मंगलवार, 27 अगस्त 2019

इंग्लैंड की एक प्रसिद्ध घटना

इंग्लैंड की एक प्रसिद्ध घटना है जो #Law_School में छात्रों को केस स्टडी के तौर पर पढ़ाई जाती है।
1883 में एक अमीर ऑस्ट्रेलियाई वकील एक यॉट (yacht) खरीदता है ये यॉट इंग्लैड की थी और डिलीवरी ऑस्ट्रेलिया में करनी थी। 4 लोगो का दल क्रू मेंबर में जहाज का कैप्टन टॉम डडली, 2 सहायक एडविन स्टीफ़न, एडमंड ब्रुक्स और एक 17 वर्षीय केबिन बॉय उस यॉट को ले कर निकलता हैै। मई में जहाज इंग्लैंड से निकलता है और जुलाई में कुछ ऊंची लहरों में जहाज डूब जाता है।जैसे तैसे चारो क्रू मेंबर अपनी जान एक लाइफबोट पर बचाते हैं। जल्दबाजी में 2 शलजम के डिब्बों को छोड़ कर और कोई कुछ नही ला पाते। वहां से जमीन 1100 किलोमीटर दूर थी जैसे तैसे 3 दिन बीत गए। किसी ने कुछ नही खाया। फिर कैप्टेन ने एक शलजम का कैन खोला और सबको खाने को दिया।
अगले 2 दिन खाना नसीब नही हुआ। सबसे ज्यादा पीने के पानी की चिंता थी। फिर एक समुद्री कछुआ पकड़ा। सबने उसका खून पिया और मांस खाया। अगले दिन दूसरा कैन भी खत्म हुआ। अब इन्हें प्यास भी लगी और भूख से बुरा हाल। 17 वर्षीय केबिन बॉय प्यास बर्दाश्त नही कर पाया और मना किये जाने के बाद भी समुद्र का पानी पी लिया। इससे उसकी तबीयत बिगड़ जाती है। 19 दिन में 4 लोगों ने सिर्फ़ बस 2 कैन शलगम और एक कछुआ खाया था। बहुत प्यासे थे। बुरी तरह थके और निराश।
तभी जहाज का कैप्टेन एक प्रस्ताव देता है कि हममें से किसी को मरना होगा ताकि बाक़ी लोग उसका भोजन कर ज़िंदा रह पाए या तो कोई खुद ब खुद अपनी कुर्बानी दी या हम लॉटरी करते हैं।
ब्रूक्स इस बात से नाराज हो जाता है और किसी भी तरह की लॉटरी या हत्या में भाग लेने से मना कर देता है। स्टीफ़न को यह आईडिया अच्छा लगता है। केबिन बॉय बीमार पड़ रहता है सहमति देने की शक्ति नही होती उसमे। वो कहता है ईश्वर ही हमारी रक्षा करेगा।
1 दिन यूँ ही बीत जाता है कैप्टेन फिर से यही प्रस्ताव दुहराता है। इस बार स्टीफ़न दृढ़ता से राजी हो जाता है और सिग्नल करता है कि 17 वर्षीय बीमार कैबिन बॉय को ही मार दिया जाए। ब्रूक्स इसमे भाग नही लेना चाहता पर उसकी असहमति से कोई फ़र्क नही पड़ता है।
कैप्टेन डडली अपने चाकू से 17 वर्षीय केबिन बॉय को मार देता है। फिर तीनो मिलकर पहले उसका खून पीते हैं। अगले 4 दिनों तक वो उसका मांस खाते हैं। 4 दिनों के बाद एक जर्मन जहाज उन्हें बचा लेता है।
जब कहानी इंग्लैंड पहुंचती है तो पूरे न्यायायिक जगत में हड़कंप मच जाता है। उन पर मुकदमा चलाया जाता है। ब्रूक्स को मासूम समझ कर रिहा कर दिया जाता है। डडली और स्टीफ़न को मृत्युदंड दिया जाता है पर जनता की सहानुभूति की वजह से उन्हें फांसी नही दी जाती।
अपने बचाव में डडली और स्टीफ़न कहते हैं -भूख के कारण सब मर जाते अगर वो ऐसा नही करते।उन्होंने लॉटरी भी करने की कोशिश की ताकि अपराध बोध ना रहे।डडली, स्टीफ़न, ब्रूक्स शादी शुदा थे। उनके परिवार थे बच्चे बीवी जो उन पर निर्भर थे। केबिन बॉय अविवाहित और अनाथ था। वो बीमार था और शायद वैसे भी मर जाता। इसलिए केबिन बॉय को चुना गया।

#मनु #इस्लाम #गांधी और #हीरालाल


महात्मा गांधी के पुत्र हीरालाल गांधी इस्लाम अपना कर अब्दुल्लाह बने और अपनी बेटी मनु को बीबी बनाने पर तुल गये
अब्दुल्लाह, यह मैं क्या सुन रहा हूं कि तुम्हारी यह सात साल की छोकरी आर्य समाज मंदिर में हवन करने जाती है?'' जकारिया साहिब ने अब्दुल्लाह के घर की बैठक में बैठे हुए रोष भरे शब्दों में कहा, ''यह अब तक मुस्लिम क्यों नहीं बनी, इसे भी बनाइए, यदि इसे मुस्लिम नहीं बनाया गया तो इसका तुमसे कुछ भी संबंध नहीं है।
हीरालाल उर्फ अब्दुल्लाह ने 27 जून 1936 को नागपुर में इस्लाम कबूल किया था और 29 जून 1936 को मुंबई में इसकी सार्वजनिक घोषणा की, और 1 जुलाई 1936 को यह घटना घट गई। हीरालाल पर इस्लाम का रंग चढ़ गया था और हर हाल में पूरे हिंदुस्तान को इस्लामी देश बनाना चाहता था। वह जकारिया के सवाल का कुछ जवाब नहीं दे पाया । तभी जकारिया ने अब्दुल्लाह की मासूम बेटी मनु जो उस समय सात साल की थी, उसकी ओर मुखातिब होकर कहा, ''क्यों तुम इस्लाम कबूल नहीं करोगी?''
मनु- ''नहीं मैं इस्लाम कबूल नहीं करूंगी!'
''यदि तुम इस्लाम कबूल नहीं करोगी तो तुम्हें मुंबई की चैपाटी पर नंगी करके तुम्हारी बोटी-बोटी करके चील और कव्वो को खिला दी जाएगी,'' फिर वे अब्दुल्लाह( हीरालाल) को चेतावनी देने लगे- ए, ''अब्दुल्ला काफिर लड़कियां और औरतें अल्लाह की ओर मुस्लिमों को दी गई नेमतें हैं...देखो यदि तुम्हारी बेटी इस्लाम कबूल नहीं करती तो तुम्हें इसको रखैल समझकर भोग करने का पूरा हक है, क्योंकि जो माली पेड़ लगाता है उसे फल खाने का भी अधिकार है, यदि तुमने ऐसा नहीं किया तो हम ही इस फल को चैराहे पर सामूहिक रूप से चखेंगे। हमें हर हाल में हिन्दुस्तान को मुस्लिम देश बनाना है और पहले हम लोहे को लोहे से ही काटना चाहते हैं।'' कहकर वह चला गया था और उसी रात अब्दुल्लाह ने अपनी नाबालिग बेटी की नथ तोड़ डाली थी ( अर्थात अपनी हब्स का शिकार बनाआ)। बेटी के लिए पिता भगवान होता है, लेकिन यहां तो बेटी के लिए पिता शैतान बन गया था। मनु को कई दिन तक रक्तस्राव होता रहा और उसे डाॅक्टर से इलाज तक करवाना पड़ा। जब मनु पीड़ा से कराहने लगी तो उसने अपने दादा महात्मा गांधी को खत लिखा, जो बापू के नाम से सारी दुनिया में प्रसिद्ध हो चुका था, लेकिन बापू ने साफ कह दिया कि इसमें मैं क्या कर सकता हूं? इसके बाद मनु ने अपनी दादी कस्तूरबा को खत लिखा, खत पढ़कर दादी बा की रूह कांप गई, ''हाय मेरी फूल सी पौती के साथ यह कुकर्म और वह भी पिता द्वारा.
बा ने 27 सितंबर 1936 को अपने बेटे अब्दुल्लाह को पत्र लिखा और बेटी के साथ कुकर्म न करने की अपील की और साथ ही पूछा कि 'तुमने धर्म क्यों बदल लिया? और गोमांस क्यों खाने लगे?'
बा ने बापू से कहा, ''अपना बेटा हीरा मुस्लिम बन गया है, तुम्हें आर्य समाज की मदद से उसे दोबारा शुद्धि संस्कार करके हिन्दू बना लेना चाहिए।''
बापू- ''यह असंभव है!''
बा- ''क्यों?''
बापू- ''देखो मैं शुद्धि आंदोलन का विरोधी हूं, जब स्वामी श्रद्धानंद ने मलकाने मुस्लिम राजपूतों को शुद्धि करके हिन्दू बनाने का अभियान चलाया था तो उस अभियान को रोकने के लिए मैंने ही आचार्य बिनोबा भावे को वहां भेजा था और मेरे कहने पर ही बिनोबा भावे ने भूख हड़ताल की थी और अनेक हिन्दुओं को मुस्लिम बनाकर ही दम लिया था, मुझे इस्लाम अपनाने में बेटे के अंदर कोई बुराई नहीं लगती, इससे वह शराब का सेवन करना छोड़ देगा।''
''शराब का सेवन करना छोड़ देगा,'' बा ने कहा, ''वह तो अपनी ही बेटी से बीवी जैसा बर्ताव करता है।''
''अरे नहीं ब्रह्मचर्य के प्रयोग कर रहा होगा, हम भी अनेक औरतों और लड़कियों के संग नग्न सो जाते हैं और अपने ब्रह्मचर्य व्रत की परीक्षा करते हैं।''
''तुम्हारे और तुम्हारे बेटे के कुकर्म पर मैं शर्मिंदा हूं।'' कहते हुए वह घर से निकल पड़ी थी और सीधे पहुंची थी आर्यसमाज बम्बई के नेता श्री विजयशंकर भट्ट के द्वार पर और आवाज लगाई थी साड़ी का पल्ला फैलाकर, ''क्या अभागन औरत को भिक्षा मिलेगी?''
विजयशंकर भट्ट बाहर आए और देखकर चौंक गए कि बा उनके घर के द्वार पर भिक्षा मांग रही है, ''मां क्या चाहिए तुम्हें?''
''मुझे मेरा बेटा लाकर दे दो, वह विधर्मियों के चंगुल में फंस गया है और अपनी ही बेटी को सता रहा है।''
''मां आप निश्चित रहें आपको यह भिक्षा अवश्य मिलेगी।''
''अच्छी बात है, तब तक मैं अपने घर नहीं जाउंगी।'' कहते हुए बा ने उनके ही घर में डेरा डाल लिया था।
श्री विजयशंकर भट्ट ने अब्दुल्लाह की उपस्थिति में वेदों की इस्लाम पर श्रेष्ठता विषय पर दो व्याख्यान दिए, जिन्हें सुनकर अब्दुल्लाह को आत्मग्लानि हुई कि वह मुस्लिम क्यों बन गया। फिर अब्बदुल्लाह को स्वामी दयानंद का सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने को दिया गया। जिसका असर यह हुआ कि जल्द ही बम्बई में खुले मैदान में हजारों की भीड़ के सामने, अपनी मां कस्तूरबा और अपने भाइयों के समक्ष आर्य समाज द्वारा अब्दुल्लाह को शुद्ध कर वापिस हीरालाल गांधी बनाया गया।महात्मा गांधी को जब यह पता चला तो उन्हें दुख हुआ कि उनका बेटा क्यों दोबारा काफिर बन गया और उन्होंने बा को बहुत डांटा कि तुम क्यों आर्य समाज की शरण में गई...बा को पति की प्रताड़ना से दुख पहुंचा और वह बीमार रहने लगी।
कस्तूरबा को ब्राॅन्काइटिस की शिकायत होने लगी थी, एक दिन उन्हें दो दिल के दौरे पड़े और इसके बाद निमोनिया हो गया। इन तीन बीमारियों के चलते बा की हालत बहुत खराब हो गई। डाॅक्टर चाहते थे बा को पेंसिलिन का इंजेक्शन दिया जाए, लेकिन वह इंजेक्शन उस समय भारत के किसी अस्पताल में नहीं था। बात गवर्नर तक पहुंचती और उन्होंने विशेष जहाज द्वारा विलायत से इंजेक्शन मंगाया। लेकिन बापू इसके खिलाफ थे कि इंजेक्शन लगाया जाए। बापू इलाज के इस तरीके को हिंसा मानते थे और प्राकृतिक तरीकों पर ही भरोसा करते थे। बा ने कहा कि अगर बापू कह दें तो वो इंजेक्शन ले लेंगी। लेकिन बापू ने कहा कि 'वो नहीं कहेंगे, अगर बा चाहें तो अपनी मर्जी से इलाज ले सकती हैं।' जीवन की आशाभरी दृष्टि से बा बेहोश हो गई और बापू ने उनकी मर्जी के बिना इंजेक्शन लगाने से मना कर दिया। एक समय के बाद गांधी ने सारी चीजें ऊपरवाले पर छोड़ दीं। 22 फरवरी 1944 को महाशिवरात्रि के दिन बा इस दुनिया से चली गईं।
कालांतर में मनु का विवाह एक कपड़ा व्यवसायी सुरेन्द्र मशरुवाला से हुआ, जो आर्य समाजी थे और जिस दिन वे ससुराल में चली तो पिता ने यही कहा था, ''बेटी मुझे क्षमा कर देना।''
''आकाश कहां तक है उसकी कोई थाह नहीं है और मैं अपने पंखो से उड़कर कहीं भी जा सकती हूं, यह मेरी योग्यता पर निर्भर करता है, उड़ते हुए मुझे पीछे नहीं देखना है।'' उसने क्षमा किया या नहीं नहीं पता, लेकिन विदाई पर यही कहा था।
अब्दुल्लाह से हीरालाल बने बापू के पुत्र स्वामी श्रद्धानंद शुद्धि सभा के कार्यकर्ता बन गए और मरते दम तक गैर हिन्दुओं को हिन्दू बनाने के कार्यक्रम से जुड़े रहे, लेकिन उनकी गर्दन कभी उंची नहीं हुई, जबकि मनु का चेहरा हमेशा खिला रहता था और उन्होंने समाज सेवा को अपना कर्म बना लिया था। मनु का रिश्ता महाराष्ट्र राज्य बाल विकास परिषद और सूरत के कस्तूरबा सेवाश्रम से रहा है। आजकल मनु की बेटी उर्मि डाॅक्टर हैं और अहमदाबाद के इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ मैनेजमेंट के प्रोफेसर भूपत देसाई से उनका विवाह हुआ है, उनके दो बच्चे हैं - मृणाल और रेनु।
बापू, जिसे आजकल महात्मा गांधी कहते हैं, उन्हें सारी दुनिया जानती है, लेकिन मनु को कोई नहीं जानता, जिन्होंने बलात्कारी पिता को भी इस्लाम की लत छुड़ाकर वेदों के रास्ते पर लाकर माफ कर दिया था।
साभार- वेद वृक्ष की छाया तले, लेखिका फरहाना ताज। गांधी के वह पत्र भी उपलब्ध हैं जिसमें स्वीकार किया गया है कि उसके पुत्र हीरा लाल उर्फ अब्दुल्लाह ने अपने बेटी मनु को हवश का शिकार बनाया था...यह पत्र नीलाम हुए थे। बा को इंजेक्शन ने लगवाने वाली बात फ्रीडम एट मिडनाइट में लिखी है कि गांधी ने उनको मरवा दिया अपनी हठ से।
इस काले सच को कैसे बदलोगे

#नेहरु का #साम्प्रदायिक_सदभाव


जब सरदार पटेल जी के प्रयासों से #सोमनाथ मंदिर 1951 में बनकर तैयार हुआ तो सरदार पटेल जी ने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी से मंदिर का उद्घाटन करने का अनुरोध किया. जिसे राजेन्द्र बाबू ने सहर्ष स्वीकार कर लिया. साथ ही सरदार पटेल जी ने नेहरू जी से भी पत्र लिखकर इस समारोह में भाग लेने की अपील की लेकिन नेहरु जिसे कांग्रेसी भारत के "शिल्पी " आदि ना जाने किन किन अलंकारों से नवाजते है उसने अपनी गन्दी और तुच्छ मानसिकता का परिचय देते हुए सिर्फ वोट बैंक की खातिर सरदार पटेल को एक पत्र लिखकर कहा की वो किसी भी ऐसे समारोह
में नहीं जाते जिसे देश का साम्प्रदायिक सद्भाव बिगड़े और नेहरु ने राजेन्द्र बाबू से भी पत्र लिखकर सोमनाथ के उद्घाटन समारोह में ना जाने की अपील की जिसे राजेन्द्र बाबू ने अस्वीकार कर दिया लेकिन चूँकि भारत में प्रधानमंत्री सत्ता का केन्द्र है इसलिए राजेंद्र बाबू ने नेहरु का मान रखते हुए सरकारी खर्च के बजाय निजी पैसे से समारोह में सिरकत की . उन्होंने फ्रंटियर मेल ट्रेन से बडौदा फिर बरोड़ा से सोमनाथ पहुचे . जबकि देश के राष्ट्रपति को विशेष ट्रेन और जहाज़ की सुबिधा है . जबकि नेहरु लखनऊ के इस्लामिक कालेज, अजमेर दरगाह और देवबंद के दारुल उलूम के कई समारोहों में एक प्रधानमंत्री के तौर पर शिरकत किया था.
क्या तब नेहरु को इस देश की साम्प्रदायिक सदभाव का ख्याल नहीं था ?
यदि आज़ादी के बाद से ही देश के सभी धर्मों और जातियों के लोगों को समान रूप से माना गया होता तो आज देश एक बारूद का ढेर ना बना होता।असल में वर्तमान में कांग्रेस नेहरु के ही वोट बैंक के तुष्टीकरण की नीति को ही आगे बढा रही है

जद्दनबाई

आज़ादी के पहले की बात है एक तवायफ थी #जद्दनबाई बेहद सुन्दर,बनारस में चौक थाने के पास जद्दन कि महफ़िल सजती थी।
नामचीन हस्तियों कि आवक थी उसके कोठे पर।नवाबज़ादे, सेठ, ठाकुर, अंग्रेज साहब आते रहे और देखते ही देखते जद्दनबाई की गोद में तीन फूल खिला गए, भैया सही आँकड़े पता नहीं हैं, हा तीनों के ही पिता अलग-2 थे इनमें से नरगिस एक हिन्दू मोहन बाबू कि संतान थी बाकी दो का पता नहीं।
जद्दनबाई तवायफ थी मगर दूरदर्शी महिला थी उसने वक्त की नब्ज़ पढ़ ली कि दो बेटे और एक बेटी के साथ इस कोठे पर कोई भविष्य नहीं है। कल बेटी तवायफ बनेगी और उसके भाई उसकी दलाली खाएंगे। जद्दनबाई ने मुंबई की गाड़ी पकड़ ली और बच्चों के साथ मुंबई आ गई। सर छुपाने की जगह मिल गई और धंधा भी,वही पुराना वाला हा कुछ 2- 3 फिल्मों में गाना भी गाई।
बेटी नरगिस को उसने फिल्मों में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी और अपने पहचान के लोगों से मदद लेकर उभरते हुए बॉलीवुड में प्रवेश करवा दिया।नरगिस एक प्रतिभाशाली अभिनेत्री साबित हुई और नई दूकान अच्छी तरह चल निकली। भाई लोगों को भी जूनियर आर्टिस्ट टाइप रोल मिलने लगे।
इसी समय लाहौरी लाला राज कपूर के नैना नरगिस से लड़ गए और फिर ये कहानी लंबी चली।
पृथ्वीराज कपूर को तवायफ की बेटी अपनी बहू के रूप में स्वीकार नहीं हुई और ये इश्क आधे रास्ते में ही निपट गया।तबतक राज कपूर और नरगिस के संबंध में बस विवाह की औपचारिकता बाकी थी। बाकी सब कुछ हो चुका था।
जबलपुर की घरेलू लड़की कृष्णा से विवाह कर राज कपूर ने कल्टी मार ली। नरगिस फोकट में लुटीपिटी भौंचक्की देखती रही।
इसके बाद उसका कैरियर ढलान पर आने लगा । अपनी संध्या वेला में उसने ख़्वाजा अहमद अब्बास की कालजयी रचना #मदरइंडिया की। इसमें उसके पुत्र की भूमिका निभाई थी तब के दमदार अभिनेता #सुनीलदत्त ने। फिल्म के एक दृश्य में आग में घिरने का सीन शूट करते हुए नरगिस सचमुच आग में घिर गई।
तब सुनील दत्त ने जान पर खेल कर उसको बचाया। इसके बाद परदे पर मां बेटे को प्यार हुआ और फिर उन्होंने शादी कर ली। नरगिस सुनील दत्त से उम्र में खासी बड़ी थी।
सुनील दत्त पंजाब के हुसैनी ब्राह्मण परिवार से हैं। हुसैनी ब्राह्मण वो लोग हैं जो कर्बला के युद्ध में हसन हुसैन की तरफ से वीरता से लड़े थे। ये भारत से वहाँ गए थे।सुनील दत्त के परिवार को ये बेहूदा रिश्ता हजम नहीं हो सका होगा इसलिये आजतक उनके बारे में कोई चर्चा नहीं होती।
दो मुसलमान मामाओं और उनके मित्रों की परवरिश से सुनील दत्त का बेटा #संजय_दत्तहिंदुओं के प्रति घृणा पालते हुए बड़ा हुआ। नरगिस की मौत पर इन लोगों ने उसे हिंदू सुहागिन की तरह अंत्येष्टि प्राप्त नहीं होने दी और जद्दनबाई की कब्र के पास दफनाने को लेकर शवयात्रा में ही बवाल खड़ा कर दिया।
संजय दत्त अपने मामाओं के साथ था।
बाबरी विध्वंस के समय संजय दत्त के मन में हिंदुओं के लिए घृणा का उफान था और उसने दाउद इब्राहिम के विस्फोटक सामग्री से लदे दो ट्रक एक रात के लिए अपने यहाँ छुपाए। बदले में उसे दो ए.के. 47 गिफ्ट दी गई।संजय की गिरफ्तारी के बाद सुनील दत्त काफी टूट गए थे
बाला साहेब ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था सूनिल मेरे टेरेंस पर रोज बियर,चने और आंसूओं के साथ बैठा रहता था मैं उसे इतना तड़पता देखता रहता था।

वेद और मानव सभ्यता

#वेद मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं।वेदों की 28 हजार पांडुलिपियाँ भारत में पुणे के भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में रखी हुई हैं।इन्हे यूनेस्को ने विरासत सूची में शामिल किया है.यूनेस्को की 158 सूची में भारत की महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की सूची 38 है।
वेद के चार विभाग है-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद,इन्ही के आधार पर धर्मशास्त्र,अर्थशास्त्र,कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई।

#ऋग्वेद- इसमें पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा आदि की भी जानकारी मिलती है।
#यजुर्वेद -यजुर्वेद का अर्थ : यत् + जु = यजु। यत् का अर्थ होता है गतिशील तथा जु का अर्थ होता है आकाश। इसके अलावा कर्म। श्रेष्ठतम कर्म की प्रेरणा। यजुर्वेद में यज्ञ की विधियां और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। तत्व ज्ञान अर्थात रहस्यमयी ज्ञान। ब्रह्माण, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ का ज्ञान। यह वेद गद्य मय है।
#सामवेद- साम का अर्थ रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप है। सामवेद गीतात्मक यानी गीत के रूप में है। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है।
#अथर्वदेव- थर्व का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन। ज्ञान से श्रेष्ठ कर्म करते हुए जो परमात्मा की उपासना में लीन रहता है वही अकंप बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्ष धारण करता है। इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, जड़ी बूटियों, चमत्कार और आयुर्वेद आदि का जिक्र है।अथर्वदेव सबसे बड़ा वेद है इसके दो खंड है नीचे दिए गए लिंक पर डावनलोड करके इसका अध्ययन कर सकते है

https://vedpuran.files.wordpress.com/2011/10/rigved.pdf
https://vedpuran.files.wordpress.com/2011/10/yajurved.pdf


https://vedpuran.files.wordpress.com/2011/10/samved.pdf
https://vedpuran.files.wordpress.com/2011/10/arthved-part-1.pdf
https://vedpuran.files.wordpress.com/2011/10/atharva-2.pdf

#कांग्रेस_न्यायपालिका_न्याय

#कांग्रेस_न्यायपालिका_न्या
12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने एक फैसला सुनाया था। अपने उस फैसले में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी को भ्रष्ट तरीकों से चुनाव लड़ने का दोषी ठहराया था और उनको किसी भी संवैधानिक पद तथा चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया था।
फैसला आते ही उसके विरोध में उत्तरप्रदेश कांग्रेस के एक तत्कालीन चर्चित नेता ने साथी कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट के गेट पर जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा का पुतला फूंका था और जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा को जमकर गालियां बकते हुए नारे लगाए थे कि-इन्दिरा तेरी सुबह की जय
इन्दिरा तेरी शाम की जय।
इन्दिरा तेरे काम की जय
इन्दिरा तेरे नाम की जय
1980 में कांग्रेस की यूपी की सत्ता में वापसी होते ही इन्दिरा गांधी, संजय गांधी की जोड़ी ने लगभग दर्जन भर वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं की अनदेखी और उपेक्षा कर उस चर्चित कांग्रेसी नेता#विश्वनाथप्रताप_सिंह (वीपी सिंह) को पुरस्कार स्वरूप यूपी का मुख्यमंत्री नियुक्त कर सबको चौंका दिया था।
सिर्फ यही नहीं उस फैसले के विषय में परम सेक्युलर और प्रचण्ड भाजपा विरोधी की अपनी पहचान वाले प्रसिद्ध पत्रकार#कुलदीप_नैयर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले के कई महीने बाद मैं जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा से इलाहाबाद में उनके घर में मिला था। उन्होंने मुझे बताया था कि एक कांग्रेस सांसद ने इन्दिरा गांधी के पक्ष में फैसला सुनाने के लिए उन्हें रिश्वत देने की कोशिश की थी। इसी तरह न्यायालय में उनके एक सहकर्मी साथी जज ने भी उन्हें सुप्रीमकोर्ट का जज बनाए जाने का प्रलोभन दिया था। सिन्हा की मुश्किल यह थी कि वे अपने फैसले को दूसरों की नज़रों में आने से कैसे रोकें। उन्होंने अपने स्टेनोग्राफर को छुट्टी पर भेज दिया और और फैसले का अहम हिस्सा स्वयं अपने हाथ से लिखा। फिर भी, सरकार की गुप्तचर एजेंसियां फैसले की गंध पाने की कोशिशों में जुटी रहीं। जस्टिस सिन्हा की धार्मिक प्रवृत्ति को देखते हुए साधू सन्यासियों तक का इस्तेमाल किया गया।"
कुलदीप नैयर अपनी किताब में लिखते हैं कि सरकार के लिए फ़ैसला इतना महत्वपूर्ण था कि उसने सीआईडी के एक दल को इस बात की ज़िम्मेदारी दी थी कि किसी भी तरह ये पता लगाया जाए कि जस्टिस सिन्हा क्या फ़ैसला देने वाले हैं?''
उन्होंने लिखा है, ''वो लोग 11 जून की देर रात सिन्हा के निजी सचिव मन्ना लाल के घर भी गए. लेकिन मन्ना लाल ने उन्हें एक भी बात नहीं बताई. सच्चाई ये थी कि जस्टिस सिन्हा ने अंतिम क्षणों में अपने फ़ैसले के महत्वपूर्ण अंशों को जोड़ा था.
कुलदीप नैयर ने आगे लिखा है कि... "बहलाने फुसलाने के बाद भी जब मन्ना लाल कुछ बताने के लिए तैयार नहीं हुए तो सीआईडी वालों ने उन्हें धमकाया, 'हम लोग आधे घंटे में फिर वापस आएंगे. हमें फ़ैसला बता दो, नहीं तो तुम्हें पता है कि तुम्हारे लिए अच्छा क्या है।
मन्ना लाल ने तुरंत अपने बीबी बच्चों को अपने रिश्तेदारों के यहाँ भेजा और जस्टिस सिन्हा के घर में जा कर शरण ले ली. उस रात तो मन्ना लाल बच गए, लेकिन जब अगली सुबह वो तैयार होने के लिए अपने घर पहुंचे, तो सीआईडी की कारों का एक काफ़िला उनके घर के सामने आकर रुक गया था।
44 साल पहले की यह घटना है पर इस तरह के शर्मनाक अध्याय उस सफर के गवाह हैं जहां देश की न्यायपालिका को अपनी उंगलियों पर नचाने की कांग्रेसी कोशिशें लगातार होती रहीं हैं। पर आज ऐसा नहीं कर पाने की वजह से कांग्रेसी तिलमिलाहट में है और पाकिस्तान का साथ देकर देशद्रोह कर रहे हैं

युगोस्लाविया - सोवियत संघ

  यदि आप कभी bosnia-herzegovina जाएंगे तब एक जगह आपको 9300 मुसलमानों की सामूहिक कब्र दिखेगी जहां उन सभी के नाम लिखे हैं दरअसल यह मुस्लिम कही...