बुधवार, 14 सितंबर 2022

वंदे मातरम तो गाया जाएगा... ये आपकी मस्जिद नहीं है??

वंदे मातरम तो गाया जाएगा... ये आपकी मस्जिद नहीं है?? 

 महान देशभक्त शास्त्रीय संगीतकार विष्णु दिगम्बर पलुस्कर इनका एक किस्सा सुन लीजिए ये उन दिनों की बात है जब कांग्रेस के अधिवेशन का शुभारंभ वंदेमातरम के गायन से होता था। 1923 का अधिवेशन आंध्र प्रदेश में काकीनाड़ा में हुआ था और खिलाफत आंदोलन के नेता मोहम्मद अली जौहर (आज़म खान की यूनिवर्सिटी वाले) उस समय गांधी जी की कृपा से कांग्रेस के अध्यक्ष थे। 

 अधिवेशन में जब महान शास्त्रीय गायक विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने #वन्देमातरम गीत प्रारम्भ किया, तो मोहम्मद अली जौहर ने इसे इस्लाम विरोधी बताकर रोकना चाहा इस पर पलुस्कर ने कहा कि -ये कांग्रेस का मंच है, कोई मस्जिद नहीं और इसके बाद उन्होंने पूरे सुरों के साथ वन्दे मातरम गाया। इस बात से मौलाना जौहर इतने बेइज्जत हुए कि मुंह छुपाते हुए मंच से उतर गये। 

 पलुस्कर जी जैसी हिम्मत अगर आज़ादी के बाद भी दिखाई गई होती तो वंदेमातरम गीत को आज इस तरह से अपमान सहन न करना पड़ता। बचपन में इनकी आंखें चली गईं थीं और इन्होंने ही वंदेमातरम को राग देश में संगीतबद्ध किया था।


 आज जो संगीत सीखना डिग्रियों, कॉलेजों के माध्यम से इतना आसान और सर्वसुलभ हुआ है और संगीत की स्वरलिपियां लिखने का जो तरीका और चलन हैं उसमें विष्णु दिगंबर पलुस्कर जी का महत्त्वपूर्ण योगदान है।




सोमवार, 4 जुलाई 2022

कांग्रेसी और वामपंथी इतिहासकार और नेहरु

 कांग्रेसी और वामपंथी इतिहासकारों ने एक साजिश के तहत ये झूठ फैलाया है की नेहरु आधुनिक भारत के निर्माता है .... सच्चाई ये है की अंग्रेजो ने नेहरु को एक तेज रफ्तार में चलती गाड़ी का स्टीयरिंग थमाया और नेहरू ने उसका धीरे 2 कबाड़ा ही किया।

भारत में पहला छोटा हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट अंग्रेजो ने दार्जिलिंग में 1897 में बनाया था जो 130 किलो वाट का था .. भारत में पहला बड़ा हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट मैसूर के राजा ने कोलर के खान से सोना निकालने के लिए कावेरी नदी पर शिवसमुद्रम फाल पर 1887 में बनाया जो 1902 में पूरा हुआ .. ये 6 मेगावाट का था .. इसका ठेका अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक को दिया गया था .. शीप से टरबाइन और अन्य साजोसामान आये फिर उन्हें सैकड़ो हाथियों पर लादकर साईट तक ले जाया गया था ..
आजादी तक भारत में कुल 230 छोटे बड़े पॉवर प्रोजेक्ट कार्यरत थे जिसमे कई कोयला आधारित थर्मल प्रोजेक्ट भी थे ..
दोराबजी टाटा ने 1910 में ही टाटा पावर नामक कम्पनी बनाई थी ... दोराबजी ने टाटा पॉवर द्वारा 1915 में महाराष्ट्र के खोपोली ने 72 मेगावाट का विशाल पावर प्रोजेक्ट बनाया .. टाटा पावर ने 1947 तक भारत में 23 बड़े पॉवर प्रोजेक्ट बना चुकी थी और बम्बई, दिल्ली और कोलकाता में इलेक्ट्रिक डिस्ट्रीब्यूशन नेट्वर्क बना चुकी थी
भारत के हैदराबाद, बीकानेर, जोधपुर, बडौदा, ग्वालियर सहित तमाम रियासतों ने अपने राज्यों में कई पॉवर प्रोजेक्ट बनवाये थे ..
आपको जानकर आश्चर्य होगा की 1947 तक चीन भारत से पॉवर, रेल, सडक तथा सेना आदि तमाम क्षमताओ में काफी पीछे था ..
अंग्रेजो ने नेहरु को चाय और काफी के विशाल बगान बनाकर दिए थे .. उन बागानों तक जो काफी दुर्गम पहाड़ो पर थे वहां अंग्रेजो ने सिचाई, रेल, सड़क आदि इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित किये थे ..
अंग्रेजो ने नेहरु को बीस विशाल बंदरगाह और 23 एयरपोर्ट बनाकर दिए थे ..
अंग्रेजो ने भारत के हर इलाको में आधुनिक युनिवर्सिटी और कालेज खोले .. मद्रास दिल्ली मुंबई करांची में सेंट स्टीफ़न कोलेज, सियालकोट में मरे कोलेज, अजमेर में मेयो कालेज सहित पुरे भारत में 350 कालेज और 23 युनिवर्सिटी अंग्रेजो ने नेहरु को दिया था ..
• Serampore College: हावड़ा Estd.: 1818.
• Indian Institute of Technology, Roorkee: Estd.: 1847.
• University of Mumbai: Estd.: 1857.
• University of Madras: Estd.: 1857.
• University of Calcutta: Estd.: 1857.
• Aligarh Muslim University: Estd.: 1875.
• Allahabad University: Estd-1887
• पंजाब विश्वविद्यालय – 1882
• बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय -1916, युनिवर्सिटी ऑफ़ मैसूर -1916, पटना युनिवर्सिटी, नागपूर युनिवर्सिटी काशी विद्यापीठ सहित 49 बड़े विश्वविद्यालय थे .. 1947 तक भारत शिक्षा संस्थानों में तीसरे नम्बर पर था .
अंग्रेजो ने नेहरु को विशाल सेना दी थी .. ब्रिटिश इंडियन आर्मी 1895 में स्थापित हुई थी .. अंग्रेज आठ कमांड बनाकर गये थे जिसमे 2 पाकिस्तान में चले गये .. ब्रिटिश इंडियन आर्मी प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में बहादुरी से लड़ी थी .. अंग्रजो ने नेहरु को 45 सैनिक छावनियां और विशाल रोयल एयरफोर्स दिया था .. भारत विश्व में तीसरा देश था जिसने वायुसेना बनाया .. यानी चीन के पहले ही अंग्रेजो ने भारत को विशाल और आधुनिक वायुसेना बनाकर दी थी ..
आज देश में जितना भी रेलवे नेट्वर्क है उसका 67% 1947 तक बन चूका था .. भारत का ये विशाल रेल नेट्वर्क नेहरु का नही बल्कि अंग्रेजो का देन है .. उन्होंने विशाल नदियों पर पुल बनाये दुर्गम पहाड़ो को काटकर रेल लाइन बनाई .. भारत विश्व में चौथा देश और एशिया का पहला देश है जहाँ रेल चली .. भारत में 1853 को रेल चली .. जबकि इसके 30 साल बाद चीन में रेल चली ..
भारत में पहली लिफ्ट ओटिस कम्पनी ने 1890 में मैसूर पैलेस में लगाया था ...भारत में विशाल चाय बागन और सागौन के लकड़ी के बागान लगाने वाली कम्पनी पारसी वाडिया खानदान की थी जिसका नाम था बाम्बे बर्मा ट्रेडिंग कम्पनी लिमिटेड .. ये कम्पनी 1863 में बनी थी ..और एशिया की बड़ी कम्पनी थी ..
1865: ALLAHABAD BANK
1892: BRITANNIA INDUSTRIES LTD
1895: PUNJAB NATIONAL BANK
1897: CENTURY TEXTILES AND INDUSTRIES LTD
1897: GODREJ AND BOYCE MANUFACTURING CO. LTD
1899: CALCUTTA ELECTRICITY SUPPLY CORPORATION
1902: SHALIMAR PAINT COLOUR AND VARNISH CO.
1903: INDIAN HOTELS CO. LTD
1908: BANK OF BARODA
1911: TVS
1904: KUMBAKONAM BANK LTD
1905: PHOENIX MILLS LTD
1906: CANARA BANKING CORP. (UDIPI) LTD
1906: BANK OF INDIA
1907: ALEMBIC PHARMACEUTICALS LTD
1907: TATA STEEL LTD सहित चार सौ से ज्यादा बड़ी कम्पनियां 1947 में पहले बन चुकी थी ..और 80 से ज्यादा बैंक थे
यानी चाहे शिक्षा हो या बैंकिग हो या इन्फ्रास्ट्रक्चर हो या रेलवे हो या उर्जा हो .. 1947 तक भारत हर फिल्ड में टॉप पर था .. फिर भी कांग्रेसी कुत्ते कहते है की नेहरु आधुनिक भारत के निर्माता है .. कांग्रेसी कुत्ते इस तरह से प्रचारित करते है जैसे 1947 तक भारत एकदम पिछड़ा था .. कोई स्कुल तक नही था .. लोग लालटेन युग में जीते थे .. फिर नेहरु आये और मात्र 2 सालो में भारत को आधुनिक बना दिया।

रविवार, 22 मई 2022

भारत के महान संगीतकार पंडित ओमकारनाथ ठाकुर और इटली का तानाशाह मुसोलिनी

 इटली का तानाशाह मुसोलिनी के जीवन प्रसंग में एक ऐसी घटना है जिसे जानकर आप हिंदुत्व पर गर्व करेंगे

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इटली में बसे हिंदुओं ने भारत के महान संगीतकार पंडित ओमकारनाथ ठाकुर को इटली में आमंत्रित किया था और उस वक्त इटली के तानाशाह मुसोलिनी ने पंडित ओमकारनाथ ठाकुर के सम्मान में डिनर का आयोजन किया था।
मुसोलिनी की कई प्रेमिकाओं में एक प्रेमिका बंगाली थी. जिसे संगीत का बहुत अच्छा ज्ञान था. उसने कई बार मुसोलिनी से कहा कि उसकी अनिद्रा का इलाज संगीत में है तो वो इसे मजाक मानता ।
वो बंगालीन ठाकुर जी से परिचित थी,उसने मुसोलिनी के इस अनिद्रा बीमारी के बारे में बता दिया था
डिनर टेबल पर ही मुसोलिनी ने हिंदू धर्म का मजाक बनाते हुए कहा ओमकारनाथ ठाकुर जी मैंने सुना है कि आप के देवता भगवान श्री कृष्ण जब बांसुरी बजाते थे तब तमाम गाय उनके पास दौड़कर चली जाती थी यह कैसे सच हो सकता है आपके हिंदू धर्म में कितना गप्प लिखा गया है ?
क्योंकि मुसोलिनी बहुत क्रूर तानाशाह था इसीलिए वहां 2 मिनट के लिए सन्नाटा पसर गया
उसके बाद पंडित ओमकारनाथ ठाकुर ने बेहद शांति से कहा यहां ना बासुरी है ना गाये हैं लेकिन मैं आपको हिंदू धर्म और हिंदू धर्म के संगीत की थोड़ी झलक दिखाता हूं
पंडित ओमकारनाथ ठाकुर जी ने डाइनिंग टेबल पर ही तमाम कप और गिलास में पानी भरकर एक जलतरंग जैसा उपकरण बनाया और राग पूरिया बजाना शुरू किया वातावरण में संगीत की ऐसी मीठी धुन पसरी की मुसोलिनी गहरी निद्रा में चला गया और नींद की वजह से वह टेबल पर इतना जोर से गिरा कि उसका सर के टेबल पर टकरा गया और 10 मिनट तक वह गहरी नींद में सोता रहा वहां उपस्थित हर सज्जन मदहोशी की अवस्था में चले गए थे




फिर जैसे ही पंडित ओमकारनाथ ठाकुर ने राग पुरिया बजाना बंद किया मुसोलिनी नींद से जगा और पंडित जी के पैरों को पकड़कर माफी मांगी और कहा सच में आपके हिंदू धर्म में जो लिखा गया है वह सच है
उसके बाद मुसोलिनी ने पंडित ओमकारनाथ ठाकुर को इटली नहीं छोड़ने की अपील किया उन्हें रोम में ही बसने की अपील किया और उन्हें बड़ा पद के साथ-साथ काफी बड़ी जागीर देने की पेशकश थी लेकिन पंडित ओमकारनाथ ठाकुर ने मना कर दिया
मित्रों यह है हमारे हिंदुत्व की ताकत यह हमारे धर्म की ताकत 💪💪💪💪
मुसोलिनी जैसे तानाशाह के सामने पंडित ओमकारनाथ ठाकुर ने अली मौला अली मौला या अली या अली या हुसैन या हुसैन या अल्लाह या अल्लाह का जाप नहीं किया उन्होंने एक ऐसा हिंदुत्व का राग बजाया जिसे मुसोलिनी भी हिंदू धर्म का लोहा मान गया
सोचता हूं आजकल के फर्जी कथावाचक होते तब मुसोलिनी के सामने अली मोला अली मोला अली मोला करते और मुसोलिनी भी उन्हें पिछवाड़े लात मार कर कहता यह तेरा अली मौला अली मौला सेकुलर लुंज पुंज हिंदू ही सुन सकते हैं मैं नही।

शनिवार, 9 अप्रैल 2022

भारतीय रेजीमेंट की शान Lieutenant General हनुत सिंह राठौड़

 राजस्थान बाड़मेर की मट्टी में पैदा हुए महावीर चक्र से सम्मानित,भारतीय रेजीमेंट की शान=== Lieutenant General हनुत सिंह राठौड़ उम्र भर का अविवाहित रहे।

उन्होंने अपना अंतिम जीवन आध्यात्मिक खोज में बिताया वे एक सच्चे संत योद्धा थे.
1949 में एनडीए में दाखिल हुए और सेकंड लेफ्टिनेंट के तौर पर नियुक्त हुए। हनुत सिंह की अगुवाई में पूना हॉर्स रेजीमेंट में 1965 और 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के बहुत सारे टैंक नष्ट किए थे। वे पोलो के टॉप कैडेट थे।


1965 की लड़ाई में बैटल ऑफ अासल में 264 पाकिस्तानी टैंकों के साथ पाकिस्तान ने खेमकरण पर कब्जा कर लिया। यह सबसे बड़ी टैंकों की लड़ाई मानी जाती है। हनुत सिंह ने अपने दो साथियों हरबक्श सिंह और गुरबख्श सिंह के साथ मिलकर ऐसी रणनीति बनाई कि पाकिस्तान के 200 टैंक नष्ट करके पाकिस्तान का पूरा ऑपरेशन फेल कर दिया।
1971 की लड़ाई में भी हनुत सिंह की 47 इन्फेंट्री ब्रिगेड को शकरगढ़ सेक्टर में बसंतर नदी के पास तैनात किया गया। दुश्मन देश द्वारा लैंडमाइन से भरे हुए एरिया के बावजूद खतरनाक युद्ध में भारतीय सेना ने उनके नेतृत्व में 48 टैंक ध्वस्त किए। इसी युद्ध के बाद वे महावीर चक्र से सम्मानित हुए।

आप यह जानकर हैरान होंगे कि इस रेजीमेंट की वीरता को देखते हुए दुश्मन देश ने भी इस रेजीमेंट को फख्र ए हिंद के खिताब से नवाजा। यहां एक बात और उल्लेखनीय है कि 1986 में ब्रॉसटेक्स्ट युद्धाभ्यास शुरू किया गया। उनकी अगुवाई में सेना से गहन युद्धाभ्यास करवाया जाता। हर तरह के युद्ध की प्लानिंग और ट्रेनिंग दी जाती। पाकिस्तान ने इसे अपने पर होने वाले हमले की तैयारी समझा। पश्चिम के डिप्लोमेट्स के अनुसार यह दक्षिणी एशिया का सबसे बड़ा युद्धाभ्यास था। भारत के इस जबरदस्त युद्धाभ्यास से सारा विश्व हैरान था।



किसी तरह कूटनीति से इस अभ्यास को रुकवाया गया। दरअसल सेना का मकसद कुछ और था अगर वह युद्धाभ्यास ना रुकवाया हो जाता तो भारत का आज नक्शा कुछ और होता।

अपने सेवाकाल में उन्होंने सेना में उच्च आदर्शों की मिसाल कायम की।1982 में भी सिक्किम की 17 माउंटेन डिवीजन के इंचार्ज बने। उनकी बहादुरी, कर्तव्य निष्ठा एवं दूर दृष्टि देखिए कि उन्हें वहां से जाते समय एक मोमेंट दिया गया ,जिस पर लिखा था जितना सैनिकों के लिए आपने 1 साल में किया उतना किसी अफसर ने 20 साल में भी नहीं किया ।
देश सेवा के लिए हनुत सिंह उम्र भर का अविवाहित रहे। उनकी प्रेरणा से उनकी यूनिट के बहुत सारे जवानों ने देश की खातिर विवाह ना करने का निश्चय किया। उनके उच्च आध्यात्मिक विचारों ने सेना के जवानों को बहुत प्रभावित किया। उनके लिखे टैंकों की लड़ाई पर दस्तावेज आज भी मिलिट्री अकादमी में पढ़ाए जाते हैं।


एक और किस्सा जो बहुत प्रसिद्ध है कि 1987 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें फोन किया। वह साधना में बैठे थे। उन्होंने अपने सहायक से कहा कि वह पूजा के बाद बात कर पाएंगे। यह बात प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बहुत बुरी लगी। 1988 में इस महान योद्धा की सारी उपलब्धियों को दरकिनार करके उनके जूनियर विश्वनाथ शर्मा को भारत का अगला थल सेना अध्यक्ष बना दिया गया उसने इस बात का भी बिल्कुल बुरा नहीं माना।
1991 में रिटायर होने के बाद देहरादून के बाल शिव योगी से प्रभावित होकर वह वहीं बस कर आध्यात्मिक साधना में लीन रहे। 2015 में ध्यान अवस्था में ही समाधि में ब्रह्मलीन हो गए।

मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

पत्नी के भाई को साला क्यो कहते है........

 किसी ने पूछा की पत्नी के भाई को साला क्यो कहते है????

तो साहब इसका पौराणिक कारण भी है...
अब जो लोग शादीशुदा है वे तो साले का महत्व जानते ही है कि साला चीज क्या होता है। हम प्रचलन की बोलचाल में साला शब्द को एक गाली के रूप में देखते हैं। साथ ही #धर्मपत्नी के भाई को भी साला, या सालेसाहब के नाम से इंगित करते हैं।
पौराणिक कथाओं में से एक समुद्र मंथन में हमें एक जिक्र मिलता है। इस मंथन से जो 14 दिव्य रत्न प्राप्त हुए थे वो थे कालकूट (हलाहल), ऐरावत, कामधेनु, उच्चैःश्रवा, कौस्तुभमणि, कल्पवृक्ष, रंभा (अप्सरा), महालक्ष्मी, #शंख (जिसका नाम साला था!), वारुणी, चन्द्रमा, शारंग धनुष, गंधर्व, और अंत में अमृत।

लक्ष्मीजी मंथन से स्वर्ण के रूप में निकली थी, इसके बाद जब "साला शंख" निकला, तो उसे लक्ष्मीजी का भाई कहा गया।
दैत्य और दानवों ने कहा कि अब देखो लक्ष्मीजी का भाई साला (शंख) आया है।

तभी से ये प्रचलन में आया कि #धर्मपत्नी जिसे हम गृहलक्ष्मी भी कहते है, उसके भाई को बहुत ही पवित्र नाम साला कह कर पुकारा जाता हैं। समुद्र मंथन के दौरान "पांचजन्य साला शंख" प्रकट हुआ, इसे भगवान विष्णु ने अपने पास रख लिया।
इस शंख को विजय का प्रतीक माना गया है, साथ ही इसकी ध्वनि को भी बहुत ही शुभ माना गया है।

विष्णु पुराण के अनुसार माता लक्ष्मी समुद्रराज की पुत्री हैं तथा शंख उनका सहोदर (सगा भाई) है। अतः यह भी मान्यता है कि जहाँ शंख है, वहीं #लक्ष्मी का वास होता है। इन्हीं कारणों से हिन्दुओं द्वारा पूजा के दौरान शंख को बजाया जाता है। जब भी धन-प्राप्ति के उपाय करो शंख को कभी नजर अंदाज ना करे, लक्ष्मीजी का चित्र या प्रतिमा के नजदीक रखें।

जब भी किसी जातक का साला या जातिका का भाई खुश होता है तो ये उनके यहाँ "धन आगमन" का शुभ सूचक होता है और इसके विपरीत साले से संबंध बिगाड़ने पर जातक घोर दरिद्रता का जीवन जीने लगता है। अतः साले साहब को सदैव प्रसन्न रखें, लक्ष्मी स्वयं चलकर आपके घर दस्तक देगी और अगर लक्ष्मी है तो बनी रहेगी।

तो साब सासु तीरथ, सुसरा तीरथ
तीरथ साला साली है
दुनिया के सब तीरथ झूठे
चारों धाम घरवाली है।

मुंशी प्रेमचंद ने "जेहाद" नाम की एक कहानी भी लिखी थी।

 

मुंशी प्रेमचंद ने "जेहाद" नाम की एक कहानी भी लिखी थी। जिसे हमारे सेकुलर प्रकाशकों ने पुस्तकों से लगभग गायब ही कर दिया।
कहानी में मुंशी जी ने बहुत कम शब्दों में ही बहुत कुछ बता दिया है। जरूर पढ़ें...
बहुत पुरानी बात है। हिंदुओं का एक काफ़िला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश से भागा चला आ रहा था।
मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे। धार्मिक द्वेष का नाम न था। पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाता था। बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे। शासन की कोई व्यवस्था न थी। हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी। आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था। जान का बदला जान था, खून का बदला खून; इस नियम में कोई अपवाद न था। यही उनका धर्म था, यही ईमान; मगर उस भीषण रक्तपात में भी हिंदू परिवार शांति से जीवन व्यतीत करते थे।
पर एक महीने से देश की हालत बदल गयी है। एक मुल्ला ने न जाने कहाँ से आ कर अनपढ़ धर्मशून्य पठानों में धर्म का भाव जागृत कर दिया है। उसकी वाणी में कोई ऐसी मोहिनी है कि बूढ़े, जवान, स्त्री-पुरुष खिंचे चले आते हैं।
वह शेरों की तरह गरज कर कहता है-खुदा ने तुम्हें इसलिए पैदा किया है कि दुनिया को इस्लाम की रोशनी से रोशन कर दो, दुनिया से कुफ्र का निशान मिटा दो। एक काफिर के दिल को इस्लाम के उजाले से रोशनी कर देने का सवाब सारी उम्र के रोजे, नमाज और जकात से कहीं ज्यादा है। जन्नत की हूरें तुम्हारी बलाएँ लेंगी और फरिश्ते तुम्हारे कदमों की खाक माथे पर मलेंगे, खुदा तुम्हारी पेशानी पर बोसे देगा।
और सारी जनता यह आवाज सुन कर मजहब के नारों से मतवाली हो जाती है। उसी धार्मिक उत्तेजना ने कुफ्र और इस्लाम का भेद उत्पन्न कर दिया है। प्रत्येक पठान जन्नत का सुख भोगने के लिए अधीर हो उठा है। उन्हीं हिंदुओं पर जो सदियों से शांति के साथ रहते थे, हमले होने लगे हैं। कहीं उनके मंदिर ढाये जाते हैं, कहीं उनके देवताओं को गालियाँ दी जाती हैं। कहीं उन्हें जबरदस्ती इस्लाम की दीक्षा दी जाती है। हिंदू संख्या में कम हैं, असंगठित हैं; बिखरे हुए हैं, इस नयी परिस्थिति के लिए बिलकुल तैयार नहीं। उनके हाथ-पाँव फूले हुए हैं, कितने ही तो अपनी जमा-जथा छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं, कुछ इस आँधी के शांत हो जाने का अवसर देख रहे हैं। यह काफिला भी उन्हीं भागनेवालों में था।
दोपहर का समय था। आसमान से आग बरस रही थी। पहाड़ों से ज्वाला-सी निकल रही थी। वृक्ष का कहीं नाम न था। ये लोग राज-पथ से हटे हुए, पेचीदा औघट रास्तों से चले आ रहे थे। पग-पग पर पकड़ लिये जाने का खटका लगा हुआ था। यहाँ तक कि भूख, प्यास और ताप से विकल होकर अंत को लोग एक उभरी हुई शिला की छाँह में विश्राम करने लगे। सहसा कुछ दूर पर एक कुआँ नजर आया। वहीं डेरे डाल दिये। भय लगा हुआ था कि जिहादियों का कोई दल पीछे से न आ रहा हो।
दो युवकों ने बंदूक भर कर कंधे पर रखीं और चारों तरफ गश्त करने लगे। बूढ़े कम्बल बिछा कर कमर सीधी करने लगे। स्त्रियाँ बालकों को गोद से उतार कर माथे का पसीना पोंछने और बिखरे हुए केशों को सँभालने लगीं। सभी के चेहरे मुरझाये हुए थे। सभी चिंता और भय से त्रास्त हो रहे थे, यहाँ तक कि बच्चे भी जोर से न रोते थे।
दोनों युवकों में एक लम्बा, गठीला रूपवान है। उसकी आँखों से अभिमान की रेखाएँ-सी निकल रही हैं, मानो वह अपने सामने किसी की हकीकत नहीं समझता, मानो उसकी एक-एक गत पर आकाश के देवता जयघोष कर रहे हैं। दूसरा कद का दुबला-पतला, रूपहीन-सा आदमी है, जिसके चेहरे से दीनता झलक रही है, मानो उसके लिए संसार में कोई आशा नहीं, मानो वह दीपक की भाँति रो-रो कर जीवन व्यतीत करने ही के लिए बनाया गया है। उसका नाम धर्मदास है; इसका ख़ज़ाँचन्द।
धर्मदास ने बंदूक को जमीन पर टिका कर एक चट्टान पर बैठते हुए कहा-तुमने अपने लिए क्या सोचा? कोई लाख-सवा लाख की सम्पत्ति रही होगी तुम्हारी ?
ख़ज़ाँचंद ने उदासीन भाव से उत्तर दिया-लाख-सवा लाख की तो नहीं,
हाँ, पचास-साठ हजार तो नकद ही थे।
‘तो अब क्या करोगे ?’
‘जो कुछ सिर पर आयेगा, झेलूँगा ! रावलपिंडी में दो-चार सम्बन्धी हैं, शायद कुछ मदद करें।
तुमने क्या सोचा है ?’
‘मुझे क्या गम ! अपने दोनों हाथ अपने साथ हैं। वहाँ इन्हीं का सहारा था, आगे भी इन्हीं का सहारा है।’
‘आज और कुशल से बीत जाये तो फिर कोई भय नहीं।’
‘मैं तो मना रहा हूँ कि एकाध शिकार मिल जाय। एक दरजन भी आ जायँ तो भून कर रख दूँ।’
इतने में चट्टानों के नीचे से एक युवती हाथ में लोटा-डोर लिये निकली और सामने कुएँ की ओर चली। प्रभात की सुनहरी, मधुर, अरुणिमा मूर्तिमान हो गयी थी।
धर्मदास पानी लेकर लौट ही रहा था कि उसे पश्चिम की ओर से कई आदमी घोड़ों पर सवार आते दिखायी दिये। जरा और समीप आने पर मालूम हुआ कि कुल पाँच आदमी हैं। उनकी बंदूक की नलियाँ धूप में साफ चमक रही थीं। धर्मदास पानी लिये हुए दौड़ा कि कहीं रास्ते ही में सवार उसे न पकड़ लें लेकिन कंधे पर बंदूक और एक हाथ में लोटा-डोर लिये वह बहुत तेज न दौड़ सकता था। फासला दो सौ गज से कम न था। रास्ते में पत्थरों के ढेर टूटे-फूटे पड़े हुए थे। भय होता था कि कहीं ठोकर न लग जाय, कहीं पैर न फिसल जायँ। इधर सवार प्रतिक्षण समीप होते जाते थे। अरबी घोड़ों से उसका मुकाबला ही क्या, उस पर मंजिलों का धावा हुआ। मुश्किल से पचास कदम गया होगा कि सवार उसके सिर पर आ पहुँचे और तुरंत उसे घेर लिया। धर्मदास बड़ा साहसी था; पर मृत्यु को सामने खड़ी देख कर उसकी आँखों में अँधेरा छा गया, उसके हाथ से बंदूक छूट कर गिर पड़ी। पाँचों उसी के गाँव के महसूदी पठान थे। एक पठान ने कहा-उड़ा दो सिर मरदूद का। दग़ाबाज़ काफिर।
दूसरा-नहीं नहीं, ठहरो, अगर यह इस वक्त भी इस्लाम कबूल कर ले, तो हम इसे मुआफ कर सकते हैं। क्यों धर्मदास, तुम्हें इस दग़ा की क्या सजा दी जाय ? हमने तुम्हें रात-भर का वक्त फैसला करने के लिए दिया था। मगर तुम इसी वक्त जहन्नुम पहुँचा दिये जाओ; लेकिन हम तुम्हें फिर मौका देते हैं। यह आखिरी मौका है। अगर तुमने अब भी इस्लाम न कबूल किया, तो तुम्हें दिन की रोशनी देखनी नसीब न होगी।
धर्मदास ने हिचकिचाते हुए कहा-जिस बात को अक्ल नहीं मानती, उसे कैसे …
पहले सवार ने आवेश में आकर कहा-मजहब को अक्ल से कोई वास्ता नहीं।
तीसरा-कुफ्र है ! कुफ्र है !
पहला- उड़ा दो सिर मरदूद का, धुआँ इस पार।
दूसरा-ठहरो-ठहरो, मार डालना मुश्किल नहीं, जिला लेना मुश्किल है। तुम्हारे और साथी कहाँ हैं धर्मदास ?
धर्मदास-सब मेरे साथ ही हैं।
दूसरा-कलामे शरीफ़ की कसम; अगर तुम सब खुदा और उनके रसूल पर ईमान लाओ, तो कोई तुम्हें तेज निगाहों से देख भी न सकेगा।
धर्मदास-आप लोग सोचने के लिए और कुछ मौका न देंगे।
इस पर चारों सवार चिल्ला उठे-नहीं, नहीं, हम तुम्हें न जाने देंगे, यह आखिरी मौका है।
इतना कहते ही पहले सवार ने बंदूक छतिया ली और नली धर्मदास की छाती की ओर करके बोला-बस बोलो, क्या मंजूर है ?
धर्मदास सिर से पैर तक काँप कर बोला-अगर मैं इस्लाम कबूल कर लूँ तो मेरे साथियों को तो कोई तकलीफ न दी जायेगी ?
दूसरा-हाँ, अगर तुम जमानत करो कि वे भी इस्लाम कबूल कर लेंगे।
पहला-हम इस शर्त को नहीं मानते। तुम्हारे साथियों से हम खुद निपट लेंगे। तुम अपनी कहो। क्या चाहते हो ? हाँ या नहीं ?
धर्मदास ने जहर का घूँट पी कर कहा-मैं खुदा पर ईमान लाता हूँ।
पाँचों ने एक स्वर से कहा-अलहमद व लिल्लाह ! और बारी-बारी से धर्मदास को गले लगाया।
श्यामा हृदय को दोनों हाथों से थामे यह दृश्य देख रही थी। वह मन में पछता रही थी कि मैंने क्यों इन्हें पानी लाने भेजा ? अगर मालूम होता कि विधि यों धोखा देगा, तो मैं प्यासों मर जाती, पर इन्हें न जाने देती। श्यामा से कुछ दूर ख़ज़ाँचंद भी खड़ा था। श्यामा ने उसकी ओर क्षुब्ध नेत्रों से देख कर कहा- अब इनकी जान बचती नहीं मालूम होती।
ख़ज़ाँचंद-बंदूक भी हाथ से छूट पड़ी है।
श्यामा-न जाने क्या बातें हो रही हैं। अरे गजब ! दुष्ट ने उनकी ओर बंदूक तानी है !
ख़ज़ाँ.-जरा और समीप आ जायँ, तो मैं बंदूक चलाऊँ। इतनी दूर की मार इसमें नहीं है।
श्यामा-अरे ! देखो, वे सब धर्मदास को गले लगा रहे हैं। यह माजरा क्या है ?
ख़ज़ाँ.-कुछ समझ में नहीं आता।
श्यामा-कहीं इसने कलमा तो नहीं पढ़ लिया ?
ख़ज़ाँ.-नहीं, ऐसा क्या होगा, धर्मदास से मुझे ऐसी आशा नहीं है।
श्यामा-मैं समझ गयी। ठीक यही बात है। बंदूक चलाओ।
ख़ज़ाँ.-धर्मदास बीच में हैं। कहीं उन्हें न लग जाय।
श्यामा-कोई हर्ज नहीं। मैं चाहती हूँ, पहला निशाना धर्मदास ही पर पड़े। कायर ! निर्लज्ज ! प्राणों के लिए धर्म त्याग किया। ऐसी बेहयाई की जिंदगी से मर जाना कहीं अच्छा है। क्या सोचते हो। क्या तुम्हारे भी हाथ-पाँव फूल गये। लाओ, बंदूक मुझे दे दो। मैं इस कायर को अपने हाथों से मारूँगी।
ख़ज़ाँ.-मुझे तो विश्वास नहीं होता कि धर्मदास …
श्यामा-तुम्हें कभी विश्वास न आयेगा। लाओ, बंदूक मुझे दो। खडे़ क्या ताकते हो ? क्या जब वे सिर पर आ जायँगे, तब बंदूक चलाओ? क्या तुम्हें भी यह मंजूर है कि मुसलमान हो कर जान बचाओ ? अच्छी बात है, जाओ। श्यामा अपनी रक्षा आप कर सकती है; मगर उसे अब मुँह न दिखाना।
ख़ज़ाँचंद ने बंदूक चलायी। एक सवार की पगड़ी को उड़ाती हुई निकल गयी। जिहादियों ने ‘अल्लाहो अकबर !’ की हाँक लगायी। दूसरी गोली चली और घोड़े की छाती पर बैठी। घोड़ा वहीं गिर पड़ा। जिहादियों ने फिर ‘अल्लाहो अकबर !’ की सदा लगायी और आगे बढ़े। तीसरी गोली आयी। एक पठान लोट गया; पर इसके पहले कि चौथी गोली छूटे, पठान ख़ज़ाँचंद के सिर पर पहुँच गये और बंदूक उसके हाथ से छीन ली।
एक सवार ने ख़ज़ाँचंद की ओर बंदूक तान कर कहा-उड़ा दूँ सिर मरदूद का, इससे खून का बदला लेना है।
दूसरे सवार ने जो इनका सरदार मालूम होता था, कहा-नहीं-नहीं, यह दिलेर आदमी है। ख़ज़ाँचंद, तुम्हारे ऊपर दगा, खून और कुफ्र, ये तीन इल्ज़ाम हैं, और तुम्हें कत्ल कर देना ऐन सवाब है, लेकिन हम तुम्हें एक मौका और देते हैं। अगर तुम अब भी खुदा और रसूल पर ईमान लाओ, तो हम तुम्हें सीने से लगाने को तैयार हैं। इसके सिवा तुम्हारे गुनाहों का और कोई कफारा (प्रायश्चित्त) नहीं है। यह हमारा आखिरी फैसला है। बोलो, क्या मंजूर है ?
चारों पठानों ने कमर से तलवारें निकाल लीं, और उन्हें ख़ज़ाँचंद के सिर पर तान दिया मानो ‘नहीं’ का शब्द मुँह से निकलते ही चारों तलवारें उसकी गर्दन पर चल जायँगी !
ख़ज़ाँचंद का मुखमंडल विलक्षण तेज से आलोकित हो उठा। उसकी दोनों आँखें स्वर्गीय ज्योति से चमकने लगीं। दृढ़ता से बोला-तुम एक हिन्दू से यह प्रश्न कर रहे हो ? क्या तुम समझते हो कि जान के खौफ से वह अपना ईमान बेच डालेगा ? हिंदू को अपने ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी नबी, वली या पैगम्बर की जरूरत नहीं ! चारों पठानों ने कहा-काफिर ! काफिर !
ख़ज़ाँ.-अगर तुम मुझे काफिर समझते हो तो समझो। मैं अपने को तुमसे ज्यादा खुदापरस्त समझता हूँ। मैं उस धर्म को मानता हूँ, जिसकी बुनियाद अक्ल पर है। आदमी में अक्ल ही खुदा का नूर (प्रकाश) है और हमारा ईमान हमारी अक्ल …
चारों पठानों के मुँह से निकला ‘काफिर ! काफिर !’ और चारों तलवारें एक साथ ख़ज़ाँचंद की गर्दन पर गिर पड़ीं। लाश जमीन पर फड़कने लगी। धर्मदास सिर झुकाये खड़ा रहा। वह दिल में खुश था कि अब ख़ज़ाँचंद की सारी सम्पत्ति उसके हाथ लगेगी और वह श्यामा के साथ सुख से रहेगा; पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। श्यामा अब तक मर्माहत-सी खड़ी यह दृश्य देख रही थी। ज्यों ही ख़ज़ाँचंद की लाश जमीन पर गिरी, वह झपट कर लाश के पास आयी और उसे गोद में लेकर आँचल से रक्त-प्रवाह को रोकने की चेष्टा करने लगी। उसके सारे कपड़े खून से तर हो गये। उसने बड़ी सुंदर बेल-बूटोंवाली साड़ियाँ पहनी होंगी, पर इस रक्त-रंजित साड़ी की शोभा अतुलनीय थी। बेल-बूटोंवाली साड़ियाँ रूप की शोभा बढ़ाती थीं, यह रक्त-रंजित साड़ी आत्मा की छवि दिखा रही थी।
ऐसा जान पड़ा मानो ख़ज़ाँचंद की बुझती आँखें एक अलौकिक ज्योति से प्रकाशमान हो गयी हैं। उन नेत्रों में कितना संतोष, कितनी तृप्ति, कितनी उत्कंठा भरी हुई थी। जीवन में जिसने प्रेम की भिक्षा भी न पायी, वह मरने पर उत्सर्ग जैसे स्वर्गीय रत्न का स्वामी बना हुआ था।
धर्मदास ने श्यामा का हाथ पकड़ कर कहा-श्यामा, होश में आओ, तुम्हारे सारे कपड़े खून से तर हो गये हैं। अब रोने से क्या हासिल होगा ? ये लोग हमारे मित्र हैं, हमें कोई कष्ट न देंगे। हम फिर अपने घर चलेंगे और जीवन के सुख भोगेंगे ?
श्यामा ने तिरस्कारपूर्ण नेत्रों से देख कर कहा-तुम्हें अपना घर बहुत प्यारा है, तो जाओ। मेरी चिंता मत करो, मैं अब न जाऊँगी। हाँ, अगर अब भी मुझसे कुछ प्रेम हो तो इन लोगों से इन्हीं तलवारों से मेरा भी अंत करा दो।
धर्मदास करुणा-कातर स्वर से बोला-श्यामा, यह तुम क्या कहती हो, तुम भूल गयीं कि हमसे-तुमसे क्या बातें हुई थीं ? मुझे खुद ख़ज़ाँचंद के मारे जाने का शोक है; पर भावी को कौन टाल सकता है ?
श्यामा-अगर यह भावी थी, तो यह भी भावी है कि मैं अपना अधम जीवन उस पवित्र आत्मा के शोक में काटूँ, जिसका मैंने सदैव निरादर किया। यह कहते-कहते श्यामा का शोकोद्गार, जो अब तक क्रोध और घृणा के नीचे दबा हुआ था, उबल पड़ा और वह ख़ज़ाँचंद के निस्पंद हाथों को अपने गले में डाल कर रोने लगी।
चारों पठान यह अलौकिक अनुराग और आत्म-समर्पण देख कर करुणार्द्र हो गये। सरदार ने धर्मदास से कहा-तुम इस पाकीजा खातून से कहो, हमारे साथ चले। हमारी जाति से इसे कोई तकलीफ न होगी। हम इसकी दिल से इज्जत करेंगे।
धर्मदास के हृदय में ईर्ष्या की आग धधक रही थी। वह रमणी, जिसे वह अपनी समझे बैठा था, इस वक्त उसका मुँह भी नहीं देखना चाहती थी। बोला-श्यामा, तुम चाहो इस लाश पर आँसुओं की नदी बहा दो, पर यह जिंदा न होगी। यहाँ से चलने की तैयारी करो। मैं साथ के और लोगों को भी जा कर समझाता हूँ। खान लोेग हमारी रक्षा करने का जिम्मा ले रहे हैं। हमारी जायदाद, जमीन, दौलत सब हमको मिल जायगी। ख़ज़ाँचंद की दोैलत के भी हमीं मालिक होंगे। अब देर न करो। रोने-धोने से अब कुछ हासिल नहीं।
श्यामा ने धर्मदास को आग्नेय नेत्रों से देख कर कहा-और इस वापसी की कीमत क्या देनी होगी ? वही जो तुमने दी है ?
धर्मदास यह व्यंग्य न समझ सका। बोला-मैंने तो कोई कीमत नहीं दी। मेरे पास था ही क्या ?
श्यामा-ऐसा न कहो। तुम्हारे पास वह खजाना था, जो तुम्हें आज कई लाख वर्ष हुए ऋषियों ने प्रदान किया था। जिसकी रक्षा रघु और मनु, राम और कृष्ण, बुद्ध और शंकर, शिवाजी और गोविंदसिंह ने की थी। उस अमूल्य भंडार को आज तुमने तुच्छ प्राणों के लिए खो दिया। इन पाँवों पर लोटना तुम्हें मुबारक हो! तुम शौक से जाओ। जिन तलवारों ने वीर ख़ज़ाँचंद के जीवन का अंत किया, उन्होंने मेरे प्रेम का भी फैसला कर दिया। जीवन में इस वीरात्मा का मैंने जो निरादर और अपमान किया, इसके साथ जो उदासीनता दिखायी उसका अब मरने के बाद प्रायश्चित्त करूँगी। यह धर्म पर मरने वाला वीर था, धर्म को बेचनेवाला कायर नहीं ! अगर तुममें अब भी कुछ शर्म और हया है, तो इसका क्रिया-कर्म करने में मेरी मदद करो और यदि तुम्हारे स्वामियों को यह भी पसंद न हो, तो रहने दो, मैं सब कुछ कर लूँगी।
पठानों के हृदय दर्द से तड़प उठे। धर्मान्धता का प्रकोप शांत हो गया। देखते-देखते वहाँ लकड़ियों का ढेर लग गया। धर्मदास ग्लानि से सिर झुकाये बैठा था और चारों पठान लकड़ियाँ काट रहे थे। चिता तैयार हुई और जिन निर्दय हाथों ने ख़ज़ाँचंद की जान ली थी उन्हीं ने उसके शव को चिता पर रखा। ज्वाला प्रचंड हुई। अग्निदेव अपने अग्निमुख से उस धर्मवीर का यश गा रहे थे।
पठानों ने ख़ज़ाँचंद की सारी जंगम सम्पत्ति ला कर श्यामा को दे दी। श्यामा ने वहीं पर एक छोटा-सा मकान बनवाया और वीर ख़ज़ाँचंद की उपासना में जीवन के दिन काटने लगी। उसकी वृद्धा बुआ तो उसके साथ रह गयी, और सब लोग पठानों के साथ लौट गये, क्योंकि अब मुसलमान होने की शर्त न थी। ख़ज़ाँचंद के बलिदान ने धर्म के भूत को परास्त कर दिया। मगर धर्मदास को पठानों ने इस्लाम की दीक्षा लेने पर मजबूर किया। एक दिन नियत किया गया। मसजिद में मुल्लाओं का मेला लगा और लोग धर्मदास को उसके घर से बुलाने आये; पर उसका वहाँ पता न था। चारों तरफ तलाश हुई। कहीं निशान न मिला।
साल-भर गुजर गया। संध्या का समय था। श्यामा अपने झोंपड़े के सामने बैठी भविष्य की मधुर कल्पनाओं में मग्न थी। अतीत उसके लिए दुःख से भरा हुआ था। वर्तमान केवल एक निराशामय स्वप्न था। सारी अभिलाषाएँ भविष्य पर अवलम्बित थीं। और भविष्य भी वह, जिसका इस जीवन से कोई सम्बन्ध न था ! आकाश पर लालिमा छायी हुई थी। सामने की पर्वतमाला स्वर्णमयी शांति के आवरण से ढकी हुई थी। वृक्षों की काँपती हुई पत्तियों से सरसराहट की आवाज निकल रही थी, मानो कोई वियोगी आत्मा पत्तियों पर बैठी हुई सिसकियाँ भर रही हो।
उसी वक्त एक भिखारी फटे हुए कपड़े पहने झोंपड़ी के सामने खड़ा हो गया। कुत्ता जोर से भूँक उठा। श्यामा ने चौंक कर देखा और चिल्ला उठी-धर्मदास !
धर्मदास ने वहीं जमीन पर बैठते हुए कहा-हाँ श्यामा, मैं अभागा धर्मदास ही हूँ। साल-भर से मारा-मारा फिर रहा हूँ। मुझे खोज निकालने के लिए इनाम रख दिया गया है। सारा प्रांत मेरे पीछे पड़ा हुआ है। इस जीवन से अब ऊब उठा हूँ; पर मौत भी नहीं आती।
धर्मदास एक क्षण के लिए चुप हो गया। फिर बोला-क्यों श्यामा, क्या अभी तुम्हारा हृदय मेरी तरफ से साफ नहीं हुआ ! तुमने मेरा अपराध क्षमा नहीं किया !
श्यामा ने उदासीन भाव से कहा-मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझी।
‘मैं अब भी हिंदू हूँ। मैंने इस्लाम नहीं कबूल किया है।’
‘जानती हूँ !’
‘यह जान कर भी तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती !’
श्यामा ने कठोर नेत्रों से देखा और उत्तेजित होकर बोली-तुम्हें अपने मुँह से ऐसी बातें निकालते शर्म नहीं आती ! मैं उस धर्मवीर की ब्याहता हूँ, जिसने हिंदू-जाति का मुख उज्ज्वल किया है। तुम समझते हो कि वह मर गया ! यह तुम्हारा भ्रम है। वह अमर है। मैं इस समय भी उसे स्वर्ग में बैठा देख रही हूँ। तुमने हिंदू-जाति को कलंकित किया है। मेरे सामने से दूर हो जाओ।
धर्मदास ने कुछ जवाब न दिया ! चुपके से उठा, एक लम्बी साँस ली और एक तरफ चल दिया।
प्रातःकाल श्यामा पानी भरने जा रही थी, तब उसने रास्ते में एक लाश पड़ी हुई देखी। दो-चार गिद्ध उस पर मँडरा रहे थे। उसका हृदय धड़कने लगा। समीप जा कर देखा और पहचान गयी। यह धर्मदास की लाश थी।
साभार -मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित कहानी जेहाद. .







बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

उपयोगी वेबसाइट


आज हम आपको 10 ऐसी वेबसाइट के बारे में बतायेगें जो आप के बहुत काम आ सकती है , और जिन्हें मैं खुद प्रयोग में लाता हूं

  • Remove bg :— हमारी लिस्ट में यह वेबसाइट सबसे उपर है । जिसके मदद से आप किसी भी फोटो का बैकग्राउंड बड़ी ही आसानी से बदल सकते हैं।
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  • Natural reader :— हमारी लिस्ट में यह वेबसाइट नौवें नंबर पर है । जिसके मदद से आप कोई भी टेक्स्ट बोलकर लिख सकते हैं ।
  • Pdf Unlock :— हमारी लिस्ट में यह वेबसाइट लास्ट और दसवें नंबर पर है । जिसके मदद से आप किसी भी PDF का पासवर्ड तोड़ सकते हैं ।

यह सभी वेबसाइट केवल educational purposes के लिए है । किसी भी अंजान और असुरक्षित वेबसाइट पर अपनी नीजी जानकारी ना दे ।


मंगलवार, 18 जनवरी 2022

बचाव== Safetry

#राम_धनुष_टूटने_की_सत्य_घटना

 #राम_धनुष_टूटने_की_सत्य_घटना


बात 1880 के अक्टूबर नवम्बर की है बनारस की एक रामलीला मण्डली रामलीला खेलने तुलसी गांव आयी हुई थी। मण्डली में 22-24 कलाकार थे जो गांव के ही एक आदमी के यहाँ रुके थे वहीं सभी कलाकार रिहर्सल करते और खाना बनाते खाते थे।

पण्डित कृपाराम दूबे उस रामलीला मण्डली के निर्देशक थे और #हारमोनियम पर बैठ के मंच संचालन करते थे और फौजदार शर्मा साज-सज्जा और राम लीला से जुड़ी अन्य व्यवस्था देखते थे...एक दिन पूरी मण्डली बैठी थी और रिहर्सल चल रहा था तभी पण्डित कृपाराम दूबे ने फौजदार से कहा इस बार वो शिव धनुष हल्की और नरम लकड़ी की बनवाएं ताकि राम का पात्र निभा रहे 17 साल के युवक को परेशानी न हो पिछली बार धनुष तोड़ने में समय लग गया था...

इस बात पर #फौजदार कुपित हो गया क्योंकि लीला की साज सज्जा और अन्य व्यवस्था वही देखता था और पिछला धनुष भी वही बनवाया था... इस बात को लेकर पण्डित जी और फौजदार में से कहा सुनी हो गया..फौजदार पण्डित जी से काफी नाराज था और पंडित जी से बदला लेने को सोच लिया था।

संयोग से अगले दिन सीता स्वयंवर और शिव धनुष भंग का मंचन होना था...फौजदार मण्डली जिसके घर रुकी थी उनके घर गया और कहा रामलीला में लोहे के एक छड़ की जरूरत आन पड़ी है दे दीजिए..... गृहस्वामी ने उसे एक बड़ा और मोटा लोहे का छड़ दे दिया छड़ लेके फौजदार दूसरे गांव के लोहार के पास गया और उसे धनुष का आकार दिलवा लाया। रास्ते मे उसने धनुष पर कपड़ा लपेट कर और रंगीन कागज से सजा के गांव के एक आदमी के घर रख आया...


रात में रामलीला शुरू हुआ तो फौजदार ने चुपके धनुष बदल दिया और लोहे वाला धनुष ले जा के मंच के आगे रख दिया और खुद पर्दे के पीछे जाके तमाशा देखने के लिए खड़ा हो गया.





रामलीला शुरू हुआ पण्डित जी हारमोनियम पर राम चरणों मे भाव विभोर होकर रामचरित मानस के दोहे का पाठ कर रहे थे... दर्शक मूर्तिवत बैठे थे... रामलीला धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था सारे राजाओं के बाद राम जी गुरु से आज्ञा ले के धनुष भंग को आगे बढ़े...पास जाके उन्होंने जब धनुष को हाथ लगाया तो धनुष उससे उठी ही नही #कलाकार को सत्यता का आभास हो गया गया उस 17 वर्षीय कलाकार ने पंडित कृपाराम दूबे की तरफ कतार दृष्टि से देखा तो पण्डित जी समझ गए कि दाल में कुछ काला है...

उन्होंने सोचा कि आज इज्जत चली जायेगी हजारों लोगों के सामने और ये कलाकार की नहीं स्वयं प्रभु राम की इज्जत दांव पर लगने वाली है.. पंडित जी ने कलाकार को आंखों से रुकने और धनुष की #प्रदक्षिणा करने का संकेत किया और स्वयं को मर्यादा पुरुषोत्तम के चरणों में समर्पित करते हुए आंखे बंद करके उंगलियां हारमोनियम पर रख दी और राम जी की स्तुति करनी शुरू....

जिन लोगों ने ये लीला अपनी आँखों से देखी थी बाद में उन्होंने बताया कि इस इशारे के बाद जैसे पंडित जी ने आंख बंद करके हारमोनियम पर हाथ रखा हारमोनियम से उसी पल दिव्य सुर निकलने लगे वैसा वादन करते हुए किसी ने पंडित जी को कभी नहीं देखा था...सारे दर्शक मूर्तिवत हो गए

नगाडे से निकलने वाली परम्परागत आवाज भीषण दुंदभी में बदल गयी..पेट्रोमेक्स की धीमी रोशनी बढ़ने लगी और पूरा पंडाल अद्भुत आकाशीय प्रकाश से रह रह के प्रकाशमान हो रहा था...दर्शकों के कुछ समझ में नही आ रहा था कि क्या हो रहा और क्यों हो रहा....पण्डित जी खुद को राम चरणों मे आत्मार्पित कर चुके थे और जैसे ही उन्होंने चौपाई कहा---

लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें॥
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा।भरे भुवन धुनि घोर कठोरा

पण्डित जी के चौपाई पढ़ते ही आसमान में भीषण बिजली कड़की और मंच पर रखे लोहे के धनुष को कलाकार ने दो भागों में तोड़ दिया..

लोग बताते हैं हैं कि ये सब कैसे हुआ और कब हुआ किसी ने कुछ नही देखा सब एक पल में हो गया..धनुष टूटने के बाद सब स्थिति अगले ही पल सामान्य हो गयी पण्डित जी मंच के बीच गए और टूटे धनुष और कलाकार के सन्मुख दण्डवत हो गए.... लोग शिव धनुष भंग पर जय श्री राम का उद्घोषणा कर रहे थे और पण्डित जी की आंखों से श्रद्धा के आँसू निकल रहे थे .

युगोस्लाविया - सोवियत संघ

  यदि आप कभी bosnia-herzegovina जाएंगे तब एक जगह आपको 9300 मुसलमानों की सामूहिक कब्र दिखेगी जहां उन सभी के नाम लिखे हैं दरअसल यह मुस्लिम कही...