सोमवार, 21 सितंबर 2015

जब आप भारत की राजधानी दिल्ली में अगर कभी घूमने आएँ तब आपको पता चलेगा कि आप "शाहजहां" रोड़ से निकलकर "अकबर" रोड़ पर पहुँच जायेंगे | आगे जाकर "बाबर" रोड़ पर मुड जायेंगे | फिर "हुमायं" रोड़ पर सीधे चले जाइयेगा | गोल चक्कर मिलेगा जहाँ से आप "तुगलक" लेन में घुस जायेंगे | "औरंगजेब" रोड़ पर आगे बढीयेगा | "सफदरजंग" रोड़ आ जाएगी , |इसके बाद तुगलाकबाद एवं जामिया नगर होते हुए कुतुबमीनार तक जाइए.... और जब इस सूफियाने माहौल में दम घुटने लगे तो "सराय कालेखाँ" होते हुए "निजामुद्दीन" रेलवे स्टेशन से अपने शहर की रेलगाड़ी में बैठिएगा और घर वापस आ जाइयेगा ....... लेकिन कहीं भी आपको नही लगेगा कि यह वही युगों युगों से साधू संतों , ऋषि मुनियों और सिद्ध पुरूषों द्वारा भुखे प्यासे जंगलों में रह कर तप कर करके बचाई हुई भारत भुमि है ? बड़े बड़े राजा , महाराजा , और योद्धाओं की महिनों तक भुखे रह रहकर , बहुत ही दुख , कष्ट , यातनाएं सह सहकर बचाई हुई भारत भुमि है ? क्या यही वो बड़े बड़े वीर शहीदों के बलिदान , अपने जीवन की कुर्बानीयाँ देकर बचाया हुआ भारत है ??? उन महापुरूषों का कहीं नामों निशान नही मिलेगा आपको... बस केवल देश के लुटेरों , आक्रमण कारीयों , गददारों और भारत व सनातन/हिन्दू धर्म के दुश्मनों की ही स्मृतियाँ मिलेंगी... आपको ऐसा लगेगा जैसे दिल्ली में नही बल्कि पाकिस्तान के किसी शहर में घुस गए हैं... !!! यह केवल तथाकथित नेहरू+गाँधी खानदान एवं वामपंथी इतिहासकारों की ही देन है..

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