सोमवार, 12 जून 2023

Why India that is #Bharat and Bharat that is #India???


द्वितीय विश्वयुद्ध ने ब्रिटेन की हालत खस्ता कर दी, ब्रिटेन का हर बड़ा शहर जर्मनी की बम-बारी से तहस-नहस हो चूका था। उस पर भारत से प्रतिदिन तोड़फोड़, सत्याग्रह, हड़ताल, बगावत की खबरों ने ब्रिटेन को भारत में अपना राज चलना बद से बदतर लगता जा रहा था। हिंदुस्तान में होने वाली सारी तोड़फोड़, सारे आंदोलन, सत्याग्रह पूरी तरह से अनियंत्रित हो कर जनता के हाथ में थे।
बरेली, कानपूर और भी कितने शहर ऐसे थे जिनसे ब्रिटिश सरकार का पूरी तरह से नियंत्रण ख़त्म हो चूका था। जहाँ पहले भारत से करोडो की आय होती थी वही अब भारत में रह रहे अधिकारियो और सेनाओ का खर्च ब्रिटेन को उठाना पड़ रहा था वह भी उस समय जब उसके खुद के लोग भुखमरी की हालात में थे, इन सब कारणों ने ना चाहते हुए भी ब्रिटिश सरकार को भारत को आज़ाद करने का निर्णय लेना पड़ा।


ब्रिटेन में चर्चिल की #Conservative_Party चुनाव हार चुकी थी और #लेबर पार्टी की सरकार थी। 1945 को क्लेमेंट एटली ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने और भारत को आज़ाद करने का निर्णय लिया। जब यह निर्णय तत्कालीन वॉयसरॉय लार्ड वेवेल को बताया गया तो उन्होंने अपनी सेवा-निवर्त्ती की अर्जी इंग्लॅण्ड भेज दी। वह और उनके जैसे और भी कई ब्रिटिश अधिकारी थे जो नहीं चाहते थे की भारत को आज़ाद करने का कलंक उन्हें लगे। बहुत सोच विचार के बाद लार्ड माउंटबेटन का नाम पर मुहर लगी। भारत आने से पहले माउंबेटन बर्मा में भी वॉयसरॉय रह चुके थे। चर्चिल भारत की आज़ादी के खिलाफ थे और उन्होंने माउंटबेटन को राय दी की जितना भी हो सके माउंटबेटन भारत की आज़ादी को टालते रहे और आखिर में अगर भारत को आज़ाद करने का निर्णय लेना ही पड़े तो भारत तो कई टुकड़ो में बाट दे।
चर्चिल का मानना था की एक अखंड भारत के बदले के कई टुकड़ो के बटा भारत हमेशा ब्रिटेन पर आश्रीत रहेगा और इससे आगे चल कर ब्रिटेन को ही फायदा पहुचेगा। ब्रिटेन यही पालिसी #South_Africa में भी आजमा रहा था और दक्षिण अफ्रीका को छोटे-छोटे देशो में बाट भी रहा था।


अमेरिका भी ब्रिटेन पर, भारत को आजाद करने के लिए जोर दे रहा था, उसे पता था अब साम्राज्यवाद के दिन लड़ गए और आने वाले दिन बाज़ारवाद के है और भारत को एक बहुत बड़ा बाजार है
भारत को आज़ाद करने के लिए ब्रिटिश संसद में #India_Independence_Act बनाया गया। ब्रिटेन की सरकार से भारत को जल्द से जल्द आज़ाद करने का लिखित आदेश लेकर 22/मार्च/1947 को भारत के आखरी माउंटबेटन भारत पहूचे। उनके पहुचने से पहले ही कांग्रेस के सभी लीडर आज़ाद कर दिए गए थे। भारत को आज़ाद करना है यह निर्णय तो हो गया था लेकिन अब माउंटबैटेन को यह निर्णय लेना था की आज़ाद करने के बाद सत्ता किसे सौपनी है, यह ठीक है की उन के सामने आठ-दस कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेता भी थे लेकिन यह कैसे पता चले की यही भारत की जनता की नुमाईंदगी करने वाले असली नेता है। यह भी प्रश्न था की किस पार्टी को भारत में कितना जन-समर्थन हासिल है ? इन सब प्रश्नों का उत्तर एक ही था और वह था भारत के पहले आम चुनाव।

आम चुनाव का निर्णय होते ही सारी पार्टीयाँ पूरे दम-खम से चुनाव जीतने के लिए मैदान में उतर गयी। ब्रिटिश सरकार के कब्जे में जितनी जमीन थी उस पर आम चुनाव की घोषणा की गयी। भारत के राजे-राजवाडो को इस चुनाव से अलग रखा गया। भारत में उस समय आम चुनाव करवाना इतना आसान भी नहीं था। अब यह कैसे तय हो की कौन वोट देगा ? उस समय तक कोई लिस्ट, कोई आधारकार्ड, कोई वोटरकार्ड तो था नहीं जिससे पता चलता की कौन असली हक़दार है वोट देने का।
फिर क़ानून बनाया गया की आम चुनाव में सिर्फ वही वोट दे सकता था जिसके पास थोड़ी सी भी जमीन हो, या वह जो सरकारी नौकरी में हो, या जिस व्यक्ति के पास घर, दुकान या कोई भी अचल संपत्ति हो। घर अगर बूढ़े बाप के नाम है तो सिर्फ बाप और माँ ही वोट दे सकते थे उनके बालिग बेटे बेटियां नहीं। चुनाव में जहा कांग्रेस अखंड और धर्मनिरपेक्ष भारत की मांग के साथ उतरी वही मुस्लिम लीग पाकिस्तान के सपने के साथ। मुसलमानो का अपना सपनो का देश, खुदा की जन्नत, और जिन्ना खुदा के पैगम्बर। भारत के मुसलमानो को यह ख्वाब दिखाया गया की अंग्रेजो के जाते ही पाकिस्तान में उनका ही शासन होगा। लाहौर से लेकर, हैदराबाद तक और गुजरात से लेकर आज के बांग्लादेश तक हर मुस्लिम को लगता था की उसके घर, उसकी दूकान या उसके खेत के पास ही बनेगा पाकिस्तान।

कॉग्रेस अगर इस चुनाव में सही तरीके से प्रचार करती और मुसलमानो को समझाती की पाकिस्तान बनते ही उन्हें अपना घर-दूकान-खेत सब छोड़ कर हिमालय की तलहटी में, अफगानिस्तान ने पास जा कर बसना पड़ेगा तो नहीं लगता की मुसलमान कभी भी मुस्लिम लीग या पकिस्तान का नाम भी अपने मुँह से निकालते। कौन ऐसा मूर्ख होगा जो बसा-बसाया घरबार, खेत, दूकान छोड़ कर हजारो किलोमीटर दूर एक अनजान जगह पर, शरणार्थी बन कर जाना चाहेगा ?
लेकिन कई मुसलमानो को लगता था की बंगाल से लेकर लाहौर तक का सारा प्रदेश जिसमे उड़ीसा, दिल्ली, हरीयाणा, पंजाब, उत्तर-प्रदेश और जम्मू-कश्मीर भी शामिल है सारा का सारा पकिस्तान बनने वाला है। दिल्ली तो जरूर ही पकिस्तान में आने वाली है क्योकि दिल्ली को तो बसाया ही मुसलमान बादशाहो ने था।

वही हिदुओ को लगता था की हड्डपा और #मोहनजोदड़ो जो की सिंधु सभ्यता के प्राचीन शहर थे वह तो जरूर ही हिंदुस्तान को मिलेंगे। चुनाव में जहाँ कांग्रेस बहुमत में जीती वही 20 % सीटे मुस्लिम लीग के हाथ भी लगी और इसी 20% की मुस्लिम लीग जीत ने देश के बटवारे पर मुहर लगा दी।

फिर आया माउंटबेटेन का दो राष्ट्र सिद्धात #Two_Nations_Theory जिसके तहत दो राष्ट्रों का निर्माण होना था भारत- पाकिस्तान और तीसरा पक्ष था राजो-महाराजो का जिन्हें छूट थी की वह चाहे तो किसी भी देश से मिल सकते थे या पूर्ण तरह से आज़ाद भी रह सकते थे। जाहिर ही था की कई राजवाड़े आजाद ही रहने का मन बना रहे थे और चर्चिल की हिंदुस्तान को टुकड़ो-टुकड़ो में बाटने की योजना का हिस्सा बनने वाले थे। फिर शुरू हुई सरदार वल्लभ भाई पटेल की 570 राजाओ को हिंदुस्तान में मिलाने की भागीरथी मुहिम। हैद्राबाद और जूनागढ़ के निजाम जैसे कुछ राजाओ का राज जहा हजारो किलोमीटर तक फैला था वही कुछ राजा सिर्फ 5 किलोमीटर तक फैले राज्य के मालिक थे। सरदार पटेल ने साम-दाम-दंड-भेद सभी तरीके अपनाये और धीरे-धीरे, कश्मीर को छोड़ कर सभी रजवाड़ो का विलय भारत में करवा दिया।
बटवारा तय होते ही #जिन्ना ने एक और मांग रखी, जिसमे कहा गया की भारत या इंडिया नाम के देश को ख़त्म कर दिया जाये और उसके बदले में दो देश बने जिनका नाम #पाकिस्तान और #हिंदुस्तान रखा जाये जिसे नेहरू ने ख़ारिज कर दिया। नेहरूजी का तर्क था की भारत से अलग हो कर पाकिस्तान बनाया जा रहा है इसलिए सिर्फ पाकिस्तान का नाम ही पड़ेगा और जो पहले से है उसका नाम तो वही रहेगा, इसलिए जब भारत का संविधान लिखा गया तो उसमे विशेष तौर पर यह वाक्य जोड़ा गया - #India that is Bharat and #Bharat that is India यह पंक्तियाँ आज भी #संविधान में है। फिर अखंड भारत के खजाने को भी बाटा गया और पाकिस्तान के हिस्से में 55 करोड़ देने का निर्णय लिया गया। आज़ाद होते ही दो महीनो में पाकिस्तान ने कश्मीर कर हमला कर दिया और इसी कारण यह 55 करोड़ भारत ने पाकिस्तान को कभी नहीं दिए। सेना को बाटा गया, मुसलमान सिपाहियों को उनकी पसंद के किसी भी देश की सेना में जाने की इजाजत दी गयी। जिन्ना ने आज़ाद भारत की सरकार पर भरोसा करने से मना कर दिया और मांग रखी की पकिस्तान को भारत से एक दिन पहले आज़ाद किया जाये जिसे माउंटबेटन ने मान लिया।

यह सब निर्णय होने तक भी भारत और पाकिस्तान की आज़ादी की तारीख अभी भी तय नहीं थी और दोनों तरफ के नेताओ को लगता था की शायद आज़ादी 1948 के जुलाई या अगस्त तक मिलेगी लेकिन लार्ड माउंटबेटन ने खुद ही निर्णय लेते हुए 15-अगस्त-1947 की तारीख तय करदी। माउंटबेटेन 15 अगस्त को अपने लिए बहुत ही शुभ मानते थे क्योकि दो साल पहले 15-अगस्त-1945 के दिन ही #जापानी_आर्मी ने उनके सामने आत्म-सपर्पण किया था। जल्दबाजी में तय की गयी इस तारीख ने आगे चल कर लाखो लोगो की जान ली।


भारत भर के सारे ज्योतिषियों ने इस तारीख को भारत और पकिस्तान दोनों के लिए अशुभ बताया लेकिन माउंटबेटन का निर्णय नहीं बदला। फिर इंडलैंड से आर्किटेक्ट सर कीरिल रेडक्लिफ को बुलाया गया और दस साल पहले किये गए जनमत संग्रह के हिसाब से भारत के दो टुकड़े करते हुए #रेडक्लिफ लाइन खीच दी गयी। यह लाइन पूरी तरह से नक़्शे पर खिंची गयी और रेडक्लिफ ने जमीन पर जा कर देखा भी नहीं की #लाइन कहा से गुजरने वाली है। इस ये लाइन ने किसी का घर तो किसी का खेत सब बाट दिया किसी का घर भारत में रह गया तो खेत पाकिस्तान में चले गए। भारत और पाकिस्तान दोनों के आज़ाद होने तक किसी को नहीं पता था की यह लाइन कहा से गुजरने वाली है।


रेडक्लिफ लाइन से ही भारत और पाकिस्तान की सीमाओं का पता चला और फिर शुरू हुआ दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का स्थानांतरण। अनुमानतः करीब पांच करोड़ लोगो का पलायन हुआ था,लगभग 10 लाख लोग मरे और करोडो बेघर हो गए। शरणार्थीयों की बाढ़ आ गयी भारत में एक शरणार्थी विस्थापन केंद्र बनाया गया जिसे पंजाब, दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता, मद्रास जैसे सभी बड़े-बड़े महानगरो में शरणार्थियों को बसाया। मुम्बई का उल्लासनगर, या गुजरात का गांधीनगर इन शरणार्थियों के लिए ही बसाया गया था, शरणार्थियों को लक्षदीप और अंडमान-निकोबार तक बसाया गया।
खैर आज भारत कहा है और आजादी के पहले लाहौर को हिंदुस्तान का पेरिस कहा जाने वाला पकिस्तांन कहा ???

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