रविवार, 21 मई 2017

आंध्रप्रदेश और तेलंगाना

नेहरु और माउंटबेटन हैदराबाद राज्य [आज का पूरा आंध्रप्रदेश और तेलंगाना ] को आजाद देश बनाने के पक्ष में थे .......

अगर सरदार पटेल और कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी [के एम मुंशी ] नही होते तो आज आंध्रप्रदेश और तेलंगाना अलग देश होते ...
जिस समय ब्रिटिश भारत छोड़ रहे थे, उस समय यहाँ के 562 रजवाड़ों में से सिर्फ़ तीन को छोड़कर सभी ने भारत में विलय का फ़ैसला किया. ये तीन रजवाड़े थे कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद.
अंग्रेज़ों के दिनों में भी हैदराबाद [आज का आंध्रप्रदेश और तेलंगाना ] की अपनी सेना, रेल सेवा और डाक तार विभाग हुआ करता था. उस समय आबादी और कुल राष्ट्रीय उत्पाद की दृष्टि से हैदराबाद भारत का सबसे बड़ा राजघराना था. उसका क्षेत्रफल 82698 वर्ग मील था जो
कि इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक था.
हैदराबाद की आबादी का अस्सी फ़ीसदी हिंदू लोग थे जबकि अल्पसंख्यक होते हुए भी मुसलमान प्रशासन और सेना में महत्वपूर्ण पदों पर बने हुए थे.
उस पर तुर्रा ये भी था कि कट्टरपंथी क़ासिम राज़वी के नेतृत्व मे रज़ाकार हैदराबाद की आज़ादी के समर्थन में जन सभाएं कर रहे थे और उस इलाक़े से गुज़रने वाली ट्रेनों को रोक कर न सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिम यात्रियों पर हमले कर रहे थे बल्कि हैदराबाद से सटे हुए भारतीय इलाक़ों में रहने वाले हिन्दुओ का कत्लेआम कर रहे थे.
आजाद भारत का सबसे पहला आतंकी सन्गठन इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन था और आजाद भारत का पहला आतंकी कासिम रिजवी था .. हैदराबाद के निजाम ने कासिम रिजवी को हिन्दुओ का कत्लेआम करने का जिम्मा सौपा था .. कासिम रिजवी के समर्थकों को रजाकार कहा जाता था .. इस संगठन के पास बहुत हथियार थे और निजाम का समर्थन था ..इसलिए हैदराबाद स्टेट में हिन्दुओ का कत्लेआम होने लगा ..
नेहरु और माउन्टबेटन हैदराबाद को भारत में शामिल करने के पक्ष में नही थे .. लेकिन सरदार पटेल किसी भी कीमत पर हैदराबाद स्टेट को भारत गणराज्य में मिलाने के पक्ष में थे ...
सरदार पटेल ने के एम मुंशी को हैदराबाद में एजेंट-जनरल बनाकर भेजा .. मुंशी जी बिना वेतन इस पद पर जाने को राजी हुए .. और हैदराबाद की पल पल की खबर प्रधानमंत्री नेहरु को न देकर गृहमंत्री सरदार पटेल को दे रहे थे ...
निजाम ने जिन्ना को संदेश भेजकर ये जानने की कोशिश की थी कि क्या वह भारत के ख़िलाफ़ लड़ाई में हैदराबाद का समर्थन करेंगे? हैदराबाद का प्रधानमंत्री मीर लायक अली लगातार पाकितानी प्रधानमंत्री के सम्पर्क में था .. उसी समय गुप्त खबर आई की पाकिस्तान ने पुर्तगाली सरकार के साथ समझौता किया .. जिसके अनुसार उस समय पुर्तगाली सरकार के अधीन गोवा में हैदराबाद स्टेट के लिए नौसेना बेस बनेगा ..बदले में गोवा पर भारत के हमले की स्थिति में करांची से पाकिस्तान गोवा की मदद करेगा ...
निज़ाम के सेनाध्यक्ष मेजर जनरल एल एदरूस ने अपनी किताब 'हैदराबाद ऑफ़ द सेवेन लोव्स' में लिखा है कि निज़ाम ने उन्हें ख़ुद हथियार ख़रीदने यूरोप भेजा था. लेकिन वह अपने मिशन में सफल नहीं हो पाए थे क्योंकि हैदराबाद को एक आज़ाद देश के रूप में मान्यता नहीं मिली थी.
मज़े की बात ये थी कि एक दिन अचानक वह लंदन में डॉर्सटर होटल की लॉबी में माउंटबेटन से टकरा गए. माउंटबेटन ने जब उनसे पूछा कि वह वहाँ क्या कर रहे हैं तो उन्होंने झेंपते हुए जवाब दिया था कि वह वहाँ अपनी आंखों का इलाज कराने आए हैं.
माउंटबेटन ने मुस्कराते हुए उन्हें आँख मारी. लेकिन इस बीच लंदन में निज़ाम के एजेंट जनरल मीर नवाज़ जंग ने एक ऑस्ट्रेलियाई हथियार विक्रेता सिडनी कॉटन को हैदराबाद को हथियारों की सप्लाई करने के लिए राज़ी कर लिया.
भारत को जब ये पता चला कि सिडनी कॉटन के जहाज़ निज़ाम के लिए हथियार ला रहे हैं तो उसने इन उड़ानों पर प्रतिबंध लगा दिया.
सरदार पटेल के कड़े रुख से परेशान जब निज़ाम को लगा कि भारत हैदराबाद के विलय के लिए दृढ़संकल्प है तो उन्होंने ये पेशकश भी की कि हैदराबाद को एक स्वायत्त राज्य रखते हुए विदेशी मामलों, रक्षा और संचार की ज़िम्मेदारी भारत को सौंप दी जाए... लेकिन वो रज़ाकारों के प्रमुख क़ासिम राज़वी को इसके लिए राज़ी नहीं करवा सके.
रज़ाकारों की गतिविधियों ने पूरे भारत का जनमत उनके ख़िलाफ़ कर दिया. 22 मई को जब इत्तेहाद-ऊल-मुसलमीन के आतंकी यानी रजाकरो ने ट्रेन में सफ़र कर रहे हिंदुओं पर गंगापुर स्टेशन पर हमला बोला और तीस हिन्दुओ की हत्या की तो पूरे भारत में भारत सरकार की आलोचना होने लगी कि वो उनके प्रति नर्म रुख़ अपना रही है.
भारतीय सेना के पूर्व उपसेनाध्यक्ष लेफ़्टिनेंट जनरल एसके सिन्हा अपनी आत्मकथा स्ट्रेट फ्रॉम द हार्ट में लिखते हैं, "मैं जनरल करियप्पा के साथ कश्मीर में था कि उन्हें संदेश मिला कि सरदार पटेल उनसे तुरंत मिलना चाहते हैं. दिल्ली पहुंचने पर हम पालम हवाई अड्डे से सीधे पटेल के घर गए. मैं बरामदे में रहा जबकि करियप्पा उनसे मिलने अंदर गए और पाँच मिनट में बाहर आ गए. बाद में उन्होंने मुझे बताया कि सरदार ने उनसे सीधा सवाल पूछा जिसका उन्होंने एक शब्द में जवाब दिया."
सरदार ने उनसे पूछा कि अगर हैदराबाद के मसले पर पाकिस्तान की तरफ़ से कोई सैनिक प्रतिक्रिया आती है तो क्या वह बिना किसी अतिरिक्त मदद के उन हालात से निपट पाएंगे?
करियप्पा ने इसका एक शब्द का जवाब दिया 'हाँ' और इसके बाद बैठक ख़त्म हो गई.
इसके बाद सरदार पटेल ने हैदराबाद के ख़िलाफ़ सैनिक कार्रवाई को अंतिम रूप दिया. भारत के तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल रॉबर्ट बूचर इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ थे. उनका कहना था कि पाकिस्तान की सेना इसके जवाब में अहमदाबाद या बंबई पर बम गिरा सकती है.
दो बार हैदराबाद में घुसने की तारीख़ तय की गई लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते इसे रद्द करना पड़ा. निज़ाम ने गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी से व्यक्तिगत अनुरोध किया कि वे ऐसा न करें.
राजा जी और नेहरू की बैठक हुई और दोनों ने कार्रवाई रोकने का फ़ैसला किया. निज़ाम के पत्र का जवाब देने के लिए रक्षा सचिव एचएम पटेल और वीपी मेनन की बैठक बुलाई गई.
उस समय हैदराबाद स्टेट में चार संस्थाए सक्रिय थी
१- इत्तेहाद-ऊल- मुसलमीन जो पूरी तरह से भारत सरकार के खिलाफ थी और हैदराबाद स्टेट को अलग देश बनाने के पक्ष में थी ...
२- कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया --ये भी रजाकरो यानि इत्तेहाद के साथ थी और हैदराबाद को अलग देश बनाने के पक्ष में थी .
३- हैदराबाद राज्य कांग्रेस -- ये हैदराबाद को भारत में मिलाने के पक्ष में थी
4- आर्य समाज और आरएसएस -- ये दोनों पूरी तरह से हिन्दुओ के साथ थे और इत्तेहाद रजाकरो के कहर से हिन्दुओ को बचाने ले लगे थे और ये भी हैदराबाद को भारत में मिलाने के पक्ष में थे ..
फिर जब खबर मिली की हैदराबाद का प्रधानमंत्री मीर लायक अली पाकिस्तान भाग गया और वहाँ से सैनिक मदद लेने का जुगाड़ कर रहा है तो सरदार पटेल में भारतीय सेना को हैदराबाद पर हमला करने का आदेश दिया
नेहरू और राजा जी चिंतित थे कि इससे पाकिस्तान जवाबी कार्रवाई करने के लिए प्रेरित हो सकता है लेकिन चौबीस घंटे तक पाकिस्तान की तरफ़ से कुछ नहीं हुआ तो उनकी चिंता मुस्कान में बदल गई.
हाँ, जैसे ही भारतीय सेना हैदराबाद में घुसी, पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ाँ ने अपनी डिफ़ेंस काउंसिल की बैठक बुलाई और उनसे पूछा कि क्या हैदराबाद में पाकिस्तान कोई ऐक्शन ले सकता है?
बैठक में मौजूद ग्रुप कैप्टेन एलवर्दी (जो बाद में एयर चीफ़ मार्शल और ब्रिटेन के पहले चीफ़ ऑफ डिफ़ेंस स्टाफ़ बने) ने कहा ‘नहीं.’
लियाक़त ने ज़ोर दे कर पूछा ‘क्या हम दिल्ली पर बम नहीं गिरा सकते हैं?’
एलवर्दी का जवाब था कि हाँ ये संभव तो है लेकिन पाकिस्तान के पास कुल चार बमवर्षक हैं जिनमें से सिर्फ़ दो काम कर रहे हैं.' इनमें से एक शायद दिल्ली तक पहुँच कर बम गिरा भी दे लेकिन इनमें से कोई वापस नहीं आ पाएगा.'
भारतीय सेना की इस कार्रवाई को ऑपरेशन पोलो का नाम दिया गया क्योंकि उस समय हैदराबाद में विश्व में सबसे ज़्यादा 17 पोलो के मैदान थे.
पांच दिनों तक चली इस कार्रवाई में 1373 रज़ाकार मारे गए. हैदराबाद स्टेट के 807 जवान भी रहे. मारे ..भारतीय सेना ने अपने 66 जवान खोए जबकि 97 जवान घायल हुए.
रजाकरो का नेता कासिम अली पाकिस्तान भाग गया ...
और इस तरह से हैदराबाद [आज का आंध्रप्रदेश और तेलंगाना ] भारत के हिस्से बने
फोटो में सरदार पटेल में सामने समर्पण करते हुए हैदराबाद स्टेट के निजाम

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