रविवार, 2 जुलाई 2023

इमरजेंसी हॉरर स्टोरीज- 1975

 इमरजेंसी हॉरर स्टोरीज - १

इमरजेंसी में एक लाख लोग आधिकारिक रूप से जेल में ठूसे गए थे। ना जाने कितने लोग इस दौरान गायब हो गए - उनके शव तक ना मिले। कुछ कहानियां मसलन स्नेहलता रेड्डी की - मीडिया में आयी किन्तु पूर्ण रूप से नहीं। ऐसी एक कहानी है केरल के कालीकट के रहने वाले राजन की। रिटायर्ड प्रोफेसर का बेटा राजन इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष का छात्र था - होनहार पढ़ाकू। १ मार्च १९७६ में पुलिस राजन और उसके दोस्त जोसफ बाली को पकड़ ले गई। राजन के पिता ने प्रधान मंत्री राष्ट्रपति केरल के cm , केरल के गृहमंत्री करुणाकरण , पुलिस चीफ सबके द्वार खटखटाये- चिट्ठियां लिखी लेकिन कुछ पता न चला दोनों लड़के किधर गए।
पूरा एक साल निकल गया - इमरजेंसी के ख़तम होने पर राजन के पिता ने हाई कोर्ट में हैबियस कार्पस लगाई। बेटे को उपस्थित करने की अर्जी लगाई। अब करुणाकरण केरल के cm बन चुके थे। करुणाकारन और पुलिस दोनों ने हलफनामा दिया राजन को तो कभी गिरफ्तार किया ही नहीं गया। लेकिन अनेक गवाह और सबूत थे जिनसे ये हलफनामे गलत साबित हुए । करुणाकरण को इस्तीफ़ा देना पड़ा - और फिर जोसफ बाली रिहा हुआ। जोसफ ने बताया राजन को इतना मारा गया था कि वो चार मार्च को ही मर गया। उसके अनुसार उसके शव को पुलिस ने लोकल बाँध में फेंक दिया था। बाँध खंगाला गया किन्तु शव ना मिला। पुलिस ने फिर कहा - राजन नहीं मरा है। राजा के पिता को उम्मीद अब भी शेष थी।
इमरजेंसी के बाद जब संजय गाँधी अरेस्ट हुए - इंदिरा गाँधी ने पब्लिक्ली आंसू बहाये अपने बेटे की सलामती की जनता से गुहार लगाई तब राजन के पिता ने मिसेस गाँधी से प्रार्थना की - मेरे बेटे की माँ उसकी याद में बीमार पड़ी रही - ख़त्म हो गई आज भी उसका कोई अता पता नहीं है। कृपया उसके शव का ही पता लगवा दीजिये - आपकी पार्टी की राज्य में सरकार है। किन्तु कुछ ना हुआ।
राजन आज भी गुमशुदा है



इमरजेंसी हॉरर स्टोरीज - २
आज 25 June को इमरजेंसी के ४८ वर्ष पूर्ण हुए है। ये शृंखला कुछ अनसुने पहलु , कहानियां कवर करेगी। सारी जानकारी पब्लिक डोमेन में है। यदि किसी को कोई संशय हो - खुद गूगल कर परख ले।
स्नेहलता रेड्डी की कहानी खूब पढ़ी और जानी गयी है। कुछ और पहलु इस सन्दर्भ में जान लें। स्नेहलता सेकंड जनरेशन कनवर्टेड ईसाई थी जो अपने पूर्वजो के धर्म की ओर आकर्षित रही थी। एक फिल्म एक्ट्रेस रेड्डी के पति एक डायरेक्टर थे - पट्टाभि। बैंगलोर में रहने वाले इस दम्पति के दो बच्चे है - नंदना रेड्डी जो आजकल एक ngo चलाती है और बेटा कोणार्क जो एक म्यूजिक कंपोजर है। रेड्डी दम्पति राम मनोहर लोहिआ जी की विचारधारा से बहुत प्रभावित थे और जॉर्ज फर्नांडेस के क्लोज मित्र थे। बस यही दो फैक्टर स्नेहलता के विरुद्ध गए।
इमरजेंसी के दौरान बड़ोदा डायनामाइट काण्ड बड़ा उछाला गया जिसमे जॉर्ज समेत पच्चीस नेताओ के खिलाफ वारंट निकले। जॉर्ज की गिरफ़्तारी के चक्कर चलते रेड्डी दम्पति पर बिजली गिरी। १ मई १९७६ को जब दोनों पति पत्नी मद्रास में थे - पुलिस ने नंदना और फिर कोणार्क को हिरासत में ले लिया। रेड्डी दंपत्ति मद्रास से बैंगलोर फ्लाइट से आये जब दोनों को एयरपोर्ट पर ही पकड़ लिया गया । स्नेहा ने पुलिस से कहा - मेरे बच्चो और पति को छोड़ दो - जो कुछ ज्ञात है बता दूंगी। उन तीनो को छोड़ स्नेहा को कस्टडी में ले लिया गया।
अगले दिन मजिस्ट्रेट के सम्मुख स्नेहा की जमानत पर छोड़ने की बात तय हुई किन्तु जब पट्टाभि थाने पहुंचे ज्ञात हुआ स्नेहा को बैंगलोर सेंट्रल जेल में भेज दिया गया है। जमानत की बात अनसुनी कर दी गयी। इसके बाद शुरू हुआ ८ महीने का टार्चर का सिलसिला । एक छोटी सी कोठरी में स्नेहा को नग्न रख टार्चर , वही दैनिक नित्य क्रम आदि। उस समय मधु दंडवते भी उसी जेल में थे - उन्होंने अपनी पुस्तक में स्नेहा के चीखने के गूंजने का जिक्र बड़े साफ़ तौर पर किया है। जॉर्ज के छोटे भाई लॉरेंस फर्नेंडेस ने भी स्नेहा के बारे में उल्लेख किया है।
स्नेहा को दमे की बीमारी थी - जो इन आठ महीने की जेल के दौरान क्रोनिक दमे में बदल गयी। तबियत बहुत बिगड़ने पर स्नेहा को जेल से रिहा किया गया और रिहा होने के पांच दिन बाद स्नेहा की अस्पताल में मृत्यु हो गयी। इमरजेंसी के ऐसे केसेस की पड़ताल करने वाले शाह कमीशन के समक्ष ये केस आया। दिलचस्प बात ये रही - बड़ोदा डायनामाइट केस की फाइनल चार्ज शीट में स्नेहा का नाम तक ना था।
फिर स्नेहा को आठ महीने जेल में क्यों रखा गया ?


इमरजेंसी हॉरर स्टोरीज - ३
जॉर्ज फर्नाडेस के भाई लॉरेंस को बैंगलोर के उनके घर से मई १९७६ में उठा लिया गया। पूछताछ के दौरान उन्हें जम कर मारा पीटा गया । दस पुलिस वालो ने एक साथ इनको लातो घुसो से पीटा जॉर्ज का पता जानने के लिए। बैंगलोर के मल्लेश्वरम थाने में लेजा और टार्चर दिया गया । अर्ध बेहोशी में लॉरेंस ने सुना - पुलिस उन्हें रेल पटरी पर फेंकने का प्लान बना रही है । फिर प्लान बदला गया - उन्हें कहा गया मजिस्ट्रेट के समक्ष कहना - तुम्हे चित्रदुर्ग से पकड़ा है । लेकिन लॉरेंस को देवनगिरि ले जाया गया और मजिस्ट्रेट से कहा इन्हे इधर के बस अड्डे से फरार होते समय पकड़ा है।
लॉरेंस को इतना पीटा गया था कि हाथ पैर सूज का दुने साइज के हो चुके थे - हड्डियां टूट चुकी थी। मजिस्ट्रेट ने ये सब अनदेखा कर पुलिस रिमांड में दे दिया। फिर पुलिस टार्चर का सिलसिला चालू हुआ - मिर्ची हर जगह से शरीर में डाली गयी । अनेक हड्डियां टूट गई - आगामी मजिस्ट्रेट पेशी से पहले एक मालिश वाले को बुला मालिश करवाई ताकि लॉरेंस खड़े तो हो सके। पीने को मूत्र और खाने के नाम मात्र मिलता । लॉरेंस के अनुसार वो हमेशा अर्ध बेहोशी में ही रहते थे - कभी उन्हें लगता उनके माँ पिता खड़े है कभी जॉर्ज और कभी उनके भाई माइकल।
दूसरी पेशी पर मजिस्ट्रेट उन्हें जमानत पर रिहा करने को तैयार था किन्तु जमानत देने वाला कोई ना था । इसलिए उन्हें बैंगलोर सेंट्रल जेल में डाल दिया गया। इस समय मधु दंडवते जी और इनकी मुलाकात हुई - स्नेहा रेड्डी के चीखने का मंजर इन दोनों ने हूबहू एक जैसा लिखा है। जेल में हुई तमाम ज्यादिति के बारे में लिखना बेमानी है - जो बुरा से बुरा हो सकता था हुआ।
लॉरेंस को आपातकाल समाप्त होने पर रिहा किया गया - रिहाई के समय वे एक मानव हड्डियों के ढांचे में शेष रह गए थे। मानसिक तौर पर पूर्ण रूप से टूटे लॉरेंस को तीन साल लगे फिजिकली और मेंटली ठीक होने में।
लॉरेंस किस्मत से अपनी कहानी बताने को जीवित रहे । बड़ी विडम्वना थी जब कांग्रेस ने इनकी और जॉर्ज की मृत्यु पर अफ़सोस जताया था।
इमरजेंसी हॉरर स्टोरीज - ४.........................
इमरजेंसी के दौरान एक खबर छपी - अलवर रियासत के पूर्व युवराज श्री प्रताप सिंह और उनके सचिव भगीरथ मिश्र मृत पाए गए । सरकारी स्पष्टीकरण था युवराज और उनके सचिव अवैद्य कारनामो में लिप्त थे और आपस में लड़ मरे। एमरजेंसी के बाद असली कहानी निकल सामने आयी। संजय गाँधी की युवराज से किसी बात पर अदावत थी - लिहाज़ा इमरजेंसी में २३ मार्च १९७६ को अलवर पुलिस और जयपुर से आई एक बटालियन ने अलवर फूलबाग में युवराज के महल की नाकाबंदी कर दी । युवराज को हथकड़ी में ले जाने का आदेश दिल्ली से आया था।
बिजली फ़ोन पानी आदि की सप्लाई काट दी गई । महल में कुछ भी खाने का सामान ले जाना मनाही था । पांच दिन तक ये नाकाबंदी रही - अंदर युवराज का समस्त परिवार भूखे प्यासे रहा किन्तु युवराज ने हथकड़ी में जाना स्वीकार ना किया। २८ मार्च १९७६ को जब सब हदे पार हो गई तो ज्ञात हुआ युवराज और भागीरथ मिश्र जी महल में मृत पाए गए है - उनकी मृत्यु का कारण ना ज्ञात हुआ - कोई कहता आत्महत्या थी।
राजनीती बड़ी कुत्ती चीज़ है । इन्ही स्वाभिमानी युवराज के एक बेटे आजकल एक पार्टी में एक्टिव है - २०१२ में इस पार्टी के मंत्री भी थे।
क्या आप गेस कर सकते है वो किस पार्टी में है ?



इमरजेंसी हॉरर स्टोरीज - ५
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नोट - मेरा किसी राजनैतिक पार्टी / दल / आदि से कोई लेना देना नहीं है । इतिहास के पन्ने खंगालना अच्छा लगता है और कुछ सैम्पल्स आप सब के साथ बांटे है। इमरजेंसी के ४८ वर्ष पूर्ण होने की घडी में ये छोटे पोस्ट संक्षेप में नमूने भर है। मुझे कुछ भी अनर्गल कहने से पहले खुद इन सब केसेस को खुद गूगल करिये - दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा ! एक मित्र ने पुछा था क्या और केसेस और है ऐसे - तो मुट्ठी भर केसेस पोस्ट करे है । बाकी शाह कमीशन के पौने तीन सौ पन्ने वाली रिपोर्ट पढ़ लें - बहुत कुछ ज्ञात हो जाएगा !
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आचार्य विनोबा भावे - भूदान मूवमेंट वाले - को महात्मा गाँधी का उत्तरधिकारी माना जाता है । भावे ने गाँधी जी की भांति कांग्रेस को हमेशा सपोर्ट किया था। इमरजेंसी को इन्होने अनुशासन पर्व की संज्ञा दी थी। इमरजेंसी के दौरान भावे जी ने टोटल चुप्पी साधे रखी । श्री कपूरी ठाकुर जी ने उन्होंने चार पांच खत लिखे - लाख दुहाई दी लेकिन भावे जी ने कोई उत्तर ना दिया। सरकारी संत के नाम से मशहूर भावे जी के एक सहयोगी हुआ करते थे श्री प्रभाकर शर्मा जी।
भावे जी के वर्धा स्थित आश्रम में रहने वाले उनके सहयोगी प्रभाकर शर्मा जी कई वर्षो से भावे जी के साथ काम कर रहे थे। किन्तु इमरजेंसी में हो रहे स्वंत्रता के हनन को लेके शर्मा जी चिंता में थे - उन्हें खुद जेल जाने का डर था। कारण सुन आप चकित रह जाएंगे।
प्रभाकर शर्मा जी एक पक्के गाँधीवादी और भावे जी के सच्चे अनुयायी थे। गौवध के विरुद्ध शर्मा जी ने एक पत्र निकाला था - मैत्रीय। इस सिलसिले में शर्मा जी की कुटिया में पुलिस ने छापा मारा और सब पत्र की कॉपी जब्त कर ली और उन्हें कड़ी चेतावनी दी। शर्मा जी अवसाद में आ गए और उन्होंने आत्म दाह कर लिया। वर्धा के सुरगाव् में शर्मा जी ने अग्नि स्नान से पूर्व भावे जी और इंदिरा के नाम पत्र भी लिखा । उन्होंने दाह से पहले लिखे नोट में लिखा - 'सरकार ने ईश्वर और मानवता को भूलते हुए, स्वयं को बर्बर शक्तियों से लैस करते हुए,अखबारों और आमजन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीनते हुए, भारतीय जीवन के शालीनतापूर्ण, महान और उदात्त गुणों पर प्रहार करते हुए देश को बंधक बना लिया है। यह असहनीय है।'
नतीजा सिफर !


इमरजेंसी हॉरर स्टोरीज़-६
जनवरी १९७६ - रक्षा मंत्री बंसी लाल के साथ संजय गांधी नौसेना के एक अहम कार्यक्रम में बंबई गये। नौसेना के बंगले आदि अधिकारियों के लिए बुक थे - रक्षा मंत्री को एक सुइट और संजय को एक कमरे में ठहराया गया। किंतु बंसीलाल ने अपना सुइट संजय को दे दिया। यहाँ से संजय के गाल फूलने शुरू हुए। बंसी लाल ने नौसेना प्रमुख कोहली जी को लताड़ा इस बात पर।
रात्रि भोज पर अलग हंगामा मचा। मेन टेबल पर राष्ट्रपति राज्यपाल रक्षा मंत्री नौसेना के मेन अधिकारियों के लिए जगह रिज़र्व थी। संजय को थोड़ी नीची टेबल पर जगह दी गई थी। बंसी लाल ने वही हंगामा शुरू कर दिया- बोले संजय को मेन टेबल पर बिठाओ। कोहली जी ने इनकार कर दिया। बंसीलाल के गाली गलोच करने पर नौसेना प्रमुख ने वहीं इस्तीफ़ा पेश कर दिया। बंसीलाल इस बात के लिये तैयार ना थे। किंतु बंसीलाल ने इसका इलाज अनोखा निकाला।
चूँकि बंसीलाल जी की पत्नी इस भोज में ना थी- उन्होंने अपनी पत्नी की सीट संजय को दे दी- इस तरह से संजय गांधी का ईगो मसाज हुआ और मेन टेबल पर बैठ ख़ाना खाया गया। ये कांड उस समय बड़ा निंदनीय साबित हुआ किंतु किसी पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।
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पच्चीस जून के दिन - इस पेज पर आपातकाल की पोस्ट की बौछार हुई- इस के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। इस सीरीज को इतना लंबा लिखा जा सकता है कि इसका कोई अंत नहीं होगा। नसबंदी और मारुति कांड पर पहले ही विस्तार से लिखा है। जो भी इमरजेंसी को डिफेंड करे- यक़ीन मानिए उसका स्वार्थ कहीं ना कहीं है। इमरजेंसी को किसी भी तरह से जस्टिफाई नहीं किया जा सकता।
सीरीज और दिन का समापन- धन्यवाद!

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