रविवार, 30 सितंबर 2018

#बख्तियारपुर #बख्तियार_खिलजी #आसामी राय

                                    #बख्तियारपुर #बख्तियार_खिलजी #आसामी राय

यह शैतान गुलामो के बाजार में कई बार बिका था कई बार इसको नोकरी ने निकाला गया फिर मुहम्मद गोरी के पास गया उसने इस अंतरास्ट्रीय डाकू सरदार की हर प्रकार से खिदमत की उसके घरेलु कामो में भी हाथ बंटाता  था , उसकी कामाग्नि को शांत करने के लिए औरतों की दलाली की।फिर लुटेरों की सेना के साथ इसने कई जगह हमले किए।
उत्तरप्रदेश एवम बिहार के सारनाथ , कुशीनगर नालंदा आदि प्राचीन हिन्दू बौद्ध मंदिरों/विश्वविद्यालय तोड़ने का श्रेय इसे ही जाता  है या साफ़ कहें इस्लाम को जाता है उसने पाषाण भवनों की नींव तक खोद डाली।इसके बाद खिलजी कुत्तुबदीन ऐबक के पास आया , वहां उसे बहुत मान सम्मान मिला..
सनातन रक्त में त्वरित प्रतिक्रिया के तत्वों का आभाव शायद हमेशा ही रहेगा।  प्रतिक्रियात्मक प्रत्युत्तर के लिए बाट जोहना हमारी आदतों में शुमार है जिस बख्तियार खिलज़ी (नालंदा विश्वविद्यालय का विध्वंसक आतताई मलेक्ष ) का नाम बिहार राज्य वाले ढो रहे हैं उसको असम के तात्कालिक शूरवीर आसामी राय से सीखनी चाहिए की कैसे बदला लिया जाता है। बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को ध्वस्त करने के बाद, बिहार समेत आधे भारत को लूटने, खसोटने के बाद वह बंगाल, आसाम की ओर बढ़ा।यहाँ सबसे पहले उसने उस समय की #बंगाल की राजधानी नदिया में प्रवेश किया वहां पहुंचकर उसने किसी से किसी तरह की छेड़खानी नहीं की और दुर्ग महल तक जा पहुंचा वह बिना किसी दिखावे के आगे बढ़ता रहा ताकि कोई समझ ना पाए की वो कौन है लोगो ने सोचा वह कोई व्यापारी है , और बेचने के लिए घोड़े लाया है इसी तरह वह राय  लखमिनिया के घर तक पहुँच गया तब उसने तलवार खिंच उनपर आक्रमण कर दिया , उस समय सभी लोग भोजन पर बैठे हुए थे , खाद सामग्री से परिपूर्ण सोने के बर्तनों में खाना परोशा जा रहा था , एकाएक ही महल से चीखे आणि शुरू हो गयी , महल में धोखे से घुस उसने कई राजपरिवार के लोगो को मौत के घाट  उतार  दिया , उनका सारा खजाना और पत्निया सारे राजपरिपर को खत्म कर लूट ली , पुरे बंगाल में फिर इस्लाम की मशीन चली , बहुत निर्मम तरीके से बंगाली मानुष पर जुल्म और अत्याचार की जैसे वर्षा हो गयी। उसके बाद बनगांव ( बंगाल में ) में अपना पड़ाव डाला।आसाम का राजा राय बहुत ही चतुर था सुबह की नमाज के समय एकाएक हिन्दू सेना ने आधी उसपर चढ़ाई कर दी । आप अनुमान लगा सकते है कम से कम 500 km की दूरी तय कर आसाम की सेना ने उनपर आक्रमण किया था । पहली बार हिन्दू ने इन दुष्टों की नाड़ी पकड़ सूझबूझ का परिचय दिया । आसामी राय की गिनती उन वीर हिन्दू राजाओं में की जानी चाहिए जिन्होंने अपने राज्य के नागरिकों की सुरक्षा के प्रति सतर्क रहें परिस्तिथि को पूरी तरह समझा । पवित्र उषाकाल में हिन्दुओ ने आक्रमण किया । दोपहर होते होते तो हिन्दुओ ने 20,000 की घुड़सवार सेना को आधी कर दी । आश्चर्य की बात यह है शत्रुओं ( यानी हिन्दुओ ) के पास बांस के भाले थे । उनके पास ढाल तक नही थी, केवल रेशम के कपड़े उनके ढाल थे । सभी के पास धनुष ओर बाण थे । मुसलमानो को वहां पटक पटक के मारा गया ।
बख्तियार खिलजी ने देखा कि उसकी सेना आधी मार दी गयी है, ओर आधी सेना हताश ओर थकी हुई है । उसने अपने नेतागणों से सलाह मशवरा किया कि दूसरे साल फिर से पूरी तैयारी के साथ यहां आक्रमण करेंगे।
लेकिन आसामी राय इनसे एक कदम आगे थे । मायावी मुस्लिम सेना को हराने के बाद आसामी सेना ने पूरा ध्यान रखा कि एक भी मुसलमान वापस जिंदा ना पाए, इन्हें खाने का एक दाना ना मिले और पशुओं को खाने को एक घांस का तिनका नसीब ना हो । भूख मरते भागते बख्तियार के सैनिक घोड़ो को मारकर खा गए । बख्तियार भागता हुआ उसी पुल तक आया ओर सन्न रह गया । उसे देखकर यह बड़ा धक्का लगा कि जो सेना उसने पुल पर अपनी सुरक्षा के लिए छोड़ी थी, उसका सफाया कर हिन्दू सेना ने पुल तोड़ दिया था, ताकि यह मल्लेछ वापस भाग ना पाए । उनके भागने का मार्ग पूरी तरह से बन्द कर दिया गया ।
हिन्दुस्थान ने वीरो की कतार में आसामी राय को रखना ही पड़ेगा, क्यो की उन्होंने ना केवल अपने देश और अपनी प्रजा की रक्षा की बल्कि जागरण, चेतना और दूरदर्शिता का परिचय भी दिया,आसामी राय ने अपने पूर्ण कर्तव्य का पालन किया। बख्तियार खिलजी ने वहां अपनी कुछ सेना के साथ एक मंदिर में शरण ली, वहां आसामी राजा की सेना ने आड़े तिरछे बांस लगाकर उसे पूरी तरह मंदिर में कैद कर दिया । पिंजरे में घिर जाने के भय से बख्तियार अपनी जान बचाने जंगल मे भाग खड़ा हुआ । आसामी हिंदू सेना का सामना करने का साहस उसमे नही था । उसने हर हाल में नदी पार करने की ठान ली, नदी के पास पहुंचा तो उसके होंश फिर फ़ाख्ता हो गए, क्यो की नदी के पास हिन्दू सेना पूरी तरह से चौकन्नी होकर उसके पीछे पड़ी थी । वहां लगभग 1 घण्टे का युद्ध हुआ, यह युद्ध केवल मुसलमानो को काटने के लिए हुआ था । पूरी सेना को खत्म कर दिया गया । अब केवल एक आदमी जीवित बचा था, ओर वो खुद बख्तियार खिलजी था, वह इसलिए जीवित बचा, क्यो की जब युद्ध हो रहा था, तो मौका देख बख्तियार नदी में कूद गया । हिन्दुओ ने मुल्लो को काट काट के नदी में फेंका था, कुछ मुल्ले डरकर नदी में कूद कर मर गए , उन्ही में से किसी एक लाश का सहारा लेकर बख्तियार दूसरे किनारे तक पहुंचा । देवकोट पहुंचकर वह बीमार पड़ गया । अब इस नीच के पास खाने तक को पैसे नही थे । लोगो से यह घृणा इतनी कमा चुका था, की इसे कोई पीने का पानी तक ना देता, नालियों का पानी पी पी कर इसने अपना आखिरी समय गुजारा, सड़को पर जाता, तो लोग इसे गालियां देते, इसको थप्पड़ मारते । बख्तियार खिलजी कभी मायावी मुसलमानो का चमकता सितारा था , लेकिन आसामी राय की बहादुरी ने आज इसे भिखारी से भी बदतर बना दिया था । देवकोट में ही यह सड़क पर कहीं मुँह छिपाए पड़ा था,ओर किसी सनकी ने आकर भयंकर गालियां देते हुए, चाकुओं से गोद गोद कर इसकी हत्या कर दी।बिहार वासियों नालंदा विश्वविद्यालय का विध्वंस और हजारों बौद्ध भिक्षुकों का हत्यारा बख्तियार खिलज़ी से आज भी बदला से सकते हो बस जरुरत है सिर्फ इच्छा शक्ति की बख्तियारपुर का नाम बदल दो और अपना फ़र्ज़ निभाओ।इच्छाशक्ति को बढाओ।

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