हिन्दू कोड बिल / नेहरू और डालमिया
हिन्दुस्तानियो की एक खासियत है हम अपने देश के सच्चे सपूतों को भुलाकर तथाकथित धर्मनिरपेक्षियों की जय जयकार करके उन्हें राष्ट्र का सर्वेसर्वा बना देते हैं जो कि असल में देश के दुश्मन है।
ये तस्वीर है राष्ट्रवादी सेठ रामकृष्ण #डालमिया की ,जिसे नेहरू ने झूठे मुकदमों में फंसाकर जेल भेज दिया तथा कौड़ी-कौड़ी का मोहताज़ बना दिया ।दरअसल डालमिया जी ने स्वामी करपात्री जी महाराज के साथ मिलकर गौहत्या एवम हिंदू कोड बिल पर प्रतिबंध लगाने के मुद्दे पर नेहरू से कड़ी टक्कर ले ली थी । लेकिन #नेहरू ने हिन्दू भावनाओं का दमन करते हुए गौहत्या पर प्रतिबंध भी नही लगाई तथा हिन्दू कोड बिल भी पास कर दिया और प्रतिशोध स्वरूप हिंदूवादी सेठ डालमिया को जेल में भी डाल दिया तथा उनके उद्योग धंधों को बर्बाद कर दिया ।
लोग डॉ राजेन्द्र प्रसाद और सुभाष बाबू के साथ उनके निर्मम व्यवहार के बारे में वाकिफ होंगे मगर इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने अपनी ज़िद के कारण देश के उस समय के सबसे बड़े उद्योगपति सेठ रामकृष्ण डालमिया को बड़ी बेरहमी से मुकदमों में फंसाकर न केवल कई वर्षों तक जेल में सड़ा दिया बल्कि उन्हें कौड़ी-कौड़ी का मोहताज कर दिया.
#राजस्थान के रामकृष्ण डालमिया मामूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने मामा के पास कोलकाता चले गए थे ,वहां पर बुलियन मार्केट में एक salesman के रूप में उन्होंने अपने व्यापारिक जीवन का शुरुआत किया था.
शुरुआती दौर में वो #सट्टा_बाजार में पैसा लगाते थे. इसमें उन्हें जहां बदनामी मिली. वहीं लोगों का भरोसा भी खोया. तब ये हालत हो गई कि कोई भी उनके साथ पैसों का लेन-देन पसंद नहीं करता था. लोगों ने उधार देना बंद कर दिया. एक बार उन्होंने पिता के वो 500 रुपए चुराए, जो उस फर्म के थे, जहां वो काम करते थे. हालांकि बाद में ये पैसा उन्होंने फर्म के मालिक को दोगुना लौटाया.
ऐसे समय में जब किस्मत उन्हें हर ओर से दगा दे चुकी थी. वो ज्यादातर कामों में नाकामी देख चुके थे. तमाम लोगों का हजारों रुपया कर्ज के तौर पर चढ़ा था. तब एक पंडित जी उनका हाथ देखकर कहा, “तुम अगले एक हफ्ते में अमीर हो जाओगे, तुम्हारे हाथों में 1.5 लाख रुपए होंगे.” ये हैरानी भरी बात थी. इस वो शख्स कैसे विश्वास कर सकता था, जिसकी जेब में तब 05 रुपए भी नहीं थे.
ऐसा हुआ. अचानक चांदी के दाम बढ़ने लगे. उन्होंने लंदन में चांदी की 04 फर्मों में जान-पहचान का फायदा उठाते हुए हजारों रुपए की चांदी बुक करानी शुरू की.हालांकि तब भी उनकी जेब में पैसे नहीं थे. लेकिन इसे ही किस्मत कहते हैं.
तब चांदी के दाम चढ़े ही नहीं बल्कि बेतहाशा चढ़े. देखते ही देखते वाकई एक हफ्ते में उन्होंने डेढ़ लाख रुपए कमाया. इतना ज्यादा धन हाथ में आया तो सबका उधार खत्म किया. अब भी उनके पास काफी रुपए थे. जिस तरह उन्होंने सबसे पैसे वापस किए, उससे कोलकाता के व्यापार जगत में ऐसे शख्स बनकर उभरे, जो अब ना केवल विश्वसनीय बन चुका था बल्कि उसकी चतुराई और व्यापारिक बुद्धि की भी धाक जम चुकी थी.
इसी बीच चांदी को लेकर जब ब्रिटिश सरकार ने 20 के दशक में अपने नियम बदले, तब तो डालमिया की किस्मत ऐसी बदली कि वो जिस काम में हाथ डालते गए, उसमें सफलता मिलती गई. वो तरक्की की ऐसी सीढ़ियां चढ़ने लगे, जो सपने जैसी थी.
भाग्य ने डटकर डालमिया का साथ दिया और कुछ ही वर्षों के बाद वे देश के सबसे बड़े उद्योगपति बन गए। उनका औद्योगिक साम्राज्य देशभर में फैला हुआ था जिसमें समाचारपत्र, बैंक, बीमा कम्पनियां, विमान सेवाएं, सीमेंट, वस्त्र उद्योग, खाद्य पदार्थ आदि सैकड़ों उद्योग शामिल थे.
डालमिया ने अपने जीवन में एक-दो नहीं बल्कि छह शादियां की. जिस समय डालमिया ने एक के बाद एक छह शादियां रचाईं, उस समय भी ऐसा करने के बारे कोई सोच भी नहीं सकता था. हालांकि उन्होंने कभी इन सबकी परवाह भी नहीं की.
जब ये छठी शादी हुई तो इसका खासा विरोध हुआ. डालमिया के बच्चे काफी बड़े हो रहे थे. उनके भाई और मां ने भी इस पर काफी इतराज किया. लेकिन शादी तो हो चुकी थी.
डालमिया सेठ के दोस्ताना रिश्ते देश के सभी बड़े-बड़े नेताओं से थी और वे उनकी खुले हाथ से आर्थिक सहायता किया करते थे।
#जिन्ना और डालमिया अच्छे दोस्त थे. वे आपस में हमेशा पैसे और इनवेस्टमेंट की बातें करते थे। 7 अगस्त 1947 को पाकिस्तान जाने से पहले जिन्ना ने अपना दिल्ली का बंगला करीब ढाई लाख रुपए में डालमिया को बेचा था।
ख़रीदने के बाद डालमिया ने #बंगले को गंगाजल से धुलवाया, जिन्ना के दिल्ली छोड़ते ही बंगले के ऊपर लगे मुस्लिम लीग के झंडे को उतारा गया, उसकी जगह गौरक्षा आंदोलन का झंडा लगवाया गया, यानी मुसलमानों के एकछत्र नेता के कट्टर हिन्दूवादी शख़्स से गहरी छनती थी.
एक घटना ने नेहरू को डालमिया का जानी दुश्मन बना दिया, डालमिया एक कट्टर सनातनी हिन्दू थे और उनके विख्यात हिन्दू संत स्वामी करपात्री जी महाराज से घनिष्ट संबंध थे।
#करपात्री जी महाराज ने 1948 में एक राजनीतिक पार्टी राम राज्य परिषद स्थापित की थी. 1952 के चुनाव में यह पार्टी लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी और उसने 18 सीटों पर विजय प्राप्त की।
हिन्दू कोड बिल और गोवध पर प्रतिबंध लगाने के प्रश्न पर डालमिया से नेहरू की ठन गई. पंडित नेहरू हिन्दू कोड बिल पारित करवाना चाहते थे जबकि स्वामी करपात्री जी महाराज और डालमिया सेठ इसके खिलाफ थे।
#हिन्दू कोड बिल और गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने के लिए स्वामी करपात्रीजी महाराज ने देशव्यापी आंदोलन चलाया जिसे डालमिया जी ने डटकर आर्थिक सहायता दी.
नेहरू के दबाव पर लोकसभा में हिन्दू कोड बिल पारित हुआ जिसमें हिन्दू महिलाओं के लिए तलाक की व्यवस्था की गई थी। राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद हिन्दू कोड बिल के सख्त खिलाफ थे इसलिए उन्होंने इसे स्वीकृति देने से इनकार कर दिया।
ज़िद्दी नेहरू ने इसे अपना अपमान समझा और इस विधेयक को संसद के दोनों सदनों से पुनः पारित करवाकर राष्ट्रपति के पास भिजवाया. संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार राष्ट्रपति को इसकी स्वीकृति देनी पड़ी।
इस घटना ने नेहरू को डालमिया का जानी दुश्मन बना दिया. कहा जाता है कि नेहरू ने अपने विरोधी सेठ राम कृष्ण डालमिया को निपटाने की एक योजना बनाई.
नेहरू के इशारे पर डालमिया के खिलाफ कंपनियों में घोटाले के आरोपों को लोकसभा में जोरदार ढंग से उछाला गया. इन आरोपों के जांच के लिए एक विविन #आयोग बना. बाद में यह मामला स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिसमेंट को जांच के लिए सौंप दिया गया।
नेहरू ने अपनी पूरी सरकार को डालमिया के खिलाफ लगा दिया. उन्हें हर सरकारी विभाग में प्रधानमंत्री के इशारे पर परेशान और प्रताड़ित करना शुरू किया. उन्हें अनेक बेबुनियाद मामलों में फंसाया गया.
नेहरू की कोप दृष्टि ने एक लाख करोड़ के मालिक डालमिया को दिवालिया बनाकर रख दिया. उन्हें टाइम्स ऑफ़ इंडिया और अनेक उद्योगों को औने-पौने दामों पर बेचना पड़ा. अदालत में मुकदमा चला और डालमिया को तीन साल कैद की सज़ा सुनाई गई.
तबाह हाल और अपने समय के सबसे धनवान व्यक्ति डालमिया को नेहरू की वक्र दृष्टि के कारण जेल की कालकोठरी में दिन गुज़ारने पड़े.
डालमिया बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे,उन्होंने अच्छे दिनों में करोड़ों रुपये धार्मिक और सामाजिक कार्यों के लिए दान में दिये। गौवंश हत्या विरोध में 1978 में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
डालमिया जी अकेले ऐसी शख्सियत नहीं है जिन्हें सबकुछ खोने के बाद भी इतिहास के पन्नों में जगह नहीं मिली भारत माता कि पावन मिट्टी में अनेकों ऐसे सपूतों का बलीदान है जिन्हें भुला दिया गया और याद रहा तो सिर्फ और नकली गाँधी खानदान
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