मंगलवार, 6 जून 2023

अमेरिका -सिविल राइट्स मूवमेंट

 1864 में अमेरिका में गृहयुद्ध के बाद अमेरिका से दासता समाप्त कर दी गई. पर यह अश्वेतों पर अत्याचारों जारी रहे। अमेरिका में अनेक ऐसे कानून बनाये गए जिससे अमेरिकी समाज में अन्याय और भेदभाव का बना रहा. इन कानूनों को "जिम क्रो" कानून कहा गया। जिम क्रो शब्द अश्वेतों के प्रति एक अनादर का शब्द था. इन कानूनों के अनुसार अमेरिकी समाज में श्वेत और अश्वेत अलग अलग रखे गए. वे अलग अलग बसों और ट्रेनों में चलते थे. श्वेतों के रेस्टोरेंट में अश्वेत प्रवेश नहीं कर सकते थे. एमन्शिपेशन लॉ के तहत एक अश्वेत को सिद्ध करना होता था कि वह रोजगार में है, अन्यथा उसे जेल या लेबर कैम्प्स में डाला जा सकता था. उनके वोटिंग के अधिकार सीमित थे. 1969 तक इंटर-रेसियल शादियाँ गैरकानूनी थीं.

किसी श्वेत व्यक्ति को किसी अश्वेत व्यक्ति का व्यवहार अगर पर्याप्त सम्मानजनक नहीं लगता था तो इसके परिणाम कुछ भी हो सकते थे, ऐसी हज़ारों घटनाएँ हैं जिसमें उत्तेजित श्वेत भीड़ ने किसी अश्वेत आरोपी को पकड़ कर उसे मारा पीटा, नाक कान काट लिए, आंखें फोड़ दीं और फाँसी दे दी, जिंदा जला दिया. अगर आरोपी जेल में बंद हो तो भीड़ ने जेल से निकाल कर मार डाला,और ऐसे फोटोग्राफ्स उस समय के अमेरिकी अखबारों में मजे से छपा करते थे. ऐसी घटनाओं को #लींचिंग सक्सेस भी बताया जाता था.

1955 में मिसिसिपी में ऐसी एक घटना हुई जिसने अमेरिका को झकझोर दिया. एक 14 साल का अश्वेत लड़का,एमेट टिल अपने रिश्तेदार से मिलने मिसिसिपी गया, वहाँ वह एक स्टोर में गया जहाँ स्टोर की 21 वर्षीया मालकिन कैरोलिन ब्रायंट को उसका व्यवहार पसंद नहीं आया. उसने एमेट पर उसपर सीटी मारने और छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया.
एमेट पर मुकदमा चला. उस महिला ने एमेट पर आरोप लगाया कि उसने उसकी कमर पर हाथ डाला और अश्लील बातें कहीं. हालांकि 2008 में दिए गए एक इंटरव्यू में उसने माना कि यह सच नहीं था.
पर भीड़ ने न्यायिक प्रक्रिया का इंतज़ार नहीं किया. उस महिला के पति और भाई ने एक भीड़ के साथ एक रात उस लड़के को मारा पीटा, क्षत विक्षत किया और फिर गोली मार लाश को नदी में फेंक दिया, श्वेत जूरी ने दोनों व्यक्तियों को सभी आरोपों से अपराधमुक्त घोषित किया

एमेट का शव शिकागो लाया गया. वहाँ उसकी माँ ने अपने बेटे की शवयात्रा खुले कास्केट में निकाली जिससे कि दुनिया देख सके कि उस 14 वर्ष के बच्चे के साथ क्या किया गया. इस शवयात्रा में हज़ारों लोग जुटे और इस घटना ने अमेरिकी सिविल राइट्स आंदोलन को हवा दी
आज भी अमेरिकी इतिहास और जन स्मृति ने एमेट टिल को जीवित रखा है. वहाँ एक एमेट टिल मेमोरियल कमीशन बनाया गया है. मिसिसिपी में 51 ऐसे स्थान हैं जो एमेट टिल के स्मारक स्थलों के रूप में पहचाने गए।

1950 और 60 के दशक में सिविल राइट्स मूवमेंट की शुरुआत हुई. इसके नेता बन कर उभरे डॉ मार्टिन लूथर किंग. उनके नेतृत्व में लोगों ने विशाल रैलियाँ निकालीं, फ्रीडम राइड्स में भाग लिया, बसों का सामूहिक बहिष्कार किया। ऐसा नहीं है की इसमें सिर्फ अश्वेत शामिल थे, इन घटनाओं ने पूरे अमेरिका के मानस को जगा दिया और बड़ी संख्या में श्वेत जनसँख्या ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया. डॉ मार्टिन लूथर ने पूरी तरह से शांतिपूर्ण और द्वेषरहित आंदोलन का आह्वान किया और उन्हें विश्व ने अमेरिकी गाँधी की संज्ञा दी ,अगले कुछ वर्षों में तेजी से कई ऐसे कानून बने जिसने "जिम क्रो" को इतिहास की चीज बना दिया।
लेकिन इतने बड़े अन्याय की पृष्ठभूमि हो, उसके लिए आंदोलन हो और #वामपंथी उसका फायदा उठाने से चूक जाएँ और अपनी वर्ग संघर्ष की प्रयोगशाला ना लगाएं यह हो नहीं सकता। बड़ी संख्या में कम्युनिष्टों ने इस आंदोलन में घुसपैठ कर ली. यह आंदोलन देखते देखते हिंसक प्रदर्शनों में बदल गया. लाखों की भीड़ सड़क पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए उतरती, लेकिन उसमें किसी एक कोने से कोई हिंसा और आगजनी की चिंगारी छोड़ देता और एक अहिंसक प्रदर्शन रेसिस्म और नस्ली दंगों में बदल जाता।



फिर पुलिस हिंसा को कण्ट्रोल करने के लिए गोलियां चलाती, और लोग मरते. इससे आने वाले और अधिक उग्र प्रदर्शन और दंगों के लिए और मसाला मिलता. आपको पिछले चार सालों में भारत में हुए अनेक प्रदर्शनों में, #जाट, गुर्जर, पटेल #आंदोलन, दलित प्रदर्शन जैसे अनेक आंदोलनों में इस रणनीति की झलक दिखाई देगी. यह अनायास नहीं है ,यह उन्हीं की स्क्रिप्ट की नक़ल है।
अमेरिका में सिविल राइट्स आंदोलन का ही एक और बड़ा नाम है मैल्कॉम एक्स. बीस वर्ष की उम्र में मैल्कॉम लिटिल नाम का एक अश्वेत व्यक्ति चोरी के आरोप में जेल गया. वहां उसकी मुलाकात अन्य अपराधियों से हुई और उसी में से एक के प्रभाव में आकर वह कम्युनिस्ट बन गया और इस्लाम स्वीकार कर लिया और अपने आप को शाहबाज़ मालिक भी कहने लगा।
उन दिनों अमेरिका में डेट्रॉइट में नेशंस ऑफ़ इस्लाम (NOI) नाम की एक संस्था थी, जो अश्वेत अमेरिकनों को इस्लाम में कन्वर्ट करने का काम करती थी. मैल्कॉम एक्स इस संस्था का एक प्रमुख सदस्य बन गया. उसने इस संस्था का खूब विस्तार किया और मुक्केबाज क्लासियस क्ले (मुहम्मद अली) और उपन्यास "रूट्स" के लेखक अलेक्स हेली भी उसके प्रभाव में मुस्लिम बने।

मैल्कॉम एक्स एक घोषित कम्युनिस्ट था. एक चोर और गैंगस्टर कैदी को जिस तरह मीडिया कवरेज देकर अमेरिका में अश्वेत आंदोलन का चेहरा बनाया गया वह ध्यान देने लायक है. उसे रेडियो और टेलीविज़न पर बुलाया गया. दुनिया भर के राजनेता अमेरिका आते तो उससे मिलने जाते, जिसमें इजिप्ट के राष्ट्रपति नासिर और क्यूबा के फिदेल कास्त्रो शामिल थे. वह यूनिवर्सिटी कैंपस में छात्रों के बीच डिबेटिंग करता था और बीबीसी तक उसके डिबेट्स को लाइव प्रसारित करता था. वह नेशंस ऑफ़ इस्लाम का प्रचारक और मौलवी था. उसकी शिक्षा के चार मुख्य विन्दु थे :

१. दुनिया के मूल निवासी अश्वेत हैं
- श्वेत लोग शैतान हैं
- अश्वेत जातियां श्वेतों से श्रेष्ठ हैं
- श्वेत जातियों का अंत निकट है

वह अमेरिकी सिविल राइट्स आंदोलन का विरोधी और आलोचक था. उसकी शिकायत थी कि यह आंदोलन अश्वेतों और श्वेतों के बीच की दूरी और विषमता को मिटाने पर केंद्रित है, जबकि वह और अधिक रेसियल संघर्ष और विद्वेष चाहता था. इसके लिए वह डॉ. मार्टिन लूथर का भी विरोधी था और उन्हें गोरों का एजेंट कहता था. हालाँकि उस समय अमेरिका में तेजी से रेसियल कानूनों में सुधर हो रहे थे पर वह इन सुधारों का समर्थक नहीं था. वह सेग्रीगेशन ख़त्म करने का विरोधी था और उसने अश्वेत लोगों के "सेल्फ-डेटर्मिनेशन" यानि उनके लिए अलग देश की माँग की और अश्वेतों को सशस्त्र विद्रोह करने के लिए प्रेरित किया.

मैल्कॉम एक्स अमेरिका के लिए बड़ा सरदर्द बन कर उभर रहा था तभी उसकी नेशंस ऑफ़ इस्लाम के अन्य नेता मुहम्मद एलिज़ा से अनबन हो गयी. वह इस संस्था से अलग हो गया. और जैसा कि गैंगस्टर्स के साथ अक्सर होता है, नेशंस ऑफ़ इस्लाम वालों ने उसकी दिन दहाड़े हत्या कर दी.

आज भारत में लिंचिंग नाम के शब्द को खूब दुहराया जा रहा है, किसी दो चार लोगों के बीच मारपीट की किसी भी घटना को लिंचिंग का नाम देकर देश विदेश के मीडिया में खूब फैलाया जा रहा है.
आज आप भारत में इनटॉलेरेंस-कथा सुनते हैं...हर तरफ इनटॉलेरेंस का एपिडेमिक फैला है. क्योंकि यह मोदी का भारत है. तो उधर ट्रम्प के अमेरिका में भी यही कहानी चल रही है. लोगों को बताया जा रहा है कि कैसे समाज में ट्रम्प के आने से रेसिज्म बढ़ रहा है. लोगों को ट्रम्प को वोट देने के लिए शर्मिंदा किया जा रहा है.

आप कोई भी #बॉलीवुड फिल्म देखते हैं, और आपको कहानी लैला-मजनू की कहानी से थोड़ी भी अलग लगती है तो आप समझ जाते हैं कि यह किसी ना किसी हॉलीवुड फिल्म की नक़ल है. तो भारत का वर्तमान वामपंथी परिदृश्य भी कोई ओरिजिनल स्क्रिप्ट नहीं है, 1960 की हिट अमेरिकन स्क्रिप्ट “सिविल राइट्स” की चोरी भर है.
साभार

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