शनिवार, 1 जुलाई 2023

#मारुती गाथा - 1968

                                     #मारुती गाथा - 1968 पार्ट 1

आज़ाद भारत के इतिहास में अनेको किस्से , केस ऐसे है जो लोगों को पता तो है लेकिन टुकड़ो में। पूरी तस्वीर ना एक जगह मिलती है और ना विकिपीडिया में भी सम्पूर्ण कहानी मिलती है । मारुती कार की गाथा को नए एंगल से पढ़िए। कृपया ये जान लीजिये - ये जानकारी जगह जगह बिखरी पड़ी है - मैंने केवल एक जगह संकलित किया है। हर बात को पहले परखा और केवल वही बात लिखी है - जिसकी पुष्टि हुई है। ये जानकारी भिन्न किताबों , पुराने अखबारों और आलेखों से जुटाई है। कहानी मारुती कार की शुरुआत की है , जब मारुती कार के जनक संजय गाँधी इंग्लैंड से रोल्स रॉयस की तीन साल की ट्रेनिंग दो साल में अधूरी छोड़ कर भारत आ गए थे। इस सन्दर्भ में संजीव से संजय वाली कहानी का कोई ऑथेंटिक सोर्स नहीं मिलता - हालाँकि इंग्लैंड में कार एक्सीडेंट वाली कहानी सच है। लेकिन मारुती के सन्दर्भ में ये बातें मायने नहीं रखती। 


वर्ष 1967में संजय ने गुलाबी बाग दिल्ली में एक लोकल मैकेनिक अर्जुन दास के साथ एक वर्कशॉप बनाया और वहां अपनी छोटी कार का प्रोटोटाइप बनाने की कोशिश करनी शुरू कर दी थी। वर्ष 1968 में संसद में एक बिल पास हुआ - फॅमिली कार भारत में बनाने का। हालाँकि ये विचार 1958 से ही चल रहा था लेकिन केवल विचाराधीन था। 1968 में फैसला हुआ था कि नयी कार - जो छोटी और अफोर्डेबल होगी , उसे प्राइवेट सेक्टर में ही बनाया जाएगा। 1960 से ये विचार चल रहा था और इस फॅमिली कार के लिए बाकायदा सरकार ने एक कमिटी का गठन किया था जो इस कार के विषय में फैसला दे। तो चुनांचे 1968 में संसद में वो दिन आ ही गया। भारत में इंदिरा गाँधी की कांग्रेस सरकार राज्य कर रही थी। इस छोटी कार की डिबेट या रेस में दो कंपनी अग्रिम थी - फ्रेंच कंपनी रीनॉल्ट और जापानी कंपनी टोयोटा। ये दोनों कम्पनीज बाकी विश्व में छोटी कार सफलता पूर्वक लांच कर चुकी थी और भारत में भी अपनी फैक्ट्री डालने के लिए तैयार थी। 


नवंबर 1968 में लोक सभा में मंत्री रघुनाथ रेड्डी ने एलान किया कि फॅमिली कार के लिए कुल 14प्रपोजल है जिसमें थी - रीनॉल्ट , वॉल्सवेगों , सिट्रोएन , मोरिस , मज़्दा , टोयोटा आदि। रीनॉल्ट का आकंड़ा था लगभग बारह हज़ार की कार और टोयोटा का साढ़े छह हज़ार। दोनों कार एक साल के अंदर लांच करने के लिए तैयार थी। इन चौदह प्रपोजल में एक प्रपोजल प्राइम मिनिस्टर के सुपुत्र का था - उनकी कीमत -छह हज़ार, कार की अधिकतम स्पीड 53 मील प्रति घंटा ; 56 मील / गैलन का तेल खर्चा। संसद में हंगामा मच गया - जॉर्ज फर्नांडेस ने खुल कर परिवार वाद का आरोप लगाया ( इंदिरा गाँधी के पास इंडस्ट्री लाइसेंस देने का फाइनल अधिकार था ) ; राज नारायण ने लोकतंत्र और समाजवाद की तोहमत कहा ; ज्योतिरोय बासु ने भ्रस्टाचार , मधु लिमये ने भ्रष्टाचार का नंगा नाच कहा , अटल जी ने भी काफी कुछ कहा। दो साल तक ये प्रपोजल पेंडिंग पड़ा रहा। 1970 में आखिरकार इंदिरा गाँधी ने अपने आधिकारिक बयां में कहा - कछु कर लियो , कछु बोल लेयो , जे कार तो हमारो लल्ला ही बनाएगो !


तो जी साहब एक महीने में लेटर ऑफ़ इंटेंट इशू हो गया पचास हज़ार कार सालाना बनाने के किये। लेटर में लिखा गया - चूँकि किसी और ने इस टेंडर को भरा ही नहीं है तो ये टेंडर आपको दिया जाता है। एक मदन मोहन राव साहब थे जिन्होंने उन 14 प्रपोजल में एक खुद का भी डाला था - उन्होंने ने दिल्ली हाई कोर्ट में PIL डाली लेकिन कुछ समय बाद वो वापस ले ली और उसके बाद वो कभी दिखाई नहीं दिए। 


अब संजय गाँधी के समक्ष सबसे बड़ा चैलेंज था - फैक्ट्री के ज़मीन ; फैक्ट्री के लिए वर्किंग कैपिटल और सबसे जरुरी - कार के लिए इंजन का डिज़ाइन तैयार करना । मतलब भारत सरकार ने एक ऐसे आदमी को ये टेंडर दिए - जिसके पास ना फैक्ट्री थी , ना कंपनी थी और ना कार के इंजन का डिज़ाइन था । केवल एक ही चीज़ थी - माँ। फैक्ट्री के लिए जमीन का जुगाड़ किया हरयाणा के मुख्य मंत्री बंसी लाल जी ने - जिन्हे संजय गाँधी में भारत का मसीहा दीखता था। तो उन्होंने दिल्ली से केवल सात किलोमीटर दूर गुडगाँव में 300 एकड़ ज़मीन दे दी - इसमें हालाँकि छोटी मोटी एक दो समस्या थी - ये ज़मीन उपजाऊ खेत थे और किसानों के थे और इस ज़मीन के पास एयरफोर्स का बारूद सेण्टर था तो इस इलाके में फैक्ट्री रक्षा कारणों से नहीं डाल सकते थे। और आखिरी समस्या थी - ज़मीन का किसानों का जो मुआवज़ा दिया जाना था - उस में ढेरो झोल झपाटे थे। 

अंत में - इस पार्ट में दो चीज़े याद रखने लायक है - मारुती कार की एस्टिमेटेड कीमत - छह हज़ार रुपये ; दूसरी बात - वायदा कि मारुती अप्रैल 1973 तक भारत की सड़कों पर दौड़ रही होगी। ये दो बातें याद रखिये - आगे के पार्ट में ये दो बातें बहुत बड़ा रोमांच पैदा करेंगी ! आगे के पार्ट्स में वो बारीकियां पढ़ेंगे जो आज के परिपेक्ष में आम भारतीय के दिमाग का बल्ब फ्यूज कर दे !

                                        


                                            मारुती गाथा - 1968 पार्ट 2


बंसी लाल जी ने तीन सौ एकड़ से ऊपर ज़मीन मारुती कंपनी को दे दी थी - जिसके एवज का पैसा कंपनी ने हरयाणा सरकार को नहीं चुकाया था - बाद में कुछ पैसा दे दिया था। 


अब इस ज़मीन के कुछ पहलू ये थे - यहाँ लगभग 1500 किसान रहते खेती करते थे - हर पच्चीस एकड़ पर एक टूयब वेल था - खेती के पशु थे : कुल मिला कर गांव के गांव थे। मुआवज़ा तय हुआ साढ़े 11 हज़ार प्रति एकड़ - जिसमें फसल , टूयब वेल , घर आदि की कीमत शामिल थी। इस अधिग्रहण की हुई जमीन के आसपास की कीमत थी चालीस हज़ार प्रति एकड़ - खाली जमीन की। संसद में इस बात को दिन दहाड़े लूट कह कर उठाया भी गया लेकिन नक्कारखाने में तूती की आवाज़ कौन सुनता है। किसानो ने एक कोआपरेटिव बनायीं और कोर्ट गए। लेकिन हरियाणा सरकार ने स्पेशल एक्वीजीशन एक्ट बना दी थी इस के लिए। खैर , कोर्ट का आदेश आया - सब किसान एक दिन आओ , आठ घंटे में फैसला सुना देंगे । मतलब राम राज्य था जी उस समय। सब मर्द किसान उस दिन कोर्ट गए और पीछे भारी मात्रा में पुलिस बल ने पूरी ज़मीन खाली करवा ली। कोर्ट में किसानो को बताया गया - जो मुआवज़ा मिल रहा है ले लो क्यूंकि ज़मीन सरकार ने रक्षा के हेतु अधिकरण की है। इस मुआवज़े का पैसा लगभग चालीस लाख हरियाणा सरकार ने भरा जो मारुती ने 1975 में दया करके सरकार को इंटरेस्ट फ्री वापस कर दिया। ये किसान आंदोलन आज के आंदोलन जैसा ना था -बेचारे किसान एक पल में अपनी ज़मीन से हाथ धो बैठे थे ! 


अब दूसरी अड़चन थी एयरफोर्स का मामला। तो जी साहब - दिल थाम कर बैठिये - उस समय एक महान मिनिस्टर थे - विद्या चरण शुक्ल । सब शुक्ल भाई दिल के बहुत सॉफ्ट होते ही है 😉 तो ये वाले तो संजय के बाए हाथ माने जाते थे । उन्होंने अपनी जादू की छड़ी घुमाई और एयरफोर्स का नो ऑब्जेक्शन मिल गया कुछ ही दिनों में। संसद में एक और मुद्दे ने हवा पकड़ी - संजय का पिछले साल का इनकम टैक्स return था 722 रुपैय्ये। तो भाई - जिस आदमी की कुल कमाई 722 हो , उसे इतना बड़ा काम कैसे दिया जा सकता है। 


तो इसका तोड़ निकला गया --1971 में एक कंपनी फ्लोट हुई - मारुती लिमिटेड जिसके मैनेजिंग डायरेक्टर श्री संजय गाँधी ( चार हज़ार महीने की पगार ) और तीन और डायरेक्टर। कंपनी का नाम ध्यान से याद रखना क्यूंकि नाम में ही तो सारा जादू छिपा रहता है। तीन और डायरेक्टर थे कंपनी के जिनका कंपनी में बड़ा पैसा लगा था। MD ने दस शेयर्स खरीदे दस रुपैये प्रति शेयर के हिसाब से। कंपनी रजिस्ट्रार के कानून के हिसाब से बोर्ड मेंबर के कम से कम पच्चीस शेयर होने चाहिए थे लेकिन इस क़ानून की कौन परवाह करता है। जिन लोगों ने कंपनी में पैसा लगाया था - उन सब के इनकम टैक्स के केस चल रहे थे और वो आर्थिक रूप से अभियुक्त थे। 


मारुती लिमिटेड शुरू हुई ढाई करोड़ के साथ जो एक साल में दस करोड़ की पूंजी पर पहुंच गयी। दो करोड़ के तो शेयर बिक गए थे छोटे मोटे रिटेल इन्वेस्टर के हाथों। जानते है - ज्यादातर इन निवेशकों के उपनाम क्या थे - मिश्रा या झा। सब मिश्रा लोग श्री LN मिश्रा के रिश्तेदार थे और सब झा लोग मिश्रा जी की पत्नी के रिश्तेदार थे । लेकिन पूंजी अभी और चाहिए थी। तो 1972 में लगभग 75 डीलर नियुक्त किये गए मारुती के लिए - वादा था छह महीने में कार की डिलीवरी होगी - हर डीलर से एक से तीन लाख रूपया लिया गया एडवांस के तौर पर। यदि कार ना दे सके तो इस पैसे को वापस करती मारुती , मय सूद के। खैर कार तो अभी बननी भी शुरू नहीं हुई थी और अगले तीन साल तक बनी भी नहीं । कई डीलर ने बाकायदा शोरूम बनवा के तैयार करवा लिए थे लेकिन मिला बाबा जी का ठुल्लू। 1975 तक जब डीलर को पैसे ना मिले , कार ना मिली तो उन्होंने रिफंड माँगा लेकिन तब तक लग गयी थी इमरजेंसी - आपातकाल । जिन जिन डीलर ने पैसा वापस माँगा , सब को मीसा के तहत जेल के अंदर । वही मीसा जिसमें लालू यादव अंदर हुए थे और मीसा भारती पैदा हुई थी। 


1973 में एक प्रोटोटाइप कार दिखाई गयी और कहा कार लगभग रेडी है बस थोड़ी सी कीमत बढ़ गयी है - अब कार की नयी कीमत होगी साढ़े ग्यारह हज़ार रुपये मात्र। वजह थी - रॉ मटेरियल की कीमत में इजाफा । 1975 से पहले महान कार डिज़ाइनर ने यूरोप का दौरा भी किया - जर्मनी , इटली , ब्रिटैन आदि देशों की कार फैक्ट्री का मुआइना किया। वापस आकर देश के लोगों को बताया - इन लोगों से हम कुछ नहीं सीख सकते - हमारी मारुती वाकई पवन पुत्र माफिक उड़ेगी। बरहाल , जिस कंपनी को छह करोड़ की पूंजी पर चलाने का प्लान था , हक़ीक़त में उसके लिए साठ करोड़ चाहिए थे और चाहिए था एक बढ़िया कार इंजन जो अब तब ना बना था। तो भाई - इतना पैसा कहा से आएगा ? जाहिर सी बात है मम्मी ने कुछ साल पहले कुछ बैंको का राष्टीयकरण किया था - तो वो बैंक अब काम में आएँगी। लेकिन बैंक लोन कैसे दे - ना कोई प्रोजेक्ट प्लान , ना को कोलैटरल , ना कोई प्रोडक्ट। तो जी - बात ये है कि पैसा तो लें के रहूँगा - चाहे दें आप बस या बाप बस। दो तीन बैंक ने पैसा दे दिया - एक दो ने नहीं दिया। रिज़र्व बैंक के गवर्नर ने बाकी बैंक को मना कर दिया लोन देने से तो जब आपात काल आया तो ये सब गवर्नर और बैंक के हेड नप गए । सब की छुट्टी - टाटा बाई बाई। 

अंत में : तो बच्चो - पिछले पाठ में पढ़ा कि छह हज़ार की कार आनी थी 1973 में , लेकिन अब वो हो चुकी थी साढ़े ग्यारह हज़ार की और 1975 तक कोई अता पता नहीं था कि ये कार कब आएगी। आगे के पाठ में पढ़ेंगे - टीन का डब्बा , मारुती का दिल्ली से अहमदाबाद का टेस्ट और आज़ाद भारत की पहली पीपल कार की बाकी की कहानी ! और अभी सोनिया जी , राहुल जी और प्रियंका जी का मारुती में एंट्री बाकी है !!!!


                                    मारुती गाथा - 1968 पार्ट 3


आपातकाल से पहले जिन जिन लोगों ने मारुती के साथ सहयोग नहीं किया था - सबको बा-इज्जत , मेरा मतलब है , फुल बे-इज्जति के साथ ट्रीट किया गया - अफसरों की क्लास लगाई : ससपेंड कर दिया ; डीलरों को जेल और बाकी लोगों को भी वैसा ही ट्रीट किया गया था। बेचारे संजय गाँधी - अब मारुती का काम देखते या फिर देश की बाकि समस्याएं सुलझाते। खैर , 1972 में एक विश्व मेला लगा - वर्ल्ड फेयर जिसमें हरियाणा के पवेलियन में एक घूमते प्लेटफार्म पर मारुती का मॉडल रखा गया - चकाचक लाइट में। लोगों ने नयी भारतीय कार को देखा - जिसका आना अभी तय नहीं था। लेकिन dmk तमिलनाडु के एक नेता ने सनसनी फैला दी। इन तमिल नाडु के मंत्री ने कार देखि , देख कर खौफ में आ गए और डरते हुए कार में बैठे। निकल कर बोले - ये तो टीन का डब्बा है ; कार थोड़ी ही है - रंगा पुदुद्दी ! लेकिन हाय रे देश की जनता - वो तो टीन में बैठ कर सफर करने को तैयार थी - बस कार आ जाए मार्किट में। 


जैसे कि पहले बताया - कार पर काम 1967 से चल रहा था अर्जुन दास नामक मैकेनिक के सहयोग से। ये लोग आखिर कर क्या रहे थे - ये लोग भारत की उस प्राचीन तकनीक पर काम कर रहे थे - जिसके बलबूते पर देश आज भी चल रहा है : जुगाड़। इन लोगों ने एक मोटर साइकिल का इंजन लिया और कबाड़ी बाजार से कुछ पुराने पार्ट उठाये और इन सब को जोड़ जाड कर एक कार के ढांचे में फिट करने की जुगाड़ कर रहे थे। लेकिन वो जुगाड़ काम नहीं कर रहा था- हालांकि बाजार में हवा खूब बाँधी गयी थी। इन दौरान इंग्लैंड के दो रिपोर्टर ये देखने आये - ये कौन से तकनीक है जो अँगरेज़ भारत में ही छोड़ गए - इतनी बढ़िया तकनीक तो पूरी दुनिया में फैलनी चाहिए थे। जब उन्होंने मारुती की फैक्ट्री में काम देखा तो उनके तोते उड़ गए और कुत्ते फेल हो गए - कानों ने धुआँ उगल दिया। बॉडी शॉप में मारुती की बॉडी की हैंड स्टिचिंग हो रही थी , इंजन शॉप , फाउंड्री आदि में भट्टी लगी हुई थी - ऐसा लगता था कोई ढाबा , कोई लोहार की दूकान में काम हो रहा है। भट्टी में मेटल पिघलकर इंजन के ढांचे में डाला जाता था - इसके कारण इंजन में चार हज़ार किलोमीटर के बाद आयल लीक होने लगता। और सबसे अद्भुत बात जो इन दो रिपोर्टर ने देखि - इतने सालों के बाद बीस फिनिश्ड मॉडल और बीस खाली कार बॉडी फैकट्री में ऐसे पड़ी थी जैसे किसी अमीर बालक के खिलौने पड़े रहते है। 


एक समझदार आदमी PN हक्सर ने इंदिरा गाँधी से कहा - मैडम , यदि आपको अपनी नाक बचानी है तो ये एलान करवा दो कि मारुती का भारतीय वाहन सहिंता के अनुसार रोड टेस्ट होगा - मतलब कार दिल्ली से अहमदाबाद जायेगी और वापस आएगी : तब कार को लाइसेंस मिलेगा आगे काम बढ़ने का। अब इंजन तो लीक कर रहा था तो संजय ने जुगाड़ प्रणाली के तहत एक जुगत भिड़ाई । एक जर्मन इंजीनियर के द्वारा दो चार स्ट्रोक इंजन देश में गैर कानूनी तरीके से मंगवाए। इन दो इंजन के सहारे कार को खड़ा किया और ये रोड टेस्ट पास करवाया। हालांकि लोग ये बताते है कि मारुती एक ट्रक पर रख कर दिल्ली से अहमदाबाद गयी और वापस आयी : ईष्यालु लोग। इन सात सालों में कार ना आने के एक सौ पचास बहाने दिए जा चुके थे - कीमत छह हज़ार से साढ़े ग्यारह हज़ार हो चुकी थी और अब नयी कीमत थी पचीस हज़ार जो एक प्रेस कांफ्रेंस में बताई गयी। लोगों ने सोचा - कोई नहीं जी , कीमत कुछ भी हो कार तो अपन खरीद ही लेंगे : आप बस कार लें आओ बनाकर। 


लेकिन पता नहीं क्यों , आपातकाल तक मारुती की पूंजी हवा में गायब हो रही थी - पैसे पेड पे थोड़ी लगते है। अब सब ऑप्शन एग्जॉस्ट हो चुके थे पैसे उघाने के तो मारुती ने अपना कबाड़ बेचना शुरू कर दिया पैसे के लिए। कबाड़ में क्या था - सीमेंट और स्टील ; जो ऐसी वस्तुए जो भारत में उस समय लाइसेंस , परमिट और बहुत सारी सिफारिश के बाद लोग खरीद पाते थे। चूँकि नयी कोई फैक्ट्री डालनी नहीं थी , सीमेंट और स्टील पड़ा पड़ा सड़ रहा था तो बाजार में बेच डाला गया और पैसे कमाए गए। इस दौरान मारुती ने रोल रोलर बनाने का काम शुरू कर दिया और कंपनी की एक और इकाई लांच हुई। पैरेंट कंपनी थी मारुती लिमिटेड और नयी इकाई आयी - मारुती टेक्निकल सर्विसेज MTS जिसके पार्टनर थे - सोनिया जी , प्रियंका जी और राहुल जी ; संजय जी सर्वेसर्वा थे। इसमें संजय जी के कई लाख रूपया लगा था - हालाँकि कुछ साल पहले तक वो केवल सात सौ सालाना कमाते थे। अब MTS कंपनी के बारे में कुछ जानिये। 


MTS की md थी श्रीमती सोनिया गाँधी - जिन्हे कोई टेक्निकल एक्सपीरियंस ना था - उन्हें मिल रहे थे ढाई हज़ार महीने के - ऊपरी खर्चे अलग कार ड्राइवर पट्रोल आदि के। MTS और मारुती में बीस साल का करार हुआ और तय हुआ मारुती टोटल सेल्स का दो परसेंट MTS को देगी , कंसल्टिंग खर्चे के अलावा। ये कुछ नेशनल हेराल्ड वाला झोल था जिसमें सब लोग बोर्ड में थे , जो यंग इंडिया में थे। स्वयं को खुद की कंसल्टिंग का खर्चा देते थे। मारुती हैवी व्हीकल भी एक कंपनी लांच की गयी जिसमें पार्टनर थे संजय गाँधी , ॐ प्रकाश मोदी और जालान साहब ( रिज़र्व बैंक वाले नहीं )। ये सब कंपनी फैंटम कंपनी थी -केवल पैसा इधर से उधर करने के लिए बनायीं गयी थी। आपातकाल में एक रूल बड़ा साफ़ था - यदि किसी को जेल नहीं जाना तो मारुती के शेयर खरीदो - साहब के सामने। और इस बीच मारुती ने सब काम किये - केमिकल बेचे , स्टील सीमेंट बेचीं , ट्रक सेल्स के दलाल बनी ;बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी के एजेंट बनी : सब कुछ काम किये : केवल कार लांच ना की। 


अंत में - पोस्ट बहुत लम्बी हो रही है और कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई है। बहुत बहुत माफ़ी ,कहानी को इतना विस्तृत करने के लिए - लेकिन ये सब बहुत जरुरी पहलू है क्यूंकि इतनी आसानी से ये सब डिटेल कही नहीं मिलेगी। आखिरी हिस्से में पढ़िए : कब आएगी मारुती !!


                             मारुती गाथा - 1968 पार्ट 4 

नब्बे के दशक तक बॉलीवुड फिल्मो में मारुती का बहुत बड़ा योगदान था - सब किडनेपिंग मारुती वैन में होती थी ; बिहार, up में भी ये धंधा इसी कार के दम पर फला फूला था। हर मिडिल क्लास आदमी का सपना था मारुती 800 खरीदना। मतलब इन टीन के डब्बानुमा कार के लिए हम इतने बेताब और उतावले थे कि हर महीने पैसे बचा कर , जोड़कर ये कचरा खरीदने को तैयार थे , बशर्ते मिले तो सही ! 


पिछले तीन किश्तों में आपने MTS , MHV और ML : इन तीन कम्पनीज के बीच पैसे का आदान प्रदान के बारे में पढ़ा । आपातकाल 1975 में लगा था और मार्च 1977 तक लागू रहा। इस समय तक मारुती ने केवल बीस कार के मॉडल बनाये जो काम योग्य कतई नहीं थे। लेकिन मारुती लिमिटेड लगातार नुक्सान में थी - काफी पैसा MTS को दिया जा चूका था। अस्पष्ट सूत्र के मुताबिक संजय और राजीव गाँधी में इस बात को लेके तनातनी थी क्यूंकि संजय ने इस मामले में सोनिया जी और दोनों बच्चों को भी लपेट दिया था और उनसे जब मन मर्जी चेक आदि पर साइन करवा लेते थे - हालांकि इसकी पुष्टि आधिकारिक तौर पर कभी नहीं हुई। कोई भी ऐरा गैर नथ्थू खैरा बता देता इन तीन कंपनी के बीच जम कर पैसा का गोलमाल चल रहा था। मारुती लिमिटेड थी तो पब्लिक लिस्टेड कंपनी जिसके शेयर्स एन्लिस्टेड थे और ये कंपनी लगातार नुकसान में चल रही थी। अब मारुती के पास दो ऑप्शन थे - या तो कोई खरीद लें या फिर liquidate हो जाए । अब कोई ऐसे घाटे में जाती कंपनी क्यों खरीदेगा और liquidate करने को अब बचा क्या था ? तो दोनों ऑप्शंस रूल आउट हो गए। 


कुछ लोग जो मारुती में शुरू से जुड़े थे - उनके अनुसार सारी समस्या थी - संजय का फैसला ; हर चीज़ में संजय गाँधी फैसला करते थे - कार का रंग , इंजन का डिज़ाइन , कूलिंग सिस्टम , बॉडी शेप, वजन :सब कुछ। यहाँ तक कौन क्या करेगा , किसको नौकरी मिलेगी किसको नहीं। बहार से जो उच्च शिक्षा वाले लोग थे, उन्हें भी भगा दिया गया। एक रोल्स रॉयस के सहकर्मी ने बताया - संजय में इतनी काबिलियत ना थी कि वो कार बना सके। हां , महत्वकांशा जरूर थी। लेकिन ये बात साबित हो चुकी थी - संजय के पास बैलगाड़ी और बैल को भी एक साथ जोड़कर चलाने की क्षमता ना थी। आपातकाल के बाद जनता पार्टी ने चुनाव में अनेक नारे बुलंद किये जिसमें मारुती कार का भी उल्लेख किया गया था। चुनाव से पहले संजय ने मारुती से इस्तीफ़ा दें दिया, डीलरों ने अपने पैसे वापस मांगे और अनेक कोर्ट केस हुए। कोर्ट ने मारुती के सब खाते फ्रीज कर दिए - हालांकि इन खातों के केवल पचीस हज़ार ही बचे थे। बहुत सारी फाइल जला दी गयी। 


1977 में जब जनता पार्टी की सरकार आयी तो कई फैसले जल्दबाज़ी में , बदले की भावना में ऐसे लिए गए कि कुछ सालों में कांग्रेस की वापसी हो गयी। जनता पार्टी सरकार ने एक कमिशन बनाया मारुती के लिए और उसके बाद जनता पार्टी सरकार ने मारुती लिमिटेड को liquidate करके सब कुछ बेच दिया।इस पूरे सिलसिले में मारुती लिमिटेड के जर्मन इंजीनियर म्युलर की गवाही बहुत अहम् है । यदि इस गवाही की डिटेल में गया तो ये पोस्ट दस किश्त तक आराम से खींच जायेगी। जब कांग्रेस वापस पावर में आयी तो मारुती का सपना सपना ही था। 23 जून 1980 में संजय गाँधी की मृत्यु के बाद ये ठन्डे बस्ते में चली गयी। संजय गाँधी की पहली बरसी पर 24 जून 1981 को भारत सरकार (इंदिरा गाँधी ) ने मारुती उद्योग की स्थापना की। इंदिरा के अनुसार ये श्रद्धांजलि थी संजय के लिए । इस बार कमान मिली अरुण नेहरू को जिन्होंने ये बहुत जल्दी भांप लिया खुद से ये कार नहीं बनेगी ; तो जापानी कंपनी सुजुकी के साथ जॉइंट वेंचर एग्रीमेंट साइन किया गया । इस तरह से मारुती सुजुकी का जन्म हुआ और पहली मारुती 800 की चाबी इंदिरा गाँधी ने पहले ग्राहक को दिसंबर 1983 में सौंपी - कीमत केवल 48000 रुपये। 


इस पार्ट में भी बहुत सारे ट्विस्ट और टर्न थे - लेकिन पोस्ट में से इंटरेस्ट ना हटे, इसलिए कांट छांट दिया है। जनता पार्टी ने भी छोटी कार के मामले में बहुत रायता फैलाया था - कुछ करोडो का घोटाला भी हुआ था। यदि आप आज मारुती के इतिहास में झाकेंगे तो 1981 की मारुती उद्योग का उल्लेख मिलेगा । लेकिन ये कहानी तो 1968 में ही शुरू हो गयी थी। ये कहानी झाड़ू से बुहार करके कालीन के नीचे दबा दी गयी है और मारुती की कहानिया इसके बाद ही लोगों को ज्ञात है। 


अंत में - इस कहानी की तह तक जाने के लिए कम से कम पांच किताबे पढ़ी - विदेशी journalist के आर्टिकल्स ढूंढें और पुराने अख़बार खंगाले। यदि आप को इस में कुछ भी गलत दिखा तो जरूर बताये : करेक्शन कर लूंगा। इस दौरान संजय गाँधी के बहुत पहलू जानने का अवसर मिला और भी बहुत कुछ पढ़ा समझा। ये कहानी और भी डिटेल में लिखी है - बहुत लम्बी है क्यूंकि बहुत और डिटेल्स है। आज़ाद भारत के अनसुने किस्से का ये दूसरा एपिसोड पढ़ने के लिए आपका आभार । अपनी राय से जरूर अवगत कराये !!

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