मंगलवार, 20 जून 2023

भगवान श्री कृष्ण श्रेष्ठ अवतार थे क्योंकि उन्होंने गुरु सांदीपनि से इन सभी 16 कलाओं को सीखा था।

 भगवान विष्णु के सभी अवतारों में भगवान श्री कृष्ण श्रेष्ठ अवतार थे क्योंकि उन्होंने गुरु सांदीपनि से इन सभी 16 कलाओं को सीखा था।

सामान्य शाब्दिक अर्थ के रूप में देखा जाये तो कला एक विशेष प्रकार का गुण मानी जाती है। यानि सामान्य से हटकर सोचना, समझना या काम करना। भगवान विष्णु ने जितने भी अवतार लिए सभी में कुछ न कुछ खासियत थीं और वे खासियत उनकी कला ही थी।
साधारण मनुष्य में पांच कलाएं और श्रेष्ठ मनुष्य में आठ कलाएं होती हैं। भगवान श्रीराम को 12 कलाओं का ज्ञान था।
श्री-धन संपदा
प्रथम कला के रूप में धन संपदा को स्थान दिया गया है। जिस व्यक्ति के पास अपार धन हो और वह आत्मिक रूप से भी धनवान हो। जिसके घर से कोई भी खाली हाथ नहीं जाए वह प्रथम कला से संपन्न माना जाता है। यह कला भगवान श्री कृष्ण में मौजूद है।
भू- अचल संपत्ति
जिस व्यक्ति के पास पृथ्वी का राज भोगने की क्षमता है। पृथ्वी के एक बड़े भू-भाग पर जिसका अधिकार है और उस क्षेत्र में रहने वाले जिसकी आज्ञाओं का सहर्ष पालन करते हैं वह अचल संपत्ति का मालिक होता है। भगवान श्री कृष्ण ने अपनी योग्यता से द्वारिका पुरी को बसाया। इसलिए यह कला भी इनमें मौजूद है।
कीर्ति- यश प्रसिद्धि
जिसके मान-सम्मान और यश की कीर्ति से चारों दिशाओं में गूंजती हो। लोग जिसके प्रति स्वतः ही श्रद्घा और विश्वास रखते हों वह तीसरी कला से संपन्न होता है। भगवान श्री कृष्ण में यह कला भी मौजूद है। लोग सहर्ष श्री कृष्ण की जयकार करते हैं।
इला-वाणी की सम्मोहकता
चौथी कला का नाम इला है जिसका अर्थ है मोहक वाणी। भगवान श्री कृष्ण में यह कला भी मौजद है। पुराणों में श्री उल्लेख मिलता है कि श्री कृष्ण की वाणी सुनकर क्रोधी व्यक्ति भी अपना सुध-बुध खोकर शांत हो जाता था। मन में भक्ति की भावना भर उठती थी। यशोदा मैया के पास शिकायत करने वाली गोपियां भी कृष्ण की वाणी सुनकर शिकायत भूलकर तारीफ करने लगती थी।
लीला- आनंद उत्सव
पांचवीं कला का नाम है लीला। इसका अर्थ है आनंद। भगवान श्री कृष्ण धरती पर लीलाधर के नाम से भी जाने जाते हैं क्योंकि इनकी बाल लीलाओं से लेकर जीवन की घटना रोचक और मोहक है। इनकी लीला कथाओं सुनकर कामी व्यक्ति भी भावुक और विरक्त होने लगता है।
कांति- सौदर्य और आभा
जिनके रूप को देखकर मन स्वतः ही आकर्षित होकर प्रसन्न हो जाता है। जिसके मुखमंडल को देखकर बार-बार छवि निहारने का मन करता है वह छठी कला से संपन्न माना जाता है। भगवान राम में यह कला मौजूद थी। कृष्ण भी इस कला से संपन्न थे। कृष्ण की इस कला के कारण पूरा व्रज मंडल कृष्ण को मोहिनी छवि को देखकर हर्षित होता था। गोपियां कृष्ण को देखकर काम पीड़ित हो जाती थीं और पति रूप में पाने की कामना करने लगती थीं।
विद्या- मेधा बुद्धि
सातवीं कला का नाम विद्या है। भगवान श्री कृष्ण में यह कला भी मौजूद थी। कृष्ण वेद, वेदांग के साथ ही युद्घ और संगीत कला में पारंगत थे। राजनीति एवं कूटनीति भी कृष्ण सिद्घहस्त थे।
विमला-पारदर्शिता
जिसके मन में किसी प्रकार का छल-कपट नहीं हो वह आठवीं कला युक्त माना जाता है। भगवान श्री कृष्ण सभी के प्रति समान व्यवहार रखते हैं। इनके लिए न तो कोई बड़ा है और न छोटा। महारास के समय भगवान ने अपनी इसी कला का प्रदर्शन किया था। इन्होंने राधा और गोपियों के बीच कोई फर्क नहीं समझा। सभी के साथ सम भाव से नृत्य करते हुए सबको आनंद प्रदान किया।
उत्कर्षिणि-प्रेरणा और नियोजन
महाभारत के युद्घ के समय श्री कृष्ण ने नौवी कला का परिचय देते हुए युद्घ से विमुख अर्जुन को युद्घ के लिए प्रेरित किया और अधर्म पर धर्म की विजय पताका लहराई। नौवीं कला के रूप में प्रेरणा को स्थान दिया गया है। जिसमें इतनी शक्ति मौजूद हो कि लोग उसकी बातों से प्रेरणा लेकर लक्ष्य भेदन कर सकें।
ज्ञान-नीर क्षीर विवेक
भगवान श्री कृष्ण ने जीवन में कई बार विवेक का परिचय देते हुए समाज को नई दिशा प्रदान की जो दसवीं कला का उदाहरण है। गोवर्धन पर्वत की पूजा हो अथवा महाभारत युद्घ टालने के लिए दुर्योधन से पांच गांव मांगना यह कृष्ण के उच्च स्तर के विवेक का परिचय है।
क्रिया-कर्मण्यता
ग्यारहवीं कला के रूप में क्रिया को स्थान प्राप्त है। भगवान श्री कृष्ण इस कला से भी संपन्न थे। जिनकी इच्छा मात्र से दुनिया का हर काम हो सकता है वह कृष्ण सामान्य मनुष्य की तरह कर्म करते हैं और लोगों को कर्म की प्रेरणा देते हैं। महाभारत युद्घ में श्री कृष्ण ने भले ही हाथों में हथियार लेकर युद्घ नहीं किया लेकिन अर्जुन के सारथी बनकर युद्घ का संचालन किया।
योग-चित्तलय
जिनका मन केन्द्रित है, जिन्होंने अपने मन को आत्मा में लीन कर लिया है वह बारहवीं कला से संपन्न श्री कृष्ण हैं। इसलिए श्री कृष्ण योगेश्वर भी कहलाते हैं। कृष्ण उच्च कोटि के योगी थे। अपने योग बल से श्री कृष्ण ने ब्रह्मास्त्र के प्रहार से माता के गर्भ में पल रहे परीक्षित की रक्षा की। मृत गुरू पुत्र को पुर्नजीवन प्रदान किया।
प्रहवि- अत्यंतिक विनय
तेरहवीं कला का नाम प्रहवि है। इसका अर्थ विनय होता है। भगवान श्री कृष्ण संपूर्ण जगत के स्वामी हैं। संपूर्ण सृष्टि का संचलन इनके हाथों में है फिर भी इनमें कर्ता का अहंकार नहीं है। गरीब सुदामा को मित्र बनाकर छाती से लगा लेते हैं। महाभारत युद्घ में विजय का श्रेय पाण्डवों को दे देते हैं। सब विद्याओं के पारंगत होते हुए भी ज्ञान प्राप्ति का श्रेय गुरू को देते हैं। यह कृष्ण की विनयशीलता है।
सत्य-यथार्य
भगवान श्री कृष्ण की चौदहवीं कला का नाम सत्य है। श्री कृष्ण कटु सत्य बोलने से भी परहेज नहीं रखते और धर्म की रक्षा के लिए सत्य को परिभाषित करना भी जानते हैं यह कला सिर्फ श्री कृष्ण में है। शिशुपाल की माता ने कृष्ण से पूछा की शिशुपाल का वध क्या तुम्हारे हाथों होगी। श्री कृष्ण निःसंकोच कह देते हैं यह विधि का विधान है और मुझे ऐसा करना पड़ेगा।
यहां कृष्णा रिश्ते की डोर में बंधकर शिशुपाल की माता यानी अपनी बुआ से झूठ नहीं बोलते। इसी प्रकार अश्वत्थामा वध के समय श्री कृष्ण युधिष्ठिर से ऐसा झूठ बुलवाते हैं जो सत्य की सीमा में है और जिसके बोलने से युधिष्ठिर असत्य बोलने के पाप से भी बच जाते हैं।
इसना -आधिपत्य
पंद्रहवीं कला का नाम इसना है। इस कला का तात्पर्य है व्यक्ति में उस गुण का मौजूद होना जिससे वह लोगों पर अपना प्रभाव स्थापित कर पाता है। जरूरत पड़ने पर लोगों को अपने प्रभाव को एहसास दिलाता है। कृष्ण ने अपने जीवन में कई बार इस कला का भी प्रयोग किया जिसका एक उदाहरण है मथुरा निवासियों को द्वारिका नगरी में बसने के लिए तैयार करना।
अनुग्रह-उपकार
बिना प्रत्युकार की भावना से लोगों का उपकार करना यह सोलवीं कला है। भगवान श्री कृष्ण को कभी भक्तों से कुछ पाने की उम्मीद नहीं रखते हैं लेकिन जो भी इनके पास इनका बनाकर आ जाता है उसकी हर मनोकामना पूरी करते हैं।
अब तक हुए अवतारों में मत्स्य, कश्यप और वराह में एक एक कला, नृसिंह और वामन में दो दो और परशुराम मे तीन कलाएं व्यक्त हुई थी। राम बारह कला के अवतार थे और श्रीकृष्ण सोलह कला के। माना जाता है कि भावी अवतार कल्कि भगवान चौबीस कला से संपन्न रहेंगे।




रामायण

 रावण ने माँ सीताजी का अपहरण पंचवटी (नासिक, महाराष्ट्र) से किया और पुष्पक विमान द्वारा हम्पी (कर्नाटक), लेपक्षी (आँध्रप्रदेश) होते हुए श्रीलंका पहुंचा...

आश्चर्य होता है जब हम आधुनिक तकनीक से देखते हैं कि नासिक, हम्पी, लेपक्षी और श्रीलंका बिलकुल एक सीधी लाइन में हैं
अर्थात ये पंचवटी से श्रीलंका जाने का सबसे छोटा रास्ता है।
अब आप ये सोचिये कि उस समय Google Map नहीं था जो Shortest Way बता देता
फिर कैसे उस समय ये पता किया गया कि सबसे छोटा और सीधा मार्ग कौन सा है??
या अगर भारत विरोधियों की अहम् संतुष्टि के लिए मान भी लें कि चलो रामायण केवल एक महाकाव्य है जो वाल्मीकि ने लिखा

तो फिर ये बताओ कि उस ज़माने में भी गूगल मैप नहीं था तो रामायण लिखने वाले वाल्मीकि को कैसे पता लगा कि पंचवटी से श्रीलंका का सीधा छोटा रास्ता कौन सा है?
महाकाव्य में तो किन्ही भी स्थानों का ज़िक्र घटनाओं को बताने के लिए आ सकता था
लेकिन क्यों वाल्मीकि जी ने सीता हरण के लिए केवल उन्हीं स्थानों का ज़िक्र किया जो पुष्पक विमान का सबसे छोटा और बिलकुल सीधा रास्ता था ??

ये ठीक वैसे ही है कि आज से 500 साल पहले गोस्वामी तुलसीदास जी को कैसे पता कि पृथ्वी से सूर्य की दूरी क्या है? (जुग सहस्त्र जोजन पर भानु = 152 मिलियन किमी - हनुमानचालीसा), जबकि नासा ने हाल ही के कुछ वर्षों में इस दूरी का पता लगाया है
अब आगे देखिये...
पंचवटी वो स्थान है जहां प्रभु श्री राम, माता जानकी और भ्राता लक्ष्मण वनवास के समय रह रहे थे..
यहीं शूर्पणखा आई और लक्ष्मण से विवाह करने के लिए उपद्रव करने लगी।
विवश होकर लक्ष्मण ने शूपर्णखा की नाक यानी नासिका काट दी और आज इस स्थान को हम नासिक (महाराष्ट्र) के नाम से जानते हैं। आगे चलिए...

पुष्पक विमान में जाते हुए सीताजी ने नीचे देखा कि एक पर्वत के शिखर पर बैठे हुए कुछ वानर ऊपर की ओर कौतुहल से देख रहे हैं तो सीता ने अपने वस्त्र की कोर फाड़कर उसमें अपने कंगन बांधकर नीचे फ़ेंक दिए, ताकि राम को उन्हें ढूढ़ने में सहायता प्राप्त हो सके..
जिस स्थान पर सीताजी ने उन वानरों को ये आभूषण फेंके वो स्थान था 'ऋष्यमूक पर्वत' जो आज के हम्पी (कर्नाटक) में स्थित है..

इसके बाद... वृद्ध गिद्धराज जटायु ने रोती हुई सीताजी को देखा, देखा कि कोई राक्षस किसी स्त्री को बलात अपने विमान में लेके जा रहा है। जटायु ने सीताजी को छुड़ाने के लिए रावण से युद्ध किया
रावण ने तलवार से जटायु के पंख काट दिए...

इसके बाद जब राम और लक्ष्मण सीताजी को ढूंढते हुए पहुंचे तो उन्होंने दूर से ही जटायु को सबसे पहला सम्बोधन 'हे पक्षी' कहते हुए किया और उस जगह का नाम दक्षिण भाषा में 'लेपक्षी' (आंधप्रदेश) है।
अब क्या समझ आया आपको? पंचवटी---हम्पी---लेपक्षी---श्रीलंका
सीधा रास्ता
सबसे छोटा रास्ता हवाई रास्ता,
यानि हमारे जमाने में विमान होने के सबूत गूगल मैप का निकाला गया फोटो नीचे है
अपने ज्ञान-विज्ञान, संस्कृति को भूल चुके भारतबन्धुओं रामायण कोई मायथोलोजी नहीं है...ये महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखा गया सत्य इतिहास है
जिसके समस्त वैज्ञानिक प्रमाण आज उपलब्ध हैं..
ये है हमारी महान संस्कृति और ज्ञान

#गौरक्षक वीर हरफूल जाट जुलानी


वीर हरफूल का जन्म 1892 ई० में भिवानी जिले में एक जाट क्षत्रिय परिवार में हुआ था।1899 में हरफूल के पिताजी की प्लेग के कारण मृत्यु हो गयी। हरफूल अपने मामा के गांव में चले गये।

जब वे वापिस आये तो उनके चाचा के लड़कों ने उसे प्रोपर्टी में शेयर देने से मना कर दिया। बहुत झगड़ा हुआ और हरफूल को झूठी गवाही देकर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया,और हरफूल पर थानेदार ने बहुत अत्याचार किये।
उसके बाद हरफूल सेना में भर्ती हो गए, प्रथम विश्वयुद्ध में भी भाग लिया। जब हरफूल ने सेना छोड़ी तो उस अफसर ने उन्हें गिफ्ट मांगने को कहा गया तो उन्होंने फोल्डिंग गन मांगी।

उसके बाद हरफूल ने सबसे पहले आते ही उस थानेदार को ठोक दिया जिसने उसे झूठा पकड़ा व टॉर्चर किया था। फिर उसने अपने परिवार से जमीन में हिस्सा मांगा तो किसी ने सपोर्ट न किया और भला बुरा कहा। वे उनकी माता की मृत्यु के भी जिम्मेदार थे तो बाकियों को हरफूल ने ठोक दिया।फिर हरफूल बागी हो गया उसने अपना बाद का जीवन गौरक्षा व गरीबों की सहायता में बिताया।
मुस्लिम का एक गाय काटने का एक कसाईखाना था। वहां की 52 गांवों की नैन खाप ने इसका कई बार विरोध किया। कई बार हमला भी किया जिसमें नैन खाप के कई नौजवान शहीद हुए व कुछ कसाई भी मारे गए। लेकिन सफलता हासिल नहीं हुई क्योंकि ब्रिटिश सरकार मुस्लिमों के साथ थी और खाप के पास हथियार भी नहीं थे।

तब नैन खाप ने वीर हरफूल को बुलाया व अपनी समस्या सुनाई। हिन्दू वीर हरफूल भी गौहत्या की बात सुनकर लाल पीले हो गए और फिर नैन खाप के लिए हथियारों का प्रबंध किया। हरफूल ने युक्ति बनाकर दिमाग से काम लिया। उन्होंने एक औरत का रूप धरकर कसाईखाने के मुस्लिम सैनिकों और कसाइयों का ध्यान बांट दिया। फिर नौजवान अंदर घुस गए उसके बाद हरफूल ने ऐसी तबाही मचाई कि बड़े-बड़े कसाई उनके नाम से ही कांपने लगे। उन्होंने कसाइयों पर कोई रहम नहीं खाया। सैंकड़ों मुस्लिम कसाईयो को मौत के घाट उतार दिया और गऊओं को मुक्त करवाया। अंग्रेजों के समय बूचड़खाने तोड़ने की यह प्रथम घटना थी।




इस महान साहसिक कार्य के लिए नैन खाप ने उन्हें सवा शेर की उपाधि दी व पगड़ी भेंट की।उसके बाद तो हरफूल ने ऐसी कोई जगह नहीं छोड़ी जहां उन्हें पता चला कि कसाईखाना है, वहीं जाकर धावा बोल देते थे।

उन्होंने जींद, नरवाना, गौहाना, रोहतक आदि में 17 गौहत्थे तोड़े। उनका नाम पूरे उत्तर भारत में फैल गया। कसाई उनके नाम से ही थर्राने लगे । उनके आने की खबर सुनकर ही कसाई सब छोड़कर भाग जाते थे। मुसलमान और अंग्रेजों का कसाईवाड़े का धंधा चौपट हो गया।
इसलिए अंग्रेज पुलिस उनके पीछे लग गयी। मगर हरफूल कभी हाथ न आये। कोई अग्रेजों को उनका पता बताने को तैयार नहीं हुआ।
वीर हरफूल उस समय चलती फिरती कोर्ट के नाम से भी मशहूर थे। जहाँ भी गरीब या औरत के साथ अन्याय होता था वे वहीं उसे न्याय दिलाने पहुंच जाते थे। उनके न्याय के भी बहुत से किस्से प्रचलित हैं

अंग्रेजों ने हरफूल को सोते हुए गिरफ्तार कर लिया। कुछ दिन जींद जेल में रखा लेकिन उन्हें छुड़वाने के लिये हिन्दुओं ने जेल में सुरंग बनाकर सेंध लगाने की कोशिश की और विद्रोह कर दिया। इसलिये अंग्रेजों ने उन्हें फिरोजपुर जेल में चुपके से ट्रांसफर कर दिया।

बाद में 27 जुलाई 1936 को चुपके से पंजाब की फिरोजपुर जेल में अंग्रेजों ने उन्हें रात को फांसी दे दी। उन्होंने विद्रोह के डर से इस बात को लोगों के सामने स्पष्ट नहीं किया। उनके पार्थिव शरीर को भी हिन्दुओं को नहीं दिया गया। उनके शरीर को सतलुज नदी में बहा दिया गया।

गौरक्षक, गरीबों के मसीहा, उत्तर भारत के रॉबिनहुड कहे जाने वाले वीर हरफूल सिंह ने अपना सर्वस्व गौमाता की सेवा में कुर्बान कर दिया।
मगर बहुत कम लोग आज उनके बारे में जानते हैं। कई गौरक्षक संगठन भी उनको याद नहीं करते। गौशालाओं में भी गौमाता के इस लाल की मूर्तियां नहीं हैं।

सोमवार, 12 जून 2023

Why India that is #Bharat and Bharat that is #India???


द्वितीय विश्वयुद्ध ने ब्रिटेन की हालत खस्ता कर दी, ब्रिटेन का हर बड़ा शहर जर्मनी की बम-बारी से तहस-नहस हो चूका था। उस पर भारत से प्रतिदिन तोड़फोड़, सत्याग्रह, हड़ताल, बगावत की खबरों ने ब्रिटेन को भारत में अपना राज चलना बद से बदतर लगता जा रहा था। हिंदुस्तान में होने वाली सारी तोड़फोड़, सारे आंदोलन, सत्याग्रह पूरी तरह से अनियंत्रित हो कर जनता के हाथ में थे।
बरेली, कानपूर और भी कितने शहर ऐसे थे जिनसे ब्रिटिश सरकार का पूरी तरह से नियंत्रण ख़त्म हो चूका था। जहाँ पहले भारत से करोडो की आय होती थी वही अब भारत में रह रहे अधिकारियो और सेनाओ का खर्च ब्रिटेन को उठाना पड़ रहा था वह भी उस समय जब उसके खुद के लोग भुखमरी की हालात में थे, इन सब कारणों ने ना चाहते हुए भी ब्रिटिश सरकार को भारत को आज़ाद करने का निर्णय लेना पड़ा।


ब्रिटेन में चर्चिल की #Conservative_Party चुनाव हार चुकी थी और #लेबर पार्टी की सरकार थी। 1945 को क्लेमेंट एटली ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने और भारत को आज़ाद करने का निर्णय लिया। जब यह निर्णय तत्कालीन वॉयसरॉय लार्ड वेवेल को बताया गया तो उन्होंने अपनी सेवा-निवर्त्ती की अर्जी इंग्लॅण्ड भेज दी। वह और उनके जैसे और भी कई ब्रिटिश अधिकारी थे जो नहीं चाहते थे की भारत को आज़ाद करने का कलंक उन्हें लगे। बहुत सोच विचार के बाद लार्ड माउंटबेटन का नाम पर मुहर लगी। भारत आने से पहले माउंबेटन बर्मा में भी वॉयसरॉय रह चुके थे। चर्चिल भारत की आज़ादी के खिलाफ थे और उन्होंने माउंटबेटन को राय दी की जितना भी हो सके माउंटबेटन भारत की आज़ादी को टालते रहे और आखिर में अगर भारत को आज़ाद करने का निर्णय लेना ही पड़े तो भारत तो कई टुकड़ो में बाट दे।
चर्चिल का मानना था की एक अखंड भारत के बदले के कई टुकड़ो के बटा भारत हमेशा ब्रिटेन पर आश्रीत रहेगा और इससे आगे चल कर ब्रिटेन को ही फायदा पहुचेगा। ब्रिटेन यही पालिसी #South_Africa में भी आजमा रहा था और दक्षिण अफ्रीका को छोटे-छोटे देशो में बाट भी रहा था।


अमेरिका भी ब्रिटेन पर, भारत को आजाद करने के लिए जोर दे रहा था, उसे पता था अब साम्राज्यवाद के दिन लड़ गए और आने वाले दिन बाज़ारवाद के है और भारत को एक बहुत बड़ा बाजार है
भारत को आज़ाद करने के लिए ब्रिटिश संसद में #India_Independence_Act बनाया गया। ब्रिटेन की सरकार से भारत को जल्द से जल्द आज़ाद करने का लिखित आदेश लेकर 22/मार्च/1947 को भारत के आखरी माउंटबेटन भारत पहूचे। उनके पहुचने से पहले ही कांग्रेस के सभी लीडर आज़ाद कर दिए गए थे। भारत को आज़ाद करना है यह निर्णय तो हो गया था लेकिन अब माउंटबैटेन को यह निर्णय लेना था की आज़ाद करने के बाद सत्ता किसे सौपनी है, यह ठीक है की उन के सामने आठ-दस कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेता भी थे लेकिन यह कैसे पता चले की यही भारत की जनता की नुमाईंदगी करने वाले असली नेता है। यह भी प्रश्न था की किस पार्टी को भारत में कितना जन-समर्थन हासिल है ? इन सब प्रश्नों का उत्तर एक ही था और वह था भारत के पहले आम चुनाव।

आम चुनाव का निर्णय होते ही सारी पार्टीयाँ पूरे दम-खम से चुनाव जीतने के लिए मैदान में उतर गयी। ब्रिटिश सरकार के कब्जे में जितनी जमीन थी उस पर आम चुनाव की घोषणा की गयी। भारत के राजे-राजवाडो को इस चुनाव से अलग रखा गया। भारत में उस समय आम चुनाव करवाना इतना आसान भी नहीं था। अब यह कैसे तय हो की कौन वोट देगा ? उस समय तक कोई लिस्ट, कोई आधारकार्ड, कोई वोटरकार्ड तो था नहीं जिससे पता चलता की कौन असली हक़दार है वोट देने का।
फिर क़ानून बनाया गया की आम चुनाव में सिर्फ वही वोट दे सकता था जिसके पास थोड़ी सी भी जमीन हो, या वह जो सरकारी नौकरी में हो, या जिस व्यक्ति के पास घर, दुकान या कोई भी अचल संपत्ति हो। घर अगर बूढ़े बाप के नाम है तो सिर्फ बाप और माँ ही वोट दे सकते थे उनके बालिग बेटे बेटियां नहीं। चुनाव में जहा कांग्रेस अखंड और धर्मनिरपेक्ष भारत की मांग के साथ उतरी वही मुस्लिम लीग पाकिस्तान के सपने के साथ। मुसलमानो का अपना सपनो का देश, खुदा की जन्नत, और जिन्ना खुदा के पैगम्बर। भारत के मुसलमानो को यह ख्वाब दिखाया गया की अंग्रेजो के जाते ही पाकिस्तान में उनका ही शासन होगा। लाहौर से लेकर, हैदराबाद तक और गुजरात से लेकर आज के बांग्लादेश तक हर मुस्लिम को लगता था की उसके घर, उसकी दूकान या उसके खेत के पास ही बनेगा पाकिस्तान।

कॉग्रेस अगर इस चुनाव में सही तरीके से प्रचार करती और मुसलमानो को समझाती की पाकिस्तान बनते ही उन्हें अपना घर-दूकान-खेत सब छोड़ कर हिमालय की तलहटी में, अफगानिस्तान ने पास जा कर बसना पड़ेगा तो नहीं लगता की मुसलमान कभी भी मुस्लिम लीग या पकिस्तान का नाम भी अपने मुँह से निकालते। कौन ऐसा मूर्ख होगा जो बसा-बसाया घरबार, खेत, दूकान छोड़ कर हजारो किलोमीटर दूर एक अनजान जगह पर, शरणार्थी बन कर जाना चाहेगा ?
लेकिन कई मुसलमानो को लगता था की बंगाल से लेकर लाहौर तक का सारा प्रदेश जिसमे उड़ीसा, दिल्ली, हरीयाणा, पंजाब, उत्तर-प्रदेश और जम्मू-कश्मीर भी शामिल है सारा का सारा पकिस्तान बनने वाला है। दिल्ली तो जरूर ही पकिस्तान में आने वाली है क्योकि दिल्ली को तो बसाया ही मुसलमान बादशाहो ने था।

वही हिदुओ को लगता था की हड्डपा और #मोहनजोदड़ो जो की सिंधु सभ्यता के प्राचीन शहर थे वह तो जरूर ही हिंदुस्तान को मिलेंगे। चुनाव में जहाँ कांग्रेस बहुमत में जीती वही 20 % सीटे मुस्लिम लीग के हाथ भी लगी और इसी 20% की मुस्लिम लीग जीत ने देश के बटवारे पर मुहर लगा दी।

फिर आया माउंटबेटेन का दो राष्ट्र सिद्धात #Two_Nations_Theory जिसके तहत दो राष्ट्रों का निर्माण होना था भारत- पाकिस्तान और तीसरा पक्ष था राजो-महाराजो का जिन्हें छूट थी की वह चाहे तो किसी भी देश से मिल सकते थे या पूर्ण तरह से आज़ाद भी रह सकते थे। जाहिर ही था की कई राजवाड़े आजाद ही रहने का मन बना रहे थे और चर्चिल की हिंदुस्तान को टुकड़ो-टुकड़ो में बाटने की योजना का हिस्सा बनने वाले थे। फिर शुरू हुई सरदार वल्लभ भाई पटेल की 570 राजाओ को हिंदुस्तान में मिलाने की भागीरथी मुहिम। हैद्राबाद और जूनागढ़ के निजाम जैसे कुछ राजाओ का राज जहा हजारो किलोमीटर तक फैला था वही कुछ राजा सिर्फ 5 किलोमीटर तक फैले राज्य के मालिक थे। सरदार पटेल ने साम-दाम-दंड-भेद सभी तरीके अपनाये और धीरे-धीरे, कश्मीर को छोड़ कर सभी रजवाड़ो का विलय भारत में करवा दिया।
बटवारा तय होते ही #जिन्ना ने एक और मांग रखी, जिसमे कहा गया की भारत या इंडिया नाम के देश को ख़त्म कर दिया जाये और उसके बदले में दो देश बने जिनका नाम #पाकिस्तान और #हिंदुस्तान रखा जाये जिसे नेहरू ने ख़ारिज कर दिया। नेहरूजी का तर्क था की भारत से अलग हो कर पाकिस्तान बनाया जा रहा है इसलिए सिर्फ पाकिस्तान का नाम ही पड़ेगा और जो पहले से है उसका नाम तो वही रहेगा, इसलिए जब भारत का संविधान लिखा गया तो उसमे विशेष तौर पर यह वाक्य जोड़ा गया - #India that is Bharat and #Bharat that is India यह पंक्तियाँ आज भी #संविधान में है। फिर अखंड भारत के खजाने को भी बाटा गया और पाकिस्तान के हिस्से में 55 करोड़ देने का निर्णय लिया गया। आज़ाद होते ही दो महीनो में पाकिस्तान ने कश्मीर कर हमला कर दिया और इसी कारण यह 55 करोड़ भारत ने पाकिस्तान को कभी नहीं दिए। सेना को बाटा गया, मुसलमान सिपाहियों को उनकी पसंद के किसी भी देश की सेना में जाने की इजाजत दी गयी। जिन्ना ने आज़ाद भारत की सरकार पर भरोसा करने से मना कर दिया और मांग रखी की पकिस्तान को भारत से एक दिन पहले आज़ाद किया जाये जिसे माउंटबेटन ने मान लिया।

यह सब निर्णय होने तक भी भारत और पाकिस्तान की आज़ादी की तारीख अभी भी तय नहीं थी और दोनों तरफ के नेताओ को लगता था की शायद आज़ादी 1948 के जुलाई या अगस्त तक मिलेगी लेकिन लार्ड माउंटबेटन ने खुद ही निर्णय लेते हुए 15-अगस्त-1947 की तारीख तय करदी। माउंटबेटेन 15 अगस्त को अपने लिए बहुत ही शुभ मानते थे क्योकि दो साल पहले 15-अगस्त-1945 के दिन ही #जापानी_आर्मी ने उनके सामने आत्म-सपर्पण किया था। जल्दबाजी में तय की गयी इस तारीख ने आगे चल कर लाखो लोगो की जान ली।


भारत भर के सारे ज्योतिषियों ने इस तारीख को भारत और पकिस्तान दोनों के लिए अशुभ बताया लेकिन माउंटबेटन का निर्णय नहीं बदला। फिर इंडलैंड से आर्किटेक्ट सर कीरिल रेडक्लिफ को बुलाया गया और दस साल पहले किये गए जनमत संग्रह के हिसाब से भारत के दो टुकड़े करते हुए #रेडक्लिफ लाइन खीच दी गयी। यह लाइन पूरी तरह से नक़्शे पर खिंची गयी और रेडक्लिफ ने जमीन पर जा कर देखा भी नहीं की #लाइन कहा से गुजरने वाली है। इस ये लाइन ने किसी का घर तो किसी का खेत सब बाट दिया किसी का घर भारत में रह गया तो खेत पाकिस्तान में चले गए। भारत और पाकिस्तान दोनों के आज़ाद होने तक किसी को नहीं पता था की यह लाइन कहा से गुजरने वाली है।


रेडक्लिफ लाइन से ही भारत और पाकिस्तान की सीमाओं का पता चला और फिर शुरू हुआ दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का स्थानांतरण। अनुमानतः करीब पांच करोड़ लोगो का पलायन हुआ था,लगभग 10 लाख लोग मरे और करोडो बेघर हो गए। शरणार्थीयों की बाढ़ आ गयी भारत में एक शरणार्थी विस्थापन केंद्र बनाया गया जिसे पंजाब, दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता, मद्रास जैसे सभी बड़े-बड़े महानगरो में शरणार्थियों को बसाया। मुम्बई का उल्लासनगर, या गुजरात का गांधीनगर इन शरणार्थियों के लिए ही बसाया गया था, शरणार्थियों को लक्षदीप और अंडमान-निकोबार तक बसाया गया।
खैर आज भारत कहा है और आजादी के पहले लाहौर को हिंदुस्तान का पेरिस कहा जाने वाला पकिस्तांन कहा ???

युगोस्लाविया - सोवियत संघ

  यदि आप कभी bosnia-herzegovina जाएंगे तब एक जगह आपको 9300 मुसलमानों की सामूहिक कब्र दिखेगी जहां उन सभी के नाम लिखे हैं दरअसल यह मुस्लिम कही...