#समाजवाद तब और अब
१९६०- ७० के दशक में एक शख़्स ऐसा हुआ करता था जो कागज़ों का पुलिंदा बगल में दबाए हुए जब संसद में प्रवेश करता था तो लोगो की सासे टग जाती थी कि न जाने आज किसकी शामत आने वाली है। मशहूर समाजवादी चिंतक और समाजवादी आंदोलन- #मधु_लिमये
वो जमाना था जब डॉक्टर लोहिया प्रधान मल्ल की तरह खम ठोंकते और सारे समाजवादी भूखे शेर की तरह सत्ता पक्ष पर टूट पड़ते और बोलती बंद कर देते।
एक बार इंदिरा गांधी ने लोकसभा में बजट पेश किया जो आर्थिक लेखानुदान था भाषण समाप्त होते ही मधु लिमये ने व्यवस्था का प्रश्न उठाना चाहा, लेकिन स्पीकर ने सदन को अगले दिन तक के लिए स्थगित कर दिया। मधु झल्लाते हुए उनके चैंबर में गए और बोले- आज बहुत बड़ा गुनाह हो गया है. आप सारे रिकॉर्ड्स मंगवा कर देखिए.मनी बिल तो पेश ही नहीं किया गया. अगर ऐसा हुआ है तो आज 12 बजे के बाद सरकार का सारा काम रुक जाएगा और सरकार का कोई भी महकमा एक भी पैसा नहीं ख़र्च कर पाएगा।
जब स्पीकर ने सारी प्रोसीडिंग्स मंगवा कर देखी तो पता चला कि धन विधेयक तो वाकई पेश ही नहीं हुआ था. वो घबरा गए क्योंकि सदन तो स्थगित हो चुका था। तब मधु ने कहा -ये अब भी पेश हो सकता है. आप तत्काल सभी नेताओं को बुलवाएं उसी समय रेडियो पर घोषणा करवाई गई कि संसद की तुरंत एक बैठक बुलवाई गई है. जो जहां भी है तुरंत संसद पहुंच जाए. संसद रात में बैठी और इस तरह धन विधेयक पास हुआ।
मधु लिमये की सादगी का आलम ये था कि उनके घर में न तो फ़्रिज था, न एसी और न ही कूलर. कार भी नहीं थी उनके पास. हमेशा ऑटो या बस से चला करते थे.
सादगी का आलम ये था कि उनके घर में न तो फ़्रिज था, न एसी और न ही कूलर,कार भी नहीं थी उनके पास हमेशा ऑटो या बस से चला करते थे.
एसी उन्होंने कभी लगाया नहीं. जब बाद में वो बीमार पड़े तो लोगों ने काफ़ी ज़िद की कि आपके यहाँ एसी लगवा देते हैं. लेकिन वो इसके लिए तैयार नहीं हुए.
एक बार 1000 रुपए का मनीऑर्डर आया उन्होंने डाकिये से पैसे तो ले लिए लेकिन मनीऑर्डर की रसीद देखि तो पता चला कि संसद में मधु लिमये ने चावल के आयात के सिलसिले में जो सवाल किया था उससे एक बड़े भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ हुआ था और उसके कारण एक व्यापारी को बहुत लाभ हुआ था और उसने ही कृतज्ञतावश वो रुपए मधुजी को भिजवाए थे,मधु लिमये ने वो रुपए पोस्ट ऑफ़िस उन सज्जन को वापस भिजवा दिए।
उनकी राय थी कि सांसदों को पेंशन नहीं मिलनी चाहिए और उन्होंने न सिर्फ़ सांसद की पेंशन नहीं ली बल्कि अपनी पत्नी को भी कहा कि उनकी मृत्यु के बाद वो पेंशन के रूप में एक भी पैसा न लें. 1976 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान संसद का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया तब भी उन्होंने पांच साल पूरे होने पर लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया।जेपी,लोहिया, मधु लिमये का समाजवाद और आज उनके चेले लालू, मुलायम कहा का कहा पहुंच गया
१९६०- ७० के दशक में एक शख़्स ऐसा हुआ करता था जो कागज़ों का पुलिंदा बगल में दबाए हुए जब संसद में प्रवेश करता था तो लोगो की सासे टग जाती थी कि न जाने आज किसकी शामत आने वाली है। मशहूर समाजवादी चिंतक और समाजवादी आंदोलन- #मधु_लिमये
वो जमाना था जब डॉक्टर लोहिया प्रधान मल्ल की तरह खम ठोंकते और सारे समाजवादी भूखे शेर की तरह सत्ता पक्ष पर टूट पड़ते और बोलती बंद कर देते।
एक बार इंदिरा गांधी ने लोकसभा में बजट पेश किया जो आर्थिक लेखानुदान था भाषण समाप्त होते ही मधु लिमये ने व्यवस्था का प्रश्न उठाना चाहा, लेकिन स्पीकर ने सदन को अगले दिन तक के लिए स्थगित कर दिया। मधु झल्लाते हुए उनके चैंबर में गए और बोले- आज बहुत बड़ा गुनाह हो गया है. आप सारे रिकॉर्ड्स मंगवा कर देखिए.मनी बिल तो पेश ही नहीं किया गया. अगर ऐसा हुआ है तो आज 12 बजे के बाद सरकार का सारा काम रुक जाएगा और सरकार का कोई भी महकमा एक भी पैसा नहीं ख़र्च कर पाएगा।
जब स्पीकर ने सारी प्रोसीडिंग्स मंगवा कर देखी तो पता चला कि धन विधेयक तो वाकई पेश ही नहीं हुआ था. वो घबरा गए क्योंकि सदन तो स्थगित हो चुका था। तब मधु ने कहा -ये अब भी पेश हो सकता है. आप तत्काल सभी नेताओं को बुलवाएं उसी समय रेडियो पर घोषणा करवाई गई कि संसद की तुरंत एक बैठक बुलवाई गई है. जो जहां भी है तुरंत संसद पहुंच जाए. संसद रात में बैठी और इस तरह धन विधेयक पास हुआ।
मधु लिमये की सादगी का आलम ये था कि उनके घर में न तो फ़्रिज था, न एसी और न ही कूलर. कार भी नहीं थी उनके पास. हमेशा ऑटो या बस से चला करते थे.
सादगी का आलम ये था कि उनके घर में न तो फ़्रिज था, न एसी और न ही कूलर,कार भी नहीं थी उनके पास हमेशा ऑटो या बस से चला करते थे.
एसी उन्होंने कभी लगाया नहीं. जब बाद में वो बीमार पड़े तो लोगों ने काफ़ी ज़िद की कि आपके यहाँ एसी लगवा देते हैं. लेकिन वो इसके लिए तैयार नहीं हुए.
एक बार 1000 रुपए का मनीऑर्डर आया उन्होंने डाकिये से पैसे तो ले लिए लेकिन मनीऑर्डर की रसीद देखि तो पता चला कि संसद में मधु लिमये ने चावल के आयात के सिलसिले में जो सवाल किया था उससे एक बड़े भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ हुआ था और उसके कारण एक व्यापारी को बहुत लाभ हुआ था और उसने ही कृतज्ञतावश वो रुपए मधुजी को भिजवाए थे,मधु लिमये ने वो रुपए पोस्ट ऑफ़िस उन सज्जन को वापस भिजवा दिए।
उनकी राय थी कि सांसदों को पेंशन नहीं मिलनी चाहिए और उन्होंने न सिर्फ़ सांसद की पेंशन नहीं ली बल्कि अपनी पत्नी को भी कहा कि उनकी मृत्यु के बाद वो पेंशन के रूप में एक भी पैसा न लें. 1976 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान संसद का कार्यकाल एक साल के लिए बढ़ा दिया तब भी उन्होंने पांच साल पूरे होने पर लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया।जेपी,लोहिया, मधु लिमये का समाजवाद और आज उनके चेले लालू, मुलायम कहा का कहा पहुंच गया







