बुधवार, 9 अगस्त 2017

वो जुर्म जिसके चलते एक हाथी को फांसी दे दी गई

                       वो जुर्म जिसके चलते एक हाथी को फांसी दे दी गई

कोई फिल्म शुरू होती है तो कभी कभी एक डिस्क्लेमर आता है. कि इस फिल्म में किसी जानवर को नुकसान नहीं पहुंचाया गया है. अगर सच में नुकसान पहुंचा दिया तो पेटा वाले धर लेते हैं. नहीं तो मेनका गांधी भरता बना देती हैं. होना भी यही चाहिए. जानवरों पर अत्याचार करना इंसान का काम नहीं है. लेकिन एक बार सारी लिमिट क्रॉस हो गई थी. एक मादा हाथी को उसी सर्कस के लोगों ने फांसी पर लटका दिया था जिसका वो पेट भरती थी. वो भी खुलेआम, ढाई हजार लोगों की भीड़ के सामने.

मामला तकरीबन सौ साल पुराना है यानी 1916 की बात है. टेनेसी, अमेरिका में चार्ली स्पार्क नाम का आदमी एक बहुत बड़ा सर्कस चलाता था. सर्कस का नाम था स्पार्क्स वर्ल्ड फेमस शोज़. उसमें बिग मैरी नाम की एक मादा हाथी थी. आगे इसको हथिनी लिखा जाएगा काहे कि मादा लिखने और पढ़ने में भारी लगता है. तो मैरी बड़ी टैलेंटेड थी. वो अपनी सूंड से सींग बजाती थी और 25 तरह का म्यूजिक निकालती थी.


तो ये सर्कस अपना शो जमाने के लिए इरविन शहर से 40 किलोमीटर दूर किंगस्पोर्ट नाम की जगह पर लगा था. 11 सितंबर की बात है. वॉल्टर एल्ड्रिज नाम के एक नए आदमी ने सर्कस जॉइन किया. इसका काम मैरी को ट्रेनिंग देना था, लेकिन उसको पहले से कोई एक्सपीरिएंस नहीं था. उसके बाल लाल भूरे टाइप के थे इसी वजह से उसे रेड कहा जाता था. 38 साल के इस आदमी के पास घर बार नहीं था इसीलिए नौकरी मिल गई थी.

अपनी जॉइनिंग के अगले दिन मैरी को उसने संभाल लिया. उसके हाथ में एक भाला पकड़ा दिया गया. समझा दिया गया कि मैरी के कान पर धीरे से इसे मारना है. अगर वो कंट्रोल में न आ रही हो. सर्कस के प्रचार के लिए टाउन में परेड करनी थी. जिसके लिए रेड मैरी को लेकर निकला. रास्ते में एक जगह मैरी को तरबूज का टुकड़ा दिखा. वो खाने के लिए रुक गई. एल्ड्रिज उसके ऊपर सवार था और उसको बड़ी जल्दी थी. वो बार बार भाला चुभाने लगा.

मैरी उसकी बार बार की हरकत से परेशान हो गई. उसने सूंड घुमाई और एल्ड्रिज को उठा के पटका जमीन पर. उसके सिर पर लात रखके कुचल दिया. खोपड़ी फट गई, एल्ड्रिज मर गया. जिन लोगों ने ये देखा उनके होश फाख्ता हो गए. सब गिरते पड़ते वहां से भागे. फिर ये बात मार्केट में फैल गई कि जब तक मैरी रहेगी, इस सर्कस का कोई शो देखने नहीं जाएगा. लोगों की मांग थी कि मैरी को मार डाला जाए.

चार्ली बिजनेसमैन था. उसको लगा कि एक हाथी की वजह से सर्कस बंद करना ठीक नहीं है. उसने मैरी को मारने का फैसला लिया. लेकिन उसे तमाशा दिखाने का एक्सपीरिएंस था. मैरी की मौत को भी तमाशा बनाने का मन बना लिया. तय हुआ कि मैरी को फांसी दी जाएगी. सोचो एक हाथी के लिए फांसी की सजा, कितना वाहियात आइडिया था. लेकिन इंसान पर शैतान सवार होता है तो ऐसे ही जुगाड़ दिमाग में आते हैं.


मैरी को ट्रेन में लादकर एरविन ले जाया गया. वहां एक क्रेन मंगाई गई, सौ टन भारी. जो वहां रेलवे के डिब्बे या बाकी सामान उठाने का काम करती थी. एरविन में उस टाइम नया नया रेलवे का काम चल रहा था. मैरी को रेल से बांध दिया गया. उसकी गर्दन में मोटी जंजीर लपेटी गई. फिर क्रेन ने उसे उठाया. मैरी इतनी जोर से चिंघाड़ी लोगों की हालत पतली हो गई. दर्द से छटपटाती मैरी सिर्फ पांच फिट ऊपर पहुंची थी कि चेन टूट गई. वो नीचे गिरी और उसके कूल्हे की हड्डियां टूट गईं. दोबारा और मोटी चेन मंगवाई गई. फिर से उसकी गर्दन में बांधी गई. फिर क्रेन से उठाया गया और आधे घंटे तक लटका के रखा गया. तब जाकर सबको यकीन हुआ कि ये मर चुकी है.

वो दिन है और आज का दिन है. एरविन शहर मैरी की फांसी के लिए याद किया जाता है. तब से जानवरों के खिलाफ क्रूरता पर कितने कानून बन चुके हैं. सजा कितनों को मिली है इसका पता नहीं. लेकिन इंसान सनकी है. तभी तो कभी मजे के लिए कुत्ते को जलाने की, कभी दांत के लिए हाथी को मारने की, कभी सींग के लिए हिरन को मारने की खबरें आती रहती हैं.

गजवा-ए-हिन्द

                                  जानिए गजवा-ए-हिन्द क्या है।

पहले तो यह जाने की गजवा-ए-हिन्द का मतलब क्या है, काफिरों को जीतने के लिए किये जाने वाले युद्ध को “गजवा” कहते हैं और जो इस युद्ध में विजयी रहता है उसे “गाजी” कहते हैं, जिस भी आक्रान्ता और अक्रमंनकारी के नाम के सामने गाजी लगा हो या जिसे गाजी की उपाधि दी गयी हो निश्चय हो वह हिन्दुओ का व्यापक नर संहार करके इस्लाम के फैलाव में लगा था। हम हिन्दुओ की सबसे बड़ी कमजोरी है की हम धर्म के बारे में बहुत कम जानते हैं और और अपने को सेकुलर कहते है और सेकुलर का मतलब भी नहीं जानते। एक मुस्लिम अपने को कभी भी सेकुलर नहीं कहता है, चाहे वह नेता हो या आम नागरिक , हां, वह हिन्दू भीड़ में सेकुलर बनने का महत्व का भाषण जरुर देता है।

गजवा-ए-हिन्द का मतलब है की भारत में सभी गैर मुस्लिमो पर इस्लामिक शरिया कानून लागु करना जिसके लिए या तो इनको मारकर ख़तम कर दो या इनको इस्लाम स्वीकार कराओ या उन्हें तब तक जिन्दा रखो जब तक अपनी कमाई का एक हिस्सा “जजिया कर” के रूप में इस्लामिक सरकार को देते रहे जैसा मुग़ल करते रहे। भारत में यह एक बार हो चूका है, हलांकि यह तुकडे तुकडे में हुआ।
गजवा-ए-हिन्द के ७ मुख्य प्रक्रिया स्तर होते हैं



१- अल-तकिय्या :
यह वह अवस्था है जब मुस्लिम कमजोर या कम संख्या में होता है, इस स्थिति में काफिरों (गैर-मुस्लिमों)से झूठ बोलना और उन्हें धोखा देना जायज माना जाता है. यह अवस्था अपने को अंदरूनी तौर से मजबूत रखना और काफिरों से अपनी अंदरूनी जानकारियों से दूर रखना. नेहरुद्दीन जवाहिरी और मैमूना बेगम, राजीव का असली धर्म आज भी किसी को नहीं पता है.
२-काफिरों के मन में भय भरना :
इस काम के लिए काफिरों पर धोखे से हमला करना और उनकी हत्या करना, झुण्ड बनाकर किसी एक जगह पर काफिरों (गैर मुस्लिमों) पर हमले करना, जो पिछले ३-४ साल से भारत में जारी है. ट्रकों और गाड़ियों में भरकर किसी एक जगह पर हिन्दुओं को हड़काना सेकुलर सरकारों में कब से चल रहा है. इस काम के लिए गैर मुस्लिम अगुआ और आक्रामक नेताओं को मौत के घात उतरना, एक-एक करके उनको घात लगाकर खतम कर देना जिसे लोग भयभीत रहा करें और सार्वजनिक रूप से जबान न खोलें.

3 हथियारों का जखीरा इकठ्ठा करना :
यह काम बहुत ही निर्णायक होता है और इसमें धर्म युद्ध जैसे कोई नियम नहीं होते. काफ़िर को जितनी पीड़ा दायक मृत्यु दी जाये (दूसरे काफ़िर को दिखाकर) वह सबसे ज्यादा प्रभावी होता है. हथियार इकठ्ठा करने का काम जो “अदनान खगोशी और उसके बाद बहुत से मुस्लिम तस्कर” पिछले ४० साल से कर रहे हैं. सबसे ज्यादा हथियार सोवियत संघ से मुस्लिम देशों के टूटने के बाद भारत में लाये गए, अनुमान के अनुसार पूर्व सोवियत देशों से १ करोड़ AK-47 गायब हुयीं मगर आज तक उनका कोई पता नहीं है! ये हथियार मुख्यतः भारत-अफगानिस्तान-पाकिस्तान गए.
4 समय समय पर काफिरों की ताकत का अंदाज़ा करना :
इसके लिए दंगो का सहारा लेकर अपने आक्रमणों का काफिरों की तरफ से प्रतिरोध आंकना जो बहुत दिनों से चल रहा है और इसका ताजा उदाहरण जम्मू के किश्तवाड़ में देखने को मिला. छोटी-छोटी बातों पर बड़ा झगड़ा करके काफिरों की एक जुटता का और उनकी ताकत का पता लगाना.

5 ठिकाने या शिविर बनाना :
इस काम के लिए धर्म का सहारा और दूसरे धर्म पर इस्लाम को सच्चा धर्म बताकर लोगों को आस्थावान बनाकर किया जाता है जिससे लोग मुस्लिमों पर विश्वास करें और उन पर शक न करें. इस इलाके से गैर मुस्लिमों को दूर रखा जाता है जिससे उन्हें गतिविधियों की जानकारी मिल ही न सके और वे गाफिल रहें. इसके लिए बस्तियों और मस्जिदों को इस्तेमाल किया जाता है जहा पर लोगों को इकठ्ठा करना और हथियार रखना और भीड़ को भड़काकर काफिरों का उस इलाक़े में सफाया कर देना. इस्लामिक गतिविधि वाले शिविरों के इलाके से किसी न किसी बहाने सभी काफिरों को भगाना जरुरी होता है जिससे कि कहीं संवेदनशील सूचनाएँ काफिरों को लीक न हो जाएँ क्योंकि इस्लाम की असली ताकत “अल-तकिय्या” ही है.

6 सरकारी सुरक्षा तंत्र को कमजोर करना :
इस काम में तो खुद सरकारें तक शामिल हैं, हर शुक्रवार को नमाज़ के बाद पुलिस की पिटाई उनके मनोबल को तोड़कर पूरे तंत्र को कमजोर करने का हिस्सा है जो जोर-शोर से चल रहा है. असल में सेकुलर सरकारें खुद इस काम को पता नहीं किस वजह से समर्थन दे रही हैं. जिस फौजी के पास १२०० गज कारगर रेंज की असाल्ट रायफल है, वह इन जेहादियों पर गुलेल चला रहा है. इशरत जहाँ और सोहराबुद्दीन केस इसी का भाग है जो इस्लामिक शक्तियों के इशारे पर हो रहे हैं. सेना की संख्या कम रखना, उनके पास साधनों का अभाव, उनके ऊपर क़ानूनी शिकंजा, नौकरी को मजबूरी बनाना, यह इसी का हिस्सा है कि व्यापक दंगे की स्थिति में जिसमें मशीन गन और ग्रेनेड प्रयोग किये जाएँ, सेना का काम सिर्फ कर्फ्यू लगाने तक ही सीमित रहे.

7 व्यापक दंगे :
यह गजवा-ए-हिन्द का अंतिम पड़ाव है जिसमें बहुत कम समय में ज्यादा से ज्यादा काफ़िर या गैर मुस्लिम मर्दों को मौत के घाट उतारना और उनके प्रतिरोध को कम कर देना. गजवा-ए-हिन्द के लिए पाकिस्तान का भारत पर आक्रमण सबसे उपयुक्त समय होगा जो कि पाकिस्तानी वेबसाइटों पर बार-बार देखने को मिलता है. इस काम के लिए जेहादी लड़कों के मरने पर युवा जेहादियों को ७२ सुन्दर जवान हुर्रें मिलने की बात की जाती है और जीत गए तो जवान काफ़िर महिलाओं के साथ सहवास करने के अनंत मौके भी प्रस्तावित किये जाए हैं. यही अंतहीन सिलसिला पिछले १४०० सालों से चल रहा है. पहले भारत में सनातनी जड़ें गहरी थीं जिससे बार-बार सनातनी-हिदूत्व पनप सका लेकिन आज के दिन झूठे इतिहास और गलत पढ़ाई तथा चर्चों और अरबों द्वारा नियंत्रित टीवी / मिडिया ने हिंदुत्व का बेड़ा गर्क कर रखा है उस पर यह हिन्दू विरोधी सरकारें हर वह काम कर रही है जो हिंदुत्व को ख़त्म करने के लिए जरुरी है.

गजवा-ए-हिन्द की यह प्रक्रिया कश्मीर में आज़माई जा चुकी है जो १००% सफल रही है, जम्मू पश्चिम बंगाल केरल आदि में इसका ट्रायल चल रहा है. बीच में ईसाइयत के खेल ने इसे कमजोर ज़रूर किया था लेकिन अब दोबारा इसने गति पकड़ ली है. भले ही इसमें सबसे बड़ा रोड़ा जानकारी बाँटने के रूप में फेसबुक व्हाट्सएप्प सोसल मीडिया आ चुका है 
लेकिन फिर भी तस्करी के हथियार तो आ ही चुके हैं।

मिज़ोरम में क्रांति और फिर शांति

पूर्वोत्तर भारत में क्रांति और फिर शांति के महत्व को समझना हो तो एक बार ‘मिजोरम’ की यात्रा करनी चाहिए यात्रा न कर सकें तो मिजोरम के इतिहास को पढना चाहिए ...आजादी के बाद मिजोरम में हुए आंदोलन देश के अन्य राज्यों में हुए आंदोलनों से सर्वथा भिन्न रहे ...

मिज़ोरम कोई नहीं जाता। क्योंकि यह पूर्वोत्तर के पार की धरती है, पूर्वोत्तर के उस तरफ की धरती है। जिस तरह लद्दाख है हिमालय पार की धरती। जिसमें हिमालय चढने और उसे पार करने का हौंसला होता है, वही लद्दाख जा पाता है। ठीक इसी तरह जिसमें पूर्वोत्तर जाने और उसे भी पार करने का हौंसला होता है, वही मिज़ोरम जा पाता है। पूर्वोत्तर बडी बदनाम जगह है। वहां उग्रवादी रहते हैं जो कश्मीर के आतंकवादियों से भी ज्यादा खूंखार होते हैं। कश्मीर के आतंकवादी तो केवल सुरक्षाबलों को ही मारते हैं, पूर्वोत्तर के आतंकवादी सुरक्षाबलों को नहीं मारते बल्कि हिन्दीभाषियों को मारते हैं। कोकराझार बडी भयंकर जगह है। पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार है कोकराझार। कोकराझार से गुजरे बिना सिक्किम तो जाया जा सकता है लेकिन बाकी के सात राज्यों में नहीं जाया जा सकता।


भारत का सबसे साक्षर राज्य केरल (93.91%) है तो दूसरे स्थान पर मिज़ोरम (91.60%) है। यही नहीं देश के सबसे साक्षर दो जिले सेरछिप (98.76%) और आइजॉल (98.50%) हैं। ये दोनों मिज़ोरम में हैं।


मिज़ोरम के इतिहास का जिक्र किये बिना यह वृत्तान्त अधूरा है। यहां का असली इतिहास आजादी के बाद शुरू होता है। इसे आसाम राज्य में एक जिले का दर्जा दिया गया था। यहां की भाषा-संस्कृति आसाम से अलग होने के कारण शीघ्र ही इसे पक्षपात का सामना करना पडा। आसाम सरकार ने पूर्णतया मिज़ोरम की अनदेखी की। राजकीय भाषा असमिया कर देने और एक अकाल के बाद यहां स्थिति और बिगडी। ऐसे में इसे एक अलग राज्य बनाने की मांग जोर पकडने लगी। इसी दौरान एक विद्रोही संगठन मिजो नेशनल फ्रंट भी बन गया।

मिज़ो नेशनल फ्रंट का लक्ष्य अलग राज्य का नहीं था बल्कि भारत से स्वतन्त्र होकर अलग देश बनाने का था। इसके लिये इस फ्रंट ने अपनी एक सेना भी बनाई- मिज़ो नेशनल आर्मी। 1960 के दशक में फ्रंट के नेताओं ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) का भी दौरा करना शुरू किया। वहां से पाकिस्तान ने उन्हें हरसम्भव सहायता दी, धन और हथियारों की सहायता व इन्हें चलाने का प्रशिक्षण भी।
इसी दौरान भारत-चीन युद्ध और भारत-पाकिस्तान युद्ध हुए। भारत का सारा ध्यान अपनी पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर लग गया। विद्रोही फ्रंट ने इस परिस्थिति का भरपूर लाभ उठाया। इसकी अपनी प्रशिक्षित सेना हथियारों से लैस थी ही, साथ ही अच्छा संख्याबल भी था। विद्रोह को सुनियोजित तरीके से अन्जाम दिया गया। गुप्तरूप से इस ऑपरेशन का नाम रखा गया- ऑपरेशन जेरिचो। इसका अन्तिम लक्ष्य 1 मार्च 1966 को पूर्ण क्रान्ति करके मिज़ोरम को स्वतन्त्र राष्ट घोषित करने का था। इसमें कोई शक नहीं था कि तात्कालित तौर पर पाकिस्तान इस नये देश का समर्थन करता।

विद्रोही 28 फरवरी की रात को आइजॉल में घुस गये। इन्होंने शहर की टेलीफोन लाइनें काट दीं ताकि प्रशासन बाहर से सहायता न मांग सके। इन्होंने रात में ही शहर के सभी प्रमुख स्थानों और कार्यालयों पर कब्जा कर लिया। शहर की पूर्ण घेराबन्दी कर दी ताकि कोई बाहर न जा सके। कानून व्यवस्था स्थानीय पुलिस और आसाम राइफल्स के हाथों से निकल चुकी थी। हालात इतने बदतर हो चुके थे कि आइजॉल के डिप्टी कमिश्नर को आसाम राइफल्स के यहां शरण लेनी पडी। बाहर से सहायता का एकमात्र साधन सिल्चर सडक ही थी जिसे विद्रोहियों ने बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया था।

1 मार्च 1966 को मिज़ो नेशनल फ्रंट के नेता लालदेंगा ने भारत से आजादी की घोषणा कर दी और अधिक से अधिक संख्या में मिज़ो लोगों को अपने समर्थन में करने लगे। इसके बाद शहर में बुरी तरह हिंसा भडक उठी। गैर-मिज़ो लोगों को जमकर मारा गया, उनकी दुकानें लूटी गईं और घरों में आग लगा दी गई।
मिज़ोरम के दूसरे भागों में भी ऐसा ही हुआ। आइजॉल से 200 किलोमीटर दूर चम्फाई में तो उन्होंने आसानी से आसाम राइफल्स की पोस्ट पर कब्जा कर लिया। आसाम की सीमा पर स्थित वैरेंगते पर भी कब्जा कर लिया और सरकारी कर्मचारियों को जिले से भागना पडा। लुंगलेई में भी ऐसा ही हुआ। कोलासिब में करीब 250 लोगों को बन्धक बना लिया गया जिनमें गैर-मिज़ो नागरिक, सरकारी कर्मचारी आदि थे।
3 मार्च को भारत की आंख खुली। मामले की गम्भीरता को देखते हुए आसाम राइफल्स की और ज्यादा बटालियनें हेलीकॉप्टर से आइजॉल भेजी गईं व शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। हेलीकॉप्टर से जवानों को भेजना भी आसान नहीं था क्योंकि विद्रोहियों के पास अच्छे हथियार थे जो हवा में घातक मार कर सकते थे। इसकी जिम्मेदारी भारतीय वायुसेना को दी गई। पहली कोशिशों में विद्रोहियों ने वायुसेना को भी क्षति पहुंचाई। इसके बाद वो घटना हुई जिसे भारत तो क्या कोई भी देश नहीं करना चाहेगा। अपने ही देश में अपने ही नागरिकों पर हवाई हमला। वायुसेना ने जमकर हवाई हमले किये। बाद में मिज़ोरम के मुख्यमन्त्री ज़ोरमथंगा ने इन हमलों को ‘निर्दयी बमबारी’ कहा था। तात्कालिक रूप से ऐसा करना आवश्यक था।

उधर थलसेना ने भी मोर्चा संभाला। 6 मार्च को सेना आइजॉल पहुंची, इसके बाद चम्फाई और लुंगलेई। मार्च के अन्त तक सेना ने पूरे मिज़ोरम का कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया। एक समय मिज़ोरम में सभी आसाम राइफल्स की चौकियों पर विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया था सिवाय आइजॉल के। लेकिन वायुसेना ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया। रही सही कसर थलसेना ने पूरी कर दी।

इसके बाद विद्रोहियों को भागना पडा और वे गांवों में सामान्य लोगों के बीच घुलमिल गये और अपनी गतिविधियां जारी रखीं। यह भी एक चुनौतीयुक्त परिस्थिति थी क्योंकि इसमें आमलोगों को दोतरफा मार पडती है- एक तो विद्रोहियों से और दूसरी सेना से। तब जनवरी 1967 में भारत सरकार ने यहां ग्रुपिंग पॉलिसी लागू की जिसमें सभी को अपने अपने गांव छोडकर सेना के नियन्त्रण वाले इलाकों में बसना था। ये निवास स्थान मुख्यतः सडकों के पास थे। ऐसा करने के बाद सेना को विद्रोहियों को ढूंढने व उनकी चालें नाकाम करने में आसानी रही, हालांकि बडी संख्या में आमलोगों को मानसिक समस्या का सामना करना पडा। अपना घर व जमीन छोडकर अनजान स्थान पर बसना किसे अच्छा लगता है?

इसके बाद हालात और सुधरे। अगस्त 1968 में विद्रोहियों को माफी दे दी गई जिसके फलस्वरूप बडी संख्या में विद्रोहियों ने समर्पण किया व मुख्यधारा में शामिल हुए। फिर 21 जनवरी 1972 को मिज़ोरम को केन्द्र शासित प्रदेश बना दिया गया। मिज़ो नेशनल फ्रंट की विद्रोही गतिविधियां 1976 में समाप्त हुईं जब उसने भारत सरकार के साथ ‘सन्धि’ की। इसकी शर्तों के अनुसार भारत सरकार मिज़ोरम को अलग राज्य बनाने व आइजॉल को उसकी राजधानी बनाने पर सहमत हुई तो फ्रंट अपनी विद्रोही व हिंसक गतिविधियां छोडने पर। आखिरकार मिज़ोरम 20 फरवरी 1987 को भारत का राज्य बना।
तो जी, ऐसी भीषण कहानी थी मिज़ोरम की। अब मिज़ोरम भारत के सबसे शान्त राज्यों में से एक है। इसके पडोसी राज्य अवश्य उत्पाती हैं।

मिजोरम की एक खासियत इसकी साक्षरता है .... भारत के प्रमुख साक्षर राज्यों में शीर्ष पर स्थित मिजोरम में मिजो भाषा बोली जाती है लेकिन चूंकि मिजो भाषा की कोई अपनी लिपि नहीं है इसलिए यह रोमन में लिखी जाती है .... बावजूद इसके मिजोरम साक्षरता के मायने में एक मिसाल है ... और क्रांति के बाद शांति के मामले में भी।

रविवार, 2 जुलाई 2017

बौद्ध गुरु विराथु




बर्मा के बौद्ध गुरु विराथु जी ने आखिर किस तरीके से मुस्लिम को भगाया या कमज़ोर किया समझो...जैसे मुसलमानों का '७८६' का नंबर लकी माना जाता है ..वैसे ही विराथु ने '९६९ ' का नंबर निकाला ... और उन्होंने पुरे देश के लोगों से आह्वान किया ... कि जो भी राष्ट्रभक्त बौद्ध है वो इस स्टीकर को अपने अपने जगह पर लगायें ...इसके बाद टैक्सी चलाने वालों ने टैक्सी पर... दूकान वालों ने दूकान पर .... इसको लगाना शुरू किया ... लेकिन विराथु का सन्देश साफ़ था ... कि हम बौद्ध अपने सारे खरीदारी और व्यापार वहीँ करेंगे जहां ये स्टीकर लगा होगा ... .किसी को टैक्सी में चढ़ना हो तो उसी टैक्सी में चढ़ेंगे जिसके ऊपर ये स्टीकर होगा .... उसी रेस्टोरेंट में खायेंगे जहां ये स्टीकर होगा ।उन्होंने ये भी कहा कि हो सकता है ऐसी हालत में मुस्लिम सऊदी से आये पैसों के दम पर अपने माल को कम कीमत पर बेच कर आपको आकर्षित करे ... लेकिन आप ध्यान रखना ... आप दो पैसा ज्यादा देना ... और सोचना कि आपने अपने देश के लिए पैसा लगाया है ... दो पैसे कम में खरीद कर मातृभूमि से गद्दारी मत करना .... वो आपके पैसे आपको ही मिटाने में लगाते हैं...मुर्खता मत करना ...दोस्तों ... हालत ये हो गए .. कि मुस्लिम के व्यापार ठप्प पड़ गए... मुस्लिम इतने आतंकित हुए कि इस स्टीकर लगे टैक्सी को चढ़ना तो दूर ... किनारे से कन्नी काटने लगे... पुरे देश में मुसलमानों के होश ठिकाने आ गए ... और फिर ये स्टीकर एक तरह से देशभक्ति का प्रमाण बन गया... उनके जिहाद का जवाब बन गया.... और इस अनोखे आईडिया का प्रभाव आप देख सकते हैं कि आज बर्मा से मुस्लिम भाग चुके हैं...अगर आप भी इन मुसलमानो की अकल ठिकाने लगाने चाहते है तो सिर्फ हिन्दुओ व आर्यो से ही व्यापार करे।अगर सभी हिन्दू भाई अपनी कार्यस्थलो पर ॐ का या जय श्री राम का स्टिकर लगाये तो मुस्लिम जिहाद को बहुत बड़ी चोट पहुंचाई जा सकती है।x

बुधवार, 28 जून 2017

⁠⁠⁠कश्मीरी पंडित...


कश्मीरी पंडित... एक ऐसी कहानी जो देश के अधिकतर लोगो को पता नहीं है।
आप सभी ने सुना होगा कश्मीरी पंडितो के बारे में। हम सभी ने सुना है की हाँ कुछ तो हुआ था कश्मीरी पंडितो के साथ। लेकिन क्या हुआ था क्यों हुआ था ......यह ठीक से पता नहीं है।
यहाँ यह बताया जा रहा है कि क्या हुआ था कश्मीर में और क्या हुआ था कश्मीरी पंडितो के साथ।
पार्ट 1: कश्मीर का खुनी इतिहास
कश्मीर का नाम कश्यप ऋषि के नाम पर पड़ा था। कश्मीर के मूल निवासी सारे हिन्दू थे।
कश्मीरी पंडितो की संस्कृति 5000 साल पुरानी है और वो कश्मीर के मूल निवासी हैं। इसलिए अगर कोई कहता है की भारत ने कश्मीर पर कब्ज़ा कर लिया है यह बिलकुल गलत है।
14वीं शताब्दी में तुर्किस्तान से आये एक क्रूर आतंकी मुस्लिम दुलुचा ने 60,000 लोगो की सेना के साथ कश्मीर में आक्रमण किया और कश्मीर में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना की। दुलुचा ने नगरों और गाँव को नष्ट कर दिया और हजारों हिन्दुओ का नरसंघार किया। बहुत सारे हिन्दुओ को जबरदस्ती मुस्लिम बनाया गया। बहुत सारे हिन्दुओ ने जो इस्लाम नहीं कबूल करना चाहते थे, उन्होंने जहर खाकर
आत्महत्या कर ली और बाकि भाग गए या क़त्ल कर दिए गए
या इस्लाम कबूल करवा लिए गए। आज जो भी कश्मीरी मुस्लिम है उन सभी के पूर्वजो को इन अत्याचारों के कारण
जबरदस्ती मुस्लिम बनाया गया था।
भारत पर मुस्लिम आक्रमण अतिक्रमण - विश्व इतिहास का सबसे ज्यादा खुनी कहानी:
http://www.youtube.com/watch?v=TMY2YV9WucY
भारत के खुनी विभाजन के बारे में जानने के लिए यह विडियो देखे:
http://www.youtube.com/watch?v=jGiTaQ60Je0
अधिक जानकारी के लिए इस लिंक को देखे:
http://kasmiripandits.blogspot.com/…/tragic-history-of-kasm…
http://en.wikipedia.org/wiki/Kashmir#Muslim_rule
पार्ट 2: 1947 के समय कश्मीर
1947 में ब्रिटिश संसद के "इंडियन इंडीपेनडेंस इ एक्ट" के अनुसार ब्रिटेन ने तय किया की मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को पाकिस्तान बनाया जायेगा। 150 राजाओं ने पाकिस्तान चुना और बाकी 450 राजाओ ने भारत। केवल एक जम्मू और कश्मीर के राजा बच गए थे जो फैसला नहीं कर पा रहे थे। लेकिन जब पाकिस्तान ने फौज भेजकर कश्मीर पर आक्रमण किया तो कश्मीर के
राजा ने भी हिंदुस्तान में कश्मीर के विलय के लिए दस्तख़त कर दिए। ब्रिटिशो ने यह कहा था की राजा अगर एक बार दस्तखत कर दिया तो वो बदल नहीं सकता और जनता की आम राय पूछने की जरुरत नहीं है। तो जिन कानूनों के आधार पर भारत और पाकिस्तान बने थे
उन नियमो के अनुसार कश्मीर पूरी तरह से भारत का अंग बन गया था। इसलिए कोई भी कहता है की कश्मीर पर भारत ने जबरदस्ती कब्ज़ा कर रहे है वो बिलकुल झूठ है।
अधिक जानकारी के लिए यह विडियो आप देख सकते है:
http://www.youtube.com/watch?v=gxhVDKRFh28
पार्ट 3: सितम्बर 14, 1989
बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्य और जाने माने वकील कश्मीरी पंडित तिलक लाल तप्लू का JKLF ने क़त्ल कर दिया। उसके बाद जस्टिस नील कान्त गंजू को गोली मार दिया गया। सारे कश्मीरी नेताओ की हत्या एक एक करके कर दी गयी। उसके बाद 300 से ज्यादा हिन्दू महिलाओ और पुरुषो की निर्संश हत्या की गयी।
कश्मीरी पंडित नर्स जो श्रीनगर के सौर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में काम करती थी, का सामूहिक बलात्कार किया गया और मार मार कर उसकी हत्या कर दी गयी। यह खुनी खेल चलता रहा और अपने सेकुलर राज्य और केंद्र सरकार, मीडिया ने
कुछ भी नहीं किया।
पार्ट ४: जनवरी 4, 1990
आफताब, एक स्थानीय उर्दू अखबार ने हिज्ब -उल -मुजाहिदीन की तरफ से एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की, सभी हिन्दू अपना सामन पैक करें और कश्मीर छोड़ कर चले जाएँ। एक अन्य स्थानीय समाचार पत्र, अल सफा ने इस निष्कासन आदेश को दोहराया। मस्जिदों में भारत और हिन्दू विरोधी भाषण दिए जाने लगे।
सभी कश्मीरी हिन्दू/मुस्लिमो को कहा गया की इस्लामिक ड्रेस कोड अपनाये। सिनेमा और विडियो पार्लर वगैरह बंद कर दिए गए। लोगो को मजबूर किया गया की वो अपनी घड़ी पाकिस्तान के समय के अनुसार करे लें।
अधिक जानकारी के लिए यह लिंक और ब्लॉग आप देख सकते है:
http://kasmiripandits.blogspot.com/2012/04/when-kashmiri-
pandits-fled-islamic.html
http://www.rediff.com/news/2005/jan/19kanch.htm -
[19/01/90: When Kashmiri Pandits fled Islamic terror]
पार्ट 5: जनवरी 19, 1990
सारे कश्मीरी पंडितो के घर के दरवाजो पर नोट लगा दिया जिसमे लिखा था "या तो मुस्लिम बन जाओ या कश्मीर छोड़ कर भाग जाओ या फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ"। पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने टीवी पर कश्मीरी मुस्लिमो को भारत से आजादी के लिए भड़काना शुरू कर दिया। सारे कश्मीर के मस्जिदों में एक टेप चलाया गया। जिसमे मुस्लिमो को कहा गया की वो हिन्दुओ को कश्मीर से निकाल बाहर करें। उसके बाद सारे कश्मीरी मुस्लिम सडको पर उतर आये। उन्होंने कश्मीरी पंडितो के घरो को जला दिया, कश्मीर पंडित महिलाओ का बलात्कार करके, फिर उनकी हत्या करके उनके नग्न शरीर को पेड़ पर
लटका दिया गया। कुछ महिलाओ को जिन्दा जला दिया गया और बाकियों को लोहे के गरम सलाखों से मार दिया गया। बच्चो को स्टील के तार से गला घोटकर मार
दिया गया। कश्मीरी महिलाये ऊंचे मकानों की छतो से कूद कूद कर जान देने लगी।
कश्मीरी मुस्लिम, कश्मीरी हिन्दुओ के हत्या करते चले गए और नारा लगते चले गए की उन पर अत्याचार हुआ है और उनको भारत से आजादी चाहिए।
पार्ट 6: कश्मीरी पंडितो का पलायन
3,50,000 कश्मीरी पंडित अपनी जान बचा कर कश्मीर से भाग गए। कश्मीरी पंडित जो कश्मीर के मूल निवासी है उन्हें कश्मीर छोड़ना पड़ा और तब कश्मीरी मुस्लिम कहते है की उन्हें आजादी चाहिए। यह सब कुछ चलता रहा लेकिन सेकुलर मीडिया चुप रही उन्होंने देश के लोगो तक यह बात कभी नहीं पहुचाई इसलिए देश के लोगो को आज तक नहीं पता चल पाया की क्या हुआ था कश्मीर में। देश- विदेश के लेखक चुप रहे, भारत का संसद चुप रहा, सारे हिन्दू, मुस्लिम, सेकुलर चुप रहे। किसी ने भी 3,50,000 कश्मीरी पंडितो के बारे में कुछ नहीं कहा। आज भी अपने देश के मीडिया 2002 के दंगो के रिपोर्टिंग में व्यस्त है। वो कहते है
की गुजरात में मुस्लिम विरोधी दंगे हुए थे लेकिन यह
कभी नहीं बताते की 750 मुस्लिमों के साथ साथ 310 हिन्दू भी मरे थे और यह भी कभी नहीं बताते की दंगो की शुरुआत मुस्लिमो ने की थी, जब उन्होंने 59 हिन्दुओं को ट्रेन में गोधरा में जिन्दा जला दिया था। हिन्दुओं पर अत्याचार के बात की रिपोर्टिंग से कहते है की अशांति फैलेगी, लेकिन मुस्लिमो पर हुए अत्याचार की रिपोर्टिंग से अशांति नहीं फैलती। इसे कहते है सेकुलर (धर्मनिरपेक्ष) पत्रकारिता।
http://kashmiris-in-exile.blogspot.com/2009/01/19-years-
to-19th-day-of-1990-exodus-of.html
पार्ट 7: कश्मीरी पंडितो के आज की स्थिति
आज 4.5 लाख कश्मीरी पंडित अपने देश में ही रेफूजी की तरह रह रहे है। पूरे देश या विदेश में कोई भी नहीं है उनको देखने वाला।
कोई भी मीडिया नहीं है जो उनके बारे में हुए अत्याचार को बताये। कोई भी सरकार या पार्टी या संस्था नहीं है जो की विस्थापित कश्मीरियों को उनके पूर्वजों के भूमि में वापस ले जाने को तैयार है। कोई भी नहीं इस इस दुनिया में जो कश्मीरी पंडितो के लिए "न्याय" की मांग करे। कश्मीरी पंडित काफी पढ़े लिखे लोगो के तरह जाने जाते थे, आज वो भिखारियों के तरह पिछले 24 सालो से टेंट में रह रहे है। उन्हें मुलभुत सुविधाए भी नहीं मिल पा रही है, पीने के लिए पानी तक की समस्या है।
भारतीय और विश्व की मीडिया, मानवाधिकार संस्थाए गुजरात दंगो में मरे 750 मुस्लिमो (310 मारे गए हिन्दुओ को भूलकर) की बात करते है। लेकिन यहाँ तो कश्मीरी पंडितो की बात करने
वाला कोई नहीं है क्योकि वो हिन्दू है। 20,000 कश्मीरी हिन्दू बस धुप की गर्मी के कारण मर गए क्योकि वो कश्मीर के ठन्डे मौसम में रहने के आदि थे।
अधिक जानकारी के लिए यह विडियो आप देख सकते है:
http://www.youtube.com/watch?v=kqSqn0id-IE [Shocking, Tragic and Horrible story of Kashmiri Pandits]
पार्ट 8: कश्मीरी पंडितो और भारतीय सेना के खिलाफ भारतीय मीडिया का षड्यंत्र
आज देश के लोगो को कश्मीरी पंडितो के मानवाधिकारों के बारे में भारतीय मीडिया नहीं बताती है लेकिन आंतकवादियों के मानवाधिकारों के बारे में जरुर बताती है। आज सभी को यह बताया जा रहा था है की ASFA नाम का किसी कानून का भारतीय सेना काफी ज्यादा दुरूपयोग किया है। कश्मीर में अलगावादी संगठन मासूम लोगो की हत्या करवाते है और भारतीय सेना के जवान जब उन आतंकियों के खिलाफ कोई करवाई करते है तो यह अलगावादी नेता अपने बिकी हुए मीडिया के सहायता से चीखना चिल्लाना शुरू कर देते है की देखो हमारे ऊपर कितना अत्याचार हो रहा है।
मित्रों, बात यहाँ तक नहीं रुकी है। अश्विन कुमार जैसे कुछ डाइरेक्टर इंशाल्लाह कश्मीर और दूसरी हैदर जैसी मूवी के जरिये पूरे विश्व की लोगो को यह दिखा रहे है की कश्मीर के भोले भाले मुस्लिम युवाओ पर
भारतीय सेना के जवानों ने अत्याचार किया है।
अश्विन कुमार अपने वृत्तचित्र पूरे विश्व के पटल पर रख रहे है। हर तरह से देश और विदेश में लोगो को दिखा रहे है की गलती भारतीय सेना की है..लेकिन जो सच्चाई है वो बिलकुल यह छिपा दे रहे है।
इस विडियो में देखे की किस प्रकार भारतीय सेना के
खिलाफ षड़यंत्र किया जा रहा है:
http://www.youtube.com/watch?v=LofOulSw07k - [Anti Hindu and Anti Indian Military - Indian Secular Media Exposed!]
पार्ट 9: निष्कर्ष
सारे मुस्लिम कहते है मोदी को फांसी दो जबकि मोदी ने गुजरात की दंगो को समय रहते रोक दिया। लेकिन आज तक एक भी मुस्लिम को यह कहते नहीं सुना गया की कांग्रेस के नेताओं, गाँधी परिवार और अब्दुल्लाह परिवार को फांसी दो।
जो लाखो कश्मीरी पंडितो के कत्लेआम देखते रहे।
मित्रों, इस कहानी को अगर आप पढ़ चुके है तो अपने बाकी मित्रो के साथ शेयर करे ताकि उन्हें भी सत्य का ज्ञान हो। जो कश्मीर में हुआ था, हम नहीं चाहते की हमारे बच्चे 10 सालों के बाद केरलाइ हिन्दू, बंगाली हिन्दुओ के बारे में कहानिया सुने जैसा हम आज कश्मीरी हिन्दुओ के बारे में सुनते हैं।
http://kasmiripandits.blogspot.com/2012/03/kasmiri-pandit-

दबाव, विवाद, प्रभाव और मुस्लिम जनसंख्या - टेररिज़्म एण्ड इस्लाम

                               दबाव, विवाद, प्रभाव और मुस्लिम जनसंख्या 

जब तक मुस्लिमों की जनसंख्या, किसी देश/प्रदेश/क्षेत्र में लगभग 2% के आसपास होती है, तब वे एकदम शांतिप्रिय, कानून पसन्द अल्पसंख्यक बनकर रहते हैं और किसी को विशेष शिकायत का मौका नहीं देते, जैसे -- अमेरिका – मुस्लिम 0.6% ऑस्ट्रेलिया – मुस्लिम 1.5% कनाडा – मुस्लिम 1.9% चीन – मुस्लिम 1.8% इटली – मुस्लिम 1.5% नॉर्वे – मुस्लिम 1.8% जब मुस्लिम जनसंख्या 2% से 5% के बीच तक पहुँच जाती है, तब वे अन्य धर्मावलम्बियों में अपना “धर्मप्रचार” शुरु कर देते हैं, जिनमें अक्सर समाज का निचला तबका और अन्य धर्मों से असंतुष्ट हुए लोग होते हैं, जैसे कि – डेनमार्क – मुस्लिम 2% जर्मनी – मुस्लिम 3.7% ब्रिटेन – मुस्लिम 2.7% स्पेन – मुस्लिम 4% थाईलैण्ड – मुस्लिम 4.6% मुस्लिम जनसंख्या के 5% से ऊपर हो जाने पर वे, अपने अनुपात के हिसाब से अन्य धर्मावलम्बियों पर दबाव बढ़ाने लगते हैं, और अपना प्रभाव जमाने की कोशिश करने लगते हैं। उदाहरण के लिये -- वे सरकारों और शॉपिंग मॉल पर “हलाल” का माँस रखने का दबाव बनाने लगते हैं, वे कहते हैं कि, “हलाल” का माँस न खाने से, उनकी धार्मिक मान्यतायें प्रभावित होती हैं। इस कदम से, कई पश्चिमी देशों में “खाद्य वस्तुओं” के बाजार में मुस्लिमों की तगड़ी पैठ बनी। उन्होंने, कई देशों के सुपरमार्केट के मालिकों को, दबाव डालकर अपने यहाँ “हलाल” का माँस रखने को बाध्य किया। दुकानदार भी “धंधे” को देखते हुए उनका कहा मान लेता है ( अधिक जनसंख्या होने का “फ़ैक्टर” यहाँ से मजबूत होना शुरु हो जाता है ), ऐसा जिन देशों में हो चुका वह हैं, जैसे कि -- फ़्रांस – मुस्लिम 8% फ़िलीपीन्स – मुस्लिम 6% स्वीडन – मुस्लिम 5.5% स्विटजरलैण्ड – मुस्लिम 5.3% नीडरलैण्ड – मुस्लिम 5.8% त्रिनिदाद और टोबैगो– मुस्लिम 6% इस बिन्दु पर आकर मुस्लिम, सरकारों पर यह दबाव बनाने लगते हैं कि, उन्हें उनके “क्षेत्रों” में शरीयत कानून (इस्लामिक कानून) के मुताबिक चलने दिया जाये ( क्योंकि, उनका अन्तिम लक्ष्य तो यही है कि समूचा विश्व “शरीयत” कानून के हिसाब से चले)। जब मुस्लिम जनसंख्या 10% से अधिक हो जाती है तब वे उस देश/प्रदेश/राज्य/क्षेत्र विशेष में कानून-व्यवस्था के लिये परेशानी पैदा करना शुरु कर देते हैं, शिकायतें करना शुरु कर देते हैं, उनकी “आर्थिक परिस्थिति” का रोना लेकर बैठ जाते हैं, छोटी-छोटी बातों को सहिष्णुता से लेने की बजाय दंगे, तोड़फ़ोड़ आदि पर उतर आते हैं, चाहे वह फ़्रांस के दंगे हों, डेनमार्क का कार्टून विवाद हो, या फ़िर एम्स्टर्डम में कारों का जलाना हो, हरेक विवाद को समझबूझ, बातचीत से खत्म करने की बजाय, खामख्वाह विवाद को और गहरा किया जाता है, जैसे कि – गुयाना – मुस्लिम 10% इसराइल -- मुस्लिम 16% केन्या – मुस्लिम 11% रूस – मुस्लिम 15%(चेचन्या – मुस्लिम आबादी 70%) जब मुस्लिम जनसंख्या 20% से ऊपर हो जाती है तब विभिन्न, सैनिक शाखायें, जेहाद के नारे लगाने लगती हैं, धार्मिक और असहिष्णुता हत्याओं का दौर शुरु हो जाता है, जैसे- इथियोपिया – मुस्लिम 32.8% भारत – मुस्लिम 22% मुस्लिम जनसंख्या के 40% के स्तर से ऊपर पहुँच जाने पर बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याऐं, आतंकवादी कार्रवाईयाँ आदि चलने लगते हैं, जैसे – बोस्निया – मुस्लिम 40% चाड – मुस्लिम 54.2% लेबनान – मुस्लिम 59% जब मुस्लिम जनसंख्या 60% से ऊपर हो जाती है तब, अन्य धर्मावलंबियों का जातीय सफ़ाया शुरु किया जाता है (उदाहरण - भारत का कश्मीर), जबरिया मुस्लिम बनाना, अन्य धर्मों के धार्मिक स्थल तोड़ना, जजिया जैसा कोई अन्य कर वसूलना आदि किया जाता है, जैसे – अल्बानिया – मुस्लिम 70% मलेशिया – मुस्लिम 62% कतर – मुस्लिम 78% सूडान – मुस्लिम 75% जनसंख्या के 80% से ऊपर हो जाने के बाद तो सत्ता/शासन प्रायोजित जातीय की सफ़ाई किया जाता है, अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है, सभी प्रकार के हथकण्डे/हथियार अपनाकर जनसंख्या को 100% तक ले जाने का लक्ष्य रखा जाता है, जैसे – बांग्लादेश – मुस्लिम 83% मिस्त्र – मुस्लिम 90% गाज़ा पट्टी – मुस्लिम 98% ईरान – मुस्लिम 98% ईराक – मुस्लिम 97% जोर्डन – मुस्लिम 93% मोरक्को – मुस्लिम 98% पाकिस्तान – मुस्लिम 97% सीरिया – मुस्लिम 90% संयुक्त अरबअमीरात – मुस्लिम 96% बनती कोशिश पूरी 100% जनसंख्या मुस्लिम बन जाने, यानी कि दार-ए-स्सलाम होने की स्थिति में वहाँ सिर्फ़ मदरसे होते हैं, और, सिर्फ़ कुरान पढ़ाई जाती है, उसे ही अन्तिम सत्य माना जाता है, जैसे – अफ़गानिस्तान– मुस्लिम 100% सऊदी अरब – मुस्लिम 100% सोमालिया – मुस्लिम 100% यमन – मुस्लिम 100% आज की स्थिति में मुस्लिमों की जनसंख्या समूचे विश्व की जनसंख्या का 22 - 24% है, लेकिन ईसाईयों, हिन्दुओं और यहूदियों के मुकाबले उनकी जन्मदर को देखते हुए कहा जा सकता है कि, इस शताब्दी के अन्त से पहले ही मुस्लिम जनसंख्या विश्व की 50% हो जायेगी (यदि तब तक धरती बची तो)… भारत में कुल मुस्लिम जनसंख्या 15% के आसपास मानी जाती है, जबकि, हकीकत यह है कि उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और केरल के कई जिलों में यह आँकड़ा 40 से 70% तक पहुँच चुका है… अब देश में आगे चलकर क्या परिस्थितियाँ बनेंगी यह कोई भी (“सेकुलरों” को छोड़कर) आसानी से सोच-समझ सकता है … (सभी सन्दर्भ और आँकड़े : डॉ पीटर हैमण्ड की पुस्तक “स्लेवरी, टेररिज़्म एण्ड इस्लाम – द हिस्टोरिकल रूट्स एण्ड कण्टेम्पररी थ्रेट तथा लियोन यूरिस – “द हज”, से साभार

रानी लक्ष्मीबाई

अंग्रेज़ों की तरफ़ से कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स पहला शख़्स था जिसने रानी लक्ष्मीबाई को अपनी आँखों से लड़ाई के मैदान में लड़ते हुए देखा.
उन्होंने घोड़े की रस्सी अपने दाँतों से दबाई हुई थी. वो दोनों हाथों से तलवार चला रही थीं और एक साथ दोनों तरफ़ वार कर रही थीं.
उनसे पहले एक और अंग्रेज़ जॉन लैंग को रानी लक्ष्मीबाई को नज़दीक से देखने का मौका मिला था, लेकिन लड़ाई के मैदान में नहीं, उनकी हवेली में.
जब दामोदर के गोद लिए जाने को अंग्रेज़ों ने अवैध घोषित कर दिया तो रानी लक्ष्मीबाई को झाँसी का अपना महल छोड़ना पड़ा था.
उन्होंने एक तीन मंज़िल की साधारण सी हवेली 'रानी महल' में शरण ली थी.
रानी ने वकील जॉन लैंग की सेवाएं लीं जिसने हाल ही में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ एक केस जीता था.
'रानी महल' में लक्ष्मी बाई
लैंग का जन्म ऑस्ट्रेलिया में हुआ था और वो मेरठ में एक अख़बार, 'मुफ़ुस्सलाइट' निकाला करते थे.
लैंग अच्छी ख़ासी फ़ारसी और हिंदुस्तानी बोल लेते थे और ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन उन्हें पसंद नहीं करता था, क्योंकि वो हमेशा उन्हें घेरने की कोशिश किया करते थे.
जब लैंग पहली बार झाँसी आए तो रानी ने उनको लेने के लिए घोड़े का एक रथ आगरा भेजा था.
उनको झाँसी लाने के लिए रानी ने अपने दीवान और एक अनुचर को आगरा रवाना किया.
अनुचर के हाथ में बर्फ़ से भरी बाल्टी थी जिसमें पानी, बियर और चुनिंदा वाइन्स की बोतलें रखी हुई थीं. पूरे रास्ते एक नौकर लैंग को पंखा करते आया था.
झाँसी पहुंचने पर लैंग को पचास घुड़सवार एक पालकी में बैठा कर 'रानी महल' लाए जहाँ के बगीचे में रानी ने एक शामियाना लगवाया हुआ था.
मलमल की साड़ी
रानी लक्ष्मीबाई शामियाने के एक कोने में एक पर्दे के पीछे बैठी हुई थीं. तभी अचानक रानी के दत्तक पुत्र दामोदर ने वो पर्दा हटा दिया.



लैंग की नज़र रानी के ऊपर गई. बाद में रेनर जेरॉस्च ने एक किताब लिखी, 'द रानी ऑफ़ झाँसी, रेबेल अगेंस्ट विल.'
किताब में रेनर जेरॉस्च ने जॉन लैंग को कहते हुए बताया, 'रानी मध्यम कद की तगड़ी महिला थीं. अपनी युवावस्था में उनका चेहरा बहुत सुंदर रहा होगा, लेकिन अब भी उनके चेहरे का आकर्षण कम नहीं था. मुझे एक चीज़ थोड़ी अच्छी नहीं लगी, उनका चेहरा ज़रूरत से ज़्यादा गोल था. हाँ उनकी आँखें बहुत सुंदर थी और नाक भी काफ़ी नाज़ुक थी.उनका रंग बहुत गोरा नहीं था. उन्होंने एक भी ज़ेवर नहीं पहन रखा था, सिवाए सोने की बालियों के. उन्होंने सफ़ेद मलमल की साड़ी पहन रखी थी, जिसमें उनके शरीर का रेखांकन साफ़ दिखाई दे रहा था.. जो चीज़ उनके व्यक्तित्व को थोड़ा बिगाड़ती थी- वो थी उनकी फटी हुई आवाज़.'
रानी के घुड़सवार
बहरहाल कैप्टन रॉड्रिक ब्रिग्स ने तय किया कि वो खुद आगे जा कर रानी पर वार करने की कोशिश करेंगे.
लेकिन जब जब वो ऐसा करना चाहते थे, रानी के घुड़सवार उन्हें घेर कर उन पर हमला कर देते थे. उनकी पूरी कोशिश थी कि वो उनका ध्यान भंग कर दें.
कुछ लोगों को घायल करने और मारने के बाद रॉड्रिक ने अपने घोड़े को एड़ लगाई और रानी की तरफ़ बढ़ चले थे.
उसी समय अचानक रॉड्रिक के पीछे से जनरल रोज़ की अत्यंत निपुण ऊँट की टुकड़ी ने एंट्री ली. इस टुकड़ी को रोज़ ने रिज़र्व में रख रखा था.
इसका इस्तेमाल वो जवाबी हमला करने के लिए करने वाले थे. इस टुकड़ी के अचानक लड़ाई में कूदने से ब्रिटिश खेमे में फिर से जान आ गई. रानी इसे फ़ौरन भाँप गई.
उनके सैनिक मैदान से भागे नहीं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या कम होनी शुरू हो गई.
ब्रिटिश सैनिक
उस लड़ाई में भाग ले रहे जॉन हेनरी सिलवेस्टर ने अपनी किताब 'रिकलेक्शंस ऑफ़ द कैंपेन इन मालवा एंड सेंट्रल इंडिया' में लिखा, "अचानक रानी ज़ोर से चिल्लाई, 'मेरे पीछे आओ.' पंद्रह घुड़सवारों को एक जत्था उनके पीछे हो लिया. वो लड़ाई के मैदान से इतनी तेज़ी से हटीं कि अंग्रेज़ सैनिकों को इसे समझ पाने में कुछ सेकेंड लग गए. अचानक रॉड्रिक ने अपने साथियों से चिल्ला कर कहा, 'दैट्स दि रानी ऑफ़ झाँसी, कैच हर.'"
रानी और उनके साथियों ने भी एक मील ही का सफ़र तय किया था कि कैप्टेन ब्रिग्स के घुड़सवार उनके ठीक पीछे आ पहुंचे. जगह थी कोटा की सराय.
लड़ाई नए सिरे से शुरू हुई. रानी के एक सैनिक के मुकाबले में औसतन दो ब्रिटिश सैनिक लड़ रहे थे. अचानक रानी को अपने बायें सीने में हल्का सा दर्द महसूस हुआ, जैसे किसी सांप ने उन्हें काट लिया हो.
एक अंग्रेज़ सैनिक ने, जिसे वो देख नहीं पाईं थीं, उनके सीने में संगीन भोंक दी थी. वो तेज़ी से मुड़ी और अपने ऊपर हमला करने वाले पर पूरी ताकत से तलवार से टूट पड़ी.
राइफ़ल की गोली
रानी को लगी चोट बहुत गहरी नहीं थी, लेकिन उसमें बहुत तेज़ी से ख़ून निकल रहा था. अचानक घोड़े पर दौड़ते-दौड़ते उनके सामने एक छोटा सा पानी का झरना आ गया.
उन्होंने सोचा वो घोड़े की एक छलांग लगाएंगी और घोड़ा झरने के पार हो जाएगा. तब उनको कोई भी नहीं पकड़ सकेगा.
उन्होंने घोड़े में एड़ लगाई, लेकिन वो घोड़ा छलाँग लगाने के बजाए इतनी तेज़ी से रुका कि वो करीब करीब उसकी गर्दन के ऊपर लटक गईं.
उन्होंने फिर एड़ लगाई, लेकिन घोड़े ने एक इंच भी आगे बढ़ने से इंकार कर दिया. तभी उन्हें लगा कि उनकी कमर में बाई तरफ़ किसी ने बहुत तेज़ी से वार हुआ है.
उनको राइफ़ल की एक गोली लगी थी. रानी के बांए हाथ की तलवार छूट कर ज़मीन पर गिर गई.
उन्होंने उस हाथ से अपनी कमर से निकलने वाले खून को दबा कर रोकने की कोशिश की.
रानी पर जानलेवा हमला
एंटोनिया फ़्रेज़र अपनी पुस्तक, 'द वारियर क्वीन' में लिखती हैं, "तब तक एक अंग्रेज़ रानी के घोड़े की बगल में पहुंच चुका था. उसने रानी पर वार करने के लिए अपनी तलवार ऊपर उठाई. रानी ने भी उसका वार रोकने के लिए दाहिने हाथ में पकड़ी अपनी तलवार ऊपर की. उस अंग्रेज़ की तलवार उनके सिर पर इतनी तेज़ी से लगी कि उनका माथा फट गया और वो उसमें निकलने वाले खून से लगभग अंधी हो गईं."
तब भी रानी ने अपनी पूरी ताकत लगा कर उस अंग्रेज़ सैनिक पर जवाबी वार किया. लेकिन वो सिर्फ़ उसके कंधे को ही घायल कर पाई. रानी घोड़े से नीचे गिर गई.
तभी उनके एक सैनिक ने अपने घोड़े से कूद कर उन्हें अपने हाथों में उठा लिया और पास के एक मंदिर में ले लाया. रानी तब तक जीवित थीं.
मंदिर के पुजारी ने उनके सूखे हुए होठों को एक बोतल में रखा गंगा जल लगा कर तर किया. रानी बहुत बुरी हालत में थी. धीरे धीरे वो अपने होश खो रही थी.
उधर, मंदिर के अहाते के बाहर लगातार फ़ायरिंग चल रही थी. अंतिम सैनिक को मारने के बाद अंग्रेज़ सैनिक समझे कि उन्होंने अपना काम पूरा कर दिया है.
दामोदर के लिए...
तभी रॉड्रिक ने ज़ोर से चिल्ला कर कहा, "वो लोग मंदिर के अंदर गए है. उन पर हमला करो. रानी अभी भी ज़िंदा है."
उधर, पुजारियों ने रानी के लिए अंतिम प्रार्थना करनी शुरू कर दी थी. रानी की एक आँख अंग्रेज़ सैनिक की कटार से लगी चोट के कारण बंद थी.
उन्होंने बहुत मुश्किल से अपनी दूसरी आँख खोली. उन्हें सब कुछ धुंधला दिखाई दे रहा था और उनके मुंह से रुक रुक कर शब्द निकल रहे थे, "....दामोदर... मैं उसे तुम्हारी... देखरेख में छोड़ती हूँ... उसे छावनी ले जाओ... दौड़ो उसे ले जाओ."
बहुत मुश्किल से उन्होंने अपने गले से मोतियों का हार निकालने की कोशिश की. लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाई और फिर बेहोश हो गई.
मंदिर के पुजारी ने उनके गले से हार उतार कर उनके एक अंगरक्षक के हाथ में रख दिया, "इसे रखो... दामोदर के लिए."
रानी का पार्थिव शरीर
रानी की साँसे तेज़ी से चलने लगी थीं. उनकी चोट से खून निकल कर उनके फेफड़ों में घुस रहा था. धीरे धीरे वो डूबने लगी थीं. अचानक जैसे उनमें फिर से जान आ गई.
वो बोली, "अंग्रेज़ों को मेरा शरीर नहीं मिलना चाहिए." ये कहते ही उनका सिर एक ओर लुड़क गया. उनकी साँसों में एक और झटका आया और फिर सब कुछ शांत हो गया.
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अपने प्राण त्याग दिए थे. वहाँ मौजूद रानी के अंगरक्षकों ने आनन फानन में कुछ लकड़ियाँ जमा की और उन पर रानी के पार्थिव शरीर को रख आग लगा दी थी.
उनके चारों तरफ़ रायफलों की गोलियों की आवाज़ बढ़ती चली जा रही थी. मंदिर की दीवार के बाहर अब तक सैकड़ों ब्रिटिश सैनिक पहुंच गए थे.
मंदिर के अंदर से सिर्फ़ तीन रायफलें अंग्रेज़ों पर गोलियाँ बरसा रही थीं. पहले एक रायफ़ल शांत हुई... फिर दूसरी और फिर तीसरी रायफ़ल भी शांत हो गई.
चिता की लपटें
जब अंग्रेज़ मंदिर के अंदर घुसे तो वहाँ से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी. सब कुछ शांत था. सबसे पहले रॉड्रिक ब्रिग्स अंदर घुसे.
वहाँ रानी के सैनिकों और पुजारियों के कई दर्जन रक्तरंजित शव पड़े हुए थे. एक भी आदमी जीवित नहीं बचा था. उन्हें सिर्फ़ एक शव की तलाश थी.
तभी उनकी नज़र एक चिता पर पड़ी जिसकीं लपटें अब धीमी पड़ रही थीं. उन्होंने अपने बूट से उसे बुझाने की कोशिश की.
तभी उसे मानव शरीर के जले हुए अवशेष दिखाई दिए. रानी की हड्डियाँ करीब करीब राख बन चुकी थीं.
इस लड़ाई में लड़ रहे कैप्टेन क्लेमेंट वॉकर हेनीज ने बाद में रानी के अंतिम क्षणों का वर्णन करते हुए लिखा, "हमारा विरोध ख़त्म हो चुका था. सिर्फ़ कुछ सैनिकों से घिरी और हथियारों से लैस एक महिला अपने सैनिकों में कुछ जान फूंकने की कोशिश कर रही थी. बार-बार वो इशारों और तेज़ आवाज़ से हार रहे सैनिकों का मनोबल बढ़ाने का प्रयास करती थी, लेकिन उसका कुछ ख़ास असर नहीं पड़ रहा था. कुछ ही मिनटों में हमने उस महिला पर भी काबू पा लिया. हमारे एक सैनिक की कटार का तेज़ वार उसके सिर पर पड़ा और सब कुछ समाप्त हो गया. बाद में पता चला कि वो महिला और कोई नहीं स्वयं झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थी."
तात्या टोपे
रानी के बेटे दामोदर को लड़ाई के मैदान से सुरक्षित ले जाया गया. इरा मुखोटी अपनी किताब 'हिरोइंस' में लिखती हैं, "दामोदर ने दो साल बाद 1860 में अंग्रेज़ों के सामने आत्म समर्पण किया. बाद में उसे अंग्रेज़ों ने पेंशन भी दी. 58 साल की उम्र में उनकी मौत हुई. जब वो मरे तो वो पूरी तरह से कंगाल थे. उनके वंशज अभी भी इंदौर में रहते हैं और अपने आप को 'झाँसीवाले' कहते हैं."
दो दिन बाद महादजी सिधिंया ने इस जीत की खुशी में जनरल रोज़ और सर रॉबर्ट हैमिल्टन के सम्मान में ग्वालियर में भोज दिया.
रानी की मौत के साथ ही विद्रोहियों का साहस टूट गया और ग्वालियर पर अंग्रेज़ों का कब्ज़ा हो गया.
नाना साहब वहाँ से भी बच निकले लेकिन तात्या टोपे के साथ उनके अभिन्न मित्र नवाड़ के राजा ने ग़द्दारी की.
तात्या टोपे पकड़े गए और उन्हें ग्वालियर के पास शिवपुरी ले जा कर एक पेड़ से फाँसी पर लटका दिया गया.⁠⁠⁠⁠

चाफेकर बंधु

जिन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में रूचि है, उन्होंने चाफेकर बंधुओं का नाम जरूर सुना है. परन्तु चूँकि हमारी पाठ्यपुस्तकों में इन बंधुओं और इनके योगदान को उचित स्थान नहीं मिला है, इसलिए आजकल के युवाओं और बच्चों ने इनके बारे में कुछ नहीं जाना.
चाफेकर बंधुओं की ही तरह ऐसे कई दर्जनों बड़े क्रांतिकारी हुए हैं, जिन्हें इतिहास लेखन में तथा पाठ्यक्रमों में से बड़े धूर्ततापूर्ण पद्धति से गायब किया गया है. बहरहाल, लेख का विषय यह नहीं है.

इस लेख का मूल विषय यह है कि अंग्रेजों और भारतीयों के बीच सबसे बड़ा फर्क क्या है? वह है प्रशासनिक चुस्ती तथा अपने क्रांतिकारियों एवं हुतात्माओं का सम्मान. आप सोचेंगे इस बात का चाफेकर बंधुओं से क्या सम्बन्ध है? बिलकुल है... जैसे-जैसे आप पूरा लेख पढ़ेंगे तो जानेंगे, कि भारत की सरकारें और इसके “नकली इतिहासकार” कितने गिरे हुए लोग रहे होंगे. लेकिन इसके लिए सबसे पहले आपको चाफ़ेकर बंधुओं के योगदान को संक्षेप में जानना-समझना होगा. जो लोग जानते हैं, उनकी बात अलग है... परन्तु जो लोग इनके बारे में नहीं जानते हैं वे निश्चित रूप से आश्चर्यचकित हो जाएँगे.
चाफेकर बंधु यानी दामोदर हरि चाफेकर, बालकृष्ण हरि चाफेकर तथा वासुदेव हरि चाफेकर को संयुक्त रूप से कहा जाता हैं। ये तीनों भाई बाल्यकाल से ही लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के सम्पर्क में थे। तीनों भाई तिलक जी को गुरुवत् सम्मान देते थे। चाफेकर बंधु महाराष्ट्र के पुणे के पास चिंचवड़ नामक गाँव के निवासी थे। 22 जून 1897 को रैंड को मौत के घाट उतार कर भारत की आज़ादी की लड़ाई में प्रथम क्रांतिकारी धमाका करने वाले वीर दामोदर पंत चाफेकर का जन्म 24 जून 1869 को पुणे के ग्राम चिंचवड़ में प्रसिद्ध कीर्तनकार हरिपंत चाफेकर के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में हुआ था। उनके दो छोटे भाई क्रमशः बालकृष्ण चाफेकर एवं वसुदेव चाफेकर थे। बचपन से ही सैनिक बनने की इच्छा दामोदर पंत के मन में थी, विरासत में कीर्तनकार का यश-ज्ञान मिला ही था। महर्षि पटवर्धन एवं लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक उनके आदर्श थे।
तिलक जी की प्रेरणा से उन्होंने युवकों का एक संगठन व्यायाम मंडल तैयार किया। ब्रितानिया हुकूमत के प्रति उनके मन में बाल्यकाल से ही तिरस्कार का भाव था। दामोदर पंत चाफ़ेकर ने ही तत्कालीन बंबई में रानी विक्टोरिया के पुतले पर तारकोल पोत कर, गले में जूतों की माला पहना कर अपना रोष प्रकट किया था। 1894 से चाफेकर बंधुओं ने पूना में प्रति वर्ष शिवाजी एवं गणपति समारोह का आयोजन प्रारंभ कर दिया था। इन समारोहों में चाफेकर बंधु शिवाजी श्लोक एवं गणपति श्लोक का पाठ करते थे। उनका मानना था कि शिवाजी श्लोक के अनुसार, केवल शिवाजी की कहानी दोहराने मात्र से स्वाधीनता प्राप्त नहीं की जा सकती. आवश्यकता इस बात की है कि शिवाजी और बाजीराव की तरह तेज़ी से काम किए जाएं. आज हर भले आदमी को तलवार और ढाल पकड़नी चाहिए, यह जानते हुए कि हमें राष्ट्रीय संग्राम में जीवन का जोखिम उठाना होगा. गणपति श्लोक में धर्म और गाय की रक्षा के लिए कहा गया है. ये अंग्रेज़ कसाइयों की तरह गाय और बछड़ों को मार रहे हैं, उन्हें इस संकट से मुक्त कराओ. मरो, लेकिन अंग्रेजों को मारकर.


सन् 1897 में पुणे नगर प्लेग जैसी भयंकर बीमारी से पीड़ित था। इस स्थिति में भी अंग्रेज अधिकारी जनता को अपमानित तथा उत्पीड़ित करते रहते थे। वाल्टर चार्ल्स रैण्ड तथा आयर्स्ट, ये दोनों अंग्रेज अधिकारी लोगों को जबरन पुणे से निकाल रहे थे। जूते पहनकर ही हिन्दुओं के पूजाघरों में घुस जाते थे। महिलाओं के साथ बेईज्जती करते थे. ये दोनों अधिकारी प्लेग पीड़ितों की सहायता की बजाय लोगों को प्रताड़ित करना ही अपना अधिकार समझते थे। किसी अत्याचार-अन्याय के सन्दर्भ में एक दिन तिलक जी ने चाफेकर बन्धुओं से कहा, "शिवाजी ने अपने समय में अत्याचार का विरोध किया था, किन्तु इस समय अंग्रेजों के अत्याचार के विरोध में तुम लोग क्या कर रहे हो?' बस, इसके बाद इन तीनों भाइयों ने क्रान्ति का मार्ग अपना लिया। संकल्प लिया कि इन दोनों अंग्रेज अधिकारियों को छोड़ेंगे नहीं।
संयोगवश वह अवसर भी आया, जब २२ जून १८९७ को पुणे के "गवर्नमेन्ट हाउस' में महारानी विक्टोरिया की षष्ठिपूर्ति के अवसर पर राज्यारोहण की हीरक जयन्ती मनायी जाने वाली थी। इसमें वाल्टर चार्ल्स रैण्ड और आयर्स्ट भी शामिल हुए। दामोदर हरि चाफेकर और उनके भाई बालकृष्ण हरि चाफेकर भी एक दोस्त विनायक रानडे के साथ वहां पहुंच गए और इन दोनों अंग्रेज अधिकारियों के निकलने की प्रतीक्षा करने लगे। रात १२ बजकर, १० मिनट पर रैण्ड और आयर्स्ट निकले और अपनी-अपनी बग्घी पर सवार होकर चल पड़े। योजना के अनुसार दामोदर हरि चाफेकर रैण्ड की बग्घी के पीछे चढ़ गए और उसे गोली मार दी, उधर बालकृष्ण हरि चाफेकर ने भी आर्यस्ट पर गोली चला दी। आयर्स्ट तो तुरन्त मर गया, किन्तु रैण्ड तीन दिन बाद अस्पताल में चल बसा। पुणे की उत्पीड़ित जनता चाफेकर-बन्धुओं की जय-जयकार कर उठी। गुप्तचर अधीक्षक ब्रुइन ने घोषणा की कि इन फरार लोगों को गिरफ्तार कराने वाले को २० हजार रुपए का पुरस्कार दिया जाएगा। (1897 में बीस हजार रूपए बहुत बड़ी रकम होती थी) चाफेकर बन्धुओं के क्लब में ही दो भाई थे - गणेश शंकर द्रविड़ और रामचन्द्र द्रविड़। इन दोनों ने पुरस्कार के लोभ में आकर अधीक्षक ब्रुइन को चाफेकर बन्धुओं का सुराग दे दिया। इसके बाद दामोदर हरि चाफेकर पकड़ लिए गए, लेकिन बालकृष्ण हरि चाफेकर फिर भी पुलिस के हाथ न लगे। सत्र न्यायाधीश ने दामोदर हरि चाफेकर को फांसी की सजा दी, और उन्होंने मन्द मुस्कान के साथ यह सजा सुनी। कारागृह में तिलक जी ने उनसे भेंट की और उन्हें "गीता' प्रदान की। 18 अप्रैल 1898 को प्रात: वही "गीता' पढ़ते हुए दामोदर हरि चाफेकर फांसीघर पहुंचे और फांसी के तख्ते पर लटक गए। उस क्षण भी वह "गीता' उनके हाथों में थी।
उधर बालकृष्ण चाफेकर ने जब यह सुना कि उसको गिरफ्तार न कर पाने से चिढ़ी हुई पुलिस उसके सगे-सम्बंधियों को सता रही है, तो वह स्वयं पुलिस थाने में उपस्थित हो गए। बाद में तीसरे भाई वासुदेव चाफेकर ने अपने साथी महादेव गोविन्द विनायक रानडे को साथ लेकर उन गद्दार द्रविड़-बन्धुओं को जा घेरा, और उन्हें गोली मार दी। वह 8 फ़रवरी 1899 की रात थी। वासुदेव चाफेकर को 8 मई को और बालकृष्ण चाफेकर को 12 मई 1899 को पुणे के यरवदा कारागृह में फांसी दे दी गई। योजना में साथ देने वाले इनके साथी क्रांतिवीर महादेव गोविन्द विनायक रानडे को 10 मई 1899 को यरवदा कारागृह में ही फांसी दी गई।
यहाँ तक का यह गौरवशाली इतिहास पढ़कर निश्चित ही आपके रोंगटे खड़े हुए होंगे... लेकिन इस लेख का असली पेंच आगे है. वॉल्टर चार्ल्स रैंड अंग्रेज सरकार का ICS अफसर था, उस जमाने में ICS अफसर की धाक और दबदबा जबरदस्त होता था. 1897 में चाफेकर बंधुओं द्वारा मारे जाने से पहले उसने लगभग 13 वर्षों तक महारानी विक्टोरिया के सम्मान में भारत में अपनी सेवाएँ दीं. उसकी अधिकाँश नियुक्तियाँ मुम्बई-पुणे में ही हुईं. दूसरा अधिकारी जिसे चाफेकर बंधुओं ने गोली मारी, यानी आयर्स्ट वह रैंड से थोड़ी निचली पदवी पर था. हाल ही में ब्रिटिश लायब्रेरी के दस्तावेजों के अध्ययन का अध्ययन करते समय एक शोधकर्ता श्री संकेत कुलकर्णी के हाथ एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज लगा. इस दस्तावेज में 23 सितम्बर 1883 को रैंड के हस्ताक्षर युक्त पत्र भी है.इस पत्र में वॉल्टर रैंड लिखता है कि मैंने मुम्बई जाने के लिए विक्टोरिया जहाज में सीट बुक कर दी है, परन्तु अभी तक मुझे आधिकारिक आदेश प्राप्त नहीं हुआ, इसलिए मुझे जल्दी से जल्दी भेजने की व्यवस्था की जाए. 24 सितम्बर को तार सन्देश द्वारा यह पत्र भारत के दफ्तर में पहुँचता है और 26 सितम्बर को यानी केवल दो दिनों के भीतर वॉल्टर रैंड को वापस तार सन्देश द्वारा आदेश भी मिल जाते हैं... (यहाँ पर यह उदाहरण केवल इसलिए दिया गया, कि आज से लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व भी अंग्रेजों की प्रशासनिक मशीनरी कितनी चुस्त और समयबद्ध थी... उपरोक्त दोनों पत्र आज भी ब्रिटिश लायब्रेरी में सुरक्षित रखे हुए हैं... यह भी एक कौतूहल वाली बात है).

खैर... आगे बढ़ते हैं.... अंग्रेजों की कार्यपद्धति एवं उनकी प्रशासनिक व्यवस्था का एक और नमूना... वॉल्टर रैंड तथा आयर्स्ट की हत्या हो जाने के मात्र तीन माह के अन्दर श्रीमती रैंड और श्रीमती आयर्स्ट को “विशेष पेंशन” भी आरम्भ हो गई. 1897 में यानी आज से 120 वर्ष पहले, श्रीमती रैंड को 250 पौंड वार्षिक तथा उनके प्रत्येक बच्चे को 21 पौंड वार्षिक की पेंशन मिलने लगी. जबकि श्रीमती आयर्स्ट को उनके पति के ओहदे के अनुसार 150 पौंड वार्षिक तथा बच्चों को 15 पौंड वार्षिक की पेंशन मिलने लगी. चूँकि दोनों अधिकारी ऑन-ड्यूटी मारे गए थे, इसलिए उन्हें विशेष शहीद का दर्जा और पेंशन दी गई. (पेंशन संबंधी यह सभी दस्तावेज ब्रिटिश लायब्रेरी में सुरक्षित हैं).
अब आते हैं इस लेख के दर्दनाक अंत पर, जो आपको स्तब्ध कर देगा... दामोदर चाफ़ेकर की पत्नी श्रीमती दुर्गाबाई (जिनका आज कोई नाम तक नहीं जानता) उस समय केवल 17 वर्ष की युवती थीं. इसके बाद पूरे साठ वर्ष अर्थात 1956 तक वे जीवित रहीं. 1947 में भारत स्वतन्त्र हुआ... यानी स्वतंत्रता के पश्चात भी नौ वर्षों तक दुर्गाबाई जीवित थीं.... लेकिन हा दुर्भाग्य!!! भारत सरकार की तरफ से उन्हें कोई विशेष पेंशन मिलना तो दूर, उनके पति वीर स्वतंत्रता सेनानी थे यह दर्शाने वाली ताम्र पट्टिका तक उन्हें नसीब नहीं हुई.

 वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास से उनका नाम मिटाने की भरपूर कोशिश की, वह घृणित अध्याय अलग है. जरा सोचिये... चाफ़ेकर बंधुओं की वीरता, उनकी प्लानिंग... हँसते-हँसते फाँसी चढ़ना और फिर पूरे साठ वर्षों तक उनकी विधवा दुर्गाबाई का जीवन संघर्ष... उधर अंग्रेजों ने अपने अधिकारियों को "शहीद" का दर्जा देकर उनके पूरे परिवार का ध्यान रखा... और इधर भारत में सत्ता की मलाई चाटने वाले नेहरू की सरकार ने दुर्गाबाई को क्या दिया... उपेक्षा और अपमान.

रविवार, 21 मई 2017

आंध्रप्रदेश और तेलंगाना

नेहरु और माउंटबेटन हैदराबाद राज्य [आज का पूरा आंध्रप्रदेश और तेलंगाना ] को आजाद देश बनाने के पक्ष में थे .......

अगर सरदार पटेल और कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी [के एम मुंशी ] नही होते तो आज आंध्रप्रदेश और तेलंगाना अलग देश होते ...
जिस समय ब्रिटिश भारत छोड़ रहे थे, उस समय यहाँ के 562 रजवाड़ों में से सिर्फ़ तीन को छोड़कर सभी ने भारत में विलय का फ़ैसला किया. ये तीन रजवाड़े थे कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद.
अंग्रेज़ों के दिनों में भी हैदराबाद [आज का आंध्रप्रदेश और तेलंगाना ] की अपनी सेना, रेल सेवा और डाक तार विभाग हुआ करता था. उस समय आबादी और कुल राष्ट्रीय उत्पाद की दृष्टि से हैदराबाद भारत का सबसे बड़ा राजघराना था. उसका क्षेत्रफल 82698 वर्ग मील था जो
कि इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक था.
हैदराबाद की आबादी का अस्सी फ़ीसदी हिंदू लोग थे जबकि अल्पसंख्यक होते हुए भी मुसलमान प्रशासन और सेना में महत्वपूर्ण पदों पर बने हुए थे.
उस पर तुर्रा ये भी था कि कट्टरपंथी क़ासिम राज़वी के नेतृत्व मे रज़ाकार हैदराबाद की आज़ादी के समर्थन में जन सभाएं कर रहे थे और उस इलाक़े से गुज़रने वाली ट्रेनों को रोक कर न सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिम यात्रियों पर हमले कर रहे थे बल्कि हैदराबाद से सटे हुए भारतीय इलाक़ों में रहने वाले हिन्दुओ का कत्लेआम कर रहे थे.
आजाद भारत का सबसे पहला आतंकी सन्गठन इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन था और आजाद भारत का पहला आतंकी कासिम रिजवी था .. हैदराबाद के निजाम ने कासिम रिजवी को हिन्दुओ का कत्लेआम करने का जिम्मा सौपा था .. कासिम रिजवी के समर्थकों को रजाकार कहा जाता था .. इस संगठन के पास बहुत हथियार थे और निजाम का समर्थन था ..इसलिए हैदराबाद स्टेट में हिन्दुओ का कत्लेआम होने लगा ..
नेहरु और माउन्टबेटन हैदराबाद को भारत में शामिल करने के पक्ष में नही थे .. लेकिन सरदार पटेल किसी भी कीमत पर हैदराबाद स्टेट को भारत गणराज्य में मिलाने के पक्ष में थे ...
सरदार पटेल ने के एम मुंशी को हैदराबाद में एजेंट-जनरल बनाकर भेजा .. मुंशी जी बिना वेतन इस पद पर जाने को राजी हुए .. और हैदराबाद की पल पल की खबर प्रधानमंत्री नेहरु को न देकर गृहमंत्री सरदार पटेल को दे रहे थे ...
निजाम ने जिन्ना को संदेश भेजकर ये जानने की कोशिश की थी कि क्या वह भारत के ख़िलाफ़ लड़ाई में हैदराबाद का समर्थन करेंगे? हैदराबाद का प्रधानमंत्री मीर लायक अली लगातार पाकितानी प्रधानमंत्री के सम्पर्क में था .. उसी समय गुप्त खबर आई की पाकिस्तान ने पुर्तगाली सरकार के साथ समझौता किया .. जिसके अनुसार उस समय पुर्तगाली सरकार के अधीन गोवा में हैदराबाद स्टेट के लिए नौसेना बेस बनेगा ..बदले में गोवा पर भारत के हमले की स्थिति में करांची से पाकिस्तान गोवा की मदद करेगा ...
निज़ाम के सेनाध्यक्ष मेजर जनरल एल एदरूस ने अपनी किताब 'हैदराबाद ऑफ़ द सेवेन लोव्स' में लिखा है कि निज़ाम ने उन्हें ख़ुद हथियार ख़रीदने यूरोप भेजा था. लेकिन वह अपने मिशन में सफल नहीं हो पाए थे क्योंकि हैदराबाद को एक आज़ाद देश के रूप में मान्यता नहीं मिली थी.
मज़े की बात ये थी कि एक दिन अचानक वह लंदन में डॉर्सटर होटल की लॉबी में माउंटबेटन से टकरा गए. माउंटबेटन ने जब उनसे पूछा कि वह वहाँ क्या कर रहे हैं तो उन्होंने झेंपते हुए जवाब दिया था कि वह वहाँ अपनी आंखों का इलाज कराने आए हैं.
माउंटबेटन ने मुस्कराते हुए उन्हें आँख मारी. लेकिन इस बीच लंदन में निज़ाम के एजेंट जनरल मीर नवाज़ जंग ने एक ऑस्ट्रेलियाई हथियार विक्रेता सिडनी कॉटन को हैदराबाद को हथियारों की सप्लाई करने के लिए राज़ी कर लिया.
भारत को जब ये पता चला कि सिडनी कॉटन के जहाज़ निज़ाम के लिए हथियार ला रहे हैं तो उसने इन उड़ानों पर प्रतिबंध लगा दिया.
सरदार पटेल के कड़े रुख से परेशान जब निज़ाम को लगा कि भारत हैदराबाद के विलय के लिए दृढ़संकल्प है तो उन्होंने ये पेशकश भी की कि हैदराबाद को एक स्वायत्त राज्य रखते हुए विदेशी मामलों, रक्षा और संचार की ज़िम्मेदारी भारत को सौंप दी जाए... लेकिन वो रज़ाकारों के प्रमुख क़ासिम राज़वी को इसके लिए राज़ी नहीं करवा सके.
रज़ाकारों की गतिविधियों ने पूरे भारत का जनमत उनके ख़िलाफ़ कर दिया. 22 मई को जब इत्तेहाद-ऊल-मुसलमीन के आतंकी यानी रजाकरो ने ट्रेन में सफ़र कर रहे हिंदुओं पर गंगापुर स्टेशन पर हमला बोला और तीस हिन्दुओ की हत्या की तो पूरे भारत में भारत सरकार की आलोचना होने लगी कि वो उनके प्रति नर्म रुख़ अपना रही है.
भारतीय सेना के पूर्व उपसेनाध्यक्ष लेफ़्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा अपनी आत्मकथा स्ट्रेट फ्रॉम द हार्ट में लिखते हैं, "मैं जनरल करियप्पा के साथ कश्मीर में था कि उन्हें संदेश मिला कि सरदार पटेल उनसे तुरंत मिलना चाहते हैं. दिल्ली पहुंचने पर हम पालम हवाई अड्डे से सीधे पटेल के घर गए. मैं बरामदे में रहा जबकि करियप्पा उनसे मिलने अंदर गए और पाँच मिनट में बाहर आ गए. बाद में उन्होंने मुझे बताया कि सरदार ने उनसे सीधा सवाल पूछा जिसका उन्होंने एक शब्द में जवाब दिया."
सरदार ने उनसे पूछा कि अगर हैदराबाद के मसले पर पाकिस्तान की तरफ़ से कोई सैनिक प्रतिक्रिया आती है तो क्या वह बिना किसी अतिरिक्त मदद के उन हालात से निपट पाएंगे?
करियप्पा ने इसका एक शब्द का जवाब दिया 'हाँ' और इसके बाद बैठक ख़त्म हो गई.
इसके बाद सरदार पटेल ने हैदराबाद के ख़िलाफ़ सैनिक कार्रवाई को अंतिम रूप दिया. भारत के तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल रॉबर्ट बूचर इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ थे. उनका कहना था कि पाकिस्तान की सेना इसके जवाब में अहमदाबाद या बंबई पर बम गिरा सकती है.
दो बार हैदराबाद में घुसने की तारीख़ तय की गई लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते इसे रद्द करना पड़ा. निज़ाम ने गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी से व्यक्तिगत अनुरोध किया कि वे ऐसा न करें.
राजा जी और नेहरू की बैठक हुई और दोनों ने कार्रवाई रोकने का फ़ैसला किया. निज़ाम के पत्र का जवाब देने के लिए रक्षा सचिव एचएम पटेल और वीपी मेनन की बैठक बुलाई गई.
उस समय हैदराबाद स्टेट में चार संस्थाए सक्रिय थी
१- इत्तेहाद-ऊल- मुसलमीन जो पूरी तरह से भारत सरकार के खिलाफ थी और हैदराबाद स्टेट को अलग देश बनाने के पक्ष में थी ...
२- कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया --ये भी रजाकरो यानि इत्तेहाद के साथ थी और हैदराबाद को अलग देश बनाने के पक्ष में थी .
३- हैदराबाद राज्य कांग्रेस -- ये हैदराबाद को भारत में मिलाने के पक्ष में थी
4- आर्य समाज और आरएसएस -- ये दोनों पूरी तरह से हिन्दुओ के साथ थे और इत्तेहाद रजाकरो के कहर से हिन्दुओ को बचाने ले लगे थे और ये भी हैदराबाद को भारत में मिलाने के पक्ष में थे ..
फिर जब खबर मिली की हैदराबाद का प्रधानमंत्री मीर लायक अली पाकिस्तान भाग गया और वहाँ से सैनिक मदद लेने का जुगाड़ कर रहा है तो सरदार पटेल में भारतीय सेना को हैदराबाद पर हमला करने का आदेश दिया
नेहरू और राजा जी चिंतित थे कि इससे पाकिस्तान जवाबी कार्रवाई करने के लिए प्रेरित हो सकता है लेकिन चौबीस घंटे तक पाकिस्तान की तरफ़ से कुछ नहीं हुआ तो उनकी चिंता मुस्कान में बदल गई.
हाँ, जैसे ही भारतीय सेना हैदराबाद में घुसी, पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ाँ ने अपनी डिफ़ेंस काउंसिल की बैठक बुलाई और उनसे पूछा कि क्या हैदराबाद में पाकिस्तान कोई ऐक्शन ले सकता है?
बैठक में मौजूद ग्रुप कैप्टेन एलवर्दी (जो बाद में एयर चीफ़ मार्शल और ब्रिटेन के पहले चीफ़ ऑफ डिफ़ेंस स्टाफ़ बने) ने कहा ‘नहीं.’
लियाक़त ने ज़ोर दे कर पूछा ‘क्या हम दिल्ली पर बम नहीं गिरा सकते हैं?’
एलवर्दी का जवाब था कि हाँ ये संभव तो है लेकिन पाकिस्तान के पास कुल चार बमवर्षक हैं जिनमें से सिर्फ़ दो काम कर रहे हैं.' इनमें से एक शायद दिल्ली तक पहुँच कर बम गिरा भी दे लेकिन इनमें से कोई वापस नहीं आ पाएगा.'
भारतीय सेना की इस कार्रवाई को ऑपरेशन पोलो का नाम दिया गया क्योंकि उस समय हैदराबाद में विश्व में सबसे ज़्यादा 17 पोलो के मैदान थे.
पांच दिनों तक चली इस कार्रवाई में 1373 रज़ाकार मारे गए. हैदराबाद स्टेट के 807 जवान भी रहे. मारे ..भारतीय सेना ने अपने 66 जवान खोए जबकि 97 जवान घायल हुए.
रजाकरो का नेता कासिम अली पाकिस्तान भाग गया ...
और इस तरह से हैदराबाद [आज का आंध्रप्रदेश और तेलंगाना ] भारत के हिस्से बने
फोटो में सरदार पटेल में सामने समर्पण करते हुए हैदराबाद स्टेट के निजाम

सनातन धर्म और बौद्ध धर्म


                                                 सनातन धर्म और बौद्ध धर्म 
                                                                                                            

 (1) प्रश्न :-
 "समुद्रगुप्त एवं सभी गुप्त वंशी शासकों ने वैष्णव धर्म का एवं क्षत्रिय धर्म का ही पालन किया था। मौर्य वंशियों ने ही जैन एवं बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया। कृपया बताएं"
उत्तर : -
"मौर्यवंश के सभी शासक हिन्दू थे, अशोक भी| अंग्रेजों और बौद्धों की झूठी बातों पर ध्यान देने के बदले अशोक के शिलालेख पढ़ लें, रोमिला थापर की पुस्तक में मिल जायेंगे | पेशावर का एक ग्रीक राजा मिनांदर बाद में बौद्ध बना, वरना भारत का कोई भी राजा कभी भी बौद्ध नहीं बना | किन्तु बौद्ध भिक्षुओं का भी सम्मान होता था, यही तो हिन्दुओं का स्वभाव रहा है | मिनांदर के बारे में भी बौद्ध स्रोत कहते हैं कि वह बौद्ध बन गया था , किन्तु दो इंडो-ग्रीक राजाओं (मीनराज तथा स्फुटिध्वज) ने ज्योतिष के ग्रन्थ संस्कृत में लिखे जिसका दर्शन 100% सनातनी है | अतः तथाकथित बौद्ध स्रोतों पर मुझे विश्वास नहीं है |
                                                                    (2) प्रश्न :--
"अब हम यही सुनते आये थे कि अशोक ने बौद्ध धर्म को अपना कर क्षत्रिय धर्म को नष्ट कर दिया अहिंसा का अत्यधिक प्रचार प्रसार करके ..... पुष्यमित्र शुंग ने मौर्य वंश को समाप्त किया था वह बौद्ध धर्म को रोकने हेतु था या राजनीतिक कारणों से।
उत्तर :--
"इसका कोई प्रमाण नहीं है कि अशोक ने बौद्ध धर्म को अपनाया | सनातन धर्म से घृणा करने वाले अंग्रेजों ने जानबूझकर हिन्दू समाज को बाँटने के लिए कई हथकण्डे खोजे, जिनमे एक हथकंडा यह भी था कि बौद्धमत को बढ़ावा दिया जाय और हिन्दुओं से लड़ाया जाय | मैं पुनः कहता हूँ कि अशोक के शिलालेख पढ़ लें, "बौद्ध" शब्द ही नहीं मिलेगा, सर्वत्र "ब्राह्मणों और श्रमणों" के लिए विशेष सम्मान और छूटों का उल्लेख है | "श्रमण" का अर्थ जानबूझकर अंग्रेजों ने "बौद्ध" लगाया , जबकि ब्राह्मण का शास्त्रीय अर्थ होता है "ब्रह्म-प्राप्त ज्ञानी व्यक्ति" और श्रमण का अर्थ है श्रम अर्थात तपस्या में रत व्यक्ति जो तत्कालीन 65 सम्प्रदायों में से किसी भी सम्प्रदाय का हो सकता था | उन 65 में से एक सम्प्रदाय बौद्धों का भी था | बौद्धमत एक पृथक religion था ही नहीं | बौद्धों के मूल ग्रन्थ हैं त्रिपिटक, उनमें भी अशोक के शिलालेखों जैसी ही भाषा है : सच्चे ब्राह्मणों की सर्वत्र प्रशंसा गौतम बुद्ध ने भी धम्मपिटक में की और लोभी ब्राह्मणों की निन्दा की, किन्तु ऐसा तो वेदव्यास जी ने भी किया | गीता में श्रीकृष्ण भी कहते हैं कि अत्यधिक तप द्वारा शरीर को नष्ट करना पाप है, किन्तु प्राणायाम, व्रत आदि तप की बड़ाई भी की | यही तो गौतम बुद्ध का भी मध्यम मार्ग है | फिर गौतम बुद्ध ने ऐसी कौन सी नयी बात कही कि उनके मत को सनातन धर्म से पृथक religion माना जाय ? गौतम बुद्ध ने कब कहा कि वे कोई नया धर्म या religion आरम्भ कर रहे हैं ? प्राचीन ऋषियों की भांति बुद्ध और तीर्थंकरों ने केवल "धर्म" का प्रचार किया, वैदिक धर्म या बौद्ध धर्म या जैन धर्म का नहीं | आधुनिक काल में भी बहुत से विद्वानों ने इस तथ्य को पकड़ा है और संसार के सम्प्रदायों को दो किस्मों में बाँटा है : धार्मिक और अधार्मिक , हिन्दू(सनातन)-बौद्ध-जैन मतों को धार्मिक-सम्प्रदाय माना गया और यहूदी-ईसाई-इस्लाम आदि को अधार्मिक क्योंकि उन सम्प्रदायों में धर्म के मूल लक्षणों का कोई महत्त्व ही नहीं है (धर्म के मूल लक्षण हैं :-- धैर्य, क्षमा-दम-अस्तेय-शौच-इन्द्रियनिग्रह-धी-विद्या-सत्य-अक्रोध) |

मेगास्थानीस का इन्डिका इन्टरनेट पर मुफ्त में मिल जाएगा | कलिंग के तीन भाग थे जिनमे हिमालय की तराई से दक्षिण तक के सारे गणतन्त्र थे | "क" का अर्थ यास्क ने बताया 33 व्यंजनों द्वारा प्रदर्शित 33 कोटि (किस्म) के देवताओं में प्रथम देवता परब्रह्म, जो कभी प्रकट नहीं होते किन्तु उनके तीन चिह्न (लिंग) प्रकट होते हैं : ब्रह्मा-विष्णु-महेश | यह है त्रि-कलिंग जिसका विस्तार से वर्णन मेगास्थानीस ने किया | चाणक्य ने भारतीय गणराज्यों का महासंघ बनाया और मगध के अत्याचारी एवं देशद्रोही राजा को हटाकर मगध को भी उस संघ में ले आये, जिसे अंग्रेजों ने झूठ-मूठ मौर्य साम्राज्य कहा | चन्द्रगुप्त मौर्य साम्राज्यवादी नहीं थे | 
उन्होंने जीवन में तीन ही युद्ध लड़े --

(1) सिकन्दर से युद्ध जिसका उल्लेख प्राचीन भारतीय साहित्य में है किन्तु अंग्रेजों ने साफ़ अनदेखा कर दिया, क्योंकि सिकन्दर भारत में अनेकों गणराज्यों और राजाओं से युद्ध में हारकर भागा था और सिन्धुतट पर लगे घाव के कारण ही बेबीलोन पँहुचने से पहले ही रास्ते में मारा गया यह बात यूरोपियन "विद्वानों" को रास नहीं आयी जो आज भी सिकन्दर को झूठ-मूठ विश्व-विजेता कहते हैं |
(2) नन्द से युद्ध जिसमें बहुत से राजाओं और गणराज्यों ने साथ दिया, और
(3)आक्रमणकारी सेल्यूकस से युद्ध, जिस कारण मगध साम्राज्य ईरान की सीमा तक फैल गया |

चन्द्रगुप्त मौर्य या उसके पुत्र ने कभी अन्य कोई युद्ध लड़ा ही नहीं | फिर दक्षिण भारत पर मौर्यों का कब्जा कैसे और कब हो गया, जैसा कि इतिहास का कबाड़ा करने वाले कबाड़ी इतिहासकार पढ़ाते हैं ? समाधान है मेगास्थानीस का इन्डिका : जिस कलिंग महासंघ ने चन्द्रगुप्त को गद्दी पर बिठाया, उसके विरुद्ध चन्द्रगुप्त क्यों लड़ता ? और वह महासंघ भी चन्द्रगुप्त को बाहरी व्यक्ति क्यों समझता ?
किन्तु जिस अशोक ने भाइयों को भी जिन्दा नहीं छोड़ा, वह एकछत्र अधिनायकवादी साम्राज्य की लिप्सा में अन्धा होकर कलिंग संघ को क्यों छोड़ता ? मगध राज्य ईरान की सीमा तक फैल गया था, उसके समक्ष कलिंग टिक न सका | पहले सैनिकों को मारा | फिर सारे युवक लड़ने आये, मारे गए | फिर गुरुकुलों के गुरु और शिष्य आये, मारे गए -- अनगिनत ब्रह्महत्याएं हुई | फिर नारियाँ आयीं, कलिंगसेना के नतृत्व में (गणराज्यों के अध्यक्ष भी राजा कहलाते थे ; कलिंगसेना वैसी ही राजकुमारी थी जैसे कि सिद्धार्थ शाक्य गणराज्य के राजकुमार थे, उन्हें कोई गद्दी उत्तराधिकार में मिलने नहीं जा रही थी) | पहले तो अशोक ने ना-नुकुर किया, उसके बाद जो किया वह महिषासुर के सिवा पूरे विश्व इतिहास में किसी और ने नहीं किया, किसी राक्षस ने भी नहीं | अंग्रेजों को केवल "अशोक" ही प्राचीन भारत में "महान" दिखा, क्योंकि सनातनी साहित्य में अशोक को महत्त्व नहीं दिया गया , अशोक कुख्यात हो चुका था | उसने बौद्धों को अपने पक्ष में करने की चाल चली - कलिंग युद्ध के दो साल बाद उसका हृदय "पिघला" ! किन्तु मौर्यों का वंश जनता की दृष्टि में राज करने का नैतिक अधिकार खो चुका था | यही कारण है कि पूरी सेना के समक्ष सेनापति पुष्यमित्र ने मौर्य सम्राट का वध किया तो एक भी सैनिक या नागरिक ने सम्राट की ओर से विरोध नहीं किया , किसी बौद्ध ने भी मुँह नहीं खोला, क्योंकि भारतीयों (हिन्दुओं-बौद्धों-जैनों) के हृदय से धर्म का लोप नहीं हुआ था | महाभारत में व्यास जी ने बारम्बार कहा कि जो धर्म की रक्षा करते हैं धर्म भी उन्हीं की रक्षा करता है | मौर्यों का धर्म चुक गया था |
सन्देह हो तो केवल तीन चीजों का अध्ययन कर लें :-- धम्मपिटक, मेगास्थानीस का इन्डिका, अशोक के शिलालेख, और सम्भव हो तो विशाखदत्त का संस्कृत नाटक "मुद्राराक्षस" भी पढ़ लें जिसका हिंदी अनुवाद 91 वर्ष पहले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने किया था | कैसे चन्द्रगुप्त मौर्य नेअकेले सिकन्दर की लाखों की सेना में घुसकर उसे नीचा दिखाया था यह आपको सेक्युलर इतिहासकार नहीं बताएँगे, वे तो चन्द्रगुप्त मौर्य को भी हिन्दू नहीं बल्कि जैन बतायेंगे, जबकि उस काल में सनातनियों और जैनों में परस्पर पृथक religion वाली कोई भावना भी नहीं थी, और चाणक्य के आज्ञाकारी शिष्य ने कभी जैन मत अपनाया इसका प्रमाण भी नहीं है | चन्द्रगुप्त मौर्य ने वर्णाश्रम धर्म के प्राचीन नियम का पालन करते हुए संन्यास लिया तो उसे म्लेच्छों ने जैन घोषित कर दिया ! ***
कोई व्यक्ति बौद्ध बन जाए किन्तु भिक्षु न बनकर सिंहासन से चिपका रहे, या कोई व्यक्ति जैन बन जाय किन्तु दिगम्बर या श्वेताम्बर साधु न बनकर दूकानदारी चलाता रहे या राजा बना रहे -- प्राचीन भारत में यह अकल्पनीय था , यह भी अकल्पनीय था कि कोई ब्राह्मण खेती करे या दूकान खोल ले | प्राचीन भारत में कोई राजा बौद्ध या जैन हो ही नहीं सकता था | ऐसी असम्भव कल्पनाएँ दासता के युग की खोजें हैं | किन्तु ब्राह्मण को यह छूट थी कि आपातकाल में वह अन्य वर्णों के कार्य करे | अतः पुष्यमित्र सुंग ने यवन खतरे से देश को बचाने के लिए गद्दी सम्भाली और दीर्घकाल के बाद भारत में अश्वमेध यज्ञ हुआ तो कोई अनुचित कार्य नहीं हुआ क्योंकि मौर्य राजा नालायक था, यही कारण है कि किसी ने विरोध भी नहीं किया | उनके पुत्र अग्निमित्र को कालिदास ने एक नाटक का मुख्य पात्र भी बनाया | ***

सेक्युलर इतिहासकार "सबूत" यह देते हैं कि श्रवण-बेलगोल में 600 ईस्वी का अभिलेख मिला जिसमे भद्रबाहु और "चन्द्रगुप्त-मुनि" का वर्णन है | बाद के भी कुछ अभिलेखों में ऐसा उल्लेख है | किन्तु यही मुनि मौर्य-सम्राट चन्द्रगुप्त थे ऐसा स्पष्ट उल्लेख 1432 ईस्वी के अभिलेख से पहले कहीं नहीं मिलता | 1432 ईस्वी के जैन अभिलेख को उससे 1729 पहले की घटना का प्रमाण किस आधार पर माना जाय? समकालीन अभिलेख को प्रमाण माना जाता है | आज से एक हज़ार वर्ष पहले वहाँ जैन मठ की स्थापना हुई, बाद में बाहुबली की विशाल मूर्ति स्थापित हुई, और पाँच सौ वर्ष बाद चन्द्रगुप्त मौर्य के जैन मुनि होने का अभिलेख बनाया गया | आज कांची के शंकराचार्य कहते हैं कि आदि-शंकर ने ही ईसापूर्व 500 में कांची मठ की स्थापना की थी | तब तो आदि-शंकर और गौतम बुद्ध समकालीन हो गए न ! मठ वाले तो ऐसी खुराफात करते ही रहते हैं |

असली बिंदु पर आइये -- चन्द्रगुप्त मौर्य जबतक सम्राट थे तबतक "मुनि" नहीं थे, और उस युग में जैन बनने का अर्थ ही था मुनि बनना, आजकल की तरह नहीं कि जैन भी हैं और दूकान भी खोले हुए हैं | मेरी बात बुरी लगे तो मैं क्या करूँ, कई बार सत्य अप्रिय हो सकता है किन्तु सत्य कभी भी अपकार नहीं करता | ये सेक्युलर इतिहासकार भी कहते हैं कि चन्द्रगुप्त स्वेच्छा से गद्दी त्यागते समय "सम्भवतः" जैन बन गया | यदि यह सत्य है तो भी जबतक वह राजा था तबतक सनातनी था न !

रविवार, 9 अप्रैल 2017

SEAL (Sea, Air and Land)

SEAL (Sea, Air and Land) 


अमेरिकी नौसेना की SEAL (Sea, Air and Land) टीम के पूर्व सदस्य ने ओसामा बिन लादेन की मौत से जुड़ी वीभत्स जानकारी सामने रखी है। नेवी SEAL टीम के शूटर रॉबर्ट ओनील बताया 
2 मई 2011 की रात
अपनी किताब में ओनील ने यह भयानक दावा किया है कि उनकी गोलियों से ओसामा की सिर बुरी तरह नष्ट हो चुका था। फोटो खींचने के लिए उसके सिर के टुकड़े वापस एकसाथ लगाने पड़े थे।

वह बताते हैं कि उस ऑपरेशन में उनके साथ 5-6 दूसरे सिपाही दूसरी मंजिल पर जाने वाली सीढ़ियां चढ़ रहे थे कि तभी AK-47 लिये हुये ओसामा का बेटा खालिद दिख गया। वह एक जंगले के पीछे छिपा हुआ था। SEAL एजेंट्स ने खालिद को धोखे से बाहर बुला लिया। उन्होंने अरबी में कहा, 'खालिद, यहां आओ।' जवाब में खालिद चिल्लाया, 'क्या?' यह कहते हुए खालिद अपने छिपने के स्थान से बाहर आ गया और तुरंत सिपाहियों ने सीधे उसके मुंह पर गोली मार दी।
सीढ़ियां पार करके एजेंट्स ने सभी कमरों की तलाशी लेनी शुरू कर दी। अहाते में ओसामा के साथ उसकी 3 बीवियां और 17 बच्चे थे।
ओनील अपने निशानेबाज के साथ तीसरी मंजिल की तरफ जाती सीढ़ियां चढ़ रहे थे और उनको इस बात का पूरा यकीन था कि जो भी तीसरी मंजिल पर होगा वह अंतिम उपाय के तौर पर आत्मघाती हमले की तैयारी कर रहा होगा।

ओनील याद करते हुये बताते हैं कि उन्होंने तुरंत ऐक्शन लेने का निर्णय किया और निशानेबाज का कंधा दबाया। यह गोली चलाने का सिग्नल था। दरवाजे पर लगे पर्दे को छलनी करती हुई गोलियों ने 2 औरतों को मौत की नींद सुला दिया।
रॉबर्ट के मुताबिक कमरे में घुसते ही उनकी नजर ओसामा पर पड़ी जो अपने बिस्तर के पास खड़ा था। उसके दोनों अपने सामने खड़ी एक औरत के कंधों पर थे। यह अमाल थी, ओसामा की 4 बीवियों में सबसे छोटी बीबी
ओनील लिखते हैं कि एक सेकंड से भी कम वक्त में उन्होंने औरत के दाहिने कंधे के ऊपर निशाना साधते हुए 2 बार ट्रिगर दबाया। बिन लादेन का सिर फट गया और वह उसी पल जमीन पर गिर गया। इसके बाद उन्होंने एक और गोली उसके सिर में मारी।

ओनील बताते हैं कि टीम के दूसरे सदस्य भागते हुए कमरे में पहुंचे, तब तक वह कमरे के कोने में छिपे 2 साल के बच्चे को ओसामा की विधवा के पास बिस्तर पर बिठा चुके थे। ऑपरेशन खत्म करके उनकी टुकड़ी 90 मिनट की फ्लाइट के बाद अफगानिस्तान के कैंप में वापस पहुंची।

रॉबर्ट ओनील की किताब इसी ऑपरेशन पर आधारित SEAL के ही एक और सदस्य मार्क बिसनेट की किताब 'नो ईजी डे' के 5 साल बाद आई है। इस किताब को पब्लिकेशन के लिए ओनील 68 लाख डॉलर (करीब 44 करोड़ रुपये) भरेंगे क्योंकि उन्होंने किताब में नॉन-डिस्क्लोजर डील का उल्लंघन करते हुए गोपनीय जानकारी साझा की है।

युगोस्लाविया - सोवियत संघ

  यदि आप कभी bosnia-herzegovina जाएंगे तब एक जगह आपको 9300 मुसलमानों की सामूहिक कब्र दिखेगी जहां उन सभी के नाम लिखे हैं दरअसल यह मुस्लिम कही...