शनिवार, 3 जून 2023

यहूदी कौन थे

 1.दुनिया के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक है यहूदी धर्म। लगभग 4000 साल पुराना यह धर्म वर्तमान में इसराइल का राजधर्म है। यहूदी धर्म की शुरुआत पैगंबर हजरत इब्राहिम (अबराहम या अब्राहम) से मानी जाती है, जो ईसा से 2000 वर्ष पूर्व हुए थे। हज. इब्राहिम के बाद यहूदी इतिहास में सबसे बड़ा नाम 'पैगंबर मूसा' का है। हजरत मूसा ही यहूदी जाति के प्रमुख व्यवस्थाकार हैं। ह. मूसा को ही पहले से चली आ रही एक परंपरा को स्थापित करने के कारण यहूदी धर्म का संस्थापक माना जाता है। हज. मूसा के बाद यहूदियों को विश्वास है कि कयामत के समय हमारा अगला पैगंबर आएगा। मूसा मिस्र के फराओ के जमाने में हुए थे।

ऐसा माना जाता है कि उनको उनकी मां ने नील नदी में बहा दिया था। उनको फिर फराओ की पत्नी ने पाला था। बड़े होकर वे मिस्री राजकुमार बने। बाद में मूसा को मालूम हुआ कि वे तो यहूदी हैं और उनका यहूदी राष्ट्र अत्याचार सह रहा है और यहां यहूदी गुलाम है, तो उन्होंने यहूदियों को इकट्ठा कर उनमें नई जागृती लाईं। मूसा को ईश्वर द्वारा दस आदेश मिले थे। मूसा का एक पहाड़ पर परमेश्वर से साक्षात्कार हुआ और परमेश्वर की मदद से उन्होंने फराओ को हरा कर यहूदियों को आजाद कराया और मिस्र से पुन: उनकी भूमि इसराइल में यहूदियों को पहुंचाया। इसके बाद मूसा ने इसराइल में इसराइलियों को ईश्वर द्वारा मिले 'दस आदेश' दिए जो आज भी यहूदी धर्म के प्रमुख सैद्धांतिक है।

2.दुनिया के प्राचीन धर्मों में से एक यहूदी धर्म से ही ईसाई और इस्लाम धर्म की उत्पत्ति हुई है। इस्लाम की एक ईश्वर की परिकल्पना, खतना, बुतपरस्ती का विरोध, नमाज, हज, रोजा, जकात, सूदखोरी का विरोध, कयामत, कोशर (हराम-हलाल), पवित्र दिन (सब्बाब), उम्माह जैसी सभी बातें यहूदी धर्म से ली गई हैं। पवित्र पवित्र भूमि, धार्मिक ग्रंथ, अंजील, हदीस और ताल्मुद की कल्पना एक ही है। ईसाई और इस्लाम में आदम, हव्वा, इब्राहीम, नूह, दावूद, इसाक, इस्माइल, इल्यास, सोलोमन आदि सभी ऐतिहासिक और महान लोग यहूदी परंपरा से ही है। हजरत अब्राहम को यहूदी, मुसलमान और ईसाई तीनों धर्मों के लोग अपना पितामह मानते हैं। आदम से अब्राहम और अब्राहम से मूसा तक यहूदी, ईसाई और इस्लाम सभी के पैगंबर एक ही है किंतु मूसा के बाद यहूदियों को अपने अगले पैंगबर के आने का अब भी इंतजार है।

3.यहूदियों के कुल 12 कबिले थे, जिसमें से एक कबिला कश्मीर में आकर बस गया था। यहूदी धर्म की शुरुआत पैगंबर अब्राहम (अबराहम या इब्राहिम) से मानी जाती है, जो ईसा से 2000 वर्ष पूर्व हुए थे। पैगंबर अलै. अब्राहम के पहले बेटे का नाम हजरत इसहाक अलै. और दूसरे का नाम हजरत इस्माईल अलै. था। दोनों के पिता एक थे, किंतु मां अलग-अलग थीं। हजरत इसहाक की मां का नाम सराह था और हजरत इस्माईल की माँ हाजरा थीं। पैगंबर अलै. अब्राहम के पोते का नाम हजरत अलै. याकूब था। याकूब का ही दूसरा नाम इजरायल था। याकूब ने ही यहूदियों की 12 जातियों को मिलाकर एक सम्मिलित राष्ट्र इजरायल बनाया था। याकूब के एक बेटे का नाम यहूदा (जूदा) था। यहूदा के नाम पर ही उसके वंशज यहूदी कहलाए और उनका धर्म यहूदी धर्म कहलाया।

4. यहूदी अपने ईश्वर को यहवेह या यहोवा कहते हैं। यहूदी मानते हैं कि सबसे पहले ये नाम ईश्वर ने हजरत मूसा को सुनाया था। ये शब्द ईसाईयों और यहूदियों के धर्मग्रंथ बाइबिल के पुराने नियम में कई बार आता है। यहूदियों की धर्मभाषा 'इब्रानी' (हिब्रू) और यहूदी धर्मग्रंथ का नाम 'तनख' है, जो इब्रानी भाषा में लिखा गया है। इसे 'तालमुद' या 'तोरा' भी कहते हैं। असल में ईसाइयों की बाइबिल में इस धर्मग्रंथ को शामिल करके इसे 'पुराना अहदनामा' अर्थात ओल्ड टेस्टामेंट कहते हैं। तनख का रचनाकाल ई.पू. 444 से लेकर ई.पू. 100 के बीच का माना जाता है। यहूदी त्योहार में प्रमुख हैं- शुक्कोह, हुनक्का, पूरीम, रौशन-शनाह, पासओवर, योम किपुर।

5. हजरत मूसा को ईश्वर द्वारा दस आदेश मिले थे। मूसा का एक पहाड़ पर परमेश्वर से साक्षात्कार हुआ और परमेश्वर की मदद से उन्होंने फराओ को हराकर यहूदियों को आजाद कराया और मिस्र से पुन: उनकी भूमि इसराइल में यहूदियों को पहुंचाया। इसके बाद मूसा ने इसराइल में इस्राइलियों को ईश्वर द्वारा मिले 'दस आदेश' दिए जो आज भी यहूदी धर्म के प्रमुख सैद्धांतिक है।

6. यहूदियों का सबसे प्राचीन स्थल अब एक परिसर और पवित्र दीवार के रूप में विद्यमान है जो जेरूशलम में स्थित है। जेरूशलम या येरुशलम इसराइल देश का विवादित शहर है। इस पर यहूदी धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म, तीनों ही दावा करते हैं, क्योंकि यहीं यहूदियों का पवित्र सुलैमानी मन्दिर हुआ करता था, जो अब एक दीवार मात्र है। यही शहर ईसा मसीह की कर्मभूमि रहा है। यहीं से हजरत मुहम्मद स्वर्ग गए थे। इसीलिए यह विवाद का केंद्र है। यही पर मूसा ने यहूदियों को धर्म की शिक्षा दी थी।

यहूदी इब्राहीम, इसहाक और याकूब की संतानें हैं। वे 3,300 से भी अधिक वर्ष पहले ईश्वर के साथ एक करार के माध्यम से एक कौम बन गए थे।

इब्राहीम ने दुनिया के सामने सबसे पहले यह घोषणा की कि ईश्वर केवल एक ही है। उनका विश्वास एक ऐसे ईश्वर में था जो सर्वव्यापी है पर फिर भी सभी वस्तुओं से परे है। उन्होंने सिखाया कि ईश्वर अपनी दुनिया में न्याय और दया चाहता है और लोगों को उनके कर्मों के लिए जवाबदेह ठहराता है।

इब्राहीम को अपनी आस्था का प्रचार-प्रसार करने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा और अपने जीवन को जोख़िम में डालना पड़ा। उनके पुत्र इसहाक ने उनके मार्ग का अनुसरण किया और इसहाक के मार्ग का अनुसरण किया उनके पुत्र याकूब ने, जिन्हें ईश्वर ने इसराइल नाम दिया। और उनको यह वचन दिया गया था कि उनकी संतानों को कनान की भूमि दी जाएगी जिसे आज इसराइल देश के नाम से जाना जाता है। वे अपने पूर्वजों के अभियान को आगे बढ़ाने के लिए चुने गए व्यक्ति होंगे।

याकूब और उनकी संतानों को एक अकाल के कारण कनान छोड़ कर मिस्र जाना पड़ा। वहां उनके वंशजों को ग़ुलाम बना लिया गया। कई वर्ष बाद, ईश्वर ने उन्हें मुक्त कराने और उन्हें उसी भूमि पर वापस लाने के लिए मूसा को भेजा जिस भूमि का वचन ईश्वर ने उनके पूर्वजों को दिया था। रास्ते में सिनाई पर्वत पर मूसा ने ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हुए इंसानों और सृष्टिकर्ता के बीच एक करार करवाया।

ईश्वर ने इंसानों से कहा कि वे धर्मोपदेशकों और पवित्र लोगों का राष्ट्र होंगे। पुरुष और स्त्रियां, नेता और मजदूर, सभी इंसान सिनाई पर्वत की तराई में खड़े रहे। उनमें से हरेक ने ईश्वर की आवाज को सीधे उन सभी से बात करते सुना, जो उन्हें इस करार के 10 बुनियादी नियम बता रही थी। इसके बाद ईश्वर ने उन शब्दों को नीलम की दो तख्तियों पर उकेर दिया।

सिनाई मरुस्थल में 40 वर्ष के समय के दौरान ईश्वर ने मूसा को कई कायदे-कानून सिखाए। मूसा को ईश्वर ने जो कुछ सिखाया वे उसे लोगों को सिखाते और समझाते थे। लोगों से कहा गया कि वे उन कायदे-कानूनों पर चर्चा करें और अपने बच्चो को भी सिखायें। मूसा ने ईश्वर की बताई सभी बातें पाँच पुस्तकों में लिख दीं। 40 वर्षों की समाप्ति पर, सभी से उन पुस्तकों की अपनी-अपनी प्रतियां बनाने और उनका अध्ययन करने को कहा गया। मूसा की लिखी इन पाँच पुस्तकों और मौखिक रूप से बताए गए अलिखित कायदे-कानूनों और उनकी व्याख्याओं को एक साथ मिलाकर तोरा कहा जाता है जिसका अर्थ है “शिक्षा” या उपदेश।

तोराका करार ने एक समाज की स्थापना की जो कई प्रकार से उस समय के अन्य समाजों से बिल्कुल अलग था। जैसे कि नियम-कायदे निरपेक्ष थे - न केवल लोगों के नेतृत्वकर्ता, बल्कि स्वयं ईश्वर भी नियम-कायदों के करार से बंधे थे। प्रत्येक बच्चे को इन नियम-कायदों की शिक्षा देना आवश्यक था। कानूनी समानता ने सभी नागरिकों को बराबर स्थिति में ला खड़ा किया। इसके अलावा, समाज के सभी लोग एक-दूसरे के कल्याण के लिए उत्तरदायी हो गए। और ईश्वर के संबंध में यह समझा जाता था कि वह उसे पुकारने वाले सभी लोगों के लिए समान रूप से सुलभ व सुगम्य है - विशेष रूप से पीड़ितों और कुचले हुए लोगों के लिए।

इस करार को कभी बंद नहीं किया गया। किसी प्रमाणित यहूदी न्यायधिकरण अदालत के समक्ष जो भी व्यक्ति इसकी सभी आवश्यकताओं को स्वीकार कर लेता है, उसे यहूदी मान लिया जाता है। पर अच्छा इंसान बनने के लिए यहूदी बनना आवश्यक नहीं है। इब्राहीम से पहले आने वाले नूह का करार समस्त मानवजाति के लिए साझा नागरिक नियम-कायदों का एक समूह है।

मूसा के बाद कई पैगम्बर हुए जिन्होंने लोगों को तोरा को कायम रखने के लिए प्रेरित भी किया और मलामत भी की। इनमें से कई पैगम्बरों के कहे शब्द हिब्रू बाइबल की 24 पुस्तकों में लिखे हुए हैं। बाइबल की पारंपरिक व्याख्या और विस्तार के काफ़ी बड़े हिस्से को बाद में, मिशना और तल्मूद में लिखा गया।

करार होने के बाद से जितना समय गुजरा है, उसमें यहूदियों को उनके देश से दो बार निकाला जा चुका है और वे विश्व के लगभग हर स्थान पर बस चुके हैं। एक अनुमान के अनुसार, आज विश्वभर में लगभग 1.50 करोड़ यहूदी फैले हुए हैं। ईश्वर उन्हें जहां भी ले गया है, हर स्थान पर उन्होंने फिर से अपने तोरा का सहारा लिया है और यह खोजा है कि वह हर परिस्थिति में किस प्रकार लागू होता है।

हिब्रू बाइबल और उसके पैगम्बरों - नूह, इब्राहीम, मूसा, दाऊद, सुलेमान, यशायाह और कई अन्य - को स्वीकार करने वाले अन्य धर्म भी उत्पन्न हुए। पर यहूदियों ने हिब्रू बाइबल और ईश्वर के साथ हुए अपने मूल करार के रास्ते पर बिना डिगे चलना जारी रखा है।

प्राचीन फारसियों, यूनानियों और रूमियों से लेकर अरबों और यूरोपीय लोगों तक, महान राष्ट्रों और साम्राज्यों ने धीरे-धीरे बहुत से यहूदी नियम-कायदों और मान्यताओं को अपनाया है। इस समय तक, संपूर्ण विश्व प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से तोरा के उपदेशों द्वारा रूपांतरित हो चुका है।

यहूदी लोग, पैगम्बरों द्वारा वचन दिए गए समय के प्रति आशान्वित हैं, एक ऐसा समय जिसमें सारे यहूदी अपनी मातृभूमि लौटेंगे, पूरे विश्व में सामंजस्य होगा और समस्त मानवजाति का व्यवसाय, ईश्वर को जानना होगा। यह स्पष्ट है कि हम तेजी से एक ऐसे ही युग की ओर बढ़ रहे हैं। ईश्वर करे वह युग हमारी कल्पना से भी पहले साकार हो जाए।


इश्मायएल के वंशजों ने आगे चल के इस्लाम धर्म अपनाया । ईसा मसीह भी यहुदा के वंशज एक यहुदी थे ।ईसा मसीह के अनुयायी ईसाई, मसीही, या क्रिश्चियन कहलाते हैं ।

कोई टिप्पणी नहीं:

युगोस्लाविया - सोवियत संघ

  यदि आप कभी bosnia-herzegovina जाएंगे तब एक जगह आपको 9300 मुसलमानों की सामूहिक कब्र दिखेगी जहां उन सभी के नाम लिखे हैं दरअसल यह मुस्लिम कही...