रविवार, 9 जुलाई 2023

भारत में कम्प्यूटर 1955

 भारत में कम्प्यूटर 1955- पार्ट १


दुनिया को पहला कंप्यूटर 1940 के दशक में मिला था, लेकिन भारत ने पहली बार 1956 में कंप्यूटर खरीदा। तब इसकी कीमत ₹10 लाख थी। इसका नाम एच ec2m था। भारत के पहले कंप्यूटर को कोलकाता के इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट में लगाया गया। तब का कंप्यूटर अभी जैसा नहीं था, यह बहुत बड़ा कंप्यूटर था। आम लोगों के लिए भारत में कंप्यूटर बहुत बाद में शुरू हुआ

विश्व में दो नाम ऐसे है जो कम्प्यूटर के जनक के रूप में जाने जाते है- चार्ल्ज़ Babbage और ऐलन टूरिंग। दोनो ब्रिटिश नागरिक और दोनो ने कम्प्यूटर के क्षेत्र में pathbreaking काम किए थे । Babbage ने 1870 के जमाने में ही कम्प्यूटिंग मशीन बना दी थी हालाँकि उस डिज़ाइन में सुधार की काफ़ी गुंजाइश थी। ऐलन टूरिंग ने दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी के गुप्त कोड को डीकोड करने में जबरजसत कार्य किया था- कुछ ऐसा काम जिसने द्वारा इंग्लैंड हारा हुआ युद्ध जीत गया। आप सोचेंगे आज़ाद भारत के संदर्भ में ये बातें क्यूँ? उत्तर है - इन दोनो का कार्य का वर्ष देखें- हमारी आज़ादी से कई साल पहले ही कम्प्यूटिंग मशीन और मॉडर्न कम्प्यूटर की नींव रखी जा चुकी थी और हम उस समय कहाँ थे?
इस आलेख में कोशिश करूँगा कि कम्प्यूटर का इतिहास बहुत छोटे रूप में कवर करूँ। आज़ाद भारत में कम्प्यूटर का इतिहास चार कालखंड में विभाजित है-
1955 -1977 तक
1978 -1991 तक
1991 - 1998 तक
1998 - अब तक
ये साल याद रखने वाले है और इन वर्ष कालों में किन किन की सरकार थी- बताने की ज़रूरत नहीं है।
भारत के आज़ाद होने से पहले दो institute ऐसे स्थापित हुए थे जिन्होंने कम्प्यूटर की रूपरेखा डाली थी- Indian इन्स्टिटूट ओफ़ स्टटिस्टिक्स कलकत्ता में 1931 - नींव रखी थी बंगाली भद्रजन प्रशांत चंद्रा मलंबोईस ने । दूसरा था - टाटा इन्स्टिटूट ओफ़ फ़ंडमेंटल रीसर्च बम्बई में 1945 में - डॉक्टर होमी भाभा ने। ये दो दिग्गज ही आज़ाद भारत में कम्प्यूटर क्रांति के जनक कहलाए जाने चाहिए । आज़ादी के पहले तीस साल तक 1977 जो पहला खंड है - उसमें कांग्रिस सरकार थी और मुख्य नेहरू की नीतिया थी। इस समय भारत में कम्प्यूटर के नाम पर इकलौती कम्पनी ibm थी जो पुराने outdated कम्प्यूटर बेचती थी भारत सरकार को - लाखों डॉलर के।
अगली किश्तों में - बाक़ी तीन खंड में क्या क्या हुआ वो पढ़िए।
जारी है !क्रमशः!
अंत में- जो आमजन के पर्सेप्शन में है कम्प्यूटर के बारे में भ्रांति- हक़ीक़त में वैसा कुछ नहीं हुआ था। ये कम्प्यूटर गाथा भारत के इतिहास का वो धीमे चलने वाला कछुआ था जिसने रफ़्तार पकड़ी 1998 के बाद। आप गेस कीजिए कौन था वो भारतीय नेता जिसने भारत को कम्प्यूटर का अगला बादशाह होने की भविष्यवाणी की थी




सर्वप्रथम ये स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए कि भारत में कंप्यूटर युग की इतनी लेट शुरुआत दो कारणों से हुई थी - सत्ता आसीन सरकारों का रव्वैया और सरकारी पालिसी जिसको सरकारी अफसरों ने मनमाफिक तरीके से देश में लागू किया था। भारत में कंप्यूटर युग की शुरुआत 1955 में हुई थी जब इंडियन इन्स्टिटूट ओफ़ स्टटिस्टिक्स कलकत्ता में पहला कंप्यूटर - HEC 2M लगाया गया था - कंप्यूटर के हिस्से इंग्लैंड से लाये गए थे और दो लोग वहां ट्रेनिंग लेकर आये थे। उस समय तक पूरे देश में बमुश्किल पचीस लोग कंप्यूटर का ज्ञान रखते थे और ज्यादातर ये लोग साइंटिस्ट थे। इसी दौरान बम्बई वाले इंस्टिट्यूट में कंप्यूटर बनाने की कवायद चालु हो चुकी थी अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी के द्वारा। 1960 में ये कंप्यूटर बन कर तैयार हो चूका था हालांकि बहुत विशाल था और बहुत लिमिटेड capability थी। कलकत्ता वाले इंस्टिट्यूट वाला कंप्यूटर उतना इफेक्टिव नहीं था और पी चंद्र साहब ने दूसरा कंप्यूटर लगवाया रूस के engineers द्वारा। ये भी जान लेना जरुरी है पी चंद्र और डॉक्टर भाभा नेहरू के ख़ास सलाहकार थे और प्लानिंग कमिशन के सदस्य भी। अब इस रुस्सियन कंप्यूटर के सब मैन्युअल रुसी भाषा में थे तो हमारे साइंटिस्ट और इंजीनियर को सबसे पहले रूसी भाषा सीखनी पड़ी। आज़ाद भारत का कलकत्ता का इंस्टिट्यूट एकलौता संसथान था जिसपर देश के सब यूनिवर्सिटी , रक्षण रिसर्च और एटॉमिक एनर्जी डिपेंड करते थे।
घोंघे की स्पीड से हमारा कंप्यूटर प्रोग्राम आगे बढ़ रहा था और 1963 में डॉक्टर भाभा ने बाद मुश्किल से सरकार से डेढ़ मिलियन डॉलर का एक कंप्यूटर CDC खरीदवाया। ये उस समय का सबसे बढ़िया कंप्यूटर था और अगले एक दशक तक इस कंप्यूटर को जमकर इस्तेमाल किया गया। अब आप सोच रहे होंगे IIT में कंप्यूटर साइंस कब आया पहली बार - वो आया 1963 में पूरे देश में पहली बार IIT कानपूर में जब IBM का एक कंप्यूटर वहां लगाया गया और कंप्यूटर पढ़ाना शुरू हुआ आज़ाद भारत में। इसके बाद हर पांच वर्षीय योजना में टेक्नीकल पढाई पर जोर दिया गया और लगभग बीस कॉलेज में कंप्यूटर की पढाई शुरू हो गयी। इस समय ibm का दबदबा था और ये कंपनी देश में कंप्यूटर नहीं बनाती थी - ये केवल इनस्टॉल करती और मेन्टेन करती। आगे आगे इसने आउटडेटिड कंप्यूटर ऊँचे दामों पर बेचने प्रारम्भ कर दिए। ibm ने जो 1400 सीरीज के कंप्यूटर देश में बेचे , उसपर एक लम्बी कहानी है कि किस प्रकार सरकारी पालिसी को तोडा मरोड़ा गया और वो सब हुआ जो नहीं होना चाहिए था 1970 तक ibm ने लगभग 80 कंप्यूटर 1400 सीरीज के इनस्टॉल किये थे - साढ़े आठ लाख रुपये प्रति वर्ष की लागत पर। ध्यान देने वाली बात थी इस समय ये वाले कंप्यूटर अमेरिका में फेज आउट हो चुके थे। ibm की प्रतिद्वंदी कंपनी थी ब्रिटिश कंपनी आईसीएल जो पचास के आसपास कंप्यूटर इनस्टॉल कर चुकी थी। अब मजेदार बात ये थी ये कंप्यूटर सालाना खर्चे पर थे - लीज की तरह। मतलब हमारी कोई पालिसी नहीं थी कंप्यूटर खरीदने की। इस दशक में अनेको ट्रेड यूनियन , अनेको नेताओ ने कंप्यूटर पर अनगिनत सवाल उठाये। कहा - ये हमारे मजदूरों का , हमारे वर्कर का गला काट देगा - देश से कंप्यूटर भगाओ आदि आदि।




1966 में भारतीय मुद्रा रुपये का बड़ा devaluation हुआ - साढ़े चार रुपये प्रति डॉलर से साढ़े सात रुपये प्रति डॉलर । ibm की चाँदी हो गयी क्यूंकि उनकी सब कॉस्ट डॉलर में थी - रुपये में नहीं। 1970 में सरकार को थोड़ा होश आया और डिपार्टमेंट ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक्स बना - मकसद था ibm से निर्भरता हटाना। ibm से कई कोशिश हुई कि वो मेक इन इंडिया करे - लोकल कंपनी के साथ काम करे लेकिन ibm ने इंकार कर दिया। ibm का इन पुराने रिटायर्ड कंप्यूटर जो अमेरिका में कोई कौड़ी के भाव ना ले - भारत में बढ़िया मार्किट था - रेलवे तक ने इन प्राचीन कंप्यूटर को काम में लेना शुरू कर दिया -एकाउंटिंग , माल भाड़े के रूप में। डिपार्टमेंट ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक्स इस समय कोशिश में लगा था कि किसी तरह भारत में ही छोटे कंप्यूटर बनने लगे - लेकिन अभी दिल्ली बहुत दूर थी। इन सब उथल पुथल में आपातकाल लगा और फिर जनता पार्टी पावर में आयी। ये था पहला काल खंड कंप्यूटर का।
नयी सरकार ने पावर में आते ही ibm का ठेका बंद किया और वो बोरी बिस्तर बांध कर भारत से निकल गए। CMC कंपनी ने ibm का मेंटेनेंस का काम ले लिया ; मिनी कंप्यूटर बनाने की पालिसी पब्लिक सेक्टर से हटा कर प्राइवेट सेक्टर में डाल दी। चार कंपनी ने unix बेस्ड मिनी कंप्यूटर बनाने भी शुरू कर दिए जिसमे एचसीएल प्रमुख थी। पाटनी कंप्यूटर कंपनी भी 1978 में बनी जिसमे नारायण मूर्ति काम करते थे। छोटे अंतराल में प्राइवेट सेक्टर में बहुत प्रोग्रेस हुई - tcs कंपनी जो 1968 में बनी थी - न्यू यॉर्क में भी पहुंच गयी। कुल मिलाकर सरकार की पालिसी बदलते ही वो होना शुरू हो गया जो पिछले तीस सालो में नहीं हुआ था।
MCA डिग्री की शुरुआत भी इसी समय हुई और टैली सॉफ्टवेयर सर्वप्रथम इसी समय आस्तित्व में आया। नोट करने वाली बात थी - एक अस्थिर सरकार के एक फैसले ने कंप्यूटर युग की दस्तक दे दी थी , इस सरकार ने कंप्यूटर से जुड़े सामान की ड्यूटी आदि भी काफी कम कर दी। 1981 में इनफ़ोसिस का जन्म हुआ और विप्रो ने 86 सीरीज के मिनी कंप्यूटर बना डाले। इसी दौरान संजय गाँधी की मृत्यु के बाद राजीव गाँधी सक्रिय राजनीती में आये और 1982 में हुए दिल्ली एशियाई गेम्स में राजीव गाँधी ने सब कार्य कंप्यूटरकृत करने का फैसला लिया - यहाँ DCM कंप्यूटर टर्मिनल बने और HP कंप्यूटर प्रयोग में लाये गए। नोट करने वाली बात थी - ये सब पिछले तीन सालों में हुआ था और ये पहला बड़ा सरकार का फैसला था जिसमें इस लेवल का कंप्यूटर का प्रयोग हुआ था। इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद राजीव गाँधी 1984 में प्रधान मंत्री बने और कंप्यूटर से जुडी सब सब आइटम्स को लिब्रलाइजेशन के तहत और सस्ता करने का फैसला लिया। यहाँ से रेलवे में रिजर्वेशन का काम कंप्यूटर से हुआ और दलाली से कुछ हद्द तक निजात मिली। धीरे धीरे बैंक में , सॉफ्टवेयर सर्विसेज आदि का काम बढ़ने लगा और सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट भारत की इकॉनमी में काफी प्रभाव डालने लगा था। 1991 तक ये था कंप्यूटर का दूसरा काल खंड।
कड़ी बड़ी होती जा रही है और इतिहास अभी भी बाकी है। सक्षेप में लिखना इतिहास के साथ अन्याय होगा।

अंत में - तो इस कड़ी से साफ़ है - कंप्यूटर आज़ाद भारत में 1955 से था और सबसे बड़ा ब्रेक पॉइंट था आपात काल के बाद : जहां से कंप्यूटर का लिब्रलाइजेशन शुरू हुआ था। राजीव गाँधी ने केवल उस लिब्रलाइजेशन की नींव पर अपनी छाप रखी और सरकारी उपक्रम में लागू किया - लेकिन वो तो कोई भी सरकार करती : आखिर कंप्यूटर उस स्टेज पर तब तक आ चुके थे। तो ये कहना कि एक आदमी भारत में कम्प्यूटर लाया- बाक़ी देश के साययंटिस्ट और एंजिनीर्ज़ आदि के साथ क्रूर मज़ाक़ होगा। राजीव गांधी ना तो कोई साइयन्सदान थे और ना सॉफ़्ट्वेर टेकी।
आखिरी कड़ी में बाकी दो काल खंड और आईटी का भारत बादशाह कैसे बना : वो पढ़िए !
एक नेता जी ने एक राज्य चुनाव में लैप्टॉप बाँटने का वादा किया था - उनके पिताजी एक जमाने में कम्प्यूटर के बहुत बड़े विरोधी थे। क्या आपको ज्ञात है वो नेता जी कौन है???????


आपने डिपार्टमेंट ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक्स के बारे में पढ़ा जो 1970 में स्थापित हुआ था। इस विभाग ने 1988 में एक सेण्टर बनाया पुणे में - CDAC - सेण्टर फॉर डेवलपमेंट ऑफ़ एडवांस कंप्यूटिंग। इस सेण्टर ने ऐसा कुछ बाद में कर दिखाया था जो विश्व में एक मिसाल थी।
अब तक आप ने 1991 तक कंप्यूटर के इतिहास के दो काल खंड के बारे में जाना। तीसरा काल खंड शुरू हुआ 1991 में जब भारत पर फॉरेन डेब्ट की समस्या आन पड़ी और श्री pv नरसिम्हा राव ने कार्यभार संभाला - श्री मनमोहन सिंह वित्त मंत्री के साथ। इसके साथ जब भारत ने अपने बाजार के द्वार दुनिया भर की कंपनी के लिए खोले तो स्वाभविक तौर पर सॉफ्टवेयर और कंप्यूटर इंडस्ट्री के लिए बहुत बड़ा मौका का द्वार भी खुल गया। इस समय नास्कॉम की स्थापना हुई और DoE ने देश भर में एसटीपी - सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क खोलने शुरू किये। इस दौर को भारतीय कम्पनीज ने जम कर भुनाया और भविष्य की बढ़िया नींव रखी। इस काल खंड में CMM और ISO क्वालिटी सर्टिफिकेट भी कंप्यूटर इंडस्ट्री में पैर जमा गया। खैर 1991 से 1998 का ये तीसरा काल बढ़िया था लेकिन अभी आईटी बूम आना बाकी था।
चौथा काल खंड शुरू हुआ अटल जी की सरकार में - 1998 में - जब अटल जी ने भारत को आईटी का भविष्य का राजा होने की भविष्यवाणी की और कितनी सटीक थी ये सोच। इस सरकार ने कुछ ऐसे कार्य किये जिस से भारत में कंप्यूटर और आईटी का काम अचानक से बूम कर गया - मसलन आईटी टास्क फाॅर्स का गठन ; अगले दस सालो के लिए आईटी कंपनी को काफी टैक्स रिबेट , इम्पोर्ट ड्यूटी बहुत कम कर देना , MNC को रिसर्च और डेवलपमेंट सेण्टर बनाने के लिए प्रोत्साहन आदि आदि। इस काल खंड में CDAC ने परम सुपर कंप्यूटर भी बना लिया था - इस परम सीरीज के सुपर कंप्यूटर आज भी भारत दुसरे देशो को बेचता है। आजकल परम ब्रह्मा और परम शिवाय सुपर कंप्यूटर ने अपना झंडा बुलंद किया है । अब तक परम सीरीज के 52 सुपर कंप्यूटर पूरी दुनिया में लग चुके है अलग अलग देशो में । कीमत बहुत कम होने के कारण ये काफी डिमांड में रहते है। परम सिद्धि AI का सुपर कंप्यूटर है जो शायद पिछले दो साल पहले इनस्टॉल हुआ है। 2010 भारतीय आईटी इंडस्ट्री ने दुनिया में अपना लोहा मनवा लिया था - कॉल सेण्टर की छवि से हटकर आईटी के हम वाकई में राजा बन चुके है।
आप सोच रहे होंगे - IBM जिसे 1978 में बोरिया बिस्तर बाँध कर जाना पड़ा था वो वापस कब आयी ? वो वापस आयी 1992 में टाटा ग्रुप का पार्टनर बनकर और आज भारत में ibm की वर्कफोर्स अमेरिका के बाद सबसे बड़ी है। आज सब बड़ी टेक कम्पनीज भारत में अपने उपक्रम खोले हुए है और दनादन लोगो को नौकरी दे रही है। मेरे पिता की पीढ़ी के लोग आज आईटी सेक्टर की सक्सेस देख कर काफी अचरज में आ जाते है - उनकी पीढ़ी ने सरकारी और प्राइवेट नौकरी की और इस दौर की आईटी नौकरी उसके मुकाबले बहुत अलग है। आज लगभग हर किसी के पास स्मार्ट फ़ोन , लैपटॉप कंप्यूटर होना भी आम बात हो चुकी है - बीस साल पहले ये सब सोचना भी एक सपना ही था , लेकिन सपने ही साकार होते है।
अंत में - कुछ प्रश्न है जिनका उत्तर आप पर छोड़ता हूँ ;
१ - आज़ादी से लेकर 1977 तक - क्या सबक सीखे कंप्यूटर को लेकर ?
२ - क्या भविष्य में हम यही ग्रोथ मेन्टेन कर पाएंगे ?
३ - क्या भारत कथिक ब्रेन ड्रेन रोकने के लिए कभी कोई कदम उठाएगा ?
४ - क्या केवल बी टेक करके हम आईटी वर्कफोर्स का निर्माण कर सकते है - क्या हम आईटी फील्ड से जुड़े पीएचडी और हाइली स्पेशलाइज्ड लोग बना पा रहे है ?
५ - सबसे जरुरी सवाल : क्या हम केवल टेक कुली बन कर रह जाएंगे ?
आज़ाद भारत के गुमनाम किस्से की चौथी कड़ी यही समाप्त होती है। अब इस शृंखला को कुछ समय के लिए रोकते है।
अपनी अमूल्य राय से अवगत जरूर करवाए ! धन्यवाद




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