गुरुवार, 27 अप्रैल 2023

बाबा राघवदास -पूर्वांचल का गाँधी


भारत के पहले सन्यासी विधायक,जिन्हे #पूर्वांचल_का_गाँधी कहा जाता है
1896 महाराष्ट्र में जन्मे राघवेन्द्र एक सिद्ध गुरु की खोज में १७ वर्ष की अवस्था में अपने प्रान्त को अलविदा कर दिए और प्रयाग, काशी आदि तीर्थों में विचरण करते हुए up के गाजीपुर पहुंचे जहाँ उनकी भेंट मौनीबाबा नामक एक संत से हुई। मौनीबाबा ने राघवेन्द को हिन्दी सिखाई,

गाजीपुर में कुछ समय बिताने के बाद राघवदास देवरिया के बरहज पहुंचे और वहां संत योगीराज अनन्त महाप्रभु के शिष्य बन गए.
1921 में स्वतंत्र भारत का सपना साकार करने के लिए स्वतंत्रता संग्राम में कूद गए तथा साथ ही साथ जनसेवा भी करते रहे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस कर्मयोगी को कई बार जेल भी गए, 1931 में गाँधीजी के नमक सत्याग्रह को सफल बनाने के लिए राघवबाबा ने क्षेत्र में कई स्थानों पर जनसभाएँ की।


जिन्होंने अपने जीवन को एक सन्यासी की भांति जिया किन्तु जनहित में सबसे आगे बढ़ कर कार्य किया।
उन दिनों क्रांतिकारियों के शवों को जेलअधिकारियों द्वारा अनादरपूर्वक नष्ट कर दिया जाता था। परिवारजन को छोड़ कर अन्य लोग क्रांतिकारियों के शवों को अंतिमसंस्कार के लिए लेने से डरते थे कि कहीं अंग्रेज सरकार के कोप का भाजन न बनना पड़े। किन्तु 18 दिसम्बर 1927 को गोरखपुर में प्रसिद्ध क्रांतिकारी रामप्रसाद ‘बिस्मिल को फांसी दिए जाने के बाद उनके शव का दाहसंस्कार बाबा राघवदास ने लोगो के सहयोग से किया था।
असहयोग आंदोलन के समय #देवरिया में कई सभाओं की अध्यक्षता की। वे इतने अच्छे वक्ता थे कि उनका भाषण सुनने के लिए हजारों स्त्री-पुरुषों की भीड़ उमड़ पड़ती थी। संयुक्त प्रांत के गुप्तचर विभाग के अभिलेख में बाबा राघवदास को एक खतरनाक वक्ता बताया गया था।अपने जेल जीवन के दौरान ही बाबा राघवदास गोरखपुर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुन लिए गए थे।


बाबा देवरियाई जनता के कितने प्रिय थे, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि की १९४८ में जब कांग्रेस से सोशलिस्ट पार्टी के अलग हो गई और विधायक आचार्य नरेंद्र देव के इस्तीफे के बाद कांग्रेस ने बाबा राघव दस को अपना प्रत्याशी बनाया तो उन्होंने आचार्य नरेंद्र देव को लगभग 1200 वोटों से हराया भी।

बाबा ने अपना सारा जीवन जनता की सेवा में समर्पित कर दिया,१५ जनवरी १९५८ को माँ भारती का यह सपूत, जनता का सच्चा सेवक अपनों से विदा लेकर ब्रह्म में विलीन हो गया।

उनकी स्मृति में पूर्वी उप में अनेक शिक्षा संस्थाओं का नाम उनके नाम पर रखा गया है,
बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज, गोरखपुर
बाबा राघवदास इण्टर कॉलेज, देवरिया
बाबा राघवदास स्नात्कोत्तर महाविद्यालय, बरहज
जब सरकार ने कोल्हू पर टैक्स लगाया तो इन्होने बिधानसभा से इस्तीफा दे दिया , और अंत में सरकार को अपना बिल वापस लेना पड़ा, बाबा राघव दास जी का मानना था की कोल्हू समाज का गरीब चलाता है। आज के नेताओं को बाबा राघव दास जी से प्रेरणा लेने की जरुरत है

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