्तनों में खाना परोशा जा रहा था , एकाएक ही महल से चीखे आणि शुरू हो गयी , महल में धोखे से घुस उसने कई राजपरिवार के लोगो को मौत के घाट  उतार  दिया , उनका सारा खजाना और पत्निया सारे राजपरिपर को खत्म कर लूट ली , पुरे बंगाल में फिर इस्लाम की मशीन चली , बहुत निर्मम तरीके से बंगाली मानुष पर जुल्म और अत्याचार की जैसे वर्षा हो गयी। उसके बाद बनगांव ( बंगाल में ) में अपना पड़ाव डाला।आसाम का राजा राय बहुत ही चतुर था सुबह की नमाज के समय एकाएक हिन्दू सेना ने आधी उसपर चढ़ाई कर दी । आप अनुमान लगा सकते है कम से कम 500 km की दूरी तय कर आसाम की सेना ने उनपर आक्रमण किया था । पहली बार हिन्दू ने इन दुष्टों की नाड़ी पकड़ सूझबूझ का परिचय दिया । आसामी राय की गिनती उन वीर हिन्दू राजाओं में की जानी चाहिए जिन्होंने अपने राज्य के नागरिकों की सुरक्षा के प्रति सतर्क रहें परिस्तिथि को पूरी तरह समझा । पवित्र उषाकाल में हिन्दुओ ने आक्रमण किया । दोपहर होते होते तो हिन्दुओ ने 20,000 की घुड़सवार सेना को आधी कर दी । आश्चर्य की बात यह है शत्रुओं ( यानी हिन्दुओ ) के पास बांस के भाले थे । उनके पास ढाल तक नही थी, केवल रेशम के कपड़े उनके ढाल थे । सभी के पास धनुष ओर बाण थे । मुसलमानो को वहां पटक पटक के मारा गया ।
बख्तियार खिलजी ने देखा कि उसकी सेना आधी मार दी गयी है, ओर आधी सेना हताश ओर थकी हुई है । उसने अपने नेतागणों से सलाह मशवरा किया कि दूसरे साल फिर से पूरी तैयारी के साथ यहां आक्रमण करेंगे।
लेकिन आसामी राय इनसे एक कदम आगे थे । मायावी मुस्लिम सेना को हराने के बाद आसामी सेना ने पूरा ध्यान रखा कि एक भी मुसलमान वापस जिंदा ना पाए, इन्हें खाने का एक दाना ना मिले और पशुओं को खाने को एक घांस का तिनका नसीब ना हो । भूख मरते भागते बख्तियार के सैनिक घोड़ो को मारकर खा गए । बख्तियार भागता हुआ उसी पुल तक आया ओर सन्न रह गया । उसे देखकर यह बड़ा धक्का लगा कि जो सेना उसने पुल पर अपनी सुरक्षा के लिए छोड़ी थी, उसका सफाया कर हिन्दू सेना ने पुल तोड़ दिया था, ताकि यह मल्लेछ वापस भाग ना पाए । उनके भागने का मार्ग पूरी तरह से बन्द कर दिया गया ।
हिन्दुस्थान ने वीरो की कतार में आसामी राय को रखना ही पड़ेगा, क्यो की उन्होंने ना केवल अपने देश और अपनी प्रजा की रक्षा की बल्कि जागरण, चेतना और दूरदर्शिता का परिचय भी दिया,आसामी राय ने अपने पूर्ण कर्तव्य का पालन किया। बख्तियार खिलजी ने वहां अपनी कुछ सेना के साथ एक मंदिर में शरण ली, वहां आसामी राजा की सेना ने आड़े तिरछे बांस लगाकर उसे पूरी तरह मंदिर में कैद कर दिया । पिंजरे में घिर जाने के भय से बख्तियार अपनी जान बचाने जंगल मे भाग खड़ा हुआ । आसामी हिंदू सेना का सामना करने का साहस उसमे नही था । उसने हर हाल में नदी पार करने की ठान ली, नदी के पास पहुंचा तो उसके होंश फिर फ़ाख्ता हो गए, क्यो की नदी के पास हिन्दू सेना पूरी तरह से चौकन्नी होकर उसके पीछे पड़ी थी । वहां लगभग 1 घण्टे का युद्ध हुआ, यह युद्ध केवल मुसलमानो को काटने के लिए हुआ था । पूरी सेना को खत्म कर दिया गया । अब केवल एक आदमी जीवित बचा था, ओर वो खुद बख्तियार खिलजी था, वह इसलिए जीवित बचा, क्यो की जब युद्ध हो रहा था, तो मौका देख बख्तियार नदी में कूद गया । हिन्दुओ ने मुल्लो को काट काट के नदी में फेंका था, कुछ मुल्ले डरकर नदी में कूद कर मर गए , उन्ही में से किसी एक लाश का सहारा लेकर बख्तियार दूसरे किनारे तक पहुंचा । देवकोट पहुंचकर वह बीमार पड़ गया । अब इस नीच के पास खाने तक को पैसे नही थे । लोगो से यह घृणा इतनी कमा चुका था, की इसे कोई पीने का पानी तक ना देता, नालियों का पानी पी पी कर इसने अपना आखिरी समय गुजारा, सड़को पर जाता, तो लोग इसे गालियां देते, इसको थप्पड़ मारते । बख्तियार खिलजी कभी मायावी मुसलमानो का चमकता सितारा था , लेकिन आसामी राय की बहादुरी ने आज इसे भिखारी से भी बदतर बना दिया था । देवकोट में ही यह सड़क पर कहीं मुँह छिपाए पड़ा था,ओर किसी सनकी ने आकर भयंकर गालियां देते हुए, चाकुओं से गोद गोद कर इसकी हत्या कर दी।बिहार वासियों नालंदा विश्वविद्यालय का विध्वंस और हजारों बौद्ध भिक्षुकों का हत्यारा बख्तियार खिलज़ी से आज भी बदला से सकते हो बस जरुरत है सिर्फ इच्छा शक्ति की बख्तियारपुर का नाम बदल दो और अपना फ़र्ज़ निभाओ।इच्छाशक्ति को बढाओ।

युगोस्लाविया - सोवियत संघ

  यदि आप कभी bosnia-herzegovina जाएंगे तब एक जगह आपको 9300 मुसलमानों की सामूहिक कब्र दिखेगी जहां उन सभी के नाम लिखे हैं दरअसल यह मुस्लिम कही...