कल्पना कीजिए कि यदि बंटवारे के बाद पाकिस्तान की सरहद #नर्मदा_नदी होती तो क्या होता???
आज ये एक चौकाने वाला और काल्पनिक सवाल हो सकता है लेकिन बंटवारे के पहले इसे हकीकत में बदलने की पुरजोर कोशिश हुई ✓✓✓✓===
इसकी पहल #भोपाल नवाब #हमीदुल्लाह खान ने की थी जो उस समय भारत के देसी रियासतों के संगठन चेंबर आफ प्रिंसेस का अध्यक्ष था।
भोपाल #नवाब देश काफी रसूखदार और देश के कई रियासतों पे भी उसका प्रभाव था और वो जिन्ना के करीबी भी था।
खान ने इस योजना को अंजाम देने के लिए अपने पद और पैसे का भी प्रयोग किया। नबाव की योजना भोपाल के साथ आसपास के कई और #रियासतों को भी पाकिस्तान में मिलाने की थी, जैसे जैसलमेर और बड़ौदा आदि रियासत।
भोपाल नवाब जैसलमेर और बड़ौदा के महाराजा को तो अपनी और नहीं कर पाया लेकिन जोधपुर के महाराजा हनुवंत सिंह और इंदौर के महाराजा यशवंतराव उनके प्रभाव में आ गए।
पश्चिम में जोधपुर और पूर्व में इंदौर तथा भोपाल के बीच में उदयपुर रियासत थी। उसने भोपाल में उदयपुर की महाराणा भूपाल सिंह को साथ लाने की भरपूर कोशिश की।
यदि उपर्युक्त रियासतों को पाकिस्तान के साथ मिलाने भोपाल नवाब की योजना सफल हो जाती है तो पाकिस्तान की सरहद पूर्व में भोपाल तथा दक्षिण में गुजरात के सूरत जिले के नवसारी तक हो जाती।
यानी तब पाकिस्तान की दक्षिण सरहद नर्मदा नदी होती ।
भोपाल नवाब की इस योजना को #विफल करने का श्रेय उदयपुर के महाराणा भूपाल सिंह को जाता है।
जब #उदयपुर महाराणा को भोपाल प्लान में शामिल होने के लिए आमंत्रण मिला तो #राणाप्रताप के इस वंशज ने जवाब दिया- मेरे पूर्वजों ने ही यह तय कर दिया था कि मुझे क्या करना है । यदि वे अपने रास्ते से भटक जाते तो मुझे विरासत में इतना विशाल राज्य मिलता जो हैदराबाद रियासत के बराबर होता । लेकिन वे भटके नहीं और न मैं भटकूँगा,मैं भारत के साथ हूं ।
उदयपुर के महाराणा के इस सख्त रुख के कारण भोपाल नवाब की योजना कामयाब नहीं हुई । सरदार पटेल की योजना के अनुसार भारत संघ में विलय करने के लिए जब भोपाल के नवाब से कहा गया तो उसने सीधा नकार दिया
उसने भारत और पाकिस्तान दोनों देशों से संधि करने की योजना बनाई ।
लेकिन लार्ड माउंटबेटन से मिलने के बाद नवाब ने महसूस किया कि ज्यादातर राजाओं ने भारत संघ में विलय पर सहमति दे दी है और यदि उसने ऐसा नहीं किया तो उसकी स्थिति बहुत खराब हो जाएगी । तब उसने सरदार #पटेल के सहयोगी वीपी मेनन से जानना चाहा कि विलय के लिए सहमत न होकर क्या वह यथास्थिति समझौते पर दस्तखत कर सकता है ?
तो मेनन ने इनकार कर दिया,फिर नवाब ने अपने सलाहकार जफरुल्लाखान से राय मागी। अंत में विलय पत्र में बिना कोई फेरबदल के भोपाल को भी सभी राज्यों के समान उन्हीं शर्तों पर शामिल होना पड़ा। नवाब ने विलय पत्र पर दस्तखत कर दिए, लेकिन शर्त रखी कि सत्ता के हस्तांतरण तक इस बात को गुप्त रखा जाएगा। उसकी इस शर्त को मानने में कोई कठिनाई नहीं थी । विलय का निर्णय लेने के बाद नवाब हमीदुल्ला खान ने सरदार पटेल को पत्र में अपने पहले के रुख के बारे में स्पष्टीकरण देते हुए लिखा --
मैं इस सच्चाई से इनकार नहीं करता कि जब संघर्ष जारी था , मैंने मेरी रियासत को स्वतंत्र और तटस्थ रखने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा दी । चूंकि अब मैंने हार स्वीकार कर ली है तो मुझे उम्मीद है कि आप पाएंगे कि मैं आपका उतना ही सच्चा मित्र हो सकता है,जितना कि आपका कठोर विरोधी था। अब नवाब हमीदल्ला खान इससे ज्यादा और क्या कर सकता था।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें