तो संजय गांधी एक रसिक आदमी थे - उसमें ना कोई शक है और ना किसी सबूत की ज़रूरत। अनेक मौजूदा कोंग्रेसी महिला नेत्री संजय की रसिकता का प्रमाण है। नाम लिखने की कोई ज़रूरत नहीं। मारुति फ़ैक्टरी डालने के बाद संजय की एक महिला मित्र थी- सबीन वॉन स्टिगलेट्स। ये मोहतरमा उस आदमी की बहन थी जिसने राजीव और सोनिया को इंग्लंड में मिलाया था । सबीन जर्मन थी लेकिन बात चीत आदि से ब्रिटिश। जब सोनिया की शादी हुई और संजय भी देश वापस आ गए तो सबीन भी हमारे मुल्क आ गयी Goethe स्कूल् दिल्ली में पढ़ाने। सबीन लम्बी खूबसूरत ब्लांड थी और सोनिया की पक्की सहेली। सबको लगता था संजय पक्का सबीन से शादी करेंगे।
एक रोज़ सबीन ने सोनिया से कहा- मुझे नहीं लगता संजय का शादी में कोई दिलचस्पी है क्यूँकि वो मुझसे ज़्यादा मारुति में बिज़ी है। तो अब दो रोज़ में इंग्लंड वापस जा रही हूँ और दो दिन बाद सोनिया ने सबीन को दिल्ली एर्पॉर्ट पर सी ऑफ़ किया। लेकिन दो दिन बाद सबीन को फिर से दिल्ली में देख कर सोनिया हक्की बक्की रह गयीं। पूछने पर सबीन ने शर्माते हुए बताया- लंदन की वो फ़्लाइट जब तहरान - ईरान के ऊपर उड़ रही थी तो पाइलट ने सबीन को काक्पिट में बुलाया और कहा- तुम्हारे लिए दिल्ली से एक फ़ोन है। फ़ोन पर अपने रसिया जनाब थे- उन्होंने प्यार से मनाया और सबीन वापस दिल्ली आ गयी। अब लगभग तय था कि इंदिरा को टक्कर देने मुस्सोलिनी और हिटलर के मुल्क की दो महिलाएँ आ चुकी थी- लेकिन होनी को कुछ और मंज़ूर था।
मारुति का काम इतना बढ़ा कि संजय और सबीन का आख़िर में ब्रेक अप हो गया और सोनिया का दिल टूट गया। सबीन लेकिन इस दफे भारत से नहीं गयी और सबीन ने Goethe स्कूल के एक टीचर से शादी कर ली। ये लोग संजय की मृत्यु तक भारत में ही रहे और उसके बाद मेक्सिको चले गए। ये थी एक छोटी सी लव स्टोरी!
सोचिए यदि आज सोनिया जी के साथ सबीन जी भी चुनाव में भाषण दे रही होती- ये ग़ुलाम नहीं आज़ाद है! क्या माहौल जमता- एक नहीं दो दो गोरी बहुएँ! एक नहीं दो दो आउल बाबा होते। चच्चा नेहरू का गोरी महिलाओं के प्रति लार टपकना वाला जो डीएनए था वो राजीव और संजय में कूट कूट कर आगे ट्रांसफ़र हुआ था।
आशिक़ लाइट- गर्लफ्रेंड को दिन में फ़ोन करते मियाँ।
आशिक़ प्रो- गर्लफ्रेंड को आधी रात में फ़ोन करते मियाँ।
आशिक़ प्रो मैक्स- गर्लफ्रेंड को उड़ती फ्लाइट में फ़ोन करते मियाँ।
एडिट - पोस्ट में सबूत जोड़ा है- किताब का नाम - रेड साड़ी

हम भारतवासी झूठे इतिहास को पढ़ने को अभिशप्त है। इस में कोई राय नहीं है। केवल ४८ साल पहले हुए कांड मसलन मारुति और नसबंदी के बारे में जनता को बहुत कम जानकारी है या ग़लत जानकारी है। लोगों को आज भी लगता है नसबंदी अच्छी थी लागू करने वाला देवता था बस ढंग से हो नहीं पायी। समझाना ज़रूरी है कोई भी नेता देवता नहीं हुआ। एक दो अपवाद के तौर पर छोड़ दीजिए। सब नेता एक जैसे है- किसी भी पार्टी के क्यों ना हो- किसी भी युग के क्यों ना हो।
सोचने वाली बात है- पचास साठ साल पहले का इतिहास ही जब इतना डिस्टॉर्टेड और साफ़ नहीं है- तो पाँच सौ साल पहले का इतिहास किस तरह पढ़ाया जा रहा होगा। सोचने वाली बात है क्यों बाहर से आये लुटेरों को महिमामण्डित किया गया। सोचने वाली बात ये है क्यों पवित्र परिवार के सब लोगो को भारत रत्न दिया गया जबकि वे कुछ और ही थे।क्यों आज राष्ट्रवादी सरकार आने के नौ वर्ष बाद भी एक लाइन नहीं बदली गई। साफ़ कहता हूँ - हम सब ग़लत पढ़ने के लिए अभिशप्त है- श्रापित है।
इंटरनेट के इस युग में जब सब जानकारी आराम से उपलब्ध है- सब यात्रियों के रोजनामचे, दरबारियों के अनुवाद हुए नामा सब कुछ उपलब्ध है तो देर किस बात की! देश में इतिहास के शोधार्थियों की कमी है? मुझ जैसा औसत बुद्धि वाला आदमी जिसे ढंग से हिन्दी लिखनी नहीं आती- जिसने इतिहास की फॉर्मल पढ़ाई नहीं की- ये काम करने का माद्दा जुटा सकता है तो क्या सरकार कमेटी बना ये काम बड़े स्केल पर नहीं कर सकती। कर सकती है किंतु होगा नहीं- कारण- हम अभिशप्त है ।
लोगों को मृत्युं , निर्धनता, रूग्णता आदि का श्राप मिलता है- हम देशवासियों को श्राप मिला है- ग़लत इतिहास जानने का- अपने महान पूर्वजों की महिमा ढंग से ना जानने का। श्राप मिला है- देश के लुटेरों को महान पढ़ने का। यही कड़वी सच्चाई है।
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