#यूरोप का एक #काला_सच ~~~ #कैस्ट्राती
सत्रहवी सदी के दौरान यूरोप में चर्च में #ओपेरा (एक तरह का लंबी तान वाला गायन) लड़कियां गाती थी। लेकिन उन पर बंदिशे डाली गई जिसके तहत लड़के गाने लगे। किन्तु लड़कों की आवाज उम्र के साथ भारी होने लगती, और वे लंबी तान नहीं लगा पाते लड़कियों की तरह। साथ–ही ओपेरा में पतली आवाज पसंद की जाती।
उस दौरान छोटे लड़कों, जो १० वर्ष के आस–पास होते, के अंडकोष कटवा दिए जाते। इन लड़कों को कैस्ट्राती कहा जाता। होता यह था कि अंडकोष हटा देने से इनकी हड्डियां लचीले रहती। टेस्टोस्टेरोन हार्मोन की कमी के कारण हड्डियां सख्त नहीं होती। ये बेहद लंबे होते; और छाती का पिंजर बड़ा होता जिससे श्वास को ज्यादा देर तक वहां रोका जा सकता था, जो लंबी तान के लिए जरूरी था।
ये कैस्ट्राती बेहद मांग में थे। हर कोई इनको पसंद करता था। क्योंंकि उनका #गायन बेहद पसंद किया जाता, साथ–ही इनका शारीरिक गठन लंबा होता। लंबी बाहें, धड़, टांगे इन्हे बेहद आकर्षक बनाते। महिलाएं इनके पीछे पागल हुई फिरती, खास कर विवाहित महिलाएं, जो इनसे शारीरिक संबंध बनाना चाहती। क्योंंकि अंडकोष ना होने की वजह से यह ज्यादा समय तक संभोग कर सकते थे तथा बच्चे पैदा ना कर पाने की वजह से इन महिलाओं को डर नहीं होता गर्भवती होने का। इसलिए ये बेहद कामयाब होते थे; पैसा, शोहरत, कामयाबी इनके कदम चूमती।
उन दिनों इनका इतना #प्रचलन था कि हर माता पिता अपने लड़कों को कैस्ट्राती बनाना चाहते।
लड़कों को झोला छाप चिकित्सकों द्वारा ऑपरेशन करवाया जाता। क्योंंकि यह कानूनी नहीं था।
चिकित्सक लड़कों को बेहोशी के लिए भारी मात्रा में अफ़ीम खिलाते थे, ताकि बीच में उनको होश ना आ जाए। फिर उन्हें गर्म पानी के टब में लिटाकर अंडकोष तक जाने वाली नलिकाओं को काट दिया जाता। जिससे अंडकोष सिकोड़ जाता नलिकाओं से जुड़ाव कट जाने की वजह से। कई बार चिकित्सक का सहायक उस नलिका को दबाकर रक्त पहुंचने नहीं देता अंडकोष में। यह बेहद दर्दनाक और भयानक प्रक्रिया थी। कई बार इस प्रक्रिया में इतना वक्त लगता कि बालक (बेहोशी की अवस्था में), गर्दन की हड्डी टूट जाने की वजह से मर जाता था या संक्रमण के कारण।
गैर कानूनी होने की वजह से मां बाप झूठ बोलते प्रशासन से की उनके बालक की मौत पेड़ से गिरने या जंगली जानवर के घात से हुई।
18वीं शताब्दी की शुरुआत में, हर साल 4,000 युवाओं ने ऑपरेशन किया, जिनमें से केवल 80 प्रतिशत बच गए। ये बालक जीवन भर के लिए शारीरिक और मानसिक तौर पर आहत हो जाते। इसके अलावा उन्हें बेहद कठोर प्रशिक्षण दिया जाता। एक घंटे तक बिना शरीर को हिलाए लंबी ताने लगने की कहा जाता। साथ–ही पूरा पूरा दिन रियाज करवाया जाता। उन्हें हर किस्म के वाद्य और पठन की शिक्षा दी जाती।
गरीब मां बाप अपनी गरीबी से छुटकारा पाने के लिए पुर जोर कोशिश करते अपने बालकों को कैस्ट्राती बनाने की।
आगे जाकर भी टेस्टोस्टेरोन हार्मोन ना होने की वजह से इन्हें ऑस्टोपोरोसिस और अवसाद की जटिल बिमारियां घर कर लेती।
उन दिनों के सबसे प्रसिद्ध कैस्ट्राती थे फरिनेल्ली जो फोटो पोस्ट में सलंगन है, कहते हैं लोग उनके पीछे पागल थे। दौलत, शोहरत, कामयाबी इनके कदम चूमती थी।
आगे चलकर इस प्रथा का अंत हुआ। पादरी ने चर्च में इनका
सत्रहवी सदी के दौरान यूरोप में चर्च में #ओपेरा (एक तरह का लंबी तान वाला गायन) लड़कियां गाती थी। लेकिन उन पर बंदिशे डाली गई जिसके तहत लड़के गाने लगे। किन्तु लड़कों की आवाज उम्र के साथ भारी होने लगती, और वे लंबी तान नहीं लगा पाते लड़कियों की तरह। साथ–ही ओपेरा में पतली आवाज पसंद की जाती।
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उस दौरान छोटे लड़कों, जो १० वर्ष के आस–पास होते, के अंडकोष कटवा दिए जाते। इन लड़कों को कैस्ट्राती कहा जाता। होता यह था कि अंडकोष हटा देने से इनकी हड्डियां लचीले रहती। टेस्टोस्टेरोन हार्मोन की कमी के कारण हड्डियां सख्त नहीं होती। ये बेहद लंबे होते; और छाती का पिंजर बड़ा होता जिससे श्वास को ज्यादा देर तक वहां रोका जा सकता था, जो लंबी तान के लिए जरूरी था।
ये कैस्ट्राती बेहद मांग में थे। हर कोई इनको पसंद करता था। क्योंंकि उनका #गायन बेहद पसंद किया जाता, साथ–ही इनका शारीरिक गठन लंबा होता। लंबी बाहें, धड़, टांगे इन्हे बेहद आकर्षक बनाते। महिलाएं इनके पीछे पागल हुई फिरती, खास कर विवाहित महिलाएं, जो इनसे शारीरिक संबंध बनाना चाहती। क्योंंकि अंडकोष ना होने की वजह से यह ज्यादा समय तक संभोग कर सकते थे तथा बच्चे पैदा ना कर पाने की वजह से इन महिलाओं को डर नहीं होता गर्भवती होने का। इसलिए ये बेहद कामयाब होते थे; पैसा, शोहरत, कामयाबी इनके कदम चूमती।
उन दिनों इनका इतना #प्रचलन था कि हर माता पिता अपने लड़कों को कैस्ट्राती बनाना चाहते।
लड़कों को झोला छाप चिकित्सकों द्वारा ऑपरेशन करवाया जाता। क्योंंकि यह कानूनी नहीं था।
चिकित्सक लड़कों को बेहोशी के लिए भारी मात्रा में अफ़ीम खिलाते थे, ताकि बीच में उनको होश ना आ जाए। फिर उन्हें गर्म पानी के टब में लिटाकर अंडकोष तक जाने वाली नलिकाओं को काट दिया जाता। जिससे अंडकोष सिकोड़ जाता नलिकाओं से जुड़ाव कट जाने की वजह से।
कई बार चिकित्सक का सहायक उस नलिका को दबाकर रक्त पहुंचने नहीं देता अंडकोष में। यह बेहद दर्दनाक और भयानक प्रक्रिया थी। कई बार इस प्रक्रिया में इतना वक्त लगता कि बालक (बेहोशी की अवस्था में), गर्दन की हड्डी टूट जाने की वजह से मर जाता था या संक्रमण के कारण।
18वीं शताब्दी की शुरुआत में, हर साल 4,000 युवाओं ने ऑपरेशन किया, जिनमें से केवल 80 प्रतिशत बच गए। ये बालक जीवन भर के लिए शारीरिक और मानसिक तौर पर आहत हो जाते। इसके अलावा उन्हें बेहद कठोर प्रशिक्षण दिया जाता। एक घंटे तक बिना शरीर को हिलाए लंबी ताने लगने की कहा जाता। साथ–ही पूरा पूरा दिन रियाज करवाया जाता। उन्हें हर किस्म के वाद्य और पठन की शिक्षा दी जाती।
गरीब मां बाप अपनी गरीबी से छुटकारा पाने के लिए पुर जोर कोशिश करते अपने बालकों को कैस्ट्राती बनाने की।
आगे जाकर भी टेस्टोस्टेरोन हार्मोन ना होने की वजह से इन्हें ऑस्टोपोरोसिस और अवसाद की जटिल बिमारियां घर कर लेती।
उन दिनों के सबसे प्रसिद्ध कैस्ट्राती थे फरिनेल्ली जो फोटो पोस्ट में सलंगन है, कहते हैं लोग उनके पीछे पागल थे। दौलत, शोहरत, कामयाबी इनके कदम चूमती थी।
आगे चलकर इस प्रथा का अंत हुआ। पादरी ने चर्च में इनका गायन बंद कर दिया तथा इतनी भयानक प्रक्रिया को बिल्कुल गैर कानूनी बनाकर उसपर प्रतिबंध लगाया गया।
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