रविवार, 9 जुलाई 2023

इमरजेंसी रपट- धीरेंद्र ब्रह्मचारी

 इमरजेंसी लागू हुए कई दिन बीत चुके है।

धीरेंद्र ब्रह्मचारी उर्फ़ धीरेंद्र चौधरी कांग्रेसी नेता ललित नारायण मिश्र के दूर के रिश्तेदार बताये जाते है। वो जो भी रहे हो बिहार के इस योग गुरु ने चच्चा साहब पर ऐसा जादू चलाया कि चच्चा ने अपनी लड़की को योग सिखाने धीरेंद्र स्वामी को नियुक्त कर दिया। कैथरिन फ्रैंक और ख़ुशवंत सिंह ने इन योग सेशन के बारे में बड़ा चटपटा लिखा है- योगशास्त्र से कामशास्त्र तक का सफ़र आदि आदि। लेकिन ऐसी गॉसिप्स एक आम मुहल्ले की चुग़लखोर औरतों की बातो के बराबर है। लेकिन जो भी हो- धीरेंद्र ब्रह्मचारी और प्रियदर्शिनी का एक लंबा अटूट रिश्ता इमरजेंसी से पूर्व रहा था।
ब्रह्मचारी के अनेक आश्रम थे- दिल्ली और जम्मू में प्रमुख। सरकारी ज़मीन पर बने ये आश्रम, ख़ास तौर पर जम्मू वाला रक्षा मंत्रालय के आपत्ति करने के बाद भी बना था। पचास एकड़ का बना ये आश्रम आधुनिक सुविधाओं से लैस था और इस में एक प्राइवेट हवाई पट्टी भी थी। ब्रह्मचारी भारत के पहले ऐसे अनोखे आदमी थे जिन्होंने हाईस्कूल भी पास ना किया था किंतु पायलट या फ्लाइंग सर्टिफिकेट हासिल कर लिया था। उन दिनों फ्लाइंग सर्टिफिकेट हासिल करना एक फैशन रहा होगा- राजीव संजय और ब्रह्मचारी - तीनों के धोरे ये था।
the फ्लाइंग स्वामी के नाम से मशहूर धीरेंद्र ब्रह्मचारी अक्सर फ्लाइट में पाये जाते थे- अंतरराष्ट्रीय उड़ाने भरते हुए। सरकारी विमानों का भी खूब प्रयोग धीरेंद्र स्वामी ने किया। ये भी आधिकारिक रिकॉर्ड है कि धीरेंद्र स्वामी को रेलवे मंत्री केदार पांडेय ने प्रथम श्रेणी पास भी खूब दिये थे। इन स्वामी जी का इतना जलवा था कि लोग इनसे मिलने आते ताकि इंदिरा और संजय का अपॉइंटमेंट दिलवा सके। स्वामी ना हुए गोया प्राइवेट सेक्रेटरी हो गये।
जिस भी राज्य में धीरेंद्र स्वामी जाते वो राज्य के मेहमान होते। दिल्ली के उपराज्यपाल तक को इन से ऑर्डर लेते हुए देखा गया। धीरेंद्र स्वामी के नाम इमरजेंसी में यूँ तो अनेक कारनामे दर्ज है किंतु दो मुख्य है। पहला - स्वामी ने प्राइवेट हवाई जहाज़ अमेरिका से नगद डॉलर दे ख़रीदा और भारत बिना ड्यूटी दिये लाये- वो भी उस ज़माने में जब अमेरिकी जूते और घड़ियों पर अंधाधुंध ड्यूटी लगती थी। दूसरा - स्वामी ने दिल्ली और कई अनेक जगह आश्रम बनाने के लिए हड़पी और शोषित लोगों को आज तक न्याय ना मिला।



जब इमरजेंसी के बाद देसाई सरकार बनी तो स्वामी का ये सफ़ेद और नीला वाला जहाज़ ज़ब्त कर लिया गया। हालाँकि दो ढाई साल बाद इंदिरा सरकार की वापसी पर ये हवाई जहाज़ स्वामी को वापस दे दिया गया। शाह कमीशन ने स्वामी से बहुत जाँच पड़ताल की। उनके हवाई जहाज़ के लॉग देखे तो पाया- दो सौ से ऊपर उड़ानों में से सवा सौ उड़ान केवल संजय और राजीव के नाम थी। बीस उड़ान राय बरेली तक थी। चीफ कंट्रोलर ऑफ़ इंपोर्ट के आधिकारिक बयान के मुताबिक़ इस जहाज़ ने इंपोर्ट करने में भी अनेक अनियमितता बरती थी। कुछ और चार्जेस जैसे मर्सिडीज़ कार को लाना , ब्यूरोक्रेट लोगो का तबादला करवाना और पैसे का ग़बन भी स्वामी के नाम पर थे।ख़ैर- इन सब रिपोर्ट्स या चार्ज का हुआ कुछ नहीं।
संजय गांधी के अंतिम संस्कार में स्वामी जी राजीव को निर्देश देते साफ़ दिखे थे। अंतिम चरणों में इनकी इंदिरा से कुछ अनबन हुई। ये भी एक अजीब इत्तिफ़ाक़ है स्वामी की मृत्यु भी एक हवाई दुर्घटना में हुई। मथाई ने भी इन स्वामी के बारे में बड़ा अजीब लिखा और बोला है।
असली सरकारी योग गुरु तो धीरेंद्र ब्रह्मचारी थे- बाबा रामदेव तो ख़ामख़ा बदनाम है।
खुलासे तो और भी अनेक है - किंतु इतना लंबा पढ़ेगा कौन।


इमरजेंसी लागू हुए कई दिन बीत चुके है। अब आप खुदाई रिपोर्टर की एक विशेष रपट पढ़िए। इस रपट के मुख्य किरदार है श्री नारायण दत्त तिवारी ।
इमरजेंसी लागू होने पर श्री हेमवती बहुगुणा जी मुख्य मंत्री थे जिन्होंने प्रियदर्शिनी की दो बातें मानने से इंकार कर दिया था। पहली- राज्य चलाने के लिए हर बात की इजाज़त हाई कमान से नहीं लूँगा और दूसरी संजय गांधी का उत्तर प्रदेश का टूर गाइड नहीं बनूँगा। इसके चलते बहुगुणा जी को बर्खास्त कर तिवारी जी मुख्य मंत्री नियुक्त किया गया। तिवारी जी बखूबी जानते थे कि गाय से मेल गाँठने के लिए बछड़े को दोस्त बनाना ज़रूरी है।
यूँ तो श्री तिवारी जी के रसिकता के ढेरों क़िस्से मशहूर है चाहे हैदराबाद में राज्यपाल हाउस में दो तीन कन्याओं के संग एक साथ टिरगितमूठ खेलने का मुआमला हो या फिर चालीस वर्षीय लड़का अचानक पैदा करने का । अब परिप्रेक्ष्य इमरजेंसी का है तो बात केवल तिवारी जी और इमरजेंसी की होगी।
तिवारी जी ने संजय की हर माँग पर कहा होगा- दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए। संजय के चमचे कहे जाने पर तिवारी जी खुश हो हामी भरते थे। यूपी में हुई एक सभा में तो खुलेआम संजय की चप्पल बाक़ायदा तिवारी जी ने खड़ाऊँ की तरह उठाई और ज़माने की परवाह तक ना की। इतने औरतों के रहते हुए तिवारी जी का एक आदमी भी था- ऐसे प्राणी वे भारत में इकलौते रहे होंगे।
इमरजेंसी में दौरान एक बार संजय और तिवारी जी हवाई जहाज़ में उड़ान भर रहे थे कि संजय ने उस समय के गाँव देखे जहां आज नोएडा है। ख़ुराफ़ाती दिमाग़ में आईडिया आया कि इस जगह इंडस्ट्रियल एरिया बनाना चाहिये। बस तिवारी जी को हुकुम दिया और नोएडा की नींव पड़ी। सरकार की जल्दी कितनी थी, इसे इससे समझा जा सकता है कि उस वक्त इस शहर के गठन के लिए सरकार ने लैंड एक्वेजिशन लॉ यानि की भूमि अधिग्रहण कानून के अर्जेंसी क्लॉज को यहां पर लागू कर दिया था। शुरुआती तौर पर गाजियाबाद और बुलंदशहर के तमाम हिस्से अधिग्रहण किए जाने लगे। आज जिस हिस्से में नोएडा का सेक्टर 12/22 और लेबर चौक हैं, वहां के इलाके अधिग्रहण की सूची में सबसे पहले आए। चौड़ा रघुनाथपुर, निठारी समेत तमाम हिस्सों का अधिग्रहण शुरू हुआ और सरकार पर कई इलाकों में जबरन जमीन कब्जाने के आरोप भी लगे। किसानों का कहना था कि सरकार ने उनसे जो जमीन ली उसके लिए प्रतिगज 3-4 रुपये का रेट दिया गया। इन फैसलों का विरोध भी शुरू हुआ और कई किसानों ने जमीन देने और मुआवजा लेने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट तक इसकी लड़ाई भी लड़ी। लेकिन हुआ कुछ नहीं।
न्यू दिल्ली तिवारी के नाम से मशहूर हुए तिवारी जी अक्सर दिल्ली में ही पाये जाते थे। दो मई १९७६ को श्री तिवारी और संजय यूपी के अनेक अधिकारियों के साथ दिल्ली से आगरा गये। रास्ते में आइटीडीसी के रेस्ता में रुके। बदहाली देख संजय ने हुकुम सुनाया इस जगह के बराबर की जगह का अधिग्रहण कर इसका विकास किया जाये और डेडलाइन दी ३० जून १९७६ तक की। हुकुम की तामील हुई और दो महीने में इस का उद्घाटन हुआ। इस मुआमाले पर बड़ा हल्ला मचा और शाह कमीशन ने बाक़ायदा इस मामले पर तिवारी की तलबी की। उस दिन के कुछ डायलॉग सुनिए-
आयोग- क्या आप उस दिन संजय गांधी के साथ गये थे?
तिवारी- नहीं सर, संजय गांधी मेरे साथ गये थे।
आयोग- संजय की क्या आधिकारिक हैसियत थी आदेश देने की?
तिवारी- वे भारत के युवावर्ग के प्रतिनिधि थे।
खुल्लम खुला तिवारी जी ने आयोग को ठेंगा दिखाया और संजय के हर आदेश को जस्टिफाई किया।
तिवारी जी एक सच्चे वफ़ादार कांग्रेसी नेता थे- आजकल के चिंटू पिंटू कांग्रेसी नेता तो ख़ामख़ा बदनाम है।
ना नर है और ना नारी है
ये एनडी तिवारी है।

संजय गांधी के लंगोटिया यार श्री नाथ जी किसी परिचय के मोहताज नहीं है। दून स्कूल में संजय और नाथ एक साथ पढ़े- पढ़े क्या एक साथ फेल हुए थे। अमीर व्यापारी पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले नाथ है तो कानपुरिया किंतु बंगाल में भी अनेक धंधे चलते थे। वैसे तो नाथ जी के सर पर अनेक कांड का दाग है ख़ास तौर पर ८४ का दंगा -लेकिन चूँकि परिप्रेक्ष्य इमरजेंसी का है तो केवल इसी मुद्दे पर रहेंगे।
आपातकाल लगने के समय लोटस जी यूथ कांग्रेस में थे। आपातकाल लगाने में प्रियदर्शिनी के क़ानूनी सलाहकार और वकील थे बंगाल के मुख्य मंत्री सिद्धार्थ शंकर रे। रे साहब उस ज़माने के कपिल सिब्बल रहे होंगे। रे की क़ानूनी सलाह और गाइडेंस पर ही इमरजेंसी लगी थी। लेकिन संजय को रे फूटी आँख ना सुहाते। इस “दुष्ट बंगाली वकील “ को सबक़ सिखाने संजय ने अपने ख़ास गुर्गे लोटस को बंगाल भेजा - उद्देश रे को टाइट लीश पर रखना और उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने की कोशिश करना।
बंगाल विद्युत बोर्ड की उस समय प्राथमिकता थी गाँव गाँव में बिजली पहुँचना। इसके चलते बोर्ड ईएमसी नामक कंपनी को बिजली के तार बिछाने और अन्य वस्तुओं के टेंडर देता था। इस कंपनी के एमडी थे कमल नाथ। छह करोड़ के टर्न ओवर से सीधे तीस करोड़ की टर्न ओवर पहुँचने वाली इस कंपनी पर अनेक इल्ज़ाम लगे- गड़बड़ घोटाले आदि के। १९७७ में रे सरकार ने एक कमीशन बनाया दत्ता कमीशन जो इस मामले की जाँच करता। लेकिन बहुत जल्दी रे सरकार गई और ज्योति बसु सरकार ने इस कमीशन को चलने दिया। दत्ता कमीशन की सुनवाई में जब संजय को बुलाया गया तो कमल नाथ ने हज़ार लोगों की भीड़ चुटकी बजाते ही खड़ी कर दी। जज दत्ता को तफ़तीश करना भारी पड़ गया। कमल नाथ ने अनेक बार कोशिश की कि बंगाल के मुख्य मंत्री गनी भाई बन जाये लेकिन रे ने भी घाट घाट का पानी पिया हुआ था।
दूसरा कांड कमल नाथ जी द्वारा इण्डियन एक्सप्रेस ग्रुप में हुआ। संजय और वीसी शुक्ल ने रामनाथ गोयेंका जी को बहुत परेशान किया अपना ग्रुप बेचने के लिये और उनके बोर्ड में कमल नाथ को बिठा दिया। इतनी पॉवर थी लोटस जी के पास कि वो कभी भी इण्डियन एक्सप्रेस की पॉवर सप्लाई रोक देते थे। इस इण्डियन एक्सप्रेस स्कैंडल की कहानी विस्तार से यहाँ बताना कठिन है। लेकिन एक बुजुर्ग आदमी को किस तरह परेशान किया गया- वो बेहद शर्मिंदगी वाला क़िस्सा है।
शाह कमीशन में भी श्री लोटस जी ने अपने मैनपॉवर और भीड़ मैनेजमेंट का भरपूर प्रयोग किया- सुनवाई की दौरान नारे लगवाने से लेके धमकियाँ देने तक। प्रेस में इनके उस ज़माने के बयान तानाशाही और बददिमाग़ी से पूर्ण थे। इंदिरा के दो हाथ- संजय गांधी और कमल नाथ- ये नारा तभी प्रचलन में आया और इसी नारे के चलते ८० में हुए छिन्दवाड़ा चुनाव में इंदिरा ने इन्हें अपना तीसरा लड़का बताया।
लोटस जी की संजय प्रेम की अनुभूति का इस बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि शाह कमीशन ने पाँच लोगों को इमरजेंसी का मुख्य ज़िम्मेदार बताया है और इन पंचों में एक श्री लोटस जी भी थे।
असली रंग तो इन्होंने उन दो वर्षों में दिखाया था- कुछ वर्ष पूर्व एमपी में किए कारनामों के लिए ये ख़ामख़ा बदनाम है।




संजय ने नसबंदी का प्रोग्राम सबसे पहले दिल्ली में लांच किया था - उस के बाद उन राज्यों में जहां कांग्रेस की सरकार थी। इस कार्यक्रम को लागू करवाने के लिए चार लोगो की टीम गठित की गयी -गवर्नर किशन चंद , नविन चावला , विद्याबेन शाह और रुखसाना सुल्ताना। सुल्ताना खुशवंत सिंह के भतीजे को तलाक दे चुकी थी - फिल्म लाइन से जुडी बेगम पारा की भतीजी थी। इत्र में नहायी , आँखों पर हमेशा धूप चश्मा चढ़ाये रुखसाना सुल्ताना संजय गाँधी की सबसे बड़ी फैन थी और वो किसी को भाव ना देती। सुल्ताना का काम एक बुटीक चलाना था और यही उसकी क्वालिफिकेशन थी। अमृता सिंह की माँ , सैफ की सास और सारा अली खान की नानी। बड़े बड़े नेता सुल्ताना के समक्ष मेमने नज़र आते थे। अब एक नज़र संजय गाँधी पर - सितम्बर 1976 , जब ये नसबंदी कार्यक्रम लांच हुआ था - उस समय संजय की आयु तीस थी - ना वो सांसद थे , ना किसी सरकारी नौकरी पर और ना कोई व्यापार - लेकिन ओहदा सबसे बड़ा। इतना बड़ा कि इंदिरा ने नसबंदी का काम संजय के हवाले कर दिया और किसी ने चू तक ना की।
सबसे पहले शुरुआत हुई दिल्ली की जामा मस्जिद के रिहाशी इलाको से , जहां विद्याबेन और सुल्ताना ने काम शुरू किया - कैंप लगाए - दोनों मरदाना और जनाना नसबंदी के। शुरू में किसी ने ध्यान ना दिया । सुल्ताना इत्र छिड़कती वहां की गलियों में घूमती और खवातीनो से दरख़्वास्त्र करती। पहले दिन १९ लोग , दुसरे दिन जीरो , तीसरे दिन तीन लोग कैंप में आये। संजय ने पैसा और वालंटियर बढ़ाये , खुद कैंप में बैठे तब भी २४ से ज्यादा लोग ना आये। अब तक प्रोग्राम स्वचछा से चल रहा था - कोई जोर जबरजस्ती नहीं थी। इनाम बढ़ाया गया -७५ रुपैये , एक टिन घी का और दो दिन की काम से छुट्टी। अब संजय ने dig पुलिस को बुलाया और लोगो को आने के किये कहा । ऊपर से सरकार ने भी १६ अप्रैल को आबादी दिवस घोषित कर दिया - सब कोंग्रेसी नेता इसी सुर में बयान देने लगे थे। अब इन सब के चलते रोज तीन सौ से ऊपर लोग कैंप में आने लगे थे। कुछ जगह ट्रांजिस्टर भी बाँट रहे थे ताकि ज्यादा लोग आये। अब ये प्रोग्राम up , mp , राजश्थान , बिहार , हरयाणा , ओरिसा , पंजाब , हिमाचल राज्यों में भी शुरू किया गया । दिल्ली का ट्रैक रिकॉर्ड ४१ प्रतिशत था और बाकी राज्य १६ प्रतिशत टारगेट पर चल रहे थे । संजय गाँधी खुद डेली सुबह रिपोर्ट लेते थे - टारगेट कितना मीट हुआ है । दिल्ली में उस एक साल में उतनी नसबंदी हो गयी जो पिछले दस साल में नहीं हुई थी। लेकिन अभी सैलाब आना बाकी था।
जब सब मुख्य मंत्री अपनी अपनी रिपोर्ट देते तो उन सबको आपस में तुलना करवा कर जलील किया जाता। इस तरह से हरियाणा - जहां बंसीलाल थे ने दमदार गति पकड़ी। राजस्थान भी पीछे ना था। अखबारों में साफ़ इंस्ट्रक्शन थे - कोई बुरी खबर ना छापी जाए। बल्कि बढ़िया खबर प्रिंट होती - कैसे अपनी ख़ुशी से लोग नसबंदी करवा रहे है - ऑस्ट्रेलियाई डॉक्टर की थीसिस छपती कि नसबंदी के बाद काम इच्छा और बढ़ जाती है आदि आदि। २ मौलवी के साथ भी संजय की फोटो छापी गयी जिन्होंने नसबंदी करवाई थी , ईसाई आर्चबिशप की भी अपील जारी हुई। अक्टूबर का महीना गजब का निकला - चाईबासा बिहार में एक डॉक्टर ने रिकॉर्ड ९२ नसबंदी करि एक दिन में ; गुजरात में दस हज़ार ऑपरेशन हुए पूरे महीने में ; भालकी कर्नाटक में बारह घंटे में दो हज़ार ऑपरेशन। आगरा में दो हज़ार भिखारियों को पकड़ा गया और १८०० को तुरंत ऑपरेट कर दिया गया एक दिन में ही। सुल्ताना ने दिल्ली में अलग ही कहर ढा रखा था - छह कैंप वो चला रही थी - सबसे ज्यादा कुख्यात था दोजना हाउस कैंप - जिसे कबाड़ी बाजार वाले स्पॉन्सर कर रहे थे। दोजोना हाउस कैंप रोज सुबह दस बजे खुलता , चाय पिलाई जाती , दोपहर खाना मिलता , पूरे दिन गाने बजते - आओ नसबंदी करवाए। इनाम में ट्रांजिस्टर , डालडा और घडिया बांटी जाती। इस कैंप में छह बिस्तर थे और डॉक्टर के टीम के हेड थे - डॉक्टर निरोध बनेर्जी। जी हां नाम सही पढ़ा आपने - निरोध ! इस दोजोना हाउस में ही सबसे ज्यादा बर्बरता हुई थी और इस कैंप को सँभालने के लिए राजस्थान के पेशेवर अपराधियों को जिम्मेदारी दी गयी थी।
सुल्ताना ने संजय के तमाम काण्डो में अपनी प्रजेंस दी थी- कोई काम ऐसा ना था जिस में ये ना हो। मर्दमार लेडी की अम्मा अपनी बेटी से कम ना थी। संजय के एक तरफ़ सोनी दूसरी तरफ़ सुल्ताना। देखने वालों को महात्मा गांधी याद आ जाते थे।
आपातकाल के कुछ चर्चित नारे ::
नसबंदी के तीन दलाल - इंदिरा ,संजय और बंसीलाल ;
संजय की मम्मी बड़ी निकम्मी ;
ज़मीन गयी चकबंदी में , मकान गया हदबंदी में , दरवज्जे पर खड़ी औरत चिल्लाये - मेरा मरद गया नसबंदी में !


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