इतिहास में #कर्णावती नाम की दो रानियों का उल्लेख मिलता है,एक चित्तौड के शासक राणासंग्राम सिंह की पत्नी थी
दूसरी देवभूमि की महारानी गढवाल की शासिका थीं जिनका उल्लेख नाक काटने वाली रानी के नाम से मिलता है~~~~~
शाहजहां के कार्यकाल पर #बादशाहनामा लिखने वाले अब्दुल हमीद लाहौरी और इटली के लेखक निकोलाओ मानुची जो 17 सदी में भारत आये और औरंगजेब के मुगल दरबार में काम किया थे, दोनों ने ही इस रानी का जिक्र अपनी किताब 'स्टोरिया डो मोगोर में किया है की कैसे मुगल सैनिकों की नाट काटी थी !
रानी कर्णावती पवार वंश के राजा #महिपतशाह की पत्नी थी,जिनके शासन में रिखोला लोदी और माधोसिंह जैसे सेनापति हुए थे जिन्होंने तिब्बत के आक्रांताओं को छठी का दूध याद दिलाया था! माधोसिंह के बारे में गढ़वाल में काफी किस्से प्रचलित हैं ! पहाड़ का सीना चीरकर अपने गांव मलेथा में पानी लाने की कहानी भला किस गढ़वाली को पता नहीं होगी। कहा जाता था कि माधोसिंह अपने बारे में कहा करते थे == एक सिंह वन का सिंह, एक सींग गाय का। तीसरा सिंह माधोसिंह, चौथा सिंह काहे का
रिखोला लोदी और माधोसिंह जैसे सेनापतियों की मौत के बाद महिपतशाह भी जल्द स्वर्ग सिधार गये ! तत्पश्चात रानी कर्णावती ने सत्ता संभाली,उनके पुत्र पृथ्वीपतिशाह केवल 7 साल के थे, अतः रानी कर्णावती ने एक संरक्षिका शासिका के रूप में शासन किया !
वे अपनी विलक्षण बुध्दि एवं गौरवमय व्यक्तित्व के लिए प्रसिध्द हुईं,और बडे धैर्य और साहस के साथ उन्होंने पृथ्वीपति शाह के संरक्षक के रूप में राज्यभार संभाला ! रानी कर्णावती ने राजकाज संभालने के बाद अपनी देखरेख में शीघ्र ही शासन व्यवस्था को सुद्यढ किया! #गढवाल के प्राचीन ग्रंथों और गीतों में रानी कर्णावती की प्रशस्ति में उनके द्वारा निर्मित बावलियों. तालाबों , कुओं आदि का वर्णन आता है।
एक बार समर्थ गुरु स्वामी #रामदास और सिख गुरु #हरगोविन्द जी 1634 में श्रीनगर गढवाल पधारे और रानी कर्णावती को उनसे भेंट करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। समर्थ गुरु रामदास ने रानी कर्णावती से पूछा कि क्या पतित पावनी गंगा की सप्त धाराओं से सिंचित भूखंड में यह शक्ति है कि वैदिक धर्म एवं राष्ट्र की मार्यादा की रक्षा के लिये मुगल शक्ति से लोहा ले सके। इस पर रानी कर्णावती ने विनम्र निवेदन किया पूज्य गुरुदेव , इस पुनीत कर्तव्य के लिये हम गढवाली सदैव कमर कसे हुए उपस्थित हैं।
इससे पहले जब महिपतशाह गढ़वाल के राजा थे तब 14 फरवरी 1628 को शाहजहां का #राज्याभिषेक हुआ था ! जब वह गद्दी पर बैठे तो देश के तमाम राजा आगरा पहुंचे थे ! महिपतशाह आगरा नहीं गये ! इसके दो कारण थे,पहला यह कि पहाड़ से आगरा तक जाना तब आसान नहीं था और दूसरा उन्हें मुगल शासन की अधीनता स्वीकार नहीं थी ! कहा जाता है कि शाहजहां इससे चिढ़ गया था !
इसके अलावा किसी ने मुगल शासकों को बताया कि गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर में सोने की खदानें हैं ! महीपति शाह के शासनकाल में मुगल सेना गढवाल विजय के बारे में सोचती भी नहीं थी, लेकिन जब रानी कर्णावती ने गढवाल का शासन संभाला तब मुगल शासकों ने सोचा कि उनसे शासन छीनना सरल होगा !
शाहजहां को समर्थ गुरु रामदास और गुरु हरगोविन्द सिंह के श्रीनगर पहुंचने और रानी कर्णावती से सलाह मशविरा करने की खबर लग गयी थी ! नजाबत खां नाम के एक मुगल सरदार को गढवाल पर हमले की जिम्मेदारी सौंपी गयी और वह 1635 में एक विशाल सेना लेकर आक्रमण के लिये आया जिसमे पैदल व घुडसवार सैनिक भी थे !
विषम परिस्थितियों में रानी कर्णावती ने सीधा मुकाबला करने के बजाय कूटनीति से काम लिया और मुगलो को अपनी सीमा में घुसने दिया लेकिन जब वे वर्तमान समय के #लक्ष्मणझूला से आगे बढ़े तो उनके आगे और पीछे जाने के रास्ते रोक दिये गये। गंगा के किनारे और पहाड़ी रास्तों से अनभिज्ञ मुगल सैनिकों के पास खाने की सामग्री समाप्त होने लगी ! उनके लिये रसद भेजने के सभी रास्ते भी बंद थे !
मुगल सेना कमजोर पड़ने लगी और ऐसे में सेनापति ने गढ़वाल के राजा के पास संधि का संदेश भेजा लेकिन उसे ठुकरा दिया गया ! मुगल सेना की स्थिति बदतर हो गयी थी ! रानी चाहती तो उसके सभी सैनिकों का खत्म कर देती लेकिन उन्होंने मुगलों को सजा देने का नायाब तरीका निकाला !
रानी ने संदेश भिजवाया कि वह सैनिकों को जीवनदान दे सकती है लेकिन इसके लिये उन्हें अपनी नाक कटवानी होगी! मुगल सैनिकों के हथियार छीन लिए गये और आखिर में उन सभी की एक एक करके #नाक काट दी गयी ! कहा जाता है कि जिन सैनिकों की नाक काटी गयी उनमें सेनापति नजाबत खान भी शामिल था ! वह इससे काफी शर्मसार था और उसने मैदानों की तरफ लौटते समय अपनी जान दे दी।
इस तरह मोहन चट्टी में मुगल सेना को नेस्तनाबूद कर देने के बाद रानी कर्णावती ने जल्द ही पूरी दून घाटी को भी पुन: गढवाल राज्य के अधिकार क्षेत्र में ले लिया ! गढवाल की उस नककटवा रानी ने गढवाल राज्य की विजय पताका फिर शान के साथ फहरा दी और समर्थ गुरु रामदास को जो वचन दिया था, उसे पूरा करके दिखा दिया ! रानी कर्णावती के राज्य की संरक्षिका के रूप में 1640 तक शासनारूढ रहने के प्रमाण मिलते है
शाहजहां इस हार से काफी शर्मसार हुआ था,बाद में उसने अरीज खान को गढ़वाल पर हमले के लिये भेजा था लेकिन वह भी दून घाटी से आगे नहीं बढ़ पाया था, बाद में शाहजहां के बेटे औरंगजेब ने भी गढ़वाल पर हमले की नाकाम कोशिश की थी !
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